हमारी शिक्षा हमें स्वावलम्बी बनना न सिखाकर नौकर बनना सिखाती है
आज किसान का बेटा किसानी नहीं करना चाहता, लोहार के बेटा लोहारी नहीं करना चाहता, सुनार का बेटा सुनारी नहीं करना चाहता ……। ये सब नौकरी करना चाहते हैं, सिर्फ नौकरी।
क्यों है ऐसा?
क्योंकि हमारी शिक्षा हमें स्वावलम्बी बनना न सिखाकर नौकर बनना सिखाती है। हमारे बच्चे ज्ञान प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि नौकरी प्राप्त करने के लिए शिक्षा ग्रहण करते हैं।
नौकरी करना अर्थात् धन कमाने के लिए नौकर बन कर दूसरे का काम करना, दूसरे के नीचे रहकर उसकी आज्ञानुसार काम करना। धन मालिक बन कर भी कमाया जा सकता है। किसानी करने में, लोहारी करने में, सुनारी करने में हम स्वयं अपने मालिक होते हैं किसी दूसरे के नौकर नहीं। मालिक बनने से हमारा स्वाभिमान बरकरार रहता है और नौकर बनने में उसका नाश होता है। यदि हमारी आज की शिक्षा इस बात को विद्यार्थियों यह बात सिखाती तो लोग मालिक बनने की सोचते नौकर बनने की नहीं।


जब जनता जग जाएगी तब नेता कोई नहीं बनना चाहेगा
गुलामी की जंजीरों से स्वतंत्रता की शान अच्छी हजारो रुपयों की नोकरी से चाय की दुकान अच्छी