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लेखः परमानंद रेड्डी
डी/19 सेक्टर-1 देवेन्द्र नगर, रायपुर
फो. – 09303904649

भारत से अपना बिस्तर-बोरिया लपेट कर गए अंग्रेजों को साठ वर्ष से अधिक हो गया है,पर अंग्रेजी शिक्षा (English Education) आज भी जारी है । अंत समय में भारत के गली-कूचों  में भी “अंग्रेजों भारत छोड़ो” (Quit India) का नारा लगने लगा था। पर बड़े आश्चर्य की बात है कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी हम भारतीयों के मन में अंग्रेजों की भाषा और संस्कृति का मोह कम होने की बजाय दिन प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहा है। गली कूचों में अंग्रेजी भाषा के काण्वेन्ट स्कूलों की भरमार होते जा रही है जो अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति के विस्तार का केन्द्र बन गए हैं। जिस परिवार में सदस्यों को इंग्लिश का ‘ई’ भी नहीं मालूम, उस परिवार में बच्चे अपनी माँ को “मम्मी” या “मॉम” बोलते नजर आते हैं। हमारे “माँ” शब्द में जो स्वाभाविकता, जो मिठास, जो गहराई और जो अंतरंगता है, वह “मम्मी” या “मॉम” शब्द में कहाँ है? “माँ” शब्द का उच्चारण हृदय को पारकर, ॐ या राम की तरह, नाभि स्थान से उच्चारित होता प्रतीत होता है, जबकि “मम्मी” या “मॉम” शब्द का उच्चारण हमारे कण्ठ स्थल को भी छू नहीं पाता। फिर भी लोग अंग्रेजियत के दीवाने हैं। हमारे बच्चे चरण वंदना, प्रणाम या नमस्कार के बदले “हाय” या “बाय” करते नजर आते हैं। “सुन्दरता” की जगह “विद्रूपता” को अपनाने में आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है?

अब तो हमारे देश में ऐसा माहौल बनते जा रहा है कि हमारे सभ्यता, संस्कृति और शिक्षा का मापदण्ड अंग्रेजियत को माना जाने लगा है। अंग्रेजियत से इतना अधिक लगाव देखकर ऐसा लगता है कि हमने आखिर अंग्रेजों को भारत से भगाया ही क्यों था? यदि हम उनसे मिन्नत करते कि हमें केवल “सत्ता की कुर्सी” सौंप दो और शान से भारत में ही रहकर हम भारतवासियों को अंग्रेजियत में पारंगत कर दो तो शायद वे इस शर्त को बेझिझक शीघ्र स्वीकार कर लेते और हमें भी अंग्रेजियत के रंग में रंगने इतना अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ता।

क्या यह हमारे लिए गर्व की बात है कि हमारे देश का नाम भारत न होकर “इण्डिया” ज्यादा प्रचलन में है? हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी होने के बावजूद, वह आज भी अंग्रेजी भाषा की दासी बनी हुई है तथा हमारी संसद में, महत्वपूर्ण गोष्ठियों में, सर्वोच्च न्यायालय तथा सभी उच्च न्यायालयों में सम्पूरण कार्य तथा शासकीय कार्यालयों का अधिकांश कार्य आज भी बड़ी शान से अंग्रेजी में चलाया जाता है। हमारे बच्चों की आधे से ज्यादा क्षमता एवं ऊर्जा केवल अंग्रेजी भाषा का व्याकरण और स्पैलिंग समझने में ही समाप्त हो जाती है। उन्हें हम आज तक यह समझा नहीँ पाये हैं कि अंग्रेजी भाषा का शब्द PUT पुट लेकिन BUT बट क्यों होता है? अंग्रेजी भाषा की इस भूल-भुलैया एवं विलक्षणता के कारण हमारे बच्चों के पास किसी भी विषय की गहराई में जाने, उसे समझने तथा ज्ञान बढ़ा कर “नोबल प्राइज” अर्जित करने  के लिए क्षमता तथा ऊर्जा शेष ही कहाँ बचती है? जिस प्रकार एक जमाने में अंग्रेजी साम्राज्य में सूर्य कभी अस्त नहीं होता था, उसी प्रकार भारत में भी अंग्रेजियत बरकरार बनी रहेगी, इसमें किसी भी प्रकार की आशंका या शक का कोई कारण दूर-दूर तक भी नहीं दिखाई पड़ रहा है। लगता है एक दिन हमारी देश-भक्ति का मापदण्ड भी यह अंग्रेजेयत बन कर ही रहेगी। किसी को कोई आपत्ति करने का साहस भी नहीं होगा। Long live English language and English culure (अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजी सभ्यता एवं संस्कृति जिंदाबाद), यह हम सब भारतीयों का आज का नारा और अंग्रेजों के प्रति हमारी आदरांजलि भी है। अंग्रेजों ने अपने साम्राज्य को सुदृढ़ बनाने एक मुहावरा का आविष्कार किया था कि “King can do no wrong” (राजा कभी कोई गलती नहीं करता) उसी प्रकार हम भी अंग्रेजी सभ्यता को आदरांजलि तथा अपनी सभ्यता को श्रद्धांजलि देते हुए बड़ी शान से आज निःसंकोच कह सकते हैं कि अंग्रेजी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता में लाख विसंगतियाँ होने के बावजूद वह हमें अपने प्राणों से भी ज्यादा प्रिय है। क्योंकि प्यार अंधा होता है (Love is blind) इसलिए हम लाचार हैं। इस मामले में हो सके तो हमें माफ करना – अंग्रेजों को भारत से भगा देने का हम शायद तहेदिल से प्रायश्चित कर रहे हैं। इसीलिए लोग ठीक ही कहते हैं कि – “अंग्रेज तो चले गए, पर अपनी औलाद यहाँ छोड़ गए”।

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