Archives for साईं बाबा
लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
अन्तर्यामी साईं बाबा (3)
साईं बाबा योगी थे। चौबीसों घण्टे उनकी सहज समाधि लगी रहती थी। वे यौगिक क्रियाओं में पूर्ण पारंगत थे। उन्हें खण्ड योग का पूरा पूरा ज्ञान था। खण्ड योग के द्वारा योगी अपने अंगों को अपने शरीर से अलग अलग कर फिर से जोड़ लेता है। साईं बाबा बैठे बेठे ही अन्तर्धान हो जाते और फिर प्रकट हो जाते थे। साईं बाबा के पास उनके दर्शन करने, उपदेश लेने और वेदान्त का ज्ञान प्राप्त करने के लिये योगी, अग्निहोत्री ब्राह्मण, साधक और मुमुक्ष लोग आते थे। बड़े बड़े शिक्षित लोग उनके भक्त थे। उनके लिये अमीर और गरीब में कोई भेद नहीं था। साईं बाबा के दिनचर्या का कोई ठोस रूप निश्चित नहीं था। वे केवल भक्तों के और जन समुदाय के कल्याण के लिये ही काम करते थे। उन्हें पूरे विश्व के कल्याण की चिन्ता रहती थी। वे भक्तों को उनके मन की कल्पना के अनुरूप ही दर्शन देते थे। वे “जाकी रही भावना जैसे, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी” के अनुसार अपने भक्तों को विट्ठल, श्री हरि, राम, कृष्ण और अन्य देवी-देवताओं के रूप में दर्शन दे कर उनके मन में धर्म, गुरु और ज्ञान के प्रति आस्था, विश्वास और श्रद्धा देते थे।
उनके जीवन काल में ही कई लोगों ने उनके अवतारी होने का रहस्य जान लिया था। कुछ सन्तों ने भी उन्हें अच्छी तरह से पहचान लिया था। वे ब्रह्माण्ड के केन्द्र थे। मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य है मोक्ष प्राप्त कर जन्म-मरण के बन्धन और कष्ट से मुक्ति पाना। जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा तभी ही मिल सकता है जब भगवान की कृपा होगी। सन् 1918 और 1997 (लेख लिखने का वर्ष) के बीच बहुत कुछ परिवर्तन हुआ है। आज सन् 1997 में यह कहना कठिन है कि आज भगवान को कितने लोग मानते हैं और कितने लोग सच्चे हृदय से धर्म की ओर झुके हुये हैं। पहले सन्त-महात्मा पावस ऋतु में जगह जगह चातुर्मास किया करते थे – क्या आज वही परिस्थिति है? रामचरित मानस पठन के लिये आयोजन किये जाते थे। लोगों की प्रवृति धार्मिक थी। अब तो लगता है कि ईश्वर को भूल जाने में ही लोग जीवन की सार्थकता समझने और मानने लगे हैं। स्वार्थ सर्वत्र प्रबल हो गया है।१ पाप ही पुण्य माना जाने लगा है। जो जितना ही अधिक धूर्त है वही सज्जन समझा जाने लगा है। भ्रष्टाचार सर्वत्र व्याप्त है। समाचार पत्रों के पन्ने भ्रष्टाचार, अनाचार, बलात्कार, हत्या, अपहरण आदि महापापों के समाचारों से भरे पड़े रहते हैं। स्वार्थी ही परमार्थी कहलाने लगे हैं। अध्यात्म की बात कोई करता हुये नहीं जान पड़ता। भौतिक वाद अनन्त काल से धर्म प्राण भारत को निगल रहा है।
जुए के क्षेत्र का विस्तार बढ़ गया है। लोग लगभग अधम, असुर और अभिमानी हो गये हैं। रक्षक ही भक्षक बनते जा रहे हैं। जब कोई धर्म और परमात्मा की बातें करता है तब लोग उसका मखौल उड़ाते हुये से जान पड़ते हैं। क्या भगवान अब अवतार लेने और धर्म की संस्थापना करने के तैयार नहीं है? ऐसा प्रतीत होता है कि अब धार्मिक वातावरण शायद नहीं उभरेगा। भगवान को तो सब कुछ मालूम है तो भी वह अवतार क्यों लेगा? परमात्मा तो माया से अलिप्त है और आज संसार में झूठ, फरेब और माया तथा असत्य का ताण्डव हो रहा है। यह सब कुछ अन्तर्यामी साईं बाबा को ज्ञात है। वे सब कुछ सुधार सकते हैं किन्तु आवश्यकता है भगवान, सन्त, गुरु और धर्म के प्रति श्रद्धा रखने की। कहा नहीं जा सकता कि भगवान दानवता से परिपूर्ण वर्तमान कृत्रिम मानवता का सर्वनाश करने वाले हैं या अपनी शरण में आये हुये मानवों के द्वारा मानवता की रक्षा करने वाले हैं। अन्ततः ईश्वर की इच्छा ही प्रबल होती है – ईश्वरेच्छा गरीयसी।
(समाप्त)
लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
अन्तर्यामी साईं बाबा (2)
साईं बाबा की मूर्ति पूजा, कर्म बन्धन, कर्म मार्ग, कर्म फल और पुनर्जन्म पर पूर्ण आस्था थी। वे गुरु भक्ति के प्रबलतम समर्थक थे। ध्यान योग में प्रति पल निमग्न रहते थे। उन्होंने स्वयं बारह वर्ष तक तपस्या की थी और तपस्या के प्रबल पक्षपाती थे। वेदान्त के तो वे मूर्तिमान स्वरूप ही थे।
चराचर सृष्टि साईं बाबा के वश में थी। वे सर्वत्र एक ही आत्मा के दर्शन करते थे। प्रकृति तो चैतन्य के अधीन रहती है। इसीलिये उन्होंने पानी से दिये जला दिये। संसार के समस्त प्राणी साईं बाबा के अनुशासन में थे। हिन्दू धर्म में अग्नि की बड़ी महिमा बतायी गई है। ऋग्वेद तो “अग्निमीले पुरोहितं……..” से ही प्रारम्भ होता है। साईं बाबा अग्नि के उपासक अग्निहोत्री ब्राह्मण थे। इसीलिये रात दिन धूनी जलाये रखते थे। वे साधक और सिद्ध की स्थिति को पार कर सुजान बन गये थे। भगवान शंकर की भाँति साईं बाबा भी भाग्यरेखा को मिटा कर अपने भक्तों के संकट दूर कर देते थे। उन्होंने शिरडी में भूमि गत तप-स्थली में अपने गुरु वेंकुश स्वामी के सानिध्य में बारह वर्ष तक कठिन तपस्या की थी।
साईं बाबा ने लोगों का मन धर्म के वास्तविक तत्व में लगाने के लिये कई चमत्कार भी किये। वे तो स्वयं मायापति त्रिलोकीनाथ भगवान थे। उनके लिये कुछ भी असम्भव नहीं था। अपने निवास के लिये उन्होंने जीर्णशीर्ण पुरानी मस्जिद को चुना पर उसका नाम रखा ‘द्वारका माई’ मस्जिद। यह भी भगवान साईं बाबा की लीला और कौतूहल ही था कि बाबा की कृपा से वह मस्जिद, मन्दिर जैसे बन गई। वहाँ धूनी जलने लगी, श्री हरि की पूजा और आरती की जाने लगी, शंख बजाये जाने लगे, कीर्तन होने लगा, साईं बाबा की अमृत वाणी गूंजने लगी, कृष्णाष्टमी और रामनवमी के त्यौहार मनाये जाने लगे। साईं बाबा का हर काम हिन्दू संस्कृति के अनुसार होता था। उनकी हर बात उपदेश पूर्ण होती थी।
साईं बाबा सदैव अपने भक्तों का ध्यान रखते और उनके दुःखों और कष्टों का निवारण करते थे। साईं बाबा अन्तर्यामी थे। वे बहिर्यामी तो हैं ही। हम भगवान को अपने से बाहर देखने का प्रयास करते हैं पर अपने भीतर झाँक कर, ध्यान लगा कर अपने अन्तर्यामी परमात्मा को भूल कर भी नहीं देखते। मनुष्य जीवन की असफलता का मूल कारण यही ही है। ‘अनतर्यामी’ को समझाते हुये भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि, “ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति”, अर्थात् हे अर्जुन! परमात्मा सबके हृदय में निवास करते हैं। साईं बाबा ऐसे ही अन्तर्यामी थे। इसीलिये जब कभी कोई साईं बाबा से मिलने आता था तब वे बना बताये ही उसका नाम और आने का प्रयोजन जान लेते थे। अन्तर्यामी होने के कारण वे सर्वज्ञ थे। साईं बाबा गुरु और गुरु भक्ति के पूर्ण पक्षपाती थे। उनका मत था कि सद्गुरु के द्वारा मार्गदर्शन कराये बिना कदम कदम पर भटक जाने का भय बना रहता है। वे जानते थे कि “राखैं गुरु जो कोप विधाता।” इतना ही नहीं, उन्होंने स्वयं तात्या कोते पाटिल की मौत को अपने ऊपर ले कर उसके प्राण बचाये।
(क्रमशः)
लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
अनतर्यामी साईं बाबा (1)
साईं बाबा अन्तर्यामी हैं। वे आत्मा हैं, परमात्मा हैं, परब्रह्म हैं। आत्मा का अस्ततित्व कभी मिटता नहीं। साईं बाबा तो मायापति त्रिलोकीनाथ ही हैं। वे परब्रह्म परमात्मा के अवतार थे। भगवान के अवतार होने का उद्देश्य होता है। गीता में भगवान ने अपने अवतार लेने के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुये स्वयं कहा है कि -
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानं अधर्मस्य तदात्मानं सृजान्यहम्॥”
और
“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥”
अर्थात् जब अधर्म बढ़ जाता है, धर्म का ह्रास होने लगता है तब मैं अवतरित होता हूँ।
साधुओं की रक्षा और दुष्टों का विनाश कर धर्म की संस्थापना करने के लिये मैं अवतार लेता हूँ।
भगवान का अवतार तीन प्रकार का होता हैः- 1. नित्यावतार, 2. नैमित्तिक अवतार और 3. युगावतार।
1. नित्यावतारः सन्त महात्मा एवं समस्त जीव नित्यावतार में गिने जाते हैं। सन्त भगवान का स्मरण करते रहते हैं। जो महुष्य साधना कर साधक बन जाता है उसे लम्बी तपस्या के बाद आत्म-दर्शन हो जाता है। प्रत्येक के भीतर “ईश्वर अंश जीव अविनाशी का निवास होने के कारण वह भगवान का नित्यावतार होता है।
2. नैमित्तिक अवतारः कुछ जीवन्मुक्त आत्माएँ अपनी इच्छा से शरीर धारण कर किसी आध्यात्मिक कार्य को सम्पन्न करने के “निमित्त” से पृथ्वी पर अवतार लेती हैं और अपना काम सम्पन्न कर वापस चली जाती हैं। भगवान के ऐसे अवतार को नैमित्तिक अवतार कहते हैं। साईं बाबा इसी श्रेणी के अवतार ज्ञात होते हैं।
3. युगावतारः “सम्भवामि युगे युगे” में युग शब्द का प्रयोग किया गया है। “राम” और “कृष्ण” युगावतार थे। युगावतार से तात्पर्य होता है भगवान का वह अवतार जो पृथ्वी का भार दूर करता है, अन्यायियों और अत्याचारियों का संहार कर युग परिवर्तित करता और धर्म का उत्थान कर उसकी संस्थापना करता है।
ऐसा जान पड़ता है कि बीसवीं शताब्दी के पहले और उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में वैष्णव धर्म में कुछ अस्थिरता आ गई थी जिसे दूर करने के निमित्त परब्रह्म ने साईं बाबा के रूप में अवतार लिया। वे स्वयं पूर्ण रूप से वैष्णव थे और कई रीतियों और कार्यों से उन्होंने वैष्णव धर्म की संस्थापना की – उनका पूरा जीवन ही इस तथ्य का स्वयं प्रमाण है। एक सच्चे वैष्णव के समान बाबा की मूर्ति पूजा में पूर्ण विश्वास था पर वे वेद वाणी के अनुसार निर्गुण ब्रह्म पर ही पूर्ण आस्था रखते थे। निराकार ब्रह्म को साकार मान कर फिर अन्तिम रूप से निराकार ब्रह्म में जीवन मुक्त हो कर लीन रहना और अन्त में महासमाधि लगा कर ब्रह्मलीन हो जाना ही हिन्दू धर्म का व्यावहारिक आधार है। आरम्भ से अन्त तक की प्रक्रिया अथवा साधना, ध्यान, नवधा भक्ति, पूजा-अर्चना-आरती, स्वाध्याय में निहित है। अन्तर्यामी साईं बाबा का पूरा जीवन ही इन्हीं तथ्यों पर आधारित था। वे पूजा और आरती का विशेष ध्यान रखते थे। एक सच्चा वैष्णव स्वयं को कभी भी परमात्मा नहीं कहता है। वेदान्ती, आत्म साक्षात्कार करने वाले साईं बाबा ने लोक कल्याण के लिये अपने को प्रभु से पृथक और भगवान को अपने से ऊँचा और अलग समझ कर भक्ति मार्ग का प्रचार करते रहे। उन्होंने तात्या कोते पाटिल को निमित्त बना कर शिरडी में लगभग सभी मन्दिरों का जीर्णोद्धार कराया। श्री हरि और उनका कीर्तन साईं बाबा के अत्यन्त प्रिय थे। श्रमद्भागवत, भगवद्गीता और विष्णु सहस्रनाम उनके प्रिय वैष्णव ग्रंथ थे।
(क्रमशः)
लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
महासमाधि में प्रवेश
सन् 1918 का दुखःद वर्ष आ पहुँचा। अट्ठाइस सितम्बर 1918के दिन साईं बाबा के ऊपर हल्के से बुखार का आक्रमण हुआ। ज्वर दो या तीन दिनों तक रहा परन्तु उसके बाद से साईं बाबा ने अन्न-जल त्याग दिया और दिनों दिन अशक्त होने लगे। ज्यों ज्यों बाबा की शक्ति क्षीण होत जाती थी त्यों त्यों उनके भक्त चिन्तित और दुःखी होत जा रहे थे। इन दिनों साईं बाबा को लक्ष्मी बाई शिन्दे की सेवा बहुत याद आ रही थी। लक्ष्मी बाई शिन्दे मस्जिद में दिन-रात काम करती थी और साईं बाबा की सेवा में लगी रहती थी। भगत म्हालासपति, तात्या और लक्ष्मी बाई के प्रति बाबा की इतनी असीम कृपा थी कि ये तीनों को ही रात के सामय मस्जिद में प्रवेश करनी का अधिकार था। एक दिन शाम के समय जब साईं बाबा तात्या के साथ बैठे थे तब वहाँ लक्ष्मी बाई आई और बाबा को प्रणाम किया। साईं बाबा ने उससे कहा, “लक्ष्मी, मैं बहुत भूखा हूँ।” लक्ष्मी बोली, “बाबा थोड़ा ठहरिये, मैं अभी आपके लिये रोटी ले कर वापस आती हूँ।” वह कुछ ही देर में साईं बाबा के लिये रोटी और सब्जी बना कर लाई और साईं बाबा के सामने रख दिया। बाबा ने रोटी और सब्जी को उठाया और एक कुत्ते को दे दिया। तब लक्ष्मी ने पूछा, “यह क्या है बाबा? मैं जल्दी से दौड़ कर रसोई घर में गई और आपके लिये रोटी-सब्जी बना कर लाई। आपने एक कौर भी नहीं खाया और सब एक कुत्ते को दे दिया।” साईं बाबा ने उत्तर दिया, “तुम व्यर्थ में क्यों दुःखी हो रही हो। कुत्ते की क्षुधा शान्त होना ही मेरी ही भूख की तृप्ति होना है। कुत्ता भले ही दूसरा प्राणी दिखता हो पर उसमें भी तो आत्मा है। भूख तो सबको समान रूप में लगती है। जिसके पास वाणी है वह बता सकता है पर जिसके पस वाक् शक्ति नहीं है वह चुप रह जाता है। निश्चित रूप से याद रखौ कि जो भूखे को भोजन देता है वह यथार्थ में उस भोजन से मेरी ही सेवा करता है। इसे स्वयं सिद्ध जानो। स्वयं न खा कर भूखे कुत्ते को रोटी-सब्जी दे देना तो तुच्छ बात है। इसके लिये तुम दुःखी क्यों होती हो?” इस प्रकार साईं बाबा ने एक महान आध्यात्मिक सत्य को व्यक्त किया और बिना किसी की भावना को ठेस पहुँचाये इस आध्यात्मिक सत्य के व्यावहारिक रूप का प्रदर्शन किया। उस समय से लक्ष्मी बाई साईं बाबा को भक्ति, स्नेह और श्रद्धा से प्रतिदिन दूध और रोटी देने लगी। साईं बाबा उसे स्वीकार कर प्रशंसा करते हुये खा लेते थे। बाबा उस दिन भोजन में से कुछ खा लेते थे और शेष को लक्ष्मी बाई केहाथ से राधाकृष्णा माई के पास भेज देते थे। वह साईं बाबा के उस प्रसाद को बड़े स्वाद के साथ खा लेती थी। रोटी का यह तथ्य सिद्ध करता है कि साईं बाबा सभी प्राणियों को स्वयं में और स्वयं को सभी प्राणियों में देखते, जानते और व्यवहार में मानते थे।
साईं बाबा के निर्वाण या सीमोल्लंघन अथवा महासमाधि का दिन था 15 अक्टूबर 1918, दशहरे का दिन। महासमाधि के पूर्व साईं बाबा को लक्ष्मी बाई शिन्दे की सेवा याद आ रही थी। उन्होंने अपनी जेब से पहले पाँच रुपये निकाल कर लक्ष्मी बाई को दान के रूप में दिये। तुरन्त बाद ही उन्होंने लक्ष्मी बाई को चार रुपये और दिये। इस प्रकार साईं बाबा ने लक्ष्मी बाई शिन्दे को दान के रूप में कुल नौ रुपये दिये। लक्ष्मी बाई धनवान महिला थी। उसे रुपयों की कोई कमी नहीं थी परन्तु साईं बाबा ने तो उसे नौ रुपये नवधा भक्ति के प्रतीक के रूप में दिये थे जिससे उसके मन में साईं बाबा के प्रति हमेशा गहरी और दृढ़ भक्ति बनी रहे। लक्ष्मी बाई ने बाबा का दिया हुआ नवधा भक्ति के प्रतीक वह दान रख लिये और उसे सदैव स्मरण करती रही।*
महासमाधि लेने के पहले साईं बाबा ने एक और सावधानी की। वे नहीं चाहते थे कि उनकी महासमाधि के क्षण में उनके प्रिय भक्त दुःखी हों। इसलिये उन्होंने उन लोगों को मस्जिद छोड़ कर बाड़ा में चले जाने और भोजन करने के बाद वापस आने का आदेश दिया। मस्जिद छोड़ कर बाड़ा में चले जाने में उन्हें असमंजस हुआ किन्तु साईं बाबा का आदेश जो था। इसलिये भारी मन और बोझिल कदम से वे बाड़ा में चले गये। फिर भी लक्ष्मी बाई शिन्दे, बया जी, लक्ष्मण लाला, शिम्पी, नाना साहब निमोनकर और शामा मस्जिद में ही रहे। बाबा की महासमाधि का समय समीप आ रहा था किन्तु उनकी चेतना ज्यों की त्यों बनी हुई थी। वे अपनी अन्तिम घड़ी तक चैतन्य बने रहे और लोगों को साहस और धीरज न छोड़ने का आदेश देते रहे। उन्होंने अपने संसार छोड़ने का ठीक ठीक समय किसी को नहीं बताया।
शामा मस्जिद की सीढ़ी पर बैठा था। लक्ष्मी बाई शिन्दे को नौ रुपये देने के बाद साईं बाबा ने कहा, “मुझे मस्जिद में अच्छा नहीं लग रहा है। मुझको बूटी के दगड़ी (पत्थर) में ले चलो। वहाँ मुझे ठीक लगेगा।” इन अन्तिम शब्दों को कहने के बाद बाबा बया जी के शरीर पर झुक गये और अन्तिम श्वाँस ली। वे मरणशील शरीर और नश्वर संसार को छोड़ कर महासमाधि में प्रविष्ट हो गये। वे ब्रह्मलीन हो गये। वह मंगलवार का दिन था। दोपहर के 2.30 बजे थे और दिनांक था 15 अक्टूबर 1918।
भागो जी शिन्दे ने देखा कि बाबा की श्वाँस उखड़ गई है। उसने नाना साहब निमोनकर को बताया जो नीचे बैठे हुये थे। नाना साहब कुछ पानी ले आये और साईं बाबा के मुँह में डाला। पानी मुँह से बाहर निकल आया। तब निमोनकर जोर से विलाप करते हुये बोले, “ओह देव!” बाबा अपनी आँख खोलते और अत्यन्त धीमे स्वर में “आह” कहते हुये-से मालूम पड़े पर यह निमोनकर का भ्रम था क्योंकि साईं बाबा तो सदा के लिये शरीर त्याग चुके थे।
साईं बाबा के निधन का समाचार आग की लपटों की तरह फैल गया। जो लोग साईं बाबा के आदेश से बाड़े में चले गये थे उनका मन और ध्यान मस्जिद की ओर ही लगा था। वे भोजन कर रहे थे पर उनसे खाया नहीं जा रहा था। भोजन समाप्त करने के पहले ही वहाँ समाचार पहुँचा कि साईं बाबा अपना नश्वर शरीर त्याग चुके हैं। सुनते ही लोगों ने थालियाँ सरका दीं। वे सब आँसू बहाते हुये मस्जिद की ओर दौड़े। वहाँ पहुँच कर उन लोगों ने देखा कि साईं बाबा बया जी की गोद में निर्जीव पड़े हैं। वे न तो जमीन पर गिरे थे और न अपने बिस्तर पर ही लेटे थे। सन्त लोग स्वयं ही अपने शरीर का निर्माण करते हैं, निश्चित उद्देश्य ले कर संसार में आते हैं और अपना कार्य समाप्त कर स्वेच्छा से शरीर त्याग कर संसार से चले जाते हैं। मस्जिद में लोग शोक-मग्न हो गये थे। प्रत्येक की आँखों से आँसू की धारा बह रही थी। कुछ लोग जोर जोर से रो रहे थे और कुछ अपने आपको सान्त्वना दे रहे थे। मस्जिद के बाहर शिरडी के निवासी उमड़ उमड़ कर इकट्ठा हो रहे थे – मानो दुःख और शोक के बादल उमड़ आये हों।
साईं बाबा के भक्त गण विचार कर रहे थे कि साईं बाबा के शरीर को कहाँ दफनायें। इस दिशा में लोग तरह तरह के विचार व्यक्त कर रहे थे। उन दिनों रामचन्द्र पाटिल शिरडी के मुख्य अधिकारी थे। उन्होंने शिरडी के निवासियों को अपने दृढ़तम निर्णय सुनाते हुये कड़े संकल्प के स्वर में कहा, “साईं बाबा का शव बाड़े में ही दफनाया जावेगा और कहीं भी नहीं।”
मंगलवार को साईं बाबा ने महासमाधि ली थी और दूसरे ही बुधवार की रात को अन्तिम प्रहर में साईं बाबा ने लक्ष्मण मामा जोशी से उनके समपने में आ कर कहा, “जल्दी से उठो। बापू साहब सोचता है कि मैं मर गया हूँ और इसलिये वह नहीं आवेगा। तुम सबेरे की आरती (कक्कड़ आरती) और पूजा करो।” लक्ष्मण मामा गाँव के ज्योतिषी और शामा के मामा थे। वे एक कट्टर ब्राह्मण थे और प्रतिदिन सबेरे साईं बाबा की पूजा करते थे। उसके बाद वे गाँव के सभी देवी-देवताओं की पूजा करते थे। उनका साईं बाबा में पूर्ण विश्वास था। स्वप्न में साईं बाबा को देखने और उनकी अनुमति पाने के बाद लक्ष्मण मामा पूजा की सब सामग्री ले कर आये और मौलवियंो के विरोध की परवाह न करते हुये उन्होंने मस्जिद में जा कर विधि-विधान से साईं बाबा की प्रभात पूजा की और प्रभात आरती करने के बाद घर वापस चले गये। दोपहर के समय पूजा की सामग्री ले कर लोगों के साथ बापू साहब जोग आये और उन्होंने हमेशा की तरह साईं बाबा की मध्याह्न पूजा और आरती की।
बाड़ा में ही साईं बाबा के शव को दफनाने का निश्चय किया गया। मंगलवार की शाम से ही लोगों ने बाड़े के मध्य भाग में स्थित गर्भ-गृह को खोदना प्रारम्भ कर दिया। मंगलवार को ही शाम के समय राहट से एक पुलिस सब इंस्पेक्टर आया। दूसरे स्थानों से दूसरे अधिकारी भी आ गये। उन लोगों ने बाड़े का निरीक्षण किया और साईं बाबा के पार्थिव शरीर को वहीं गड़ाने की अनुमति दे दी। दूसरे दिन बम्बई से अमीर भाई और कोपरगाँव से मामलतदार भी आ गये। बाला साहब भाटे और बाबा के एक महान भक्त उपासी के द्वारा ाईं बाबा के शव के कर्मकाण्ड किये गये। बुधवार के दिन सन्ध्या समय साईं बाबा की शव-यात्रा निकाली गई और उनका शव बाड़े में लाया गया। प्रोफेसर नार्के ने अवलोकन किया कि छत्तीस घण्टे के बाद भी साईं बाबा का शव नरम था। उनके अंग अकड़े नहीं थे। उनकी कफनी बना फाड़े निकाल ली गई।
साईं बाबा का मृत शरीर गर्भ गृह में गड़ा दिया गया। बाबा मुरलीधर बन गये, बाड़ा मन्दिर बन गया और शिरडी एक महान तीर्थ स्थान।
* साईं बाबा के द्वारा दिये गये उस दान के दो अर्थ निकाले गये हैं – 1. नवधा भक्ति का प्रतीक और 2. भक्त के नौ गुण।
नवधा भक्तिः
“श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद सेवनं।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्म निवेदनं॥”
अर्थात् (1) श्रवण (2) कीर्तन (3) स्मरण (4) चरण सेवा (5) अर्चन (6) वन्दना (7) दास्य भाव (8) सखा भाव (9) आत्म-निवेदन।
भक्त के नौ गुणः
“अमान्यमत्सरो दक्षो निर्ममो दृढ़सौहृदः।
असत्वरोऽर्थ जिज्ञासुरनसूयुरमोघवाक्ः
अर्थात् (1) अमानी (2) अमत्सर (3) दक्ष (निपुण) (4) दृढ़ सौहार्द्र (5) निर्मम (6) असत्वर (7) जिज्ञासु (8) असूय (9) अमोधवाक्
(क्रमशः)
लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
महासमाधि की पूर्व सूचना
सन्त भगवान के अवतार होते हैं। उन्हें संसार की किसी भी वस्तु में तिल भर भी मोह नहीं रहता। यहाँ तक कि वे अपने शरीर से भी अलग रहते हैं। उनके शरीर तो “निज इच्छा निर्मित तनु” होते हैं। वे स्वेच्छा से शरीर धारण करते और बिना कष्ट के उसे त्याग देते हैं। साईं बाबा ने भी यही किया था।
महा समाधि लेने के दो वर्ष पूर्व सन् 1916 ई. में दशहरे (सीमोल्लंघन) के दिन साईं बाबा अपने भक्तों से धिरे हुये मस्जिद में बैठे थे। शाम का समय था। अचानक साईं बाबा को सीमा-रहित क्रोध आ गया। उन्होंने अपने सिर का कपड़ा, कफनी, लंगोट आदि को उतार कर अपने शरीर से अलग कर दिया और पूरी तरह से निर्वस्त्र हो कर सबके सामने धूनी के साने क्रोध में विकराल बने खड़े रहे। यह देख कर वहाँ उपस्थित सभी लोग डर से थर थर काँपने लगे। साईं बाबा ने अपने शरीर से निकाले हुये अपने सभी कपड़ों को जलती हुई धूनी में डाल दिया। जब कपड़े जलने लगे तब धूनी की आग की लपटें बहुत तेज और प्रकाशपूर्ण हो गई। उनकी आँखें लाल हो गईं और वे क्रोध में चिल्लाये, “तुम लोग गौर से देखो कि मैं हिन्दू हूँ कि मुसलमान।”
वहाँ उपस्थित भक्त लोग काँप रहे थे। बाबा के समीप जाने का साहस किसी में नहीं था। कुछ समय बाद साईं बाबा का कुष्ठ रोगी भक्त भागो जी शिन्दे हिम्मत करे बाबा के नजदीक गया और उनकी कमर में एक लंगोट बांधने में सफल हो गया और बोला, “बाबा यह सब क्या है? आज दशहरा का त्यौहार है।” अपने सटके (लकड़ी) से जमीन को पीटते हुये बाबा ने कहा, “यह मेरा सीमोल्लंघन का दिन है।” इस तरह साईं बाबा ने दो साल पहले अपने ‘सीमोल्लंघन’ अथवा दशहरे के दिन अपने महासमाधि की पूर्वसूचना दे दी थी पर किसी ने नहीं समझा और ध्यान नहीं दिया।
साईं बाबा का क्रोध शान्त हो ही नहीं रहा था। कम से कम ग्यारह बजे रात तक बाबा शान्त नहीं हुये और लोगों को सन्देह होने लगा कि आज बाबा की चावड़ी यात्रा का जुलूस निकलेगा या नहीं। एक घण्टे के बाद साईं बाबा की स्थिति शान्त और सामान्य हो गई और वे चावड़ी जाने के लिये कपड़े पहन कर तैयार हो गये।
(क्रमशः)
लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
चावड़ी यात्रा समारोह
साईं बाबा रात को बारी बारी से दो अलग स्थानों में सोया करते थे – एक द्वारका माई मस्जिद में और दूसरा चावड़ी में। वे एक रात मस्जिद में सोते थे दूसरी रात चावड़ी के एक कक्ष में। चावड़ी एक इमारत का नाम था। वहाँ एक या दो कमरे थे। चावड़ी मस्जिद से बहुत दूर नहीं थी। दस दिसम्बर 1909 से भक्तों ने चावड़ी में साईं बाबा की नियमित पूजा करना प्रारम्भ कर दिया। जिस दिन साईं बाबा शयन करने के लिये चावड़ी जाते थे उस दिन का समारोह दर्शनीय होता था।
उस दिन शाम से ही लोग झुण्ड बना कर मस्जिद के सामने जमा हो जाते थे और कुछ घण्टे तक मण्डप में भजन गाते थे। लोगों के पीछे तुलसी वृन्दावन के दाहिनी ओर एक छोटा सा सुन्दर रथ खड़ा रहता था। रथ के सामने साईं बाबा खड़े रहते थे। रथ तथा साईं बाबा के बीच भजन गाने वाले भक्त रहते थे। भजन गाने वाली महिलाएँ और पुरुष ठीक समय पर उपस्थित हो जाते थे। हाथों में ताल, करताल, ढोलक, मृदंग, खंजरी और कई तरह के वाद्य यंत्र होते थे। साईं बाबा सबके केन्द्र और चुम्बक थे जो अपने सभी भक्तों को आकर्षित करके रखते थे।
बाहर खुली जगह में कुछ भक्त मशालों को ठीक करत थे, कुछ लोग पालकी की सजावट करते थे और कुछ लोग हाथों में बेत और छड़ी लिये “साईं बाबा की जय” बोलते थे। मस्जिद का कोना तोरण-पताका और झण्डियों से सजाया जाता था। मस्जिद के चारों ओर जलती हुई मशालों की रोशनी की जाती थी।
साईं बाबा के घोड़े का नाम “श्याम कर्ण” था। श्याम कर्ण घोड़ा पूरी तरह से सज-धज कर बाहर खड़ा रहता था। तब तात्या पाटिल कुछ लोगों के साथ आता था और साईं बाबा को तैयार रहने के लिये कहता था। साईं बाबा तब तक अपने आसन पर शान्त बैठे रहते थे। तात्या पाटिल आकर उनकी बगल में हाथ डाल कर उन्हें उठाता था। तात्या साईं बाबा को मामा कहता था। सचमुच में साईं बाबा और तात्या पाटिल का रिश्ता बहुत अधिक गहरा, नजदीकी और हार्दिक था।
साईं बाबा अपने शरीर पर हमेशा की तरह कफनी पहने रहते थे। वे अपने ‘सटका’ (लकड़ी) उठा कर अपने बगल में दबा कर रख लेते थे। अपनी चिलम और तम्बाखू रखने के बाद अपने कन्धे पर एक कपड़ा डाल कर तैयार हो जाते थे। तब तात्या साईं बाबा के शरीर पर सुनहरी जरी से सुसज्जित सुन्दर ‘शेला’ डालता था। इसके बाद बाबा अपने दाहिने पैर के अंगूठे से पीछे रखे हुये ईंधन के गट्ठे को थोड़ा सा हटा कर जलते हुये लैम्प को अपने दाहिने हाथ से बुझा कर चावड़ी के लिये प्रस्थान करते थे।
तब लोग सभी प्रकार के बाजे बजाते थे जिनमें तासे, मृदंग, वीणा, झांझ, मंजीरा, शहनाई, तुरही, ढोलक आदि शामिल रहते थे। बाजे के साथ साथ लोग भगवान तथा साईं बाबा का भजन गाते और साईं बाबा की जयजयकार करते हुये जुलूस के रूप में साईं बाबा के साथ चलते थे। कुछ लोग खुशी से रास्ते पर नाचते थे। पुरुष और महिलाएँ साईं बाबा का गुणगान करते हुये उनकी लीलाओं को भजन के रूप में गाते हुये चलते थे। कुछ लोग अपने हाथों में झण्डे और पताके रखे रहते थे।
जब साईं बाबा मस्जिद की सीढ़ियों पर आते थे तब मालदार साईं बाबा के नाम की घोषणा करते थे। बाहर सड़क पर जलती हुई मशअलों की रोशनी रहती थी और रंग-बिरंगी आतिशबाजियाँ चलाई जाती थीं। साईं बाबा के दोनों ओर दो आदमी चँवर लिये खड़े रहते थे और दूसरे लोग बाबा को पंखा झलते थे। रास्त पर एक के बाद दूसरा पाँवड़ा बिछाया जाता था जिन पर भक्तों के हाथों का सहारा ले कर साईं बाबा चलते थे। तात्या पाटिल साईं बाबा का बायाँ हाथ पकड़ता था और म्हालासपति दाहिना हाथ थामता था। इस प्रकार साईं बाबा चावड़ी जाते थे।
पूरी तरह से सजा हुआ बाबा का श्याम कर्ण घोड़ा जुलूस का नेतृत्व करता था। चावड़ी यात्रा में श्याम कर्ण घोड़ा सबसे आगे चलता था। श्याम कर्ण के पीछे गाड़ियाँ, पैदल चलने वाले भक्त और संगीत तथा भजन गाने वाले भक्तों की भीड़ चलती थी। भक्तों के द्वारा अविराम गति से गाये जाने वाले और “श्री हरि” के भजन तथा साईं बाबा के यश के भजन एवं जयजयकार की अविराम ध्वनि आकाथ को चीर देती थी। इस प्रकार जुलूस जब कोने पर पहुँचता था तब जुलूस में शामिल होने वाले सभि लोग अत्यन्त प्रसन्न हो जाते थे।
मोड़ पर आने के बाद साईं बाबा चावड़ी की ओर मुँह करके खड़े हो जाते थे। उस समय वे अद्भुत और ईश्वरीय ज्योति से देदीप्यमान हो जाते थे। उस समय ऐसा लगता था कि साईं बाबा उषाकाल की ज्योति से जगमगा रहे हों अथवा सूर्योदय की दिव्य ज्योति उनके अंग-प्रत्यंग से नकल रही हो। साईं बाबा उस समय अपने मन की पूरी एकाग्रता से ध्यानावस्थित हो कर उत्तर दिशा की ओर से बुला रहे हों। उस समय साईं बाबा कुछ समय तक अपनी दाहिनी भुजा को ऊपर उठाते और नीचे ले जाते थे। तभी सब वाद्य यंत्र एक साथ सबसे उत्तम संगीत बजाते थे। उसी समय काका साहब दीक्षित चांदी की तश्तरी में लाल गुलाल से सने हुये फल और फूलों की पंखुड़ियाँ ले कर बाबा के सामने आते और बाबा के शरीर पर बाबा बार गुलाल और फूल छिड़कते थे और साईं बाबा की मुख-मुद्रा अतिरिक्त सुन्दरता और अधिक ज्योति से चमकती थी। सभी उपस्थित लोग अपने हृदय के छकते तक अपनी आँखों से साईं बाबा के उस अलौकिक रूप को पीते थे। उसी समय कभी कभी म्हालासपति ऐसे नाचना शुरू कर देता था जैसे उस पर देवता की शक्ति सवार हो गई हो। परन्तु सभी यह देख कर अचरज में डूब जाते थे कि साईं बाबा के ध्यान में तिल भर भी विघ्न नहीं पड़ता था।
हाथ में लालटेन ले कर तात्या पाटिल साईं बाबा के बायीं तरफ चलता था। साईं बाबा के लम्बे कपड़े का छोर अपने हाथ में उठाये दाहिनी ओर भगत म्हालासपति चलता था। क्या ही सुन्दर जुलूस होता था और भक्ति की कैसी सुन्दर अभिव्यक्ति होती थी! उसे देखने और उसका रसास्वादन लेने के लिये शिरडी के नर-नारी, गरीब-अमीर झुण्ड के झुण्ड एकत्र होते थे। मोड़ से आगे साईं बाबा बहुत ही धीमी गति से आगे चलते थे। भक्त गण उनके दोनों ओर भक्ति और प्रेम से बाबा के साथ साथ चलते थे। चारों ओर व्याप्तआनन्दमय वातावरण में जुलूस चावड़ी पहुँचता था। वे दिन और वे दृश्य अब लुप्त हो चुके हैं। अब या भविष्य में उन दिनों और दृश्यों को मन की आँखों के सामने गहरे ध्यान से दृष्टिगोचर कर हम अपने मन और हृदय में प्रेम और आनन्द का अनुभव कर सकते हैं।
चावड़ी की सजावट पहले से ही कर ली जाती थी। चावड़ी के कमरे की भीतरी छत (सीलिंग) सुन्दर और एकदम सफेद थी। कमरे में बड़े बड़े दर्पण लटके थे और छत में तरह तरह के लैम्प लगे हुये थे। चावड़ी के उस कमरे में पहुँचने पर तात्या आगे जाता था और एक आसन बिछाता था तथा उसके एक किनारे पर दीवाल से टिका कर एक बड़ी गोल तकिया रखता था। उस आसन पर तिकिये के सहारे साईं बाबा को बैठाता था। इसके साथ ही साईं बाबा को आग्रहपूर्वक सुन्दर अंगरखा पहनाता था। फिर बाबा के भक्त कई तरह से उनकी पूजा करते थे। वे साईं बबा के उनके सिर पर रत्नजटित मुकुट पहनाते थे। उस मुकुट के ऊपर कीमती तुर्रा लगा रहता था। भक्त लोग साईं बाबा के मस्तक पर हीना मिश्रित चन्दन लगाते थे। वे तिलक “वैष्णव तिलक” होते थे अर्थात् माथे पर बीच में गोल बिन्दी और बिन्दी को छूती हुई चन्दन की दो खड़ी रेखाएँ खींचते थे। वे साईं बाबा के अलौकिक चमचमाते हुये चेहरे को अपने हृदय के छकते तक लम्बे समय के लिये अपलक नेत्रों से देखा करते थे। साथ ही लोग बाबा से डरते भी थे कि कहीं वे अपने सिर पर रखे हुये रत्नों के मुकुट को सिर से निकाल कर फेंक न दें। इसलिये लोग बाबा के सिर पर रखे हुये मुकुट को बार बार बदल देते थे। वास्तव में बाबबा तो निस्पृहता के अवतार थे। उनको संसार की कीमती से कीमती के लिये न तो मोह था और न तिल भर भी आसक्ति। किन्तु अन्तर्यामी साईं बाबा अपने भक्तों की श्रद्धा, प्रेम, भक्ति और आत्म समर्पण को अच्छी तरह जानते थे। इसलिये वे भक्तों के आनन्द के लिये लीलाएँ करते थे। अपने उस श्रृंगार के कारण साईं बाबा अद्भुत रूप से सुन्दर दिखाई देते थे।
नाना साहब निमोनकर अत्यन्त सुन्दर लोलक जैसे गोलाकार खुला हुये छत्ता पकड़े रहते थे। बापू साहब जोग चांदी की थाली में साईं बाबा के चरण धोते थे और लोगों को अर्ध्य बाँटते थे तथा विधि-विधान से साईं बाबा की पूजा करते थे। तब साईं बाबा की भुजाओं पर घिसे हुये चन्दन का लेप करते थे और बाबा को पान (ताम्बूल) देते थे। साईं बाबा आसन (गद्दी) पर बैठे रहते थे। उस समय तात्या और दूसरे भक्त खड़े रहते थे और साईं बाबा के चरणों पर गिर कर उन्हें प्रणाम करते थे। भक्त लोग उनके दोनों ओर चँवर डुलाते और पंखे झलते थे।
शामा चिलम तैयार करके लाता था और उसे तात्या के हाथ में दे देता था। तात्या चिलम को फूँक मार कर आग की लपट निकालता था और फिर उस जलती हुई चिलम को साईं बाबा के हाथ में दे देता था। चिलम पी लेने के बाद बाबा उस चिलम को म्हालासपति को देते थे। फिर वहाँ उपस्थित सभी लोग बारी बारी से उस चिलम को पीते थे। साईं बाबा तो पूर्ण रूप से विरक्त और अनासक्त थे। इसलिये वे हीरे-जवाहरात के हार और अन्य रत्नों के हार-श्रृंगार की दूसरी मूल्यवान वस्तुओं की तिल भर भी परवाह नहीं करते थे। उन्हें अत्यन्त ही तुच्छ समझते थे किन्तु अपने भक्तों के प्रति अपने सच्चे प्रेम के कारण और प्रेम तथा श्रद्धा से भरे हुये भक्तों का मन रखने के लिये भक्तों को अपनी भावना के अनुसार काम करने देते थे जिससे भक्त गण प्रसन्न रहें।
अन्त में बापू साहब जोग समस्त विधि-विधान के साथ साईं बाबा की आरती करते थे। उस समय सभी संगीत-वाद्य मंगल गीत बजाते थे। जब रात्रि की यह सन्ध्या आरती हो जाती थी तब भक्त गण साईं बाबा को साष्टांग दण्डवत् प्रणाम कर उनसे आज्ञा ले एक के बाद एक अपने अपने घर चले जाते थे।
जब चिलम भर कर साईं बाबा को देने और बाबा को गुलाब जल प्रदान करने के बाद तात्या पाटिल घर जाने के लिये उठता था तब साईं बाबा उससे प्रेमपूर्वक कहते थे कि ‘मेरी रक्षा करो। अगर जाना चाहते हो तो जवो पर रात को किसी भी समय आ जाना और मेरे बारे में पता लगा लेना।’ सकारात्मक उत्तर दे कर तात्या चावड़ी छोड़ कर अपने घर चला जाता था। तब साईं बाबा अपने बिस्तर स्वयं लगाते थे। वे एक के ऊपर एक पचास से साठ तक सफेद चादर बिछाते थे और उसी बिछौने पर शयन करते थे।
(क्रमशः)
लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
भभूत अथवा ऊदी की शक्ति
जामनेर का चमत्कार
लगभग सन् 1904-05 में नाना साहब चान्दोरकर खानदेश जिले के जामनेर में मामलतदार थे। जामनेर शिरडी से 100 मील से अधिक दूर है। उनकी पुत्री मैना ताई उस समय गर्भवती थी और उस जजकी होने वाली थी। वह अपने पिता चान्दोरकर के पास ही जामनेर में थी। उसकी दशा बहुत ही गम्भीर थी और दो या तीन दिनों से वह प्रसव पीड़ा से कष्ट पा रही थी। नाना साहब ने सभी प्रकार के उपचार कराये पर सब व्यर्थ गया। तब उन्होंने साईं बाबा को स्मरण किया और उनसे सहायता मांगी।
उधर शिरडी में रामगिर बुवा ने खानदेश में स्थित अपने पैतृक घर में जाने की इच्छा की। साईं बाबा रामगिर बुवा को बापूगिर बुवा कहते थे। साईं बाबा ने रामगिर उर्फ बापूगिर बुवा को अपने पास बुलाया और उसे कुछ समय के लिये जामनेर में जा कर नाना साहब चान्दोरकर के पास रुकने के लिये कहा।
रामगिर उर्फ बापूगिर बुवा ने साईं बाबा को बताया कि उसके पास केवल जलगाँव तक ही रेल टिकट लेने लायक रुपये हैं इसलिये जलगाँव से 30 मील दूर जामनेर तक जा पाना सम्भव नहीं हो पायेगा। साईं बाबा ने रामगिर को आश्वासन दिया कि वह चिन्ता न करे, जामनेर तक जाने की सुविधा उसे मिल जावेगी। उसके बाद बाबा ने शामा को कह कर माधव आदकर के द्वारा रची गई आरती की एक प्रति तैयार करने के लिये कहा और उस प्रति को भभूत के साथ नाना साहब चान्दोरकर को जामनेर में देने के लिये रामगिर बुवा को दे दिया।
रामगिर बुवा ने शिरडी से प्रस्थान किया और लगभग दो बज कर पैंतालीस मिनट के समय रात को जलगाँव पहुँच गया। उस समय उसके पास केवल दो आने बचे थे और उसकी दशा बहुत खराब थी। तभी किसी ने कहा, “शिरडी का बापूगिर बुवा कौन है?” वह उसके पास गया और बोला, “मैं बापूगिर बुवा हूँ।” उस व्यक्ति ने बताया कि वह चान्दोरकर के द्वारा उसे लेने के लिये भेजा गया चपरासी है।
उस चपरासी ने रामगिर बुवा को एक बहत ही अच्छे तांगे पर बैठाया जिसमें दो बहुत ही अच्छे घोड़े जुते हुये थे। चपरासी के साथ एक तांगा चलाने वाला भी था। तांगा तेजी के साथ दौड़ने लगा। सबेरे वे लोग एक छोटे नाले के पास पहुँच गये। वहाँ पहुँच कर तांगेवाले ने तांगा रोका और घोड़ों को पानी पिलाने के लिये तांगे से अलग किया। चपरासी की दाढ़ी-मूछ और वर्दी देख कर रामगिर बुवा को सन्देह हुआ कि यह मुसलमान है और इसलिये उसका दिया हुआ नाश्ता खाने में हिचकिचाया। उसको पेशोपेश में देख कर चपरासी ने कहा, “मैं हिन्दू हूँ और गढ़वाल जिले का रहने वाला क्षत्रिय हूँ। यह नाश्ता नाना साहब ने उसके लिये भेजा है। इसे खाने में संकोच करने की कोई आवश्यकता नहीं है।” नाश्ता करने के बाद दोनों तांगे में बैठ कर आगे चले और वे उषाकाल में जामनेर पहुँच गये। रामगिर बुवा लघुशंका के लिये तांगे से उतरा और कुछ ही मिनट के बाद वापस आने पर यह देख कर विस्मित रह गया कि वहाँ पर तांगा, घोड़ा, तांगे वाला और चपरासी कोई भी नहीं था।
रामगिर बुवा नाना साहब चान्दोरकर के घर पहुँचा और साईं बाबा के द्वारा दिये गये आरती और भभूत दे दी। उस समय मैना ताई की दशा बहुत ही गम्भीर थी और सब उसके बारे में चिन्ता कर रहे थे। नाना साहब ने अपनी पत्नी को बुलाया और उसके हाथ में भभूत दे कर उसे पानी में घोल कर मैना ताई को पिला देने के लिये कहा, साथ ही आरती गाने के लिये भी कहा। चान्दोरकर ने सोचा कि साईं बाबा की सहायता समयोचित है और साईं बाबा की कृपा से वह सहायता मिली थी। थोड़ी ही देर में नाना साहब चान्दोरकर को सूचना मिली कि प्रसव उचित और सुरक्षित ढंग से हो गया है और खतरा टल गया है।
जब रामगिर बुवा ने नाना साहब चान्दोरकर को तांगा और नाश्ता भेजने के लिये धन्यवाद दिया तब वे अचरज में पड़ गये और बोले, “मैंने तो किसी को नहीं भेजा था। मुझे तो मालूम भी नहीं था कि शिरडी से कोई आ रहा है।”
(क्रमशः)
लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
धूनी और भभूत या ऊदी
साईं बाबा अपने निवास स्थान द्वारकामाई मस्जिद में हमेशा धूनी जलाया करते थे। वह धूनी दिन-रात जलती रहती थी। साधु-सन्तों में से कुछ धूनी जलाते हैं किन्तु साईं बाबा के द्वारा जलाई गई धूनी अद्भुत और दिव्य थी। शिरडी में वही धूनी निरन्तर और अनवरत रूप से जलायी जा रही है। धूनी जलाना, अग्नि में हवन करना अग्निहोत्री ब्राह्मण का कर्तव्य और कर्म है। साईं बाबा के द्वारा प्रज्वलित धूनी से यह स्पष्ट और प्रमाणित है कि वे अवश्य ही अग्निहोत्री ब्राह्मण थे।
साईं बाबा दक्षिणा लेते थे। दक्षिणा से जो मिलता था उसका बहुत बड़ा हिस्सा दान में दे देते थे। दक्षिणा के पैसे से ही वे लकड़ी खरीदते थे जिसको धूनी में जलाते थे। लकड़ी जल जाने के बाद धूनी में भभूत या ऊदी रह जाती थी। धूनी की वह भभूत बहुत लाभदायक होती थी। वह भभूत लोगों के शारीरिक कष्ट और मानसिक बीमारियों को दूर कर देती थी। साईं बाबा के दर्शन करने के लिये कई भक्त आते थे। जब कोई भक्त साईं बाबा से विदा ले कर जाने लगता था तब बाबा उसे प्रसाद के रूप में भभूत देते थे। किसी भक्त के माथे पर वे भभूत लगा कर उसके सिर पर अपने वरद हस्त रख कर आशीर्वाद देते थे। साईं बाबा कभी प्रसन्न मन से अत्यन्त मधुर स्वर में गाते थे। उनके गीत की प्रथम पंक्ति होती थी – “रमते राम आओ जी आओ जी, उदिया की गोनिया लाओ जी।” भभूत से कई भयानक बीमारियाँ ठीक हो जाती थीं। आज भी उनकी धूनी की भभूत बीमारों को स्वस्थ कर देती है।
भभूत अथवा ऊदी की शक्ति
बिच्छू का डंक
नासिक निवासी नारायण मोतीराम जानी साईं बाबा का भक्त था। वह साईं बाबा के दूसरे भक्त रामचन्द्र वामन मोडक के पास नौकर के रूप में काम कर अपनी जीविका चलाता था। एक बार नारायण मोतीराम जानी अपने मां के साथ साईं बाबा के दर्शन करने के लिये शिरडी आया। उस समय स्वयं बाबा ने उसकी मां से कहा कि उसका लड़का दूसरे की नौकरी छोड़ दे और स्वतंत्र रूप से अपने रोजगार शुरू कर दे। नारायण जानी ने नौकरी छोड़ दी और अपने मां के साथ नासिक में “आनन्दाश्रम” नाम से छात्रावास चलाने लगा। उसका छात्रावास जल्दी ही पनप गया और उसको पर्याप्त आमदनी होने लगी।
एक बार नारायण राव के एक मित्र को बिच्छू ने डंक मार दिया। जहाँ पर बिच्छू ने डंक मारा था उस हिस्से में असह्य पीड़ा होने लगी। नारायण राव डंक वाले स्थान पर लगाने के लिये भभूत ढूंढने लगा पर उसे भभूत नहीं मिली। तब वह साईं बाबा के चित्र के सामने खड़ा हो गया और उनसे सहायता करने की प्रार्थना की। साईं बाबा का नम लिये चित्र के सामने जलती हुई अगरबत्ती से एक चुटकी भभूत निकाली। साईं बाबा की धूनी की भभूत समझते हुये उसे जहाँ दर्द हो रहा था वहाँ पर लगा दिया। जैसे ही नारायण ने वह भभूत लग कर अपनी उंगली हटायी वैसे ही दर्द गायब हो गया। दोनों ही व्यक्ति आश्चर्य-चकित हो गये और बहुत अधिक प्रसन्न हुये। साईं बाबा की धूनी की भभूत में ऐसी शक्ति आज भी है।
गिल्टी वाला प्लेग
एक बार बम्बई (वर्तमान मुंबई) के बान्द्रा के निवासी साईं बाबा के एक भक्त को पता लगा कि किसी दूसरी जगह रहने वाली उसकी लड़की को प्लेग हो गया है और गिल्टियाँ भी निकल आई हैँ। उस समय उसके पास बाबा की धूनी की भभूत नहीं थी। उसने नाना साहब चान्दोरकर के पास भभूत भेजने के लिये सूचना भेजी। नाना साहब चान्दोरकर उस समय अपने पत्नी के साथ कल्याण जा रहे थे। थाना स्टेशन में वह सन्देश वाहक नाना साहब चान्दोरकर से मिला। वे समाचार तो पा गये पर उस समय उनके पास भी भभूत नहीं थी। इसलिये उन्होंने जमीन से कुछ मिट्टी उठाई, साईं बाबा का ध्यान किया और प्रार्थना करने के बाद उस मिट्टी को अपने पत्नी के माथे पर लगा दिया। उस भक्त ने चान्दोरकर के काम को देखा और जब वह अपनी लड़की के घर गया तो पाया कि उसकी लड़की की गिल्टी वाले प्लेग की बीमारी और गिल्टियाँ गायब हो चुकी हैं और वह एकदम स्वस्थ हो गई है।
हर्दा का सज्जन
मध्य प्रदेश में हर्दा नाम का शहर था जहाँ एक वृद्ध सज्जन को मूत्राशय में पथरी की बीमारी हो गई। पथरी की बीमारी में आपरेशन कर पथरी को बाहर निकालते हैं। लोगों ने हर्दा के उस वृद्ध सज्जन को आपरेशन के द्वारा पथरी को बाहर निकलवा लेने की राय दी।
वह सज्जन बूढ़ा और कमजोर था। उसमें शल्य चिकित्सा कराने के लिये मनोबल नहीं था। उसका कष्ट जल्दी ही दूसरे तरीके से दूर होने वाला था। हर्दा का इनामदार उस समय वहाँ आया था। वह साईं बाबा का भक्त था और उसके पास शिरडी की धूनी की भभूत का संग्रह हमेशा रहता था। मित्र के द्वारा सिफारिश किये जाने पर उस रोगी का पुत्र इनामदार के पास से कुछ भभूत मांग लाया और उसे पानी में घोल कर अपने पिता को पिला दिया। पाँच मिनट के भीतर वह भभूत उस वृद्ध के भीतर एकत्र हुआ और उसकी पथरी उसमें घुल गई। घुली हुई पथरी पेशाब के सा बाहर निकल गई। वह वृद्ध जल्दी ही स्वस्थ हो गया। भभूत में आज भी ऐसी अद्भुत शक्ति है और हमेशा रहेगी।
(क्रमशः)
लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
शीघ्र ब्रह्म ज्ञान
एक अत्यन्त ही अधिक सम्पन्न व्यक्ति था (दुर्भाग्य से उसका नाम और पता अज्ञात है)। वह बहुत धनवान था। उसके पास अटूट धन-सम्पत्ति, कई घर, खेत, जमीन-जायदाद और बहुत से नौकर-चाकर थे। उसे किसी बात की कमी नहीं थी। जब साईं बाबा का यश उसके कानों तक पहुँचा तब एक दिन उसने अपने एक मित्र से कहा, “मुझे किसी बात की कमी नहीं है। इसलिये मैं शिरडी जाउंगा और साईं बाबा से ब्रह्म ज्ञान मांगूंगा। अगर मुझे ब्रह्म ज्ञान मिल जाता है तो मैं अवश्य ही अधिक सुखी हो जाउँगा।” उसके मित्र ने उसे समझाया कि ‘ब्रह्म’ को जानना सरल नहीं है और विशेष रूप से तुम जैसे लालची के लिये जो हमेशा धन, पत्नी और बच्चों में लिप्त रहता है। ब्रह्म ज्ञान की खोज में कौन तुम्हें सन्तुष्ट करेगा। तुम दान में एक पैसा भी तो नहीं देते हो।
अपने मित्र की सलाह पर ध्यान न देते हुये उस धनी व्यक्ति ने आने-जाने का (दोनों ओर का) किराया तय कर एक तांगे से शिरडी पहुँचा। वह मस्जिद में गया, साईं बाबा को साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया और बोला, “बाबा, यह सुन कर कि जो लोग यहाँ आते हैं उन सबको आप ही ब्रह्म का दर्शन करा देते हैँ, मैं भी अपने दूर के निवास स्थान से आया हूँ। मैं यात्रा से बहुत थक गया हूँ। यदि आपके पास से मुझे ब्रह्म ज्ञान मिल जाता है तो मेरा कष्ट सफल हो जावेगा।”
साईं बाबा ने कहा, “मेरे प्यारे मित्र, उतावला मत होवो। मैं तुमको तुरन्त ब्रह्म दिखा दूंगा। मेरे सभी काम नकद होत हैं, उधारी नहीं। कई लोग मेरे पास आते हैं और मुझसे धन, स्वास्थ्य, सम्मान, ऊँचा पद, बीमारी से छुटकारा और दूसरे सांसारिक पदार्थ मांगते हैं। क्वचित व्यक्ति मेरे पास ब्रह्म ज्ञान मांगने के लिये आता है। उन आदमियों की कमी नहीं है जो सांसारिक वस्तुएँ मांगते हैं पर मैं उस क्षण को भाग्यशाली और शुभ मानता हूँ जब तुम्हारे समान व्यक्ति आते और मुझसे ब्रह्म ज्ञान देने का आग्रह करते हैं। इसलिये मैं तुम्हें ब्रह्म के सभी उपकरणों और उलझनों के साथ ‘ब्रह्म’ दिखाउंगा।
यह कह कर बाबा ने उसे ब्रह्म दिखाना प्रारम्भ किया। उन्होंने उसको वहाँ बैठाया और दूसरी बातों तथा विषयों में लगा दिया। इस तरह से उन्होंने उसे थोड़े समय के लिये अपने मूल प्रश्न को भूलने में लगा दिया। फिर उन्होंने एक लड़के को बुलाया और उसे नन्दू मारवाड़ी के पास जा कर उससे पाँच रुपये उधारी मांग कर लाने को कहा। लड़का बाहर गया और कुछ ही देर बाद वापस आ कर बोला, “नन्दू नहीं है। उसके घर में ताला लगा हुआ है।” तब बाबा ने उसको बाला जी किराने वाले के पास से उधार मांग कर लाने को कहा। इस बार भी लड़का असफल रहा। यह प्रयोग दो या तीन बार दुहराया गया पर सफलता नहीं मिली।
साईं बाबा तो स्वयं ब्रह्म के सगुण अवतार थे। तब कोई यह पूछ सकता है कि पाँच रुपये की एकदम तुच्छ राशि क्यों चाह रहे थे और उसके लिये इतनी उठा-पटक क्यों कर रहे थे? सचमुच में बाबा को उस नगण्य राशि की कोई आवश्यकता नहीं थी। वे अवश्य ही यह भी जानते थे कि नन्दू और बाला जी नहीं मिलेंगे। ऐसा मालूम पड़ता है कि उन्होंने ब्रह्म पाने के लिये आये हुये उन व्यक्ति की परीक्षा लेने के लिये यह तरीका अपनाया। उस सज्जन की जेब में उस समय नोटों का पुलिन्दा था। यदि उसकी सचमुच ही ब्रह्म देखने की हार्दिक इच्छा होती तो जिस समय बाबा पाँच रुपये उधार लेने के लिये प्रयत्न कर रहे थे उस समय वह चुपचाप मूक दर्शक बने नहीं बैठा रहता और अपने पास से रुपये निकाल कर दे दिया होता। उसे मालूम था कि बाबा अपने वचन का पालन अवश्य करेंगे और उधार ली हुई रकम वापस कर देंगे। तो भी वह निश्चय नहीं कर सका और उसने उधार नहीं दिया। ऐसा आदमी बाबा से संसार की सबसे बड़ी वस्तु ‘ब्रह्म ज्ञान’ लेना चाहता था।
कोई भी दूसरा आदमी जिसके हृदय में साईं बाबा के प्रति प्रेम और भक्ति होती तो वह केवल देखता नहीं रहता किन्तु वह पाँच रुपये निकाल कर दे दिया होता। उसने न तो पैसा ही दिया और न चुप ही बैठा रहा किन्तु अधीर हो गया क्योंकि वह वापस जाने की जल्दी में था। उसने कहा, “मुझे जल्दी ब्रह्म दिखाइये।” साईं बाबा ने जवाब दिया, “मेरे मित्र, इस स्थान पर बैठ कर तुम्हें ब्रह्म दिखाने के लिये जो काम मैंने किया उसे तुमने नहीं समझा। थोड़े में वह यह है कि ब्रह्म देखने के लिये पाँच चीजें समर्पित करनी पड़ती हैं – (1) पंच प्राण (प्राण, अपान, सपान, उदान और व्यान), (2) पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, (3) मन, (4) बुद्धि और (5) अहंकार। ब्रह्म ज्ञान अथवा आत्म ज्ञान का मार्ग इतना कठिन है जितना तलवार की धार पर चलना।
तब साईं बाबा ने ब्रह्म ज्ञान विषय पर लम्बा प्रचन दिया जो संक्षेप में इस प्रकार है – ब्रह्म ज्ञान या आत्म ज्ञान के लिये योग्यताएँ चाहिये। अपने जीवन काल में सभी लोग ब्राह्म ज्ञान का अनुभव नहीं करते। इसके लिये कुछ गुण पूरी तरह से जरूरी हैं:-
(1) मुमुक्षत्व:- मुमुक्ष या मुक्त होने की तीव्रतम इच्छा रखने वाले ही ब्रह्म ज्ञान पा सकते हैं। जो यह सोचते हैं कि मैं माया-जाल में फँसा हूँ – मुझे अवश्य ही माया के बन्धन से छूटना ही चाहिये, जो अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेने के लिये किसी की परवाह न करते हुये दृढ़तापूर्वक तपस्या और साधना करता है वही आध्यात्मिक जीवन के योग्य होता है।
(2) विरक्ति या वैराग्य:- जो इस संसार की और दूसरी दुनिया की वस्तुओं और सुखों की इच्छा नहीं रखता वही ब्रह्म ज्ञान का अधिकारी होता है। जब तक किसी के मन में लौकिक और पारलौकिक सुखों के प्रति लगाव है तब तक कोई भी ब्रह्म ज्ञान पाने का अधिकारी हो ही नहीं सकता।
(3) अन्तर्मुखता:- ईश्वर के द्वारा हमारी इन्द्रियों की रचना इस प्रकार की गई है कि उनकी प्रकृति और प्रवृति बाहर जाने और घूमने की है। इसलिये आदमी हमेशा बाहर ही देखता है – अन्तर्मुखी नहीं होता। जो आत्मज्ञान और अमरत्व चाहता है उसे अवश्य ही अन्तर्दृष्टि करके अपनी आत्मा को ही देखना ही होगा।
(4) निष्पाप मन:- जब तक कोई व्यक्ति दुष्टता नहीं छोड़ता, गलत काम करने से नहीं रुकता और पूरी तरह सा अपने आपको शान्त नहीं रखता तब तक वह ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद भी उस ज्ञान के द्वारा आत्म ज्ञान नहीं पा सकता।
(5) सही आचरण:- जब तक कोई व्यकति सचाई का जीवन नहीं बिताता तब तक वह ईश्वर का दर्शन नहीं कर सकता।
(6) प्रेयस की अपेक्षा श्रेयस को स्वीकार करना:- स्थितियाँ दो प्रकार की होती हैं – प्रेयस और श्रेयस। प्रेयस का अर्थ है सांसारिक सुख का जीवन और श्रेयस का अर्थ है ‘अच्छाई’। श्रेयस अध्यात्म की ओर ले जाता है और प्रेयस संसार की ओरढकेलता है। ये दोनों अपने आपको स्वीकार कराने के लिये आदमी के मन में आते हैं। उस मनुष्य को दोनों में से एक को ग्रहण करने के लिये सोचना पड़ता है। बुद्धिमान मनुष्य सांसारिक सुख की अपेक्षा अच्छाई और अध्यात्म (श्रेयस) को अधिक पसन्द करता है परन्तु जो व्यक्ति बुद्धिमान नहीं है वह मनुष्य लोभ और मोह के कारण प्रेयस अथवा क्षणिक सांसारिक सुख को चुन लेता है।
(7) मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण:- शरीर रथ है और आत्मान उसका स्वामी है। बुद्धि सारथी है। मन लगाम है। इन्द्रियों से शरीर रूपी रथ में जुते हुये घोड़े हैं और इन्द्रयों के द्वारा ग्रहण की जाने वाली वस्तुएँ मार्ग हैं जिनको समझ नहीं है, जिनका मन सीमित नहीं है और जिनकी इन्द्रियाँ रथ में जुते हुये खराब घोड़ों के समान वश में नहीं है और अनियंत्रित हैं वे गन्तव्य स्थान तक नहीं पहुँचते अर्थात् ब्रह्म ज्ञान नहीं पाते किन्तु जन्म-मरण के चक्र में घूमते रहते हैं। इसके विपरीत जिसको समझ है, जिसका मन नियंत्रित है और जिसका मन रथ में जुते हुये अच्छे घोड़े के समान नियंत्रित है वह अपने गन्तव्य ब्रह्म ज्ञान या आत्म साक्षात्कार तक पहुँचता है अर्थात् ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करता है और जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो जाता है। फिर उसका पुनर्जन्म नहीं होता। ऐसा ज्ञानी विष्णु लोक में पहुँच जाता है।
(8) मन की शुद्धता:- जब तक कोई व्यक्ति निर्लिप्त रह कर, सन्तोषजनक और निष्काम रूप से अपने जीवन काल में निर्धारित अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता है तब तक उसका मन शुद्ध नहीं होता और जब तक मन शुद्ध नहीं होता तब तक वह ब्रह्म ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। केवल शुद्ध मन में ही विवेक और वैराग्य जागृत होता है और उसे आत्म ज्ञान तक ले जाता है। जब तक अहंकार का नाश नहीं हो जाता, लोभ से छुटकारा नहीं मिल जाता और मन इच्छा-रहित नहीं हो जाता तब तक ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना असम्भव है। यह विचार कि – “मैं शरीर हूँ – बहुत बड़ी माया और इन्द्रजाल तथा जन्म-मरण के बन्धन का कारण है। इसलिये यदि तुम आत्म ज्ञन पाना चाहते हो तो इस विचार और मोह को एकदम छोड़ दो।
(9) गुरु की आवश्यकता:- आत्म ज्ञान इतना सूक्ष्म और रहस्यमय है कि कोई भी व्यक्ति कभी भी अपने स्वयं के व्यक्तिगत प्रयास से ब्रह्म ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिये जिस गुरु ने स्वयं आत्म ज्ञान प्राप्त कर लिया है उस गुरु की सहायता नितान्त आवश्यक और अनिवार्य है। जो ज्ञान कठिन परिश्रम और प्रयास करके भी दूसरे नहीं दे सकते उसे सद्गुरु की कृपा और सहायता से प्राप्त कर लेना सरल हो जाता है क्योंकि सद्गुरु जिस मार्ग से चल कर आत्म ज्ञान तक स्वयं पहुँचा है उसी मार्ग से अपने शिष्य को ले जा सकता है।
(10) ईश्वर की कृपा:- अन्त में ईश्वर की कृपा सबसे अधिक आवश्यक है। जब परमात्मा किसी पर प्रसन्न हो जाता है तब वह उसे विवेक और वैराग्य दे देता है।
इस बातचीत के बाद साईं बाबा उस सज्जन की ओर मुड़े जो ब्रह्म देखने आया था और बोले, “महाशय जी, आपकी जेब में दस दस रुपये के रूप में 250) हैं। साईं बाबा की सर्वज्ञता देख कर वह व्यक्ति बहुत प्रभावित हुआ और बाबा के चरणों पर गिर कर क्षमा और आशीर्वाद मांगा। तब बाबा ने उससे कहा, “अपने ब्रह्म अर्थात् नोटों के पुलिन्दे को ठीक से मोड़ कर अपने जेब में छिपा लो। जब तक तुम अपने लोभ से छुटकारा नहीं पावोगे तब तक तुम वास्तविक ब्रह्म को नहीं पावोगे। जब तक किसी का मन धन-सम्पत्ति, सन्तान और अपनी सांसारिक प्रगति में लिप्त है तब तक वह ब्रह्म ज्ञान पाने की आशा कैसे कर सकता है? धन का मोह भ्रम जाल से भरे हुये अहंकार के रूप में मगरमच्छ से भरा हुआ गहरा भँवर है। जो इच्छारहित है केवल वही अकेले अहंकार और लोभ के उस भँवर को पार कर सकता है। लोभ और ब्रह्म दो अलग अलग स्तम्भ हैं। वे दोनों अनादि काल से नित्य एक दूसरे के विपरीत हैं। जहाँ लोभ है वहाँ विचार और ब्रह्म का ध्यान करने के लिये कोई गुंजाइश नहीं है। मेरा खजाना भरा हुआ है और मैं किसी को भी वह दे सकता हूँ। किन्तु मुझे देखना पड़ता है कि जो मैं देता हूँ, उसे पाने के लिये वह योग्य पात्र है या नहीं। अगर तुम मेरी बात सावधानी से सुनते हो तो तुम्हें अवश्य ही लाभ होगा। इस मस्जिद में बैठ कर मैं कभी कोई झूठ नहीं बोलता।
साईं बाबा ने अपने उपदेश समाप्त किया। उस समय दूसरे भक्त भी वहाँ बैठे थे। जैसे किसी अतिथि के आने पर उसे जो उत्तम भोजन कराया जाता है वही भोजन उस समय घर के लोगों को भी खिलाया जाता है वैसे ही उस धनवान व्यक्ति को साईं बाबा ने जो आध्यात्मिक भोजन कराया उसका आस्वादन उन सब लोगों ने भी किया जो उस समय मस्जिद में उपस्थित थे। साईं बाबा का आशीर्वाद पाने के बाद उस धनवान व्यक्ति के सहित सभी सन्तुष्ट को कर चले गये।
(क्रमशः)
लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया
साईं बाबा और संस्कृत ज्ञान
बात उन दिनों की है जब शिरडी में द्वारकामाई मस्जिद में भीड़ बहुत अधिक नहीं लगती थी। उन दिनों किसी को विश्वास नहीं होता था कि साईं बाबा संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित हैं। उनके परम प्रिय भक्त नाना साहब चान्दोरकर संस्कृत बहुत अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने गीता पर कई भाष्यों का अध्ययन किया था और उन्हें गर्व था कि वे संस्कृत के अच्छे विद्वान हैं। वे भी यही समझते थे कि साईं बाबा संस्कृत नहीं जानते हैं।
एक दिन साईं बाबा और चान्दोरकर अकेले बात कर रहे थे। चान्दोरकर साईं बाबा के चरण दबा रहे थे और कुछ गुनगुना रहे थे। साईं बाबा पूछ बैठे, “नाना, क्या गुनगुना रहे हो?”
चान्दोरकर बोले, “मैं संस्कृत के एक श्लोक का पाठ कर रहा हूँ।”
“कौन सा श्लोक?”
“भगवत्गीता से है।”
“जरा जोर से पाठ करो।”
नाना साहब चान्दोरकर ने जोर से पाठ किया -
“तद्विद्धि प्रणिपतेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्व दर्शिनः॥”
(गीता, अध्याय 4, श्लोक 14)
बाबा – नाना, क्या तुम इस श्लोक का अर्थ समझते हो?
नाना – हाँ।
बाबा – यदि तुम समझते हो तो मुझे बताओ।
नाना – इसका अर्थ यह है कि गुरु को साष्टांग दण्डवत प्रणाम करते हुये, गुरु की सेवा करते हुये, उनसे प्रश्न करते हुये सीखो कि यह ज्ञान क्या है। तब सद्वस्तु (ब्रह्म) का सत्य ज्ञान प्राप्त किये हुये ज्ञानी तुम्हें ज्ञान का उपदेश देंगे।
बाबा – मैं श्लोक के पूरे पद का इस तरह से संग्रह किया हुआ सारांश नहीं चाहता। मुझे प्रत्येक शब्द का व्याकरणिक प्रभाव, महत्व और अर्थ बताओ।
तब नाना साहब ने साईं बाबा को एक एक शब्द समझाया।
बाबा – नाना, क्या केवल साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करना पर्याप्त है?
नाना – मैं ‘प्रणिपात’ शब्द का अर्थ साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करने के सिवाय दूसरा नहीं जानता।
बाबा – ‘परिप्रश्न’ क्या है?
नाना – प्रश्न पूछना।
बाबा – प्रश्न का क्या अर्थ है?
नाना – वही, प्रश्न पूछना।
बाबा – यदि ‘परिप्रश्न’ और ‘प्रश्न’ का एक ही अर्थ है तो व्यास ने ‘परि’ उपसर्ग क्यों लगाया? क्या उसका सिर फिर गया था?
नाना – मैं ‘परिप्रश्नेन’ शब्द का दूसरा कोई अर्थ नहीं जानता।
बाबा – ‘सेवा’ शब्द से किस प्रकार की सेवा का तात्पर्य है?
नाना – वही जो हम लोग हमेशा करते हैं।
बाबा – क्या ऐसी सेवा पर्याप्त है?
नाना – मैं नहीं जानता कि ‘सेवा’ शब्द का इससे और अधिक क्या महत्व है।
बाबा – अगली पंक्ति ‘उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं’ में ‘ज्ञानं’ के स्थान पर दूसरा कोई और शब्द रख कर पढ़ सकते हैं?
नाना – हाँ ‘अज्ञानं’ रख कर भी पढ़ सकते हैं।
बाबा – ‘ज्ञानं’ के बदले ‘अज्ञानं’ शब्द ले लेने से क्या इस श्लोक का कोई अर्थ निकलता है?
नाना – नहीं। शांकर भाष्य में ऐसी कोई श्लोक रचना नहीं है।
बाबा – अगर शांकर भाष्य में नहीं है तो कोई हर्ज नहीं। यदि ‘ज्ञानं’ के स्थान पर ‘अज्ञानं’ रख देने से उसका बेहतर मतलब निकलता है तो क्या कोई आपत्ति है?
नाना – मैं नहीं समझता कि ‘अज्ञानं’ शब्द रख देने से शब्दों की व्याख्या, पदच्छेद, अन्वय और अर्थ कैसे कर सकते हैं।
बाबा – कृष्ण अर्जुन को ज्ञानी या तत्वदर्शी के पास जा कर साष्टांग दण्डवत करने, परिप्रश्न और सेवा करने का निर्देश क्यों देते हैं जब कि कृष्ण स्वयं ‘तत्वदर्शन’ और ‘ज्ञान’ ही हैं?
नाना – हाँ, वे थे तो। लेकिन मैं इसे नहीं समझ सकता हूँ कि कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञानियों के पास जाने का निर्देश क्यों दिया।
बाबा – नाना, क्या तुम जैसा संस्कृत का विद्वान भी इसे नहीं समझ पा रहा है?
नाना चान्दोरकर की अब तक अवमानना हो चुकी थी। उनके गर्व का सिर नीचा हो चुका था। तब साईं बाबा ने समझाना शुरू किया।
(1) ज्ञानी के सामने केवल साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करना ही पर्याप्त नहीं है। हमें सद्गुरु के प्रति पूर्ण रूप से शरणागति में जाना ही पड़ेगा।
(2) केवल प्रश्न करना ही पर्याप्त नहीं है। गुरु या सद्गुरु को किसी कारण से, अथवा उनसे आलस्यवश गलत उत्तर मिल जाने पर उनसे तर्क-वितर्क करने के उद्देश्य से ही प्रश्न करना कदापि वांछित नहीं है वरन सदैव अनुचित और अवांछनीय है। प्रश्न अवश्य गम्भीर होना चाहिये। मोक्ष या आध्यात्मिक प्रगति के लिये ही प्रश्न किया जाना चाहिये। यही ‘परिप्रश्नेन’ का अर्थ है।
(3) सेवा करते समय यह भावना रखना कि सेवा करते या न करने के लिये हम स्वतंत्र हैं – ऐसा सोच कर सेवा करना सेवा ही नहीं है। सेवा करने वाले को अवश्य ही अपने मन में यह भावना रखनी चाहिये कि मैं अपने शरीर का मालिक नहीं हूँ। शरीर गुरु का है, उस पर मेरा कोई अधिकार ही नहीं क्योंकि शरीर गुरु को समर्पित हो चुका है और केवल गुरु की सेवा करने के लिये ही यह शरीर जीवित है।
अगर यह किया जाय तो सद्गुरु तुम्हें दिखावेंगे कि श्लोक में आया हुआ शब्द ‘अज्ञानं’ क्या है।
नाना साहब चान्दोरकर की समझ में नहीं आया कि गुरु ‘अज्ञान’ की शिक्षा देता है।
तब बाबा ने समझाने के लिये कहा कि – ‘ज्ञान’ अथवा ‘आत्मज्ञान’ का उपदेश अपने भीतर के ‘अज्ञान’ का नाश करने पर ही प्रभावशील हो सकता है और ‘अज्ञान’ का नाश करने के लिये उसे जानना आवश्यक है। साईं बाबा ने इसे स्पष्ट करने के लिये गीता पर सन्त ज्ञानेश्वर के भाष्य का यह उदाहरण दिया -
(1) मग अज्ञान निमालिया मीच एक असे अपैसया सनिद्र स्वप्न गेलिया। आपण जसें
(2) ते अज्ञान जे समूल तुटे। तैं भ्रान्ती चें मसैरे फिटे।
गीता के श्लोक 18-66 पर भाष्य करते हुये सन्त ज्ञानेश्वर कहते हैं कि “ओ अर्जुन, यदि अज्ञान और नींद हटा दिये जावें तो तुम स्वयं ही तो हो। अंधेरे को दूर हटा देना ही प्रकाश है। ‘द्वैत’ की भावना मिटा देना ही तो ‘अद्वैत’ है। जब कभी हम ‘द्वैत’ को मिटाने की बात करते हैं तब हम ‘अद्वैत’ के बारे में ही तो बोलते हैं। जब कभी हम अंधेरे को मिटा देने की बात करते हैं तब हम प्रकाश की ही बात करते हैं। यदि हमें ‘अद्वैत’ का अनुभव करना है तब अपने भीतर रहने वाली ‘द्वैत’ भावना का उन्मूलन करना ही होगा। वही ‘अद्वैत’ की स्थिति है। द्वैत में रहने वाला ऐसा कौन है जो अद्वैत के बारे में बात कर सकता है। जब तक कोई अद्वैत की स्थिति में प्रवेश नहीं कर जाता तब तक यदि वह बोले भी तो कोई उस स्थिति को कैसे जान सकता है।
शिष्य भी वस्तव में सद्गुरु के समान ही है – ज्ञान का सदेह स्वरूप है। सद्गुरु और शिष्य दोनों के बीच प्रकृति, ऊँचे आत्मज्ञान की प्राप्ति, मानवीय शक्ति से ऊपर अलौकिक और दैवी सत्व, प्रतियोगिता से परे क्षमता तथा ऐश्वर्य योग (दैवी शक्ति) का अन्तर रहता है। सद्गुरु निर्गुण सच्चिदानन्द होते हैं। वास्तव में सद्गुरु मानव जाति के उत्थान करने और संसार को ऊपर उठाने के लिये मनुष्य का शरीर धारण किया हुआ होता है किन्तु उनकी यथार्थ निर्गुण प्रकृति इससे तिल भर भी नष्ट नहीं होती। उनका अस्तित्व अथवा ‘सत्य’, दैवी शक्ति और बुद्धि कभी भी कम न हो कर ज्यों की त्यों रहती है। वास्तव में शिष्य का भी यही स्वरूप होता है परन्तु वह अनेक जन्मों के संस्कारों के कारण अज्ञान से ढँका रहता है। यही अज्ञान उसे इस दृष्टि से अलग रखता है कि वह ‘शुद्ध’ और ‘चैतन्य’ है। भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि “अज्ञानेन आवृतं ज्ञानं तेन मुह्यान्ति जन्तवः” (गीता, अध्याय 5, श्लोक 16)। उस पर संस्कार पड़ा रहता है कि मैं जीव हूँ और तुच्छ प्राणी हूँ। गुरु को, अज्ञान की जड़ों को समूल उखाड़ फेंकना और उपदेश तथा निर्देश देना पड़ता है। जो शिष्य अनन्त जन्म जन्मान्तरों से माया-जाल में फँसा हुआ इन विचारों से जकड़ा रहता है कि मैं तुच्छ प्राणी हूँ, निर्बल और निर्धन हूँ, सैकड़ों जन्म से अज्ञान में पड़े हुये उस शिष्य के उसी अज्ञान का निवारण करने के लिये सद्गुरु उसे शिक्षा देते हुये बताते हैं कि “तुम ईश्वर हो, तुम शक्तिशाली, ऐश्वर्य सम्पनाना तथा शक्तिमान हो। तब कहीं वह शिष्य अत्यल्प मात्रा में समझता है की मैं ईश्वर हूँ। माया के इन्द्रजाल का यह स्थायी भ्रम कि मैं शरीर हूँ, मैं प्राणी अर्थात् जीव हूँ, ईश्वर मुझसे भिन्न है – एक भूल है जो असंख्य पूर्व जन्मों से चला आ रहा है। इस पर आधारित कर्मों से उसने सुख, दुःख और इन दोनों का मिश्रण प्राप्त किया है। इस मूल कारण , माया और भूल को हटाने के लिये वह अवश्य ही जाँच-पड़ताल शुरू करे। अज्ञान कैसे उत्पन्न हुआ? वह कहाँ है? इसे ही शिष्य को दिखा देना गुरु का उपदेश है। निम्न बातें अज्ञान के दृष्टांत हैं:-
1. मैं जीव (प्राणी) हूँ।
2. मैं शरीर हूँ।
3. ईश्वर, संसार और जीव अलग अलग हैं।
4. मैं ईश्वर नहीं हूँ।
5. यह नहीं जानना कि शरीर आत्मा नहीं है।
6. यह नहीं जानना कि ईश्वर, संसार और जीव एक ही हैँ।
जब तक ये भूलें उसकी नजर में नहीं लायी जातीं तब तक शिष्य यह नहीं सीख सकता कि परमात्मा, जीव, संसार और शरीर क्या हैं, वे आपस में एक दूसरे से कैसे जुड़े हुये हैं, क्या वे एक दूसरे से भिन्न हैं या फिर ये सब एक ही हैं। इसी सबकी शिक्षा देना और शिष्य के अज्ञान का नाश कर देना ही ज्ञान या अज्ञान के निर्देश हैं। जीव को ज्ञान की शिक्षा क्यों दी जाय जब कि जीव स्वयं ज्ञानमूर्ति है? उपदेश तो उसे केवल उसकी भूल दिखाने और उसका अज्ञान नष्ट करने के लिये है।
साईं बाबा ने आगे यह भी जोड़ दिया कि (1) ‘प्रणिपात’ में समर्पण की भावना निहित है (2) समर्पण अवश्य ही तन, मन, धन का होना चाहिये। (3) श्री कृष्ण के द्वारा अर्जुन को दूसरे ज्ञानियों की ओर क्यों संकेत किया गया? इसका कारण यह है कि सद् भक्त हर वस्तु को वासुदेव के रूप में स्वीकार करता है। स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि कोई भी गुरु शिष्य के लिये श्री कृष्ण ही होगा। इसका प्रमाण है कि -
“उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी आत्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥”
(गीता, अध्याय 7, श्लोक 18)
अर्थात् श्री कृष्ण कहते हैं कि “सभी ज्ञानी श्रद्धा सहित मेरा भजन करने के कारण उत्तम हैं, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है। शिष्य गुरु को वासुदेव के रूप में स्वीकार करेगा और श्री कृष्ण गुरु और शिष्य दोनों को ही अपने प्राण और आत्मा के रूप में स्वीकार करते हैं। श्री कृष्ण जानते हैं कि ऐसे भक्त और सद्गुरु हैं। इसीलिये वे अर्जुन को उनकी ओर निर्देशित करते हैं जिससे उन ज्ञानियों की महानता बढ़े और सबको ज्ञात हो सके।
(क्रमशः)
