बच्चों को खुश करें सू्र्य के प्रकाश को इन्द्रधनुषीय रंगों बदला दिखाकर और उनका ज्ञान भी बढ़ायें

आसमान में इन्द्रधनुष को देखकर बच्चे कितना आनन्दित होते हैं! अजी बच्चे तो क्या आपको भी मजा आ जाता है।

rainbowपर इन्द्रधनुष हमेशा थोड़े ही दिखता है? यह तो तभी दिखता है जब बारिश होते समय या उसके बाद सूर्य निकल आया हो। पर आप अपने बच्चों को इन्द्रधनुषीय रंगों को जब चाहे तब दिखा कर खुश कर सकते हैं बशर्तें कि उस समय सूर्य निकला होना चाहिये। इसके लिये आपको मात्र एक उथला प्लास्टिक का डिब्बा या कोई उथला बर्तन जिसमें पानी भरा जा सके, एक दर्पन और एक सफेद कागज की जरूरत पड़ेगी।

डिब्बे या बर्तन को सूर्य के प्रकाश में किसी टेबल या जमीन पर रखकर उसमें लगभग दो तिहाई पानी भर दें और उसमें दर्पन कोण बनाते हुए, जैसा कि नीचे चित्र में दर्शाया गया है, डाल दें। सूर्य से आने वाली प्रकाश बर्तन में पड़े दर्पन से परावर्तित होगी। परावर्तित प्रकाश के रास्ते में सफेद कागज को हाथ से पकड़ें। कागज में इन्द्रधनुष के रंग दिखाई पड़ने लगेंगे।

विज्ञान के खेल

विज्ञान के खेल

अब अपने बच्चों को समझायें कि क्यों होता है ऐसा। पहले उन्हें यह बतायें कि इन्द्रधनुष क्यों बनता है। वास्तव में सूर्य का प्रकाश सात रंगों से मिलकर बना हुआ है। किसी प्रिज्म के सहारे इन रंगों को अलग अलग किया जा सकता है। आसमान में स्थित बादलों में निहित पानी की बूँदें प्रिज्म का कार्य करती हैं। जब सूर्य का प्रकाश इन पानी की बूँदों पर पड़ता है तो प्रकाश के अपवर्तन Refraction एवं परावर्तन reflection के कारण वह अपने मूल रंगों में परिवर्तित हो जाता है और इन्द्रधनुष दिखाई पड़ता है। इसी प्रकार ऊपर के हमारे उपरोक्त प्रोजेक्ट में पानी और दर्पन मिलकर प्रिज्म का काम करते हैं और सूर्य का प्रकाश इन्द्रधनुषीय रंगों में विभाजित हो जाता है।

“कुकुर के मुँह में लौठी हुड़सना” … याने कि किसी को जबरन छेड़ना

मानव मस्तिष्क भी विचित्र वस्तु है। कभी-कभी यह किसी को जबरन छेड़ कर मौज लेता है। इसे ही छत्तीसगढ़ी हाना (लोकोक्ति) में “कुकुर के मुँह में लौठी हुड़सना” कहा जाता है। मनोविज्ञान के अनुसार यह एक मानसिक खेल है जो अक्सर महज मौज-मजा लेने के लिये किया जाता है और संसार का शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसने कभी भी ऐसा न किया हो। एक सीमा तक ही यह खेल जारी रहे तो कुछ अधिक नुकसानदायक नहीं है यह किन्तु प्रायः यह खेल अपनी सीमा पार कर जाती है और साधारण चुहलबाजी एक विवाद का रूप धारण कर लेती है। बेहतरी इसी में है कि हम इस मानसिक खेल से बच कर ही रहें।

लोकोक्ति की बात चली है तो आपको हम यह बता दें कि जब जीवन का यथार्थ ज्ञान नपे-तुले शब्दों में मुखरित होता है तो वह लोकोक्ति बन जाता है याने कि लोकोक्ति एक प्रकार से “गागर में सागर” होता है। छत्तीसगढ़ी में लोकोक्ति को “हाना” के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ी भाषा में बहुत से सुन्दर हाना हैं जिन्हें उनके हिन्दी अर्थसहित जानकर आपको बहुत आनन्द आयेगा। यहाँ पर हम कुछ ऐसे ही रोचक छत्तीसगढ़ी हाना उनके हिन्दी अर्थ सहित प्रस्तुत कर रहे हैं

  • “अपन पूछी ला कुकुर सहरावै” अर्थात् अपनी तारीफ स्वयं करना याने कि अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना।
  • “चलनी में दूध दुहय अउ करम ला दोष दै” अर्थात् खुद गलत काम करना और किस्मत को दोषी ठहराना।
  • “घर के जोगी जोगड़ा आन गाँव के सिद्ध” अर्थात् घर के ज्ञानी को नहीं पूछना और दूसरे गाँव के ज्ञानी को सिद्ध बताना याने कि आप कितने ही ज्ञानी क्यों न हों घर में आपको ज्ञानी नहीं माना जाता।
  • “अपन मरे बिन सरग नइ दिखय” अर्थात् स्वयं किये बिना कोई कार्य नहीं होता।
  • “आज के बासी काल के साग अपन घर में काके लाज!” अर्थात् अपने घर में रूखी-सूखी खाने में काहे की शर्म।
  • “अड़हा बैद परान घातिया” अर्थात् नीम-हकीम खतरा-ए-जान।
  • “कउवा के रटे ले बइला नइ मरय” अर्थात् कौवा के रटने से बैल मर नहीं जाता याने कि किसी के कहने से किसी की मृत्यु नहीं होती।
  • “उप्पर में राम-राम तरी में कसाई” अर्थात् मुँह में राम बगल में छुरी।
  • “करनी दिखय मरनी के बेर” अर्थात् किये गये अच्छे या बुरे कर्मों की परीक्षा मृत्यु के समय होती है।
  • “खेलाय-कुदाय के नाव नइ गिराय पराय के नाव” अर्थात् प्रशंसा कम मिलती है और अपयश अधिक।

ऐसे भी बीमे होते हैं

एक ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट खिलाड़ी ने अपनी अनूठी मूंछों के लिए लाखों डॉलर की राशि की बीमा पॉलिसी ली थी।

1957 में खाद्य समीक्षक (food critic) इगोन रोने (Egon Ronay) ने अपने स्वाद के लिये 400,000 डॉलर का बीमा करवाया था।

कीथ रिचर्ड्स (Keith Richards), जिन्हें गिटारिस्ट फॉर रोलिंग स्टोन्स रोलिंग स्टोन्स (guitarist for the Rolling Stones) के नाम से भी जाना जाता है, ने अपनी उंगलियों का बीमा करवाया था।

फ्लेम्बोयान्ट लिबेरस Flamboyant Liberace ने अपने पियानो बजाने वाले हाथ का बीमा करवाया था।

1980 के दशक में Bruce Springstein ने अपनी आवाज का $6 million के लिये बीमा करवाया था।

बीमा
गायक Tom Jones ने अपने छाती के बालों का $7 million के लिये बीमा करवाया था।

बीमा
एक अफवाह यह उड़ी थी कि जेनिफ़र लोपेज़ (Jennifer Lopez) ने कई मिलियन या बिलियन डॉलर के लिये अपनी नितम्बों का बीमा करवाया था।

बीमा
स्रोतः http://abcinsuranceleads.com/pages/strange-insurance-policies.php

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1953 से 1993 तक के बिनाका गीतमाला में सर्वाधिक लोकप्रिय गानों की सूची

नीचे प्रस्तुत है बिनाका गीतमाला के अनुसार वर्षवार सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों की सूचीः

वर्ष गीत फिल्म संगीतकार गीतकार गायक/गायिका
1953 ये जिन्दगी उसी की है अनारकली सी रामचंद राजेन्द कृष्ण लता मंगेषकर
1954 जायें तो जायें कहाँ टैक्सी ड्राइव्हर सचिनदेव बर्मन साहिर लुधियानवी तलत महमूद/लता मंगेषकर
1955 मेरा जूता है जापानी श्री 420 शंकर जयकिशन शैलेन्द्र मुकेश
1956 ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ सीआईडी ओ पी नैयर मजरूह सुल्तानपुरी मोहम्मद रफी, गीतादत्त
1957 जरा सामने तो आओ छलिये जनम जनम के फेरे एस एन त्रिपाठी भरत व्यास मोहम्मद रफी, लता मंगेषकर
1958 है अपना दिल तो आवारा सोलहवाँ साल सचिनदेव बर्मन मजरूह सुल्तानपुरी हेमन्त कुमार
1959 हाल कैसा है जनाब का चलती का नाम गाड़ी सचिनदेव बर्मन मजरूह सुल्तानपुरी हेमन्त कुमार, आशा भोसले
1960 जिंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात बरसात की रात रोशन साहिर लुधियानवी मोहम्मद रफी, लता मंगेषकर
1961 तेरी प्यारी प्यारी सूरत को ससुराल शंकर जयकिशन हसरत जयपुरी मोहम्मद रफी
1962 एहसान तेरा होगा मुझपर जंगली शंकर जयकिशन हसरत जयपुरी मोहम्मद रफी/लता मंगेषकर
1963 जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा ताजमहल रोशन साहिर लुधियानवी मोहम्मद रफी, लता मंगेषकर
1964 मेरे मन की गंगा संगम शंकर जयकिशन शैलेन्द्र मुकेश, वैजयन्तीमाला
1965 जिस दिल में बसा था प्यार तेरा सहेली कल्याणजी आनन्दजी इन्दीवर मुकेश/लता मंगेषकर
1966 बहारों फूल बरसाओ सूरज शंकर जयकिशन हसरत जयपुरी मोहम्मद रफी
1967 सावन का महीना पवन करे सोर मिलन लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल आनन्द बख्शी मुकेश, लता मंगेषकर
1968 दिल विल प्यार व्यार शागिर्द लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल आनन्द बख्शी लता मंगेषकर
1969 कैसे रहूँ चुप इन्तेकाम लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल राजेन्द्र कृष्ण लता मंगेषकर
1970 बिंदिया चमकेगी दो रास्ते लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल आनन्द बख्शी लता मंगेषकर
1971 जिंदगी एक सफर है सुहाना अंदाज शंकर जयकिशन हसरत जयपुरी किशोर कुमार/आशा भोसले
1972 दम मारो दम हरे रामा हरे कृष्णा राहुलदेव बर्मन आनन्द बख्शी आशा भोसले
1973 यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी जंजीर कल्याणजी आनन्दजी गुलशन बावरा मन्ना डे
1974 मेरा जीवन कोरा कागज कोरा ही रह गया कोरा कागज कल्याणजी आनन्दजी एम जी हश्मत किशोर कुमार
1975 बाकी कुछ बचा तो मँहगाई मार गई रोटी कपड़ा और मकान लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल वर्मा मलिक लता मंगेषकर, मुकेश, जानीबाबू, नरेन्द्र
1976 कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है कभी कभी खैयाम साहिर लुधियानवी मुकेश
1977 हुस्न हाजिर है मुहब्बत की सजा पाने को लैला मजनूँ मदन मोहन साहिर लुधियानवी लता मंगेषकर
1978 अँखियों के झरोखे से मैंने देखा जो अँखियों के झरोखे से रवीन्द्र जैन रवीन्द्र जैन हेमलता
1979 खइके पान बनारस वाला डॉन कल्याणजी आनन्द जी अंजान किशोर कुमार
1980 डफली वाले डफली बजा सरगम लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल आनन्द बख्शी लता मंगेषकर, मोहम्मद रफी
1981 मेरे अँगने में तुम्हारा क्या काम है लावारिस कल्याणजी आनन्दजी अंजान अमिताभ बच्चन, अलका याग्निक
1982 अंग्रेजी में कहते हैं खुद्दार राजेश रोशन मजरूह सुल्तानपुरी किशोर कुमार, लता मंगेषकर
1983 शायद मेरी शादी का खयाल सौतन उषा खन्ना सावन कुमार किशोर कुमार, लता मंगेषकर
1984 तू मेरा हीरो है हीरो लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल आनन्द बख्शी अनुराधा पौढ़वाल, मनहर उधास
1985 सुन सायबा सुन राम तेरी गंगा मैली रवीन्द्र जैन रवीन्द्र जैन लता मंगेषकर
1986 यशोदा का नन्दलाला संजोग लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल अंजान लता मंगेषकर
1987 चिट्ठी आई है नाम लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल आनन्द बख्शी पंकज उधास
1988 पापा कहते हैं कयामत से कयामत तक आनन्द मिलिन्द मजरूह सुल्तानपुरी अलका याग्निक, उदित नारायण
1989 माय नेम इज लखन राम लखन लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल आनन्द बख्शी मोहम्मद अज़ीज़
1990 गोरी है कलाइयाँ आज का अर्जुन भप्पी लहरी अंजान लता मंगेषकर, शब्बीर कुमार
1991 देखा है पहली बार साजन नदीम-श्रवण समीर अलका याग्निक, एस पी बालसुब्रमनियम
1992 मैने प्यार तुम्हीं से किया है फूल और काँटे नदीम-श्रवण समीर कुमार सानू, अनुराधा पौढ़वाल
1993 चोली के पीछे खलनायाक लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल आनन्द बख्शी अलका याग्निक, इला अरुण

बिनाका गीतमाला

बिनाका गीतमाला रेडियो पर प्रसारित होने वाला भारतीय फिल्मों के गीतों पर आधारित प्रथम काउंट डाउन (count down) कार्यक्रम था जिसकी जो कि सन् 1952 से शुरू होकर सन् 1994 तक चली। एक समय में बिनाका गीतमाला इतना अधिक लोकप्रिय था कि लोग इसे सुनने के लिये अपने जरूरी से जरूरी काम को भी टाल दिया करते थे। भारत के करोड़ों लोग इस प्रोग्राम के दीवाने थे।

बिनाका गीतमाला का प्रसारण “सीलोन ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन”, जिसे कि रेडियो सीलोन के नाम से जाना जाता था और जो बाद में “श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन” हो गया, से प्रत्येक बुधवार की रात्रि 8 बजे हुआ करता था। आरम्भ में यह प्रोग्राम आधे घंटे का हुआ करता था किन्तु बाद में इसकी लोकप्रियता को ध्यान में रख कर इसे एक घंटे का कर दिया गया था। संगीत के इस अत्यन्त लोकप्रिय कार्यक्रम में लोकप्रियता के आधार पर भारतीय फिल्मों के गीतों को सुनवाया जाता था और इसे विख्यात उद्घोषक अमीन सयानी अपनी मनमोहक अंदाज एवं आवाज के साथ प्रस्तुत किया करते थे। भारतीय फिल्मों की मेलॉडियस संगीत और अमीन सयानी की कर्णप्रिय आवाज पूरे एक घंटे तक श्रोताओं को भाव विभोर कर के रेडियो से चिपका के रख दिया करती थी।

बिनाका गीतमाला में गीतों को उनकी लोकप्रियता के क्रम के अनुसार सुनवाया जाता था। चयन किये गये सोलह गानों में सबसे कम लोकप्रिय गाना सबसे पहले और सबसे अधिक लोकप्रिय गाना सबसे अंत में बजा करता था। कार्यक्रम का आरम्भ शानदार बिगुल बजने के साथ हुआ करता था। गानों के रेकॉर्ड की बिक्री गानों की लोकप्रियता का पैमाना हुआ करता था।

बाद में बिनाका गीतमाला के नाम को दो बार बदला गया। पहली बार इसका नाम बदल कर सिबाका गीतमाला किया गया और दूसरी बार कोलगेट गीतमाला। कालान्तर में सिबाका गीतमाला को सिबाका संगीतमाला के नाम से विविध भारती से भी प्रसारित किया गया।

बिनाका गीतमाला के आरम्भ होने के 39 वर्षों के बाद टेलीविजन पर फिल्मी गीतों के काउंट डाउन (count down) कार्यक्रम सुपरहिट मुकाबला शुरू हो गया जिसके कारण इस इस कार्यक्रम का प्रभाव कम होने लगा। लोकप्रियता कम हो जाने पर कार्यक्रम के 42वें वर्ष में इसे बंद कर दिया गया।

पृथ्वी के कुछ रहस्यमय एवं रोमांचक स्थान

हमारे ग्रह पृथ्वी पर कुछ ऐसे स्थान हैं जो अत्यधिक रहस्यमय होने के साथ ही साथ अत्यन्त रोचक भी हैं। आप ऐसे स्थानों अन्तरिक्ष से लिये गये चित्रों को गूगल अर्थ की सहायता से घर बैठे देख सकते हैं।

यहाँ पर ऐसे ही कुछ स्थानों के चित्र दिये जा रहे हैं साथ ही साथ अक्षांश एवं देशांश में उन स्थानों की स्थिति भी दी जा रही है ताकि आप उन स्थानों को गूगल अर्थ की सहायता से घर बैठे ही अपने कम्प्यूटर पर देख सकें। इसके लिये आपको इन स्थानों की स्थति को गूगल अर्थ की “फ्लाई टू” बॉक्स में डालकर मात्र अपने की बोर्ड के एंटर बटन को दबाना है और क्षणमात्र में पहुँच जायेंगे आप उन स्थानों में!

हम आपको बता दें कि गूगल अर्थ (Google Earth) हमारे ग्रह पृथ्वी की आभासी यात्रा करने के लिये बनाया गया एक आभासी एक्सप्लोरर (virtual Explorer) है जिसकी सहायता से आप माउस से सिर्फ एक क्लिक कर के संसार के किसी भी स्थान की यात्रा कर सकते हैं चाहे वह स्थान आपके स्थान से भौगोलिक दृष्टि से कितनी ही दूरी पर स्थित हो। याने कि गूगल अर्थ की सहायता से आप बात की बात में विश्व के किसी भी स्थान पर जा सकते हैं।

गूगल अर्थ को गूगल के आफिसियल वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है।

Djoser, Saqqara का पिरामिड
29 52 13.58N, 31 13 01.02E

रेत पर बना स्पायरल
48 21′10.18″N 11 43′56.72″E

ge2

शेर का चित्र
51 50′54.34″N 0 33′16.49″W

ge3

पहाड़ पर रहस्यमय आकृति
40 27′24.72″N 93 23′33.75″E

ge4
पहाड़ पर त्रिकोण की आकृति
33 44′17.45″N 112 38′0.17″W


उँगली का निशान
50°50′38.73″N 0°10′18.91″W


नाज़ी का स्वास्तिक आकार भवन
32°40′34.19″N 117° 9′27.58″W

ge6

रहस्यमय गोले
39°39′38.05″N 115°58′33.73″W

ge7

कामदेव का पूजन होता था वसन्तोत्सव के दिन

आज हम वसन्त ऋतु में वसन्त पंचमी और होली त्यौहार मनाते हैं किन्तु प्राचीन काल में वसन्तोत्सव मनाया जाता था। वसन्तोत्सव, जिसे कि मदनोत्सव के नाम से भी जाना जाता है, मनाने की परम्परा हमारे देश में अत्यन्त प्राचीनकाल से ही रही है। संस्कृत के प्रायः समस्त काव्यों, नाटकों, कथाओं में कहीं न कहीं पर वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव या मदनोत्सव का वर्णन अवश्य ही आता है। वसन्त को ऋतुराज माना गया है क्योंकि यह मानव की मादकता एवं कोमल भावनाओं को उद्दीप्त करता है। वसन्त पंचमी से लेकर रंग पंचमी तक का समय वसन्त की मादकता, होली की मस्ती और फाग का संगीत से सभी के मन को मचलाते रहता है। टेसू और सेमल के रक्तवर्ण पुष्प, जिन्हें कि वसन्त के श्रृंगार की उपमा दी गई है, सभी के मन को मादकता से परिपूर्ण कर देते हैं। शायद यही कारण है वसन्तोत्सव मनाने की।

वसन्तोत्सव का दिन कामदेव की पूजा की जाती थी। महाकवि “भवभूति” के ‘मालती-माधव’ संस्कृत नाटक के अनुसार एक विशेष मदनोद्यान का निर्माण करके वहाँ पर मदनोत्सव मनाया जाता था। मदनोद्यान के केन्द्र में कामदेव का मन्दिर होता था। इसी मदनोद्यान में नगर के समस्त स्त्री-पुरुष एकत्र होते, फूल चुनकर हार बनाते, एक दूसरे पर अबीर-कुंकुम डालते और नृत्य-संगीत आदि का आयोजन करते थे। समस्त आयोजनों के सम्पन्न होने के पश्चात अन्त कामदेव की पूजा करने के साथ उत्सव का समापन हुआ करता था। राज परिवार तथा नगर के प्रतिष्ठित परिवारों की कन्यायें भी पूजन के हेतु यहाँ आया करती थीं। उनका मुख्य उद्देश्य भगवान कन्दर्प की कृपा से मनोवांछित वर की प्राप्त करने ही होती थी।

उल्लेखनीय है कि कामदेव प्राणीमात्र की कोमल भावनाओं के देवता हैं और उन्हें मदन, मन्मथ, प्रद्युम्न, मीनकेतन, कन्दर्प, दर्पक, अनंग, काम, पञ्चशर, स्मर, शंबरारि, मनसिज (मनोज), कुसुमेषु, अनन्यज, पुष्पधन्वा, रतिपति, मकरध्वज तथा विश्वकेतु के नाम से भी जाना जाता है।

रामानन्द सागर का टी.व्ही. सीरियल रामायण

रामानन्द सागर निर्मित “रामायण” टी.व्ही. सीरियल भारत के सफलतम टी.व्ही. सीरियल्स में अपना स्थान रखता है। रामायण टी.व्ही. सीरियल में कुछ 78 एपिसोड थे। इस सीरियल का प्रदर्शन दूरदर्शन के द्वारा 25 जनवरी 1987 से लेकर 31 जुलाई 1988 तक किया गया। सीरियल का प्रदर्शन प्रत्येक रविवार को भारतीय समय के अनुसार पूर्वाह्न 9:30 बजे किया जाता था।

अपने मूल प्रसारण के दौरान, रामायण अत्यधिक लोकप्रिय था तथा इसने 100 मिलियन से अधिक दर्शकों को आकर्षित किया था। इसकी लोकप्रियता एक ऐसी सीमा तक पहुँच गई थी कि इसके प्रसारण के समय सारा भारत एक प्रकार से बंद हो जाता था क्योंकि सभी लोग अपना काम-धाम रोक कर टेलिविजन के सामने पहुँ जाया करते थे। यहाँ तक कि उस दौरान रेलगाड़ियों को भी पूरे रामायण सीरियल के एपिसोड के प्रसारण तक के लिये किसी न किसी स्टेशन में रोक दिया जाता था।पूरे एपिसोड के प्रसारण तक बस, ट्रक इत्यादि गाड़ियाँ रोक दी जाती थीं और लोग टेलिविजन के सामन इस सीरियल को देखने के लिये पहुँच जाया करते थे।

रामायण सीरियल के मुख्य कलाकार थे:

  • अरुण गोविल (राम)
  • दीपिका (सीता)
  • सुनील लहरी (लक्ष्मण)
  • संजय जोग (भरत)
  • दारसिंग (हनुमान)
  • अरविन्द त्रिवेदी (रावण)

तीन देवियाँ

स्माइल ‘जगदलपुरी’

नेता

खादी नित पहना करें, सूरत है मनहूस।
तीन देवियाँ साथ हैं, चंदा, थैली, घूस॥

साहब

रिश्वत खाकर बढ़ गया, बड़े साब का पेट।
तीन देवियाँ साथ हैं, चाय, पान सिगरेट॥

थानेदार

छात्र पुलिस संघर्ष में, टूट गई है टाँग।
तीन देवियाँ साथ हैं, व्हिस्की, गाँजा, भाँग॥

क्लर्क

बहे पसीना देह से, तनिक न आवे चैन।
तीन देवियाँ साथ हैं, फाइल, चिट्ठी, पैन॥

छात्र

पीट दिया आचार्य को, करी खोपड़ी ठूँठ।
तीन देवियाँ साथ हैं, हाकी, पत्थर, बूट॥

महिलाएँ

फिल्म देखने को चली, महिलाओं की टीम।
तीन देवियाँ साथ हैं, रूज़, पाउडर, क्रीम॥

गृहस्थ

दर्जन भर बच्चे हुये, किस्मत का है खेल।
तीन देवियाँ साथ हैं, राशन, लकड़ी, तेल॥

पत्नी

घर आने में रात को, पति हो जायें लेट।
तीन देवियाँ साथ हैं, चिमटा, बेलन, प्लेट॥

मुन्ना

भाग गये स्कूल से, देख पिता जी दंग।
तीन देवियाँ साथ हैं, मंझा, डोर, पतंग॥

कुत्ता

मेम साब को देखकर, फौरन पूँछ हिलाय,
तीन देवियाँ साथ हैं, हलवा, रोटी, चाय॥

स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द

रामकृष्ण मिशन की स्थापना करने वाले और सम्पूर्ण संसार में भारत के गौरव को प्रचारित करने वाले स्वामी विवेकानन्द भला कौन नहीं जानता। विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी सन्‌ 1863 को हुआ था। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखने वाले नरेन्द्र के पिता श्री विश्वनाथ दत्त अपने पुत्र को भी अंग्रेजी की शिक्षा दिला कर पाश्चात्य सभ्यता में ढालना चाहते थे। किन्तु अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि के स्वामी नरेन्द्र की परमात्मा को पाने की प्रबल लालसा थी। अतः वे ब्रह्म समाज के अनुयायी हो गये। बाद में जब उनकी भेंट स्वामी रामकृष्ण परमहंस से हुई तो उनसे प्रभावित होकर वे उनके शिष्य हो गये। रामकृष्ण परमहंस जी ने नरेन्द्र को सन्यास की दीक्षा दी और उनका नाम स्वामी विवेकानन्द हो गया।

स्वामी विवेकानन्द वेदान्त के प्रख्यात ज्ञाता एवं प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु साथ ही साथ वे एक महान वक्ता भी थे। सन् 1893 में अमेरिका के शिकागो नगर में आयोजित विश्व धर्म महासम्मेलन में उन्होंने सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। वहाँ पर विवेकानन्द के भाषण ने लोगों को ऐसा प्रभावित किया कि भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में पँहुच गया।

स्वामी विवेकानन्द ने 1 मई सन् 1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना किया था। आज भी रामकृष्ण मिशन की शाखाएँ विश्व के सभी देशों में कार्यरत हैं।

4 जुलाई सन्‌ 1902 को भारत के गौरव स्वामी विवेकानन्द जी का स्वर्गवास हो गया।