Archives for हमारी हिन्दी (Hindi – Our Pride)
किसी साहित्यकार की कृति का प्रत्येक दृष्टिकोण से अवलोकन कर निष्पक्ष भाव से उसके गुण-दोषों के प्रकटीकरण को आलोचना कहा जाता है। किसी भी कृति का सही मूल्यांकन करने के लिए आलोचक का निष्पक्ष, तटस्थ और पूर्वाग्रह से मुक्त होना अत्यावश्यक है।
बालकृष्ण भट्ट, महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. नगेनद्र आदि साहित्यकार हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक माने जाते हैं।
उपन्यास हिन्दी गद्य की विधाओं में से एक प्रमुख विधा है। उपन्यास का अर्थ है प्रस्तुत करना। उपन्यास लेखक अपने उपन्यास के पात्रों के चरित्र-चित्रण के बहाने तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, सास्कृतिक तथा आर्थिक वातावरण का प्रस्तुतीकरण करता है।
हिन्दी उपन्यासों का प्रारम्भ भारतेन्दु युग से हुआ। भारतेन्दु युग के प्रमुख उपन्यास हैं बाबू देवकीनन्दन खत्री रचित “चन्द्रकान्ता” और “चन्द्रकान्ता सन्तति”, बालकृष्ण भट्ट रचित “नूतन ब्रह्मचारी” हरिऔध रचित “अधखिला फूल” और “ठेठ हिन्दी का ठाठ”, अम्बिकादत्त व्यास रचित “आदर्श-वृत्तान्त” आदि।
बाद में उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का उदय हुआ जिन्होंने विषय, भाषा, शैली आदि की दृष्टि से उपन्यास विधा में उल्लेखनीय परिवर्तन किया। प्रेमचंद के प्रमुख उपन्यास हैं – गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि आदि। प्रेमचन्द के काल में जयशंकर ‘प्रसाद’, आचार्य चतुरसेन, भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर, विश्वम्भर नाथ कौशिक, वृन्दावन लाल वर्मा आदि लेखकों ने उपन्यास विधा के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। “कंकाल”, “वैशाली की नगरवधू”, “सोमनाथ”, “चित्रलेखा”, “तितली”, “मृगनयनी” आदि उस युग के श्रेष्ठतम उपन्यास हैं।
हिन्दी के अन्य उपन्यासकारों में यशपाल, फणीश्वर नाथ ‘रेणु’, रांगेय राघव, धर्मवीर भारती, विष्णु प्रभाकर, हिमांशु जोशी, भीष्म साहनी, राजेन्द्र यादव, शिवानी आदि नाम उल्लेखनीय हैं।
अंग्रेजी में जिसे ‘शार्ट स्टोरी’ कहते हैं उसी का प्रचलन हिंदी में कहानी के नाम से हुआ। बंगला में इसे गल्प कहा जाता है। कहानी ने अंग्रेजी से हिंदी तक की यात्रा बंगला के माध्यम से की। कहानी गद्य कथा साहित्य का एक अन्यतम भेद तथा उपन्यास से भी अधिक लोकप्रिय साहित्य का रूप है।
मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना तथा सुनना मानव का आदिम स्वभाव बन गया। इसी कारण से प्रत्येक सभ्य तथा असभ्य समाज में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में कहानियों की बड़ी लंबी और सम्पन्न परंपरा रही है। वेदों, उपनिषदों तथा ब्राह्मणों में वर्णित ‘यम-यमी’, ‘पुरुरवा-उर्वशी’, ‘सौपणीं-काद्रव’, ‘सनत्कुमार-नारद’, ‘गंगावतरण’, ‘श्रृंग’, ‘नहुष’, ‘ययाति’, ‘शकुन्तला’, ‘नल-दमयन्ती’ जैसे आख्यान कहानी के ही प्राचीन रूप हैं।
प्राचीनकाल में सदियों तक प्रचलित वीरों तथा राजाओं के शौर्य, प्रेम, न्याय, ज्ञान, वैराग्य, साहस, समुद्री यात्रा, अगम्य पर्वतीय प्रदेशों में प्राणियों का अस्तित्व आदि की कथाएँ, जिनकी कथानक घटना प्रधान हुआ करती थीं, भी कहानी के ही रूप हैं। ‘गुणढ्य’ की “वृहत्कथा” को, जिसमें ‘उदयन’, ‘वासवदत्ता’, समुद्री व्यापारियों, राजकुमार तथा राजकुमारियों के पराक्रम की घटना प्रधान कथाओं का बाहुल्य है, प्राचीनतम रचना कहा जा सकता है। वृहत्कथा का प्रभाव ‘दण्डी’ के “दशकुमार चरित”, ‘वाणभट्ट’ की “कादम्बरी”, ‘सुबन्धु’ की “वासवदत्ता”, ‘धनपाल’ की “तिलकमंजरी”, ‘सोमदेव’ के “यशस्तिलक” तथा “मालतीमाधव”, “अभिज्ञान शाकुन्तलम्”, “मालविकाग्निमित्र”, “विक्रमोर्वशीय”, “रत्नावली”, “मृच्छकटिकम्” जैसे अन्य काव्यग्रंथों पर साफ-साफ परिलक्षित होता है।
इसके पश्चात् छोटे आकार वाली “पंचतंत्र”, “हितोपदेश”, “बेताल पच्चीसी”, “सिंहासन बत्तीसी”, “शुक सप्तति”, “कथा सरित्सागर”, “भोजप्रबन्ध” जैसी साहित्यिक एवं कलात्मक कहानियों का युग आया। इन कहानियों से श्रोताओं को मनोरंजन के साथ ही साथ नीति का उपदेश भी प्राप्त होता है। प्रायः कहानियों में असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की और धर्म पर अधर्म की विजय दिखाई गई हैं।
किन्तु वर्तमान कहानियों पर सर्वाधिक प्रभाव अमेरिका के कवि-आलोचक-कथाकार ‘एडगर एलिन पो’ का है जिनके अनुसार एक सफल कहानी में एक केन्द्रीय कथ्य होता है जिसे प्रभावशाली और सघन बनाने के लिये कहानी के सभी तत्वों – कथानक, पात्र, चरित्र-चित्रण, संवाद, देशकाल, उद्देश्य – का उपयोग किया जाता है। श्री पो के अनुसार कहानी की परिभाषा इस प्रकार हैः
“कहानी वह छोटी आख्यानात्मक रचना है, जिसे एक बैठक में पढ़ा जा सके, जो पाठक पर एक समन्वित प्रभाव उत्पन्न करने के लिये लिखी गई हो, जिसमें उस प्रभाव को उत्पन्न करने में सहायक तत्वों के अतिरिक्त और कुछ न हो और जो अपने आप में पूर्ण हो।”
हिंदी कहानी को सर्वश्रेष्ठ रूप देने वाले ‘प्रेमचन्द’ ने भी श्री पो के विचारों को स्वीकारते हुये कहानी की परिभाषा इस प्रकार से की हैः
“कहानी वह ध्रुपद की तान है, जिसमें गायक महफिल शुरू होते ही अपनी संपूर्ण प्रतिभा दिखा देता है, एक क्षण में चित्त को इतने माधुर्य से परिपूर्ण कर देता है, जितना रात भर गाना सुनने से भी नहीं हो सकता।”
कहानी के तत्व
रोचकता, प्रभाव तथा वक्ता एवं श्रोता या कहानीकार एवं पाठक के बीच यथोचित सम्बद्धता बनाये रखने के लिये सभी प्रकार की कहानियों में कमोबेस निम्नलिखित तत्व महत्वपूर्ण हैं:
कथावस्तु: किसी कहानी के ढाँचे को कथानक अथवा कथावस्तु कहा जाता है। प्रत्येक कहानी के लिये कथावस्तु का होना अनिवार्य है क्योंकि इसके अभाव में कहानी की रचना की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कथानक के चार अंग माने जाते हैं – आरम्भ, आरोह, चरम स्थिति एवं अवरोह।
- ‘आरम्भ’ में कहानीकार कहानी के शीर्षक तथा प्रारमंभिक अनुच्छेदों के द्वारा पाठक को कथासूत्र से अवगत कराता है जिससे कि वह कहानी के प्रति आकर्षित होकर उसमें रमने लगे। सफल आरम्भ वह होता है जिसमें कि कहानी शुरू करते ही पाठका का मन कुतूहल और जिज्ञासा से भर जाये।
- कहानी के विकास की अवस्था को कहानी का ‘आरोह’ कहते हैं। आरोह में कहानीकार घटनाक्रम को सहज रूप में प्रस्तुत करता है और पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं का उद्घाटन करता है।
- जब कहानी पढ़ते-पढ़ते पाठक कौतूहल की पराकाष्ठा में पहुँच जाये तो उसे कहानी की ‘चरम स्थिति’ कहते हैं।
- पाठक को जब कहानी के उद्देश्य का प्रतिफल प्राप्त होता है उसे कहानी का ‘अवरोह’ अथवा ‘अंत’ कहते हैं। कहानी के अवरोह में संक्षिप्तता तथा मार्मिकता पर अधिक जोर दिया जाता है।
पात्र अथवा चरित्र-चित्रण: कहानी का संचालन उसके पात्रों के द्वारा ही होता है तथा पात्रों के गुण-दोष को उनका ‘चरित्र चित्रण’ कहा जाता है। जब पात्रों का चरित्र चित्रण कहानीकार के द्वारा किया जाता है तो उसे ‘प्रत्यक्ष’ चरित्र चित्रण कहते हैं और जब पात्रों का चरित्र चित्रण संवादों के द्वारा होता है तो उसे ‘अप्रत्यक्ष’ अथवा ‘परोक्ष चरित्र’ चित्रण कहा जाता है। परोक्ष चरित्र चित्रण को अधिक उपयुक्त माना जाता है।
कथोपकथन अथवा संवाद: कहानी के पात्रों के द्वारा किये गये उनके विचारों की अभिव्यक्ति को संवाद अथवा कथोपकथन कहते हैं। संवाद के द्वारा पात्रों के मानसिक अन्तर्द्वन्द एवं अन्य मनोभावों को प्रकट किया जाता है।
देशकाल अथवा वातावरण: कहानी में वास्तविकता का पुट देने के लिये देशकाल अथवा वातावरण का प्रयोग किया जाता है। यदि किसी कहानी में शाहजहाँ और मुमताज महल को आधुनिक कार में घूमते हुये बताया जाता है तो उसे हास्यास्पद ही माना जायेगा।
भाषा-शैली: कहानीकार के द्वारा कहानी के प्रस्तुतीकरण के ढंग को उसकी भाषा शैली कहा जाता है। प्रायः अलग-अलग कहानीकारों की भाषा-शैली भी अलग-अलग होती है।
उद्देश्य: कहानी केवल मनोरंजन के लिये ही नहीं होती, उसे एक निश्चित उद्देश्य लेकर लिखा जाता है।
“निबन्ध” शब्द का मूल है “बन्ध”, निबन्ध का अर्थ होता है बाँधना। किसी विषयवस्तु से सम्बन्धित ज्ञान को क्रमबद्ध रूप से बाँधते हुए लेखन को निबन्ध कहा जाता है। बाबू गुलाबराय ने निबन्ध को इस प्रकार से परिभाषित किया है -
एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय या वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वच्छन्दता, सौष्ठव, सजीवता तथा सम्बद्धता के साथ किया जाना ही निबन्ध कहलाता है।
निबन्ध के निम्न मुख्य भेद होते हैं -
- विचारात्मक
- वर्णनात्मक
- विवराणात्मक
- भावात्मक
विचारात्मक निबन्ध – जब निबन्ध में किसी विषयवस्तु का तर्कपूर्ण विवेचन, विश्लेषण तथा खोज किया जाए तो उसे विचारात्मक निबन्ध कहा जाता है। विचारात्मक निबन्ध में बुद्धितत्व की प्रधानता होती है और इनमें लेखक के चिन्तन, मनन, अध्ययन, मान्यताओं तथा धारणाओं का प्रभाव स्पष्टतः दिखाई पड़ता है।
वर्णनात्मक निबन्ध – जब किसी निबन्ध में किसी वस्तु, स्थान, व्यक्ति, दृश्य आदि का निरीक्षण के आधार पर रोचक तथा आकर्षक वर्णन किया जाए तो उसे वर्णनात्मक निबन्ध कहा जाता है।
विवरणात्मक निबन्ध – जब किसी निबन्ध में ऐतिहासि तथा सामाजिक घटनाओं, स्थानों, दृश्यों आदि का रोचक तथा आकर्षक विवरण दिया जाए तो उसे विवरणात्मक निबन्ध कहा जाता है।
भावात्मक निबन्ध – जब किसी निबन्ध में हृदय में उत्पन्न होने वाले भावों तथा रागों को दर्शाया जाए तो उसे भावात्मक निबन्ध कहा जाता है। ऐसे निबन्धों की भाषा सरल, मधुर, ललित तथा संगीतमय होती है और ये निबन्ध कवित्वपूर्ण तथा प्रवाहमय प्रतीत होते हैं।
विधा का सामान्य अर्थ होता है प्रकार। हिन्दी गद्य की भी अनेक विधाएँ हैं जिन्हें मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है। उपन्यास, कहानी, नाटक, निबन्ध, आलोचना आदि विधाओं, जिनका जन्म भारतेन्दु युग में हो चुका था, को प्रथम वर्ग के अन्तर्गत रखा जा सकता है तथा आत्मकथा, जीवनी, यात्रावृत्तांत, रिपोर्ताज, डायरी लेखन आदि विधाओं, जिनका जन्म भारतेन्दु युग के पश्चात् हुआ, को द्वितीय वर्ग में रखा जा सकता है।
सन् से अब तक का युग छायावादोत्तर युग कहलाता है। इस युग में भावुकता और स्वप्नलोक की छायावादी कल्पना का स्थान यथार्थ ने ले लिया और हिन्दी गद्य साहित्य में चुटीली उक्तियों का समावेश होने लग गया जिसमें अलंकारों का अभाव स्पष्टतः दृष्टिगोचर होता है। इसका कारण था इस काल का राजनैतिक तथा सामाजिक उथल पुथल। चूँकि साहित्य समाज का आईना होता है, समाज, देश, काल का यथार्थ के यथार्थ का साहित्य में समावेश होना आवश्यक हो गया। इस काल को प्रगतिवादी युग भी कहा जाता है।
इस काल के प्रमुख साहित्यकारों में छायावाद के उत्तर काल के लेखकों के साथ ही साथ उनके बाद की पीढ़ी के लेखक भी सम्मिलित हैं जिनमें प्रमुख हैं हजारी प्रसाद द्विवेदी, भगवतीचरंण वर्मा, रामाधारी सिंह ‘दिनकर’, अमृतलाल नागर, जैनेन्द्र, अज्ञेय, बनारसीदास चतुर्वेदी, कन्हैयालाल मिश्र, यशपाल, उपेन्द्रनाथ अश्क, हरिशंकर परसाई, फणीश्वर नाथ ‘रेणु’, धर्मवीर भारती तथा अन्य अनेक गणमाण्य साहित्यकार।
द्विवेदी युग के बाद एक नये युग ने जन्म लिया जिसे छायावादी युग के नाम से जाना जाता है। इस युग में हिन्दी गद्य साहित्य लाक्षणिक, अलंकृत और कवित्वमय होते चली गई। हिन्द साहित्य में में गद्य गीतों, भाव तरलता, रहस्यात्मक और मर्मस्पर्शी कल्पना, राष्ट्रीयता, स्वतन्त्र चिन्तन आदि का समावेश होता चला गया।
छायावादी युग के प्रमुख साहित्यकार हैं रायकृष्ण दास, वियोगी हरि, डॉ. रघुवीर सहाय, पं. माखनलाल चतुर्वेदी, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, नन्द दुलारे वाजपेयी, डॉ. शिवपूजन सहाय, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, रामचन्द्र शुक्ल, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, बाबू गुलाबराय आदि।
भारतेन्दु युग के पश्चात् सन् से तक का काल महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का रहा इसलिए इस काल को द्विवेदी युग माना जाता है। भारतेन्दु युग में हिन्दी गद्य साहित्य में वृद्धि तो हुई किन्तु उसके शुद्धिकरण पर ध्यान नहीं दिया गया। भारतेन्दु युग में हुई इस गलती को द्विवदी जी ने सुधारने का कार्य किया इसलिए इस काल को सुधार काल भी माना जाता है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी न केवल हिन्दी भाषा के बल्कि संस्कृत, बंगला, मराठी और अंग्रेजी भाषाओं के भी ज्ञाता थे। हिन्दी साहित्य की सेवा के लिए उन्होंने अपनी रेल्वे की नौकरी छोड़ कर “सरस्वती” पत्रिका का सम्पादन आरम्भ किया और सतत् रूप से हिन्दी साहित्य में सुधार कार्य करते रहे।
द्विवेदी युग में देवकीनन्दन खत्री, गोपालराम गहमरी, किशोरीलाल गोस्वामी आदि रचनाकारों ने तिलस्मी एवं जासूसी उपन्यास लिखे जो कि उन दिनों अत्यन्त लोकप्रिय हुए। देवकीनन्दन खत्री जी की “चन्द्रकान्ता” उपन्यास तो लोगों को इतनी भायी कि लाखो लोगों ने उसे पढ़ने के लिए हिन्दी सीखा। तिलस्मी और जासूसी उपन्यासों के लेखकों के अतिरिक्त प्रेमचन्द, वृन्दावनलाल वर्मा, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, विश्वम्भर नाथ कौशिक, चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’, सुदर्शन, जयशंकर ‘प्रसाद’ आदि द्विवेदी युग के साहित्यकार रहे।
द्विवेदी युग में “सरस्वती” के अलावा “इन्दु”, “माधुरी”, “सुधा”, “मर्यादा”, नागरी “प्रचारिणी पत्रिका”, “हंस”, “प्रभा”, “प्रताप”, “कर्मवीर”, “विशाल भारत” आदि पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ।
हिन्दी गद्य साहित्य का सन् 1850 से लेकर सन् 1900 तक का समय भारतेन्दु युग के नाम से जाना जाता है। हिन्दी गद्य साहित्य के क्षेत्र में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी के आगमन से पूर्व इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व दो महत्वपूर्ण व्यक्ति कर रहे थे – वे थे राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द और राजा लक्ष्मण सिंह। जहाँ राजा शिवप्रसाद सिंह सितारे हिन्द हिन्दी को उर्दू प्रधान बनाकर उसका प्रचार-प्रसार करने का प्रयास कर रहे थे वहीं राजा लक्ष्मण सिंह हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाकर उसका प्रचार-प्रसार करने में जुटे हुए थे। ऐसे ही समय में बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का हिन्दी गद्य साहित्य में आविर्भाव हुआ जिन्होंने हिन्दी के प्रचार-प्रसार के उपरोक्त दोनों मार्गों को एक साथ मिला कर एक बीच का मार्ग निकाला। उन्होंने न केवल उर्दू और संस्कृत बल्कि अरबी, फारसी, अंग्रेजी आदि अन्य भाषाओं के उन समस्त सरल शब्दों का, जिन्हें जन-सामान्य प्रयोग में लाती थी, हिन्दी में समावेश किया। हिन्दी भाषा को सजीव तथा सशक्त बनाने के लिए उन्होंने कहावतों, मुहावरों और लोकोक्तियों को हिन्दी में यथोचित स्थान देने का कार्य किया।
उनके इस प्रयोग से हिन्दी भाषा व्यवहारिक तथा प्रवाहपूर्ण होकर जन-सामान्य की भाषा बन गई।
भारतेन्दु जी ने हिन्दी गद्य साहित्य की सभी विधाओं, यथा नाटक, उपन्यास, कहानी, निबन्ध, आलोचना, जीवनी, आत्मकथा, यात्रावृत्तान्त, डायरी लेखन, रिपोर्ताज, गद्य-गीत, रेखाचित्र इत्यादि, में न केवल स्वयं साहित्य-सृजन किया बल्कि अग्रणी बनकर अपने समकालीन रचनाकारों से भी करवाया।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी के समकालीन प्रमुख साहित्यकार हैं – बालकृष्ण भट्ट, राधाचरण गोस्वामी, बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमसन’, राधाकृष्ण दास आदि।
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम व द्वितीय चरण को समस्त विश्व के लिए जागरण युग कहा जाता है। पूरे संसार के साथ ही साथ भारत में भी उस काल में महत्वपूर्ण राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं सामाजि परिवर्तन हुए। यद्यपि उस काल में मैकॉले के द्वारा भारत में अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाना भारत के लिए एक अहितकर घटना थी किन्तु इस घटना के कुछ अच्छे परिणाम भी सामने आए जैसे कि भारत के जनमानस के द्वारा आधुनिक विचारधाराओं को ग्रहण करना। जहाँ भारत के लिए उस काल में आधुनिक विचारधाराओं को ग्रहण करना एक अच्छा कार्य था वहीं इस कार्य के साथ ही साथ अपनी सभ्यता और संस्कृति को हेय दृष्टि से देखने का सिलसिला आरम्भ हो जाना भारत के लिए अत्यन्त अहितकर था।
अस्तु, नवजागरण को देशव्यापी बनाने हेतु उसी काल में “ब्रह्म समाज”, “रामकृष्ण मिशन”, “प्रार्थना समाज”, “आर्य समाज”, “थियोसोफिकल सोसाइटी” जैसी संस्थाओं की संस्थापना उसी काल में हुई। यद्यपि उस काल में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी हो चुका था, जन-सामान्य की भाषा खड़ी बोली ही थी इसलिए नवीन विचारधाराओं के प्रचार-प्रसार का माध्यम भी खड़ी बोली ही रही तथा वह उत्तरोत्तर परिमार्जित और सुसंस्कृत होती और वर्तमान हिन्दी का रूप लेते चली गई।
सन् 1850 से अब तक के हिन्दी गद्य साहित्य काल को निम्न भागों में विभाजित किया जा सकता हैः
- भारतेन्दु युग (सन् 1850 से 1900 तक)
- द्विवेदी युग (सन् 1901 से 1919 तक)
- छायावादी युग (सन् 1920 से 1936 तक)
- छायावादोत्तर युग (सन् 1937 से अब तक)
इस कैटेगरी की अगली पोस्टों में हम उपरोक्त युगों के विषय में विस्तार से चर्चा करेंगे।
