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प्रस्तुत है श्री हरिवंश राय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan) की सुप्रसिद्ध रचना मुझे पुकार लो (Mujhe Pukar Lo)

इसलिए खड़ा रहा
कि तुम मुझे पुकार लो !

(1)

ज़मीन है न बोलती
न आसमान बोलता,
जहान देखकर मुझे
नहीं ज़बान खोलता,
नहीं जगह कहीं जहाँ
न अजनबी गिना गया,
कहाँ-कहाँ न फिर चुका
दिमाग-दिल टटोटलता,
कहाँ मनुष्य है कि जो
उम्मीद छोड़कर जिया,
इसीलिए खड़ा रहा
कि तुम मुझे पुकार लो!

(2)

तिमिर-समुद्र कर सकी
न पार नेत्र की तरी,
विनिष्ट स्वप्न से लदी,
विषाद याद से भरी,
न कूल भूमि का मिला,
न कोर भोर की मिली,
न कट सकी, न घट सकी,
विरह भरी विभावरी,
कहां मनुष्य है जिसे
कमी खली न प्यार की,
इसीलिए खड़ा रहा
कि तुम मुझे दुलार लो!

(3)

उजाड़ से लगा चुका
उम्मीद मैं बहार की,
निदाघ से उम्मीद की
बसंत के बयार की,
मरुस्थली मरीचिका
सुधामयी मुझे लगी,
अँगार से लगा चुका
उम्मीद मैं तुषार की,
कहाँ मनुष्य है जिसे
न भूल शूल सी गड़ी
इसीलिए खड़ा रहा
कि भूल को सुधार लो!
इसीलिए खड़ा रहा
कि तुम मुझे पुकार लो!

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