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[आपके प्रश्न: मेरे उत्तर ]
प्रश्न: हम मधुमेह से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर आधारित आपकी वैज्ञानिक रपट की प्रगति जानना चाहते है। आपने पहले बताया था कि वर्ष 2009 तक यह रपट पूरी हो जायेगी।
उत्तर: आपके प्रश्न और रुचि के लिये धन्यवाद। यह रपट अपने निर्धारित कार्यक्रम से कम गति से चल रही है। अभी इसमे 82,000 तालिकाए जोडी जा चुकी है। यदि पन्नो के नजरिये से देखे तो 24 अगस्त, 2008 तक ग्यारह लाख से अधिक पन्ने इसमे जोडे जा चुके है। अभी भी आधी रपट पूरी नही हुयी है। पहले अपनी सीमाओ को देखते हुये मुझे दो लाख पन्ने मे इस रपट के पूरे हो जाने की आशा थी पर आकडो और जानकारियो के बढने से यह बढती ही जा रही है। यह उम्मीद करता हूँ कि वर्ष 2010 के अंत तक इसे समाप्त कर लूंगा। वर्ष 2009 के अंत तक तालिकाओ का कार्य पूरा होने की सम्भावना है।
प्रश्न: ग्यारह लाख से अधिक पन्ने रपट मे जोड पाना निश्चित ही आश्चर्यजनक है। आप बधाई के पात्र है। क्या यह विश्व रिकार्ड है?
उत्तर: पन्नो का महत्व अपनी जगह है पर इनमे समाहित पारम्परिक ज्ञान ज्यादा महत्वपूर्ण है। मैने अपने अनुभवो से यह देखा है कि प्राचीन ग्रंथो मे जानकारियाँ बहुत अधिक विस्तार से नही है जबकि हमारे पारम्परिक चिकित्सको के पास हर पहलु पर विस्तार से जानकारी है। वे वनस्पतियो के चुनाव से लेकर इनके रोगियो पर पडने वाले प्रभावो तक के विषय मे विस्तार से जानते है। हमारे पूर्वजो को भी ऐसा ही गूढ ज्ञान था पर इस ज्ञान को अपने मौलिक रुप मे लिखा नही गया। फलस्वरुप आज हमारे पास बहुत कम जानकारियाँ है। भले ही रपट का विस्तार हो पर मैने हर पहलु को पूरी तरह से समझाने का प्रयास किया है। इस तरह से ज्ञान का समावेश किया है ताकि नौसीखीया भी इस ज्ञान से लाभ उठा सके। देश भर के पारम्परिक चिकित्सको से मिलने कारण मेरे अपने ज्ञान का स्तर भी सुधर गया है। इस अर्जित ज्ञान का समावेश मै इस रपट मे कर रहा हूँ ताकि यह और अधिक उपयोगी हो सके।
प्रश्न: आप अभी रपट के किस भाग पर काम कर रहे है?
उत्तर: अभी मधुमेह की जटिल अवस्था की चिकित्सा से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान पर अध्याय लिखा जा रहा है। चूँकि यह जीवन-मरण का प्रश्न होता है इसलिये पारम्परिक चिकित्सक किसी तरह की चूक नही करते है। वे जटिल औषधीय मिश्रणो का प्रयोग करते है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि कुछ मिश्रणो मे 500 से अधिक प्रकार की वनस्पतियो का प्रयोग किया जाता है। इसमे से बहुत से मिश्रण अब प्रचलन मे नही है पर फिर भी इन्हे रपट मे शामिल किया गया है। इनमे से ज्यादातर मिश्रणो का वर्णन हमारे प्राचीन ग्रंथो मे नही मिलता है। आधुनिक विज्ञान भी इस तक नही पहुँच पाया है। इस अवस्था मे पारम्परिक चिकित्सक अपनी निगरानी मे चिकित्सा करते है। आँतरिक और बाहरी दवाओ को दौर रात-दिन चलता है। रोगी को विशेष वृक्षो या वृक्ष समूह के नीचे बैठकर दवा लेने और विशेष सामग्रियो से बनी शैय्या पर सोने को कहा जाता है। रात को जब रोगी गहरी नीन्द मे होता है तब भी उसकी चिकित्सा जारी रहती है। बाहरी दवाए उसे विशिष्ट माध्यमो से दी जाती है। राजा-महाराजाओ की चिकित्सा मे इस ज्ञान का उपयोग होता था। पारम्परिक चिकित्सको के एक दल के साथ बडी संख्या से सहायक भी होते थे। यह चिकित्सा बहुत समर्पण चाहती थी पर लाभ अवश्य होता था। आज न राजा-महाराजा है न ही उनके पारम्परिक चिकित्सक पर सौभाग्य से उनके वंशज है जिन्हे इस विशेष ज्ञान की जानकारी है पर वे अब इसका प्रयोग नही करते है।
मधुमेह की जटिल अवस्था मे एक दिन को दसो हिस्सो मे बाँटा जाता है फिर 10, 50, 100, 200 दिनो की दवाए तैयार की जाती है। मैने 200 दिनो के लिये तैयार की गयी दवाओ के विषय मे रपट मे लिखा है। पहले जब मै मधुमेह की सामान्य अवस्था पर लिख रहा था तब एक तालिका मुश्किल से एक पन्ने की होती थी पर जटिल अवस्था की एक तालिका 100 से 150 पन्नो की होती है। ऐसी ही तालिकाओ ने रपट मे पन्नो की संख्या को अप्रत्याशित रुप से बढा दिया है।
प्रश्न: क्या सभी नुस्खे रपट मे लिखे जा रहे है?
उत्तर: सभी नुस्खो को लिख पाना सम्भव नही जान पडता है। अभी 220 नुस्खो और उनकी प्रयोग विधियो के विषय मे लिखने से ही यह रपट ग्यारह लाख पन्नो से अधिक की हो गयी है। हजारो नुस्खे है और सभी की विशिष्ट प्रयोग विधियाँ है। फिर हर नुस्खे पर अलग-अलग पारम्परिक चिकित्सको की राय भिन्न है। कुछ इनमे नयी वनस्पतियाँ जोड देते है तो कुछ घटा देते है। मै इन सब प्रतिक्रियाओ को भी रपट मे शामिल करता आया हूँ। यह तो मेरा सौभाग्य है कि कम्प्यूटर जैसी नयी तकनीक का सहारा मिल रहा है अन्यथा हाथ से इतना सब जोड पाना सम्भव ही नही था, वह भी इतने कम समय मे।
प्रश्न: अभी तक कितने पन्ने इकोपोर्ट के माध्यम से आन-लाइन हो चुके है?
उत्तर: आज तक साढे छै लाख से अधिक पन्ने आन-लाइन है। इतनी बडी रपट से इकोपोर्ट को तकनीकी परेशानियाँ झेलनी पड रही है। अब नयी जानकारी जोडने पर पूरा डेटाबेस धीमा हो जाता है और कुछ घंटो के काम मे दिन भर लग जाता है। इसलिये कुछ समय तक इस कार्य को रोका गया है। वे दुनिया भर के विशेषज्ञो से परामर्श लेकर इसमे सुधार की भरसक कोशिश कर रहे है।
प्रश्न: क्या किसी तरह का बाहरी दबाव है रपट मे लिखे कूट शब्दो का राज बताने के लिये?
उत्तर: अभी तक तो नही पर बडी संख्या मे दुनिया भर के लोगो को इस रपट के पूरे होने का बेसब्री से इंतजार है। वे भी इसके बढते आकार से हतप्रभ है।
प्रश्न: भविष्य़ के लिये क्या योजनाए है? आगामी रपटो के विषय मे बताये।
उत्तर: इस रपट के बाद कैसर और ह्र्दय रोगो पर वैज्ञानिक रपट लिखने की योजना है। पर पहले मै निरोगी जीवन जीने और रोगो से बचाव करने से सम्बन्धित ज्ञान पर एक रपट तैयार करना चाहूंगा। यह रपट भी बहुत विस्तार से होगी। यदि मेरा बस चला तो मधुमेह की रपट के बाद एक लम्बा समय मै जंगलो मे गुजारना चाहूंगा वनस्पतियो की तस्वीरे उतारते हुये और अपने पारम्परिक चिकित्सको से एक फिर मिलते हुये।
प्रश्न: आप रपट की मूल प्रति अपने पास किस माध्यम से रख रहे है?
उत्तर: मेरी फील्ड डायरियो और अपने दिमागी हार्ड डिस्क मे तो मूल रुप मे जानकारियाँ सुरक्षित है। पहले रपट की एक प्रिंट प्रति रखने की योजना थी पर लाखो पन्नो का प्रिंट निकालना महंगा है इसलिये सीडी और बाहरी हार्ड डिस्क के माध्यम से इसे सुरक्षित रखा जा रहा है।
प्रश्न: क्या सरकार से या दूसरे संगठनो से आपको किसी प्रकार का प्रोत्साहन मिला?
उत्तर: अभी तक तो नही। चूँकि तकनीकी कारणो से इकोपोर्ट सर्च इंजिनो मे नही दिखता इसलिये इस रपट को अधिक प्रचार नही मिला है। देशी मीडिया को भी शायद इसकी खबर नही है। जिन्हे खबर है वे इसके पूरे होने का इंतजार कर रहे है। मेरे अपने खर्च से यह कार्य अब तक तो जारी है।
प्रश्न: आप इस लगातार मेहनत के बीच अपने स्वास्थ्य के लिये कैसे समय निकाल पा रहे है?
उत्तर: तनाव से मुक्त रहने की कोशिश करता हूँ। शाम को टेबल टेनिस खेल लेता हूँ। बीच-बीच मे वानस्पतिक सर्वेक्षणो मे चला जाता हूँ। लगातार इस रपट पर काम करना बहुत ही थका देने वाला काम है।
रपट मे प्रगति जानने के लिये इस कडी पर आते रहे:
सम्बन्धित लेख:
http://paramparik.blogspot.com/2008/08/blog-post.html
लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
� सर्वाधिकार सुरक्षित
आज दुनिया भर मे ह्रदय रोगियो की संख्या बढती जा रही है। आमतौर पर मरीज जब चिकित्सक तक पहुँचते है तब तक रोग बहुत बढ गया होता है। अचानक से दिनचर्या मे परिवर्तन करना पडता है और दवाओ का दौर आरम्भ हो जाता है। सोचिये कितना अच्छा हो कि रोग की शुरुआत मे ही रोगी को सब कुछ पता चल जाये और अपनी दिनचर्या मे थोडा से परिवर्तन करके वह आजीवन इन्हे बढने से रोक सके। प्राचीन भारतीय चिकित्सा ग्रंथो मे कई प्रकार की वनस्पतियो और उन पर आधारित मिश्रणो का वर्णन है पर इन्हे कुशल चिकित्सको के मार्गदर्शन मे लेना आवश्यक है। आखिर यह दिल का मामला जो है। देश के पारम्परिक चिकित्सको के पास कुछ सरल पर प्रभावी उपाय है।
पिछले एक दशक से भी अधिक समय से देश के विभिन्न भागो विशेषकर छत्तीसगढ मे पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के दस्तावेजीकरण के दौरान मुझे हजारो पारम्परिक चिकित्सको से मिलने का अवसर मिला। इनमे से बहुत से पारम्परिक चिकित्सक ह्रदय रोगो की चिकित्सा मे महारत रखते है। वे रोग के आरम्भ होते ही चिकित्सा पर जोर देते है। बहुत से पारम्परिक चिकित्सक तो छोटे बच्चो की जाँच कर पहले ही से यह कह देते है कि अमुक बालक अमुक रोग से ग्रस्त होगा इसलिये अभी से उपाय किये जाये। इस तरह बचपन ही से खान-पान ऐसा कर दिया जाता है कि वह बालक ताउम्र उस रोग से बचा रहे। आज के युग मे जब शीतल पेय और विदेशी आहार भारतीय बच्चो की दिनचर्या के अहम भाग बन चुके है और परिणामस्वरुप छोटी उम्र से ही नाना प्रकार के रोग हो रहे है ऐसे मे आज देश को पारम्परिक चिकित्सको की सेवाओ की आवश्यकता है।
ह्रदय रोगो की चिकित्सा से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान भारत मे समृद्ध है। पर यह विडम्बना ही है कि इस विषय मे आधुनिक शोधकर्ताओ ने बहुत कम लिखा है। कहने को तो ढेरो शोध पत्र है पर उनमे फलाँ वनस्पति ह्रदय रोगो मे काम आती है, से अधिक कुछ नही लिखा है। इन वनस्पतियो को कैसे लेना है? कितने दिनो तक लेना है? अन्य औषधीयो के साथ इन्हे कैसे उपयोग करना है? यदि विशेष परेशानी आये तो क्या करना है? कैसे इन वनस्पतियो की पहचान करना है? किस अवस्था मे एकत्रण करना है? इसमे मिलावट को कैसे पहचानना है? आदि विषयो पर जानकारी नही दी गयी है। मधुमेह पर विस्तृत वैज्ञानिक रपट तैयार करने के दौरान जब मैने पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान को तालिकाओ के रुप मे समायोजित करने का प्रयास किया तो मुझे गूढ ज्ञान और पारम्परिक चिकित्सको की गहरी समझ का आभास हुआ।
आम तौर पर ह्रदय रोगियो से साधारण बातचीत के दौरान पारम्परिक चिकित्सक काफी जनाकारियाँ एकत्र कर लेते है। फिर वे रोगी की दशा के अनुसार अलग-अलग अवधि की तालिकाओ का निर्माण करते है। रोगी से कहा जाता है कि वह अपनी दिनचर्या पहले ही की तरह रखे और इसमे साधारण प्रयोगो को स्थान देना आरम्भ करे। उदाहरण के लिये आप इस 365 दिनो की तालिकाओ को देखे।
हर दिन के लिये अलग तालिका बनायी गयी है और धीरे-धीरे औषधीयो की संख्या और मात्रा बढायी गयी है। इन तालिकाओ के प्रयोग के दौरान स्पष्ट रुप से समय-समय पर यह निर्देशित किया गया है कि मजे से इनका प्रयोग करे। इसे बला के रुप मे न ले। साधारण जल के प्रयोग से लेकर पेडो की छाँव मे बैठना, फूलो के साधारण प्रयोग से हर्बल चाय के असाधारण प्रयोग को इन तालिकाओ मे शामिल किया गया है। हर सात दिन के बाद वे रोगियो से बात करते है और फिर उसी के अनुसार आगे के लिये तालिकाओ मे सुधार करते है। दस्तावेजाकरण के लिये मैने एक अनोखा तरीका चुना है। मैने 365 दिन की तालिका अर्थात दिन के हिसाब से 365 तालिकाए तैयार की। फिर दूसरे पारम्परिक चिकित्सको से इस पर टिप्पणियाँ माँगी। ये सारे पारम्परिक चिकित्सक किसी एक स्थान से तो नही पढे है इसलिये हर के विचार और अनुभव अलग है। सभी ने इसमे नयी वनस्पतियो को जोडा और आधार तालिकाओ मे उनके क्रम को ऊपर नीचे किया। उनकी टिप्पणियो के आधार पर मै 100 से अधिक परिवर्तित तालिकाए तैयार कर चुका हूँ। 100 परिवर्तित तालिकाए या उपचार विधियाँ मतलब 365 गुणा 100 अर्थात 36,500 तालिकाए। एक तालिका पाँच पन्नो की है। पूरी तालिकाए लाखो पन्नो मे होंगी। यह वृहत ज्ञान है जैसा मैने पहले लिखा है। अब मै इन तालिकाओ को इकोपोर्ट मे शामिल कर रहा हूँ। निश्चित ही यह कठिन कार्य है पर मुझे लगता है कि इस ज्ञान को विलुप्त होने से पहले दस्तावेजो की शक्ल देना जरुरी है। मधुमेह की रपट मे दो लाख तालिकाओ मे से 62,000 तालिकाए हुयी है। अब साथ मे ह्रदय रोगो की तालिकाओ का कार्य भी शुरु किया है।
जैसा आधुनिक चिकित्सा जगत ने नियम बनाया है, ये विशेष उपचार पहले आधुनिक ज्ञान की कसौटी पर परखे जायेंगे और उसके बाद ही ये आम जनता के लिये अनुमोदित होंगे। इस परख के लिये सबसे पहले यह जरुरी है कि इसका दस्तावेजीकरण हो पूरी तरह से। इसी का प्रयास जारी है।
कुछ सम्बन्धित कडियाँ
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(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
� सर्वाधिकार सुरक्षित
जब मैने छत्तीसगढ मे जडी-बूटियो से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण आरम्भ किया तो मेरे पास कम्प्यूटर नही था। मै शोध आलेखो को लिखता फिर पास की दुकान से टाइप करवा लेता। फिर फ्लापी मे इसे लेकर साइबर कैफ़े मे चला जाता जहाँ से इसे बाटेनिकल डाट काम को भेज देता था। पहले सप्ताह मे एक आलेख लिखता रहा तो यह प्रक्रिया सरल लगी पर जब रोज एक आलेख लिखने की शुरुआत हुयी तो आलेखो की कतार लगने लगी। यह सिलसिला एक वर्ष तक चला। फिर जब मैने एकत्र किये गये ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे लगने वाले समय का आँकलन किया तो मुझे आभास हुआ कि इस गति से तो यह कार्य दो जन्मो मे पूरा होगा तो मैने गति बढाने का फैसला किया।
यह बडा ही कठिन फैसला था। रोज औसतन दस से बारह घंटे बिना रुके लिखने का। और वो भी कई सालो तक। धीरे-धीरे आदत हो गयी। परिणाम यह रहा कि मैने बारह हजार से अधिक शोध आलेख लिख लिये और उन्हे बाटेनिकल डाट काम मे डाल दिया। इस साइट पर मेरे आलेख को शामिल करने दस कर्मचारी उन्होने रखे और वे दो वर्षो तक लगातार रात-दिन यहाँ तक कि क्रिसमस मे भी काम करते रहे। इतने सारे आलेखो के लिये अलग से साफ्टवेयर भी बनाया गया। इतने सारे आलेखो के बाद जब मैने इसी गति से तीन और वर्ष तक काम करने का इरादा जताया तो उन्होने हाथ खडे कर दिये। फिर इकोपोर्ट मे काम शुरु हुआ।
बहुत पैसे लग रहे थे और कम्प्यूटर वाले ने भी साफ कह दिया कि पैसे ज्यादा देने होंगे क्योकि मेरे कारण और किसी का काम नही हो पा रहा था। अंतत: मैने कम्प्यूटर लिया। राह कुछ आसान हुयी। जब मैने मधुमेह की रपट लिखने का मन बनाया तो तालिका बनाना सिरदर्द लगा। तालिका को देखकर कम्प्यूटर वालो ने 20 रुपये प्रति तालिका की बात कही। अधिक काम होने पर 15 रुपये के लिये वे तैयार हो गये। पर मेरे लिये तो इतना खर्च उठाना सम्भव नही था। अत: मैने ही इसके लिये मेहनत करने की ठानी। आज इस रपट मे 62,000 तालिकाए जोडी जा चुकी है और हजारो पन्ने लिखे जा चुके है। बाजार से इतना काम करवाने पर दस लाख रुपये लग जाते। ये तो बात हुयी तालिका बनाने की। अब इसे इकोपोर्ट मे अपलोड भी करना था। एक दिन मे छह घंटे लगातार काम करने पर 200-250 तालिकाए अपलोड हो पाती थी। आठ महिनो के अथक प्रयास से मैने 52,000 तालिकाए डाली। सारा काम छोडना पडा। स्वास्थ्य की बलि चढ गयी। एक काम करते-करते मन चिडचिडा हो गया। पर अब तो जैसे आदत हो गयी है।
अभी तक शामिल की गयी 62,000 से अधिक तालिकाए ऊँट के मुँह मे जीरे के समान है। कुल तालिकाए दो लाख से अधिक है। इस काम के कारण मेरा हिन्दी लेखन प्रभावित हो रहा था। इसलिये मैने इस वर्ष के आरम्भ से यह फैसला किया कि अब हिन्दी भी लिखूंगा। जंगल भी जाऊँगा और तस्वीरे भी लूंगा ताकि थकान से उबर पाऊँ।
हिन्दी लेखो की भी यही कहानी है। कुछ वर्ष पहले इतने सारे लेख लिखे कि देश की बारह कृषि पत्र-पत्रिकाओ के पास अगले दस वर्ष तक के लिये लेख जमा हो गये। अब वे विनम्रतापूर्वक आलेख न भेजने की बात लिखते है। इकोपोर्ट पर 30,000 से अधिक तस्वीरे है। उनके पास 50,000 से अधिक तस्वीरे कतार मे है। इसी तरह 20,000 तस्वीरे डिस्कवरलाइफ़ मे कतार मे है। जंगल जाना मतलब नयी तस्वीरो का आना। यह अंतहीन प्रक्रिया है।
मुझे अपने अब तक के अनुभव से यह अहसास हुआ है कि समय बहुत मूल्यवान है और इसके सही उपयोग से हम समाज के लिये बहुत कुछ कर सकते है। किसी भी काम को कल पर टालना ठीक नही। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह लगी कि मनुष्य मे असीम क्षमता है। मन थक सकता है, तन थक सकता है पर यदि फिर भी लगातार काम करते रहे तो असम्भव लक्ष्य भी पाये जा सकते है। छत्तीसगढ के प्रसिद्ध कवि श्री हरि ठाकुर की यह पक्तियाँ सदा नया जोश भरती रहती है।
�यदि पैरो मे गति हो तो क्या कर लेंगी राहे�
- बाटेनिकल डाट काम पर उपलब्ध 12,000 से अधिक शोध आलेख
- इकोपोर्ट पर उपलब्ध शोध आलेख/रपट
- इकोपोर्ट पर उपलब्ध 30,000 से अधिक तस्वीरे
- मधुमेह पर वैज्ञानिक रपट से सम्बन्धित आलेख और कडियाँ
- डिस्कवरलाइफ मे तस्वीरे
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
� सर्वाधिकार सुरक्षित
कुछ दिनो पहले मेरे मित्र की माताजी को सिर पर चोट लग गयी। चोट मामूली थी पर फिर भी मित्र को लगा कि डाक्टर को दिखा दे। डाक्टर ने जाँच की और कहा कि सब ठीक है पर चाहे तो सिटी स्केन करा ले। मित्र ने यह भी करा लिया। सिटी स्केन की रपट देने वाले डाक्टर ने कहा सब कुछ सही है। फिर उस डाक्टर के पास वह गया जिसने इसकी सिफारिश की थी। उसने बिना रपट देखे कहा सब ठीक है। बात आयी-गयी हो गयी। एक नजदीकी रिश्तेदार ने कहा कि सिर का मामला है, किसी और को भी दिखा लो। एक नये डाक्टर के पास गये। उसने रपट देखी और कहा कि दिमाग मे सूजन है। ग्लिसराल नामक दवा पीने को दी गयी। आमतौर पर एक चम्मच ग्लिसराल दी जाती है एक दिन मे। पर इस डाक्टर ने तो एक दिन मे पूरी शीशी पिला दी। दवा उसकी अपनी दवा दुकान से दिलवायी गयी। तीन दिन मे तीन शीशी। फिर सिटी स्केन कराने को कहा। इस बार दूसरी जगह से सिटी स्कैन कराने कहा। फिर रपट आयी तो कहा कि एक न्यूरो सर्जन से मिल लो। उसने फिर सिटी स्केन के लिये कहा। अब तो हद हो गयी। मित्र थक गया। लोगो ने उसे इस फन्दे से बचाया कि पहले मन से डर निकालो और घरेलू दवा के रूप मे दूध हल्दी पियो और वो भी यदि दर्द हो तो। बस फिर क्या था कुछ ही दिनो मे माताजी चंगी हो गयी। इस तरह की घटना भले ही मित्र के लिये नयी हो पर हम आप तो रोज ऐसे किस्से सुनते रहते है जहाँ एक बार फन्दे मे फँसने पर भयादोहन कर जब तक सम्भव हो चिकित्सा के नाम पर पैसे ऐठे जाते है। दवाए इतनी महंगी है और इलाज भी सबके बूते की बात नही है। हमारा आधुनिक जीवन हमे रोगो के पास ले जा रहा है और रोग का इलाज उनके पास है जो येन-केन-प्रकारेण पैसे कमाने की फिराक मे है। मुझे डिस्कवरी चैनल मे दिंखाये जाने वाले आफ्रीका के उन वन्य पशुओ का ख्याल आता है जिनका प्यास से बुरा हाल होता है और पास के पोखर मगरमच्छो से भरे होते है। पशु फिर भी पानी पीने जाते है और धर लिये जाते है। उनकी मजबूरी आज के बीमार आदमी की मजबूरी जैसी ही है।
जब मै सुदूर अंचलो मे जाता हूँ वानस्पतिक सर्वेक्षणो के लिये तो मुझे ऐसे लोग मिलते है जो कि अपने पारम्परिक ज्ञान के आधार पर आस-पास उपलब्ध वनस्पतियो से रोगियो को आराम पहुँचाते है। चूँकि यहाँ डाक्टर नही होते है इसलिये रोगी इन पर ही निर्भर रहते है। हम इन्हे पारम्परिक चिकित्सक के नाम से जानते है। इनमे से ज्यादातर लोग चिकित्सा के पैसे नही लेते है। कुछ लेते है तो केवल वनस्पतियो की कीमत, वह भी चन्द रुपयो मे। उन्हे चेताया गया है कि इस ज्ञान से अर्थ लाभ किया तो सदा के लिये इसे खो बैठोगे। पर ठहरिये अगर आप भारतीय कानून को मानते है तो इनसे दूर रहे। क्यो? क्योकि हमारा कानून इनको नीम-हकीम कहता है। इन्हे इलाज करने की छूट नही है। भले ही विदेशो से वैज्ञानिक आये और इनके ज्ञान के आधार पर दवा बनाकर पेटेंट कराये पर इन पारम्परिक चिकित्सको को यह करने की छूट नही है। मुझे यह बडी अजीब से स्थिति लगती है। अपनी संस्कृति और विरासत पर नाज करने वाला हमारा देश यह क्या कर रहा है? विदेशी चिकित्सा पद्धति को इतना बढावा और देशी चिकित्सा पद्धति से इतना बैर कि उसे कानूनी मान्यता ही नही। मै असमंजस मे हूँ।
आजादी के बाद पडोसी देश चीन मे इस पर बह्स हुयी कि नंगे पाँव देशी चिकित्सको का क्या भविष्य हो। वहाँ योजनाकारो ने उन पर प्रतिबन्ध लगाने की बजाय उनको प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया। इसके दूरगामी परिणाम हुये। आज चीनी दवाये दुनिया भर मे नम्बर वन है। चीनी पारम्परिक चिकित्सको का पूरी दुनिया मे बोलबाला है। इन दवाओ से न केवल करोडो चीनीयो को स्वास्थ्य लाभ मिलता है बल्कि इससे देश को बहुत आय भी होती है। ऐसा हमारे देश के योजनाकारो ने क्यो नही किया- इस पर लम्बी बहस हो सकती है। हम राजनीति कर सकते है। किसी पार्टी विशेष को दोषी ठहरा सकते है पर अब भी जो वयोवृद्ध पारम्परिक चिकित्सक समाज से आदर और सम्मान की बाट जोह रहे है उनके लिये कुछ नही करते है। ये शर्म की बात नही तो और क्या है?
मैने इन पारम्परिक चिकित्सको के विषय मे बहुत कुछ लिखा है। हजारो शोध आलेख इंटरनेट पर है। इन लेखो के आधार पर दुनिया भर मे शोध हो रहे है। दुनिया भर के लोग छत्तीसगढ और भारत के अन्य भागो के पारम्परिक चिकित्सको के ज्ञान के आगे नतमस्तक है। पर फिर भी �घर का जोगी जोगडा और आन गाँव का सिद्ध� की तर्ज पर हम सब कुछ जानकर भी इनसे पर्दा किये बैठे है। ऐसा ही चलता रहा तो वे तो जल्दी ही हमारे बीच से चले जायेगे पर हमारी आगामी पीढी को मगरमच्छो से भरे पोखरो की ओर बढने से कोई नही रोक पायेगा।
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
� सर्वाधिकार सुरक्षित
मै वानस्पतिक सर्वेक्षण के लिये तैयार हो ही रहा था कि सुबह-सुबह फोन आ गया। यह फोन अमेरिका से था।
� आप ही मेरे अंकल को बचा सकते है।� यह आवाज एक भारतीय की थी। उनका कहना था कि उनके अंकल किसी वनस्पति का सेवन करते थे लम्बे समय तक और इसी कारण उनकी तबियत बिगड गयी है और वे दिल्ली मे भरती है। लीवर और किडनी खराब हो गयी है। यदि आप उपचार बतायेंगे तो दिल्ली के चिकित्सक आपको पूरा सहयोग करेंगे।� मैने एक पल सोचा फिर मदद करने की ठानी। मैने उनसे कहा कि मै कृषि वैज्ञानिक हूँ और मुझसे जो बन पडेगा मै करूंगा। मुझे इलाज करना नही आता। पर फिर भी मै आपकी तसल्ली के लिये उन चिकित्सको से बात कर सकता हूँ। उधर से जवाब आया कि आप वनस्पति की पहचान बता दे। उन्होने तस्वीर भेज दी। साथ मे प्रश्नो की एक लम्बी सूची भी। यह तो पूछा ही गया था कि इस वनस्पति से होने वाली हानियो को कैसे दूर करे? साथ ही यह भी जानकारी माँगी गयी थी कि यह देश मे कहाँ मिलती है? इसे कैंसर की चिकित्सा मे कैसे उपयोग करते है? भला इन प्रश्नो का अंकल की तबियत से क्या वास्ता? सन्योग से जिस अस्पताल का नाम बताया गया था वहाँ मेरे मित्र काम करते थे। उनको फोन किया तो तस्वीर साफ होने लगी। बताये गये नाम का कोई व्यक्ति अस्पताल मे भर्ती नही था। जिस चिकित्सक का नाम बताया जा रहा था उस नाम से भी वहाँ कोई नही था। अमेरिका के फोन नम्बर के आधार पर जब इंटरनेट पर खोज की तो पता चला कि वो महाश्य एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय मे शोध करते है, वह भी जडी-बूटियो पर। उन्होने जो सन्देश भेजा था वह विश्वविद्यालय का न होकर सामान्य आई.डी.था। मैने उन्हे जवाब नही दिया। एक दिन मे कई सन्देश आते रहे फिर एक सन्देश आया �आपके अनदेखा करने के कारण अंकल गुजर गये। आपने यह ठीक नही किया। अभी भी प्रायश्चित की गुन्जाइश है। यदि आप पूरी जानकारी दे दे तो आपको माफ किया जा सकता है।� मैने सिर्फ एक काम किया और वह यह कि उसकी ई-मेल आई.डी. को ब्लाक कर दिया। मरीज बनकर रोज दसो लोग मुझसे पारम्परिक ज्ञान से सम्बन्धित जानकारी पाना चाहते है और इसी फेर मे कई बार असली रोगी मेरे तल्ख रवैये के शिकार हो जाते है।
यह बडे ही आश्चर्य की बात है कि भारतीय वनस्पतियो पर मेरे लेखो को सबसे अधिक विदेशो मे पढा जाता है और अधिक पत्र भी वही से आते है। वे आलू की सब्जी से लेकर रुद्राक्ष तक की जानकारी माँगते है। अब ई-मेल से तो पता नही चलता कि जरुरतमन्द सही है या व्यवस्सयिक उपयोग के लिये यह जानकारी माँग रहा है। हो सकता है वह मरीज बनकर माँगी जा रही जानकारी से कोई पेटेण्ट ले ले। इसलिये मै उनसे कहता हूँ कि आप राष्ट्रीय जैव-विविधता बोर्ड के पास जाकर अनुमति माँगे और फिर उनके कहने पर मै जानकारी देने का प्रयास करूंगा। पर ज्यादातर लोग यह रास्ता नही अपनाते है। एक उदाहरण देता हूँ। पिछले सप्ताह अमेरिका के एक लेखक ने मुझे लिखा कि मै उसे अकरकरा नामक वनस्पति के विषय मे जानकारी दूँ। मैने उससे कहा कि आप बोर्ड से अनुमति ले ले। इसके बाद एक और सन्देश आया मलेशिया से। उसमे कहा गया कि हमे इसके बीज चाहिये। मैने वही बात दोहरायी। अगला सन्देश दिल्ली से आया कि हमे अकरकरा की जानकारी दे। अब देश के अन्दर तो जानकारी दी जा सकती है। पर इसके व्यव्सायिक उपयोग की बात सोचते हुये मैने फिर वही बात दोहरायी। अगला सन्देश नागपुर से आया। यह किसी प्रोफेसर का था। लीजिये अब तो आपके ही क्षेत्र का व्यक्ति आपसे जानकारी माँग रहा है। मैने उनसे कहा कि आप यह लिख कर दे दे कि जानकारी का उपयोग व्यवसायिक तौर पर नही करेंगे क्योकि यह देश का पारम्परिक ज्ञान है तो कोई जवाब नही आया। अगला सन्देश नही आया बल्कि मेरे ही शहर का एक शोधकर्ता इसी जानकारी के लिये घर पहुँच गया। साथ मे मेरे एक रिश्तेदार को भी ले आया। अब बताइये। आप कहाँ तक बचेंगे? दरअसल मै कैसर की पारम्परिक चिकित्सा पर एक रपट तैयार कर रहा हूँ। अकरकरा उसमे है यह तो लोग जानते है पर इसके उपयोग की जानकारी कूट शब्दो मे है। यही कारण है इस लम्बी मशक्कत का। यह विडम्बना ही है कि अपने खर्च पर पारम्परिक ज्ञान का दस्तावेजाकरण कर रहे व्यक्ति को प्रोत्साहन तो दूर कोई इस तरह भारी दबाव से बचाने भी सामने नही आ रहा है। रिश्तेदार ने देखा कि मुझ पर असर नही हो रहा तो पिता जी से बोले कि मैने सामने वाले को जबान दे दी है। अब जानकारी नही मिली तो रिश्ता भी खतरे मे पड सकता है। इस दबाव से अब मै यह पता लगा रहा हूँ कि आखिर कौन है जो इतना साधन सम्पन्न है और जिसे जानकारी की इतनी आवश्यकता है। वह जो भी है उसे सीधे रास्ते से जानकारी नही चाहिये। नही तो वह बोर्ड के पास जाये और विधिवत तरीके से काम करे।
ऐसे विचित्र अनुभवो की लम्बी सूची है मेरे पास। अगले लेखो मे मै इस विषय मे और लिखूंगा। मुझे लगता है कि इस लेख से इस विषय मे कार्य करने की इच्छा रखने वाले नये शोधकर्ताओ को कुछ समझने और सीखने मिलेगा और वे इन दबाओ से बच सकेंगे।
सम्बन्धित हिन्दी आलेख
- पंकज अवधिया (2007). काँटे ही काँटे है पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे भाग-1
- पंकज अवधिया (2007). काँटे ही काँटे है पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे भाग-2
- पंकज अवधिया (2007). काँटे ही काँटे है पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे भाग-3
- पंकज अवधिया (2007). काँटे ही काँटे है पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे भाग-4
- पंकज अवधिया (2007). काँटे ही काँटे है पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे भाग-5
- पंकज अवधिया (2007). काँटे ही काँटे है पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे भाग-6
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
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देश के सभी शहर बारुद की गन्ध से महक रहे है। जी नही मै आतंकवाद पर नही लिखने जा रहा हूँ। मै तो प्रतिदिन लाखो की तादाद के फोडे जा रहे बमो की बात कर रहा हूँ जिन्हे आप चौबीसो घंटे फूटते सुन सकते है। पहले रात को यह शोर कम हो जाता था पर अब तो कोई भी बहाना मिले बम अवश्य फोडे जाते है। बमो की आवाज मे भी इजाफा हो गया है। सँकरी गलियो मे रहने वाले लोग या अस्पताल मे पडे मरीज अचानक ही चौक पडते है। रंग मे भंग न हो इसलिये मन-मसोस कर रह जाते है। बमो की आवाज से घरो के काँच थरथराने लगते है। कई बार तो आस-पास खडी गाडियो के शीशे टूट जाते है। इन बमो से कई प्रकार के प्रदूषण होते है। धुँए से लोगो विशेषकर बच्चो को साँस की तकलीफ हो जाती है। हमारे कान सुनने की स्वाभाविक क्षमता खोते जा रहे है फिर भी हमारे ही अपने लोग यह कर रहे है और आने वाले समय मे करते रहेंगे। यह कडवा सच है। रोज हो रहे धमाको के बीच मै यह सोचता रहता हूँ कि क्या इन बमो को समाज के लिये उपयोगी बनाया जा सकता है?
कुछ महिनो पहले अपने युवा मित्र के साथ टेबल टेनिस खेलते हुये मैने उसके सामने प्रस्ताव रखा कि सुगन्ध फैलाने वाले बम क्यो नही बनाये जाते? दीपावाली के बाद पूरा शहर महकने लगे तो कितना अच्छा होगा। अभी तो बारुद की बदबू से शहर कई दिनो तक रहने लायक नही हो पाते है। कई लोग दीपावली के तुरंत बाद पहाडो पर चले जाते है। युवा मित्र फटाको का खानदानी निर्माता है। उसने आधे मे ही खेल छोडा और घर चला गया। कुछ घंटो बाद फोन आया कि पिता जी तो हँस रहे है इस प्रस्ताव पर मै इस पर काम करने को तैयार हूँ। बस फिर क्या था हम लोगो ने इस पर काम शुरु कर दिया। बारुद की इतनी तेज गन्ध को दबा पाना बडा मुश्किल लग रहा है पर फिर भी प्रयास चल रहे है।
कुछ वर्षो पहले मैने बतौर सलाहकार मच्छरो को भगाने के लिये एक हर्बल नुस्खा बनाया था। यह बहुपयोगी था। इसे जलाने से वातावरण शुद्ध होता था। मख्खियाँ भाग जाती थी और मच्छर भी घरो से दूर रहना बेहतर समझते थे। इस नुस्खे को चीटीयो के पास रखने से वे दूर चली जाती थी। इसी नुस्खे से दमा के रोगियो को इनहेलर की जरुरत नही पडती थी। यदि आप बाहर है तो इस नुस्खे का लेप हाथ धोने के काम भी आ जाता था। मतलब यह कि एक पंथ और कई काज। दिल्ली के एक महाश्य ने इसे खरीदा और अब वे इसके लायसेंस के लिये लगे हुये है। मेरा काम खत्म हो चुका है। नये बम मे जब हमने इसे प्रयोग किया तो यह आशा जागी कि अब बम के फूटने से मच्छरो से भी निजात मिले सकेगी। मेरे इस युवा मित्र की कई सीमाए है पर उसका उत्साह देखते ही बनता है।
महंगे और जमीनी स्तर पर बेकार शोध करने वाले शोधकर्ताओ को अब आम लोगो की समस्याओ पर शोध कर उन्हे परेशानियो से मुक्ति दिलवानी चाहिये- ऐसा मेरा मानना है। आप मंगल मे जाने के लिये आतुर है पर जमीनी स्तर पर बमो से उत्पन्न प्रदूषण से नही निपट पा रहे है। इस प्रदूषण से दुनिया मे बहुत से देश प्रभावित है। पटाखो का प्रचलन सब ओर बढ रहा है। हम सब कुछ जानते हुये भी अपनी खुशी के लिये अपने स्वास्थ्य और पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहे है।
बारातो मे नाचते हुये युवाओ से मै पूछता हूँ कि बम फोडने से किस प्रकार का आनन्द मिलता है? तो सामान्य सा जवाब मिलता है कि आवाज मे जो रोमांच है वैसा किसी मे नही। तो क्या आने वाले समय मे हम सभी बारातियो को ऐसे हेडफोन दे सकते है जिसमे सभी को अपने रोमांच की आवश्यकता के हिसाब से आवाज सुनने को मिले। बम की आवाज आस-पास न फैले केवल हेडफोन से सुनने वालो तक जाये। अभी भले ही यह अकल्पनीय लगे पर इस तरह के समाधान सामने लाने होंगे ताकि रंग भी बना रहे और किसी को दिक्कत भी न हो।
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
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क्या आपने नियमगिरि का नाम सुना है? ज्यादातर लोगो का जवाब नकारात्मक ही होगा। नियमगिरि पर्वत उडीसा मे है और वहाँ के मूल निवासी आजकल अपने घर को बचाने के लिये संघर्ष कर रहे है। इस पर्वत पर बाक्साइट का खनन किया जाना है और इस खनन से पहले वहाँ के निवासियो को विस्थापित किया जाना है। कोई भी अपने घर ऐसे कैसे छोड सकता है? मूल निवासियो ने मना कर दिया और बात अब सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुँची है। नियमगिरि घने वनो से आच्छादित है और अपने कुछ दिनो के सर्वेक्षण से मैने दुर्लभ जडी-बूटियो और वन्य प्राणियो पर वृहत जानकारियाँ एकत्र की। बाक्साइट की आधुनिक समाज को बहुत जरुरत है पर नियमगिरि मे जो जैव-विविधता है उसकी कीमत पर यह खनन बहुत महंगा है। बहुत से संगठन मूल निवासियो से मिलकर नियमगिरि को बचाने संघर्ष कर रहे है। मै यकीन से यह बात कह सकता हूँ कि आपको दुनिया भर के पर्यावरण की जानकारी है पर आपके अपने देश मे होने वाले इस विनाश के विषय मे आप कुछ नही जानते। इसके लिये किसे जिम्मेदार ठहराया जाये? आप तो जिम्मेदार है ही पर बडी जिम्मेदारी हमारे प्रसार तंत्र की है जो ऐसी खबरो को आप तक पहुँचने ही नही देता।
अंग्रेजी अखबारो ने नियमगिरि पर काफी खबरे छापी है। इंटरनेट पर भी इस पर आपको काफी वेबसाइट मिल जायेंगी पर सबमे संघर्ष की बात मिलेगी। नियमगिरि क्या है और इसका बचा रहना धरती के पर्यावरण के लिये क्यो जरूरी है यह कही भी पढने या जानने को नही मिलेगा। क्या लेखक इस पर लिखना नही चाहते या फिर वे जानबूझकर ऐसा कर रहे है? यह अबूझ प्रश्न है।
मैने अपने सर्वेक्षणो के आधार पर जब हिन्दी और अंग्रेजी मे लेख लिखने आरम्भ किये तो सर्च इंजिनो ने उन्हे दिखाना आरम्भ किया पर जल्दी ही ये लेख सर्च इंन्जिन से गायब हो गये। आज भी ये लेख इंटरनेट पर है पर सर्च इंजिन इन्हे नही दिखाते है। मैने तो खनन मे लगे संस्थान या इससे जुडी राजनीति की बजाय जैव-विविधता पर आधारित लेख लिखे थे। इस घटना के बाद मुझे अहसास हो गया कि समस्या सचमुच गम्भीर है और इस पर लगातार लिखना होगा।
यह कडवा सच है कि हमारा मीडिया राजनीति से सम्बन्धित विषयो मे दक्ष है पर अन्य विषयो पर उसे विशेषज्ञो पर निर्भर रहना पडता है। देश की राजधानी मे बैठे या बडी संस्थानो मे कार्यरत विशेषज्ञो से ही राय ले ली जाती है और उसे सही भी मान लिया जाता है। नियमगिरि की ही बात करे। सर्वेक्षण के दौरान हम आलाबेली गाँव गये तो वहाँ के पारम्परिक चिकित्सक ने बताया कि कल रात हाथी आये थे। मैने उनके चलने से दबी जमीन की तस्वीरे ली और फिर आम लोगो के अनुभवो के आधार पर शोध आलेख लिखा पर उत्तरी भारत के एक अनुसन्धान संस्थान के वन्य पशु विशेषज्ञो की राय सुनी गयी कि नियमगिरि मे वन्य पशु है ही नही। मीडिया ने उसी बयान को माना और कानूनविदो ने भी। किसी ने वहाँ जाकर सत्य जानने की कोशिश नही की।
मुझे कई बार पत्रकारिता सीखाने वाले संस्थानो के लोगो से मिलने का मौका मिला है। मै उनसे पूछता हूँ कि क्या देश की महत्वपूर्ण पर्यावरण से जुडी सम्स्याए छात्रो को बतायी जाती है तो उनमे से कुछ सकारात्मक उत्तर देते है। मै फिर पूछता हूँ कि क्या पर्यावरण विशेषज्ञ यह बात बताते है तो वे कहते है कि नही जी, उन्हे किताबो के माध्यम से यह बात बतायी जाती है। मेरा बस चले और वे मुझे सुनना चाहे तो मै देश भर मे घूमकर जैव-विविधता की बाते इन छात्रो को बताना चाहूंगा ताकि प्रजातंत्र के चौथे खम्बे का दायित्व वे आशानुरूप ढंग से निभा सके। बेहतर तो यह होगा कि दोनो पक्षो की बात ये छात्र सुने और फिर अपने विवेक से समाधान सुझाये। लगातार बढ रही समस्याओ को देखते हुये विषय विशेषज्ञ पत्रकारो की एक पूरी पीढी तैयार करने की जरुरत है।
नियमगिरि जैसे विषयो को जन-जन तक पहुँचाना जरूरी है। धरती के किसी भाग मे होने वाला पर्यावरणीय असंतुलन सभी को किसी न किसी रूप मे प्रभावित करता है। इस नजरिये से तो नियमगिरि की समस्या पूरे विश्व की समस्या है। आम जन के इससे जुडने से राजनेता भी सजग होंगे और मारे डर ही सही पर जनविरोधी निर्णय करने से बाज आयेंगे- ऐसा मेरा मानना है।
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
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केवाँच और गोखरू के बीजो के चूर्ण को बराबर मिलाकर गाय के धारोष्ण दूध के साथ सेवन मनुष्य की शक्ति को कभी क्षीण नही करता है। ऐसा प्राचीन चिकित्सा ग्रंथो मे लिखा है। इसे स्वयमगुप्तादिचूर्णम का नाम दिया गया है। ग्रंथो मे इससे अधिक जानकारी उपलब्ध नही है। इस जानकारी के साथ जब मै छत्तीसगढ के पारम्परिक चिकित्सको से मिला तो उन्होने अपनी अलग-अलग प्रतिक्रियाए दी।
ज्यादातर पारम्परिक चिकित्सक इस नुस्खे को जानते है। दोनो ही वनस्पतियाँ राज्य मे मिलती है और वे सैकडो नुस्खो मे इन वनस्पतियो का प्रयोग अन्य वनस्पतियो के साथ करते है। पर बहुत से पारम्परिक चिकित्सक इन दो वनस्पतियो के प्रयोग ही को उपयोगी मानते है।
मैदानी भाग के पारम्परिक चिकित्सको ने बताया कि वे केवाँच के काले बीजो वाली किस्म का प्रयोग करते है। जमीन मे गिरे या कहे बिखरे हुये बीजो का एकत्रण है। खेती से तैयार बीजो का प्रयोग नही होता है। बागबहरा के पारम्परिक चिकित्सको ने बताया कि वे सफेद, काले और मिले-जुले बीजो का प्रयोग करते है।
गोखरू के बीज नदी के किनारे पर अपने आप उगने वाले पौधो से एकत्र किये जाते है। महानदी की रेत मे उगने वाले गोखरू को सबसे अच्छा माना जाता है। वे पारम्परिक चिकित्सक जो महानदी से दूर है, वे घूम-घूम कर वनस्पति बेचने वालो से इसे खरीद लेते है। मेलो से भी इसकी खरीद होती है।
क्या साल भर इसका प्रयोग करना चाहिये? यह जानकारी सन्दर्भ ग्रंथो मे नही मिलती है। पारम्परिक चिकित्सक बताते है कि बरसात और जाडे के मौसम मे इसका प्रयोग करना चाहिये। बरसात मे इसे भैस के दूध के साथ जबकि जाडे मे गाय के दूध के साथ लेना चाहिये।
पारम्परिक चिकित्सक पहले केवाँच की मात्रा अधिक रखते है फिर धीरे-धीरे गोखरू की मात्रा बढाते जाते है। वे इस नुस्खे का प्रयोग सहायक उपचार के रूप मे उन रोगियो की चिकित्सा मे करते है जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। वे कहते है कि आरम्भ मे इसका प्रयोग मुख्य उपचार मे भी होता है। आधुनिक चिकित्सा जब हार मान लेती है और एडस के रोगी को मरने के लिये छोड दिया जाता है तब वे पारम्परिक चिकित्सको के पास आते है। कई पारम्परिक चिकित्सक इस अवस्था मे इस नुस्खे के प्रयोग की बात कहते है पर वे इसमे 20 प्रकार की अन्य वनस्पति भी मिला लेते है।
काँकेर के पारम्परिक चिकित्सक जब किडनी रोगो का उपचार करते है तो इस नुस्खे मे गोखरू का अनुपात बढा देते है। पार्किंसंस जैसी बीमारियो के इलाज मे केवाँच का अनुपात बढा दिया जाता है। उनका कहना है कि मुख्य भूमिका केवाँच की होती है और गोखरू का प्रयोग केवाँच के असर को बढा देता है। दूध केवल माध्यम का कार्य नही करता है। यह केवाँच और गोखरू दोनो ही की क्षमता को बढा देता है।
इन जानकारियो को जब मैने विस्तार से लिखना आरम्भ किया तो इसे समाहित करने मे 350 से अधिक पृष्ठ लगे। राज्य मे 6000 से अधिक पारम्परिक चिकित्सको को मै जानता हूँ। इनमे से कुछ से मिलने पर इस नुस्खे के विषय मे इतनी जानकारी मिली। देश भर के पारमपरिक चिकित्सको से कितनी जानकारी मिल सकती है यह कल्पना से बाहर है। ये जानकारियाँ बहुत महत्वपूर्ण है। मुझे लगता है कि इन्हे प्राचीन ग्रंथो के नवीन संस्करण के शामिल किया जाना चाहिये। ऐसी ही जानकारियाँ दस्तावेजो के रूप मे उपलब्ध पारम्परिक ज्ञान को समृद्ध बना सकती है। पिछले एक दशक से भी अधिक समय से मै यह कार्य कर रहा हूँ और अब तक हजारो नुस्खो के विषय मे जानकारी एकत्र की है। पर यह ज्ञान बहुत वृहत है। यही कारण है कि अभी तक मै केवल 38 नुस्खो मे नयी जानकारियाँ जोड पाया हूँ। आज सारी दुनिया पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान जैसे नीरस विषय के बारे मे जानने को तैयार नही है। ऐसे मे चिंता और बढ जाती है। इस विषय मे नयी पीढी को बताकर यदि एक विश्वविद्यालय की स्थापना की जाये तभी इसका भविष्य सुनहरा कहा जा सकता है।
सम्बन्धित शोध आलेखो की सूची
- Comments of Traditional Healers of Indian State Chhattisgarh on Ayurveda Formulations. 1. Introduction.
- Comments of Traditional Healers of Indian State Chhattisgarh on Ayurveda Formulations. 2. Comments on Vilvadikwath.
- Comments of Traditional Healers of Indian State Chhattisgarh on Ayurveda Formulations. 12. Shringyadileh.
- Comments of Traditional Healers of Indian State Chhattisgarh on Ayurveda Formulations. 7. Use of Durva Prash.
- Comments of Traditional Healers of Indian State Chhattisgarh on Ayurveda Formulations. 8. Raktashrav Chikitsa (Chakradatt).
- Comments of Traditional Healers of Indian State Chhattisgarh on Ayurveda Formulations. 9. Use of Shriparni Tailam.
- Comments of Traditional Healers of Indian State Chhattisgarh on Ayurveda Formulations. 10. Laja Yog.
- Comments of Traditional Healers of Indian State Chhattisgarh on Ayurveda Formulations. 11. Kajjalam (Chakradatt).
- Comments of Traditional Healers of Indian State Chhattisgarh on Ayurveda Formulations. 13. Nimbpatra Yoga.
- Comments of Traditional Healers of Indian State Chhattisgarh on Ayurveda Formulations. 14. Shvavishchikitsa.
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- Comments of Traditional Healers of Indian State Chhattisgarh on Ayurveda Formulations. 17. Lohtriphala Yoga
- Comments of Traditional Healers of Indian State Chhattisgarh on Ayurveda Formulations. 18. Varahvasa Yoga.
- Comments of Traditional Healers of Indian State Chhattisgarh on Ayurveda Formulations. 19. Mash Payas.
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(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
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कुछ वर्षो पहले मै गर्मियो के दिनो मे पीले पलाश की तलाश मे वनो मे घूमने निकल्ने की तैयारी कर रहा था। साथ मे चल रहे मार्गदर्शक जो पारम्परिक चिकित्सक भी थे, ने बहुत से तेन्दु के फल एकत्र कर लिये। मैने उनसे कारण पूछा तो वे बोले कि यह तो जंगल के अन्दर जाने पर ही बताऊँगा। हम लोग काफी देर तक चलते रहे। बीच-बीच मे मै अपनी बोतल से पानी पीता रहा और फिर पानी खत्म हो गया। गर्मियो मे जंगल मे पानी मिलना मुश्किल होता है और मिल भी जाये तो वन्य पशुओ के साथ कतार मे लगना पडता है। यहाँ तेन्दु की उपयोगिता पता चली। रास्ते भर मार्गदर्शक ने पानी नही पीया सिर्फ रूककर तेन्दु खाते रहे। उन्हे बिल्कुल प्यास नही लगी। उन्होने खुलासा किया कि शहर के लोग शीतल पेय़ पीकर जो स्वास्थ्य को खतरे मे डालते है और फिर भी गर्मी से नही बच पाते है, के लिये तेन्दु एक सशक्त विकल्प है। यह सस्ता है और स्वादिष्ट भी। बचपन मे गाँवो मे रहकर हमने खूब तेन्दु खाये है पर हमारे आस-पास ऐसे लोग भी है जिनका जीवन शहर मे कटा है और वे तेन्दु जैसे देशी फलो को नही जानते। खाने की बात तो दूर है। मार्गदर्शक महोदय ने बताया कि तेन्दु के प्रयोग से गर्मियो की बीमारियो से बचा जा सकता है। एक शहर से दूसरे शहर जाने से पानी बदलने के कारण होने वाली समस्याओ से भी यह बचाता है, बिल्कुल अदरक की तरह।
आजकल पथरी के रोगी बढते जा रहे है। सन्दर्भ ग्रंथ कहते है कि तेन्दु के फलो का सेवन न केवल इस रोग का उपचार करता है बल्कि फिर से पथरी बनने को रोकता है। खून की सफाई करने का दावा करने वाले ढेरो उत्पाद आज बाजार मे है। हमारे युवा बरसो से इनका उपयोग कर रहे है पर कम ही लाभांवित हो रहे है। तेन्दु मे दूषित खून के कारण होने वाले बीमारियो को जड से दूर करने की ताकत है।
तेन्दु की तरह एक और देशी फल कैथा के विषय मे भी शहरो मे कम जानकारी है। हमारे प्राचीन चिकित्सा ग्रंथ इस फल के औषधीय गुणो के बखान से भरे पडे है। ठंड की बीमारियो के लिये यह एक बहुत उपयोगी औषधी है। सर्दी-खाँसी मे यह आधुनिक दवाओ का सस्ता पर प्रभावी विकल्प साबित होता है। माँ प्रकृति अपने बच्चो को जानती है। इसलिये उन्होने सर्दी के लिये अपने बच्चो की रक्षा के लिये कैथा का फल उपलब्ध करवाया है। पर उनके बच्चे इस ओर ध्यान नही दे रहे है। कैथा हाथी के प्रिय फलो मे से एक है। इसलिये जिन भागो मे हाथी समस्या पैदा करते है (या कहे कि जहाँ आदमी हाथियो के क्षेत्र मे अतिक्रमण करते है) वहाँ मानव आबादी से इन्हे दूर रखने के लिये कैथा के जंगल लगाने की सलाह दी जाती है ताकि उनकी भूख वही मिट जाये।
शहरो मे अंजीर बडे चाव से खायी जाती है। यह महंगी तो होती है पर दिव्य गुणो से युक्त नही होती है। शहरी माँग को पूरा करने के लिये इसे उगाया जाता है। अच्छी फसल के लिये रसायनो का प्रयोग किया जाता है और यही रसायन इसे खाने वालो के लिये अभिशाप बन जाते है। अंजीर का वैज्ञानिक नाम फाइकस कैरिका है। इसका देशी विकल्प हमारे बीच गूलर या डूमर के रूप मे उपलब्ध है। इसे इंडियन फिग का नाम मिला है और इसका वैज्ञानिक नाम है फाइकस रेसीमोसा। इसमे अंजीर जैसे ही गुण पाये जाते है। यह अपने आप उगता है और रसायनो का प्रयोग इसके उत्पादन मे नही होता है। यह बहुत ही स्वादिष्ट होता है। बच्चे इसे चाव से खाते है। देश के पारम्परिक चिकित्सक बताते है कि इसके मौसमी प्रयोग से वर्ष भर बीमारियो से बचा जा सकता है। अब आपको महंगे रिशी मशरूम और नोनी जैसे उत्पाद पर व्यर्थ पैसे बहाने की क्या जरुरत?
मैने देशी फलो के महत्व पर सैकडो आलेख लिखे है और एक वृहत एनसाइक्लोपीडीया तैयार की है। देश भर मे साल भर देशी फल उपलब्ध है। आप अपने इलाके का नाम बताइये और हम आपको बतायेंगे आपके आस-पास पाये जाने वाले देशी फल, उनके स्थानीय नाम, उनके औषधीय महत्व और साथ ही इस विषय मे जानकारी रखने वालो की सूची। – इस तर्ज पर इसे तैयार किया गया है। मुझे लगता है कि आने वाली पीढी के लिये यह अधिक उपयोगी होगा क्योकि यह हमारा सौभाग्य है कि वर्तमान पीढी इनके विषय मे कम ही सही पर उपयोगी जानकारी रखती है। उन्हे फिर से जगाने की जरुरत है जिससे देशी फल भारतीय घरो मे एक फिर पहुँचे। बच्चे यदि इन्हे खाने की मेज पर देख ले तो समझिये हमने एक पूरी पीढी तक यह सन्देश पहुँचा दिया।
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
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रोज शाम को जब आपके घरो मे मच्छरो का आक्रमण होता है तो आप क्या करते है? कई प्रकार के काइल्स जलाते है या फिर तरल अपनाते है, मच्छरदानी के अन्दर घुस जाते है या फिर अपने और बच्चो के शरीर मे क्रीम लगाकर तेज पंखा चलाकर सो जाते है। यदि ठंड लगे तो चादर ओढ लेते है। कुल मिलाकर पूरे देश मे ये ही तरीके अपनाये जाते है मच्छरो से बचने के लिये। पर क्या इससे आपकी समस्या का समाधान हो जाता है। नही ना। क्योकि साल के कुछ महिनो मे मच्छर इतने अधिक बढ जाते है कि ये उपाय भी धरे के धरे रह जाते है। ऐसे मे हम जी भर के प्रशासन को कोसते है और एक की जगह कई काइल्स जलाने लगते है। आप तो जानते ही है कि प्रति वर्ष मच्छरो से होने वाली बीमारियाँ बढती ही जा रही है। मच्छरो से होने वाली बीमारियो को तो हम जानते है पर इसके कारण अप्रत्यक्ष रूप से जो बीमारियाँ होती है उससे हम जानकर भी अनजान बने हुये है।
सभी काइल्स और तरल मे एलीथ्रीन नामक कीटनाशक होता है जिसके दुष्प्रभाव को दुनिया भर मे लोग जानते है। घरो मे आम तौर पर हमेशा ही इन साधनो का उपयोग किया जाता है। पता नही कितनी अधिक मात्रा मे यह रसायन आपकी श्वाँस नली के माध्यम से आपके शरीर मे जा रहा है? आप अपनी छोडिये बच्चो की सोचिये। नाना प्रकार की बडो की बीमारियाँ अब बच्चो को हो रही है। हाल ही मे एक पालक ने मुझे बताया कि उनके बच्चे को अस्थमा है। कई तरह की जाँच करवायी, मौसम बदलने की गरज से सिंगापुर घूम आये, यहाँ तक कि घर भी बदल दिया पर राहत नही मिली। मैने पूछा कि आप मच्छर भगाने वाले तरल का उपयोग करते है? तो वे चहक के बोले हाँ बिल्कुल और हमने तो सभी कमरे मे दो-दो लगा रखे है। मैने उनसे कहा कि इन सब को हटा दे और देखे। हो सकता है बीमारी की जड यही हो। वे मान गये और कुछ दिनो बाद उन्होने बताया कि असली जड तरल नही काइल्स थी और अब इनके हटने से न केवल बच्चा ठीक हो रहा है बल्कि उनका खुद का सिरदर्द चला गया। ऐसे सैकडो उदाहरण मिलेंगे आपको। यकीन न हो तो आप अपने ऊपर आजमा कर देख ले। आपने पैसे देकर यह आत्माघाती कदम उठाया है। अभी तक तो प्रशासन ही आपकी मौत का प्रबन्ध करता रहा पर अब आपने खुद अपने पैरो पर कुल्हाडी मार ली है।
छत्तीसग़ढ की ही बात करे। यहाँ रोज शाम को एक गाडी घूमती है और उससे धुआँ फैलाया जाता है मच्छरो का दम घोटने के लिए। इस धुए मे मेलाथियान जैसे कीटनाशक होते है। पूरी दुनिया मे इन कीटनाशको पर प्रतिबन्ध है पर हमारे देश मे खुलेआम इसका उपयोग हो रहा है। आधुनिक शोधो से पता चला है कि ये कीटनाशक कैसर पैदा कर सकते है। लीजिये एक गाडी से तो मच्छरो का बाल भी बाँका होने से रहा उल्टे आपको सडको मे खुले आम यह जानलेवा बीमारी बाँटी जा रही है। यह धुँआ हवा के साथ घर के अन्दर भी पहुँच जाता है और आम लोगो का दम घुटने लग जाता है। वैसे मेरे पास एक खुशखबरी भी है। मुझे एक ठेकेदार ने बताया कि सबको हिस्सा देने के बाद इतना पैसा बचता ही कहाँ है जो कीटनाशक का प्रयोग किया जा सके। इसीलिये हम तो केवल कैरोसिन का प्रयोग करते है।
यह मान लिया कि इस लेख को पढने के बाद कुछ समय के लिये आप इन जानलेवा उपायो का प्रयोग बन्द कर देंगे पर जब मच्छर काटेंगे तो झुंझलाकर फिर वही सब शुरु हो जायेगा। मुझे एक बात बताइये। आप इतने सारे उपाय मच्छरो को भगाने के लिये करते है पर क्या कभी यह जानने की कोशिश करते है कि आखिर ये आ कहाँ से रहे है? आस-पास की गन्दगी ही से ना। और यह आस-पास आपका ही आस-पास है। तो फिर क्यो न इस गन्दगी से छुटकारा पाया जाये। आप अब तक तो प्रशासन को दोष देते आये है पर वह तो आने से रहा। रोज पता नही कितने मच्छर आपको और आपके परिवार के सदस्यो को काट रहे है। एक बार काटने ही से बीमारियाँ हो सकती है पर यह शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पर निर्भर है कि कब तक आप बचे रहते है। एक बार यह कम हुयी नही कि डाक्टरो के महंगे चक्कर शुरु।
यह कदम बडा ही झिझक भरा है पर कोशिश तो करिये जानने की कि क्या आपके पडोसी भी यही समस्या झेल रहे है और अपने आप को असहाय पा रहे है? आपको पता चलेगा कि वे भी परेशान है तो फिर रविवार का समय निश्चित करिये और सब मिलकर मच्छरो के अड्डो को नेस्तनाबूत कर दीजिये। आस-पास के लोगो से मिलने आप तरोताजा हो जायेंगे। सबसे बडी बात यह होगी कि आपके बच्चे यह सब देखकर एक नया पाठ सीखेंगे जो स्कूली किताबो मे नही मिलेंगा आगे आने वाला समय और कठिन होने वाला है। हम बढते ही जायेंगे और गन्दगी फैलाते ही जायेंगे। ऐसे प्रयास बच्चो को बिना झिझक आगे आने के लिये प्रेरित करेगा। इस सब के लिये कुछ पैसे लगेंगे। यदि आप बीमारियो पर होने वाले खर्च से इसकी तुलना करेंगे तो आप अपने को लाभ मे ही पायेंगे। रविवार को मच्छर भगाओ दिवस मनाइये। आपके प्रयास और लोगो को प्रेरणा देंगे और साथ ही प्रशासन को शर्मसार करेंगे। वे गल्ती से रविवार को आ जाये तो उन्हे भी बाहर का रास्ता दिखा दे यह कहकर कि आज मच्छर भगाओ दिवस है। वे जरुर इस व्यंग्य को समझेंगे।
नीम तो एक वनस्पति है पर इसके अलावा सैकडो वनस्पतियाँ है जो आपको मच्छरो से निजात दिलवा सकती है। इनमे से ज्यादातर वनस्पतियाँ आपके आस-पास खरपतवार की तरह उग रही है। आपको केवल एकत्र करके सुखाना है और फिर जलाना है। इसका धुआँ नुकसान नही करता। बहुत सी वनस्पतियो का धुआँ तो शरीर को निरोग बनाता है। आज के बाजारी युग ने अच्छी चीजे आपको बाजार मे नही बल्कि आस-पास मिलेंगी। अब तो होली भी आ रही है। आप विशेषज्ञो से इन वनस्पतियो की पहचान करवा कर हरे-भरे वृक्षो की जगह इन्हे जलाने की जानकारी बाँट सकते है। इससे आपका पडोस ही नही बल्कि पूरा शहर मच्छरो से मुक्त हो पायेगा। तो फिर देर किस बात की?
(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)
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