पथ के दावेदार (उपन्यास) -3
शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय
दरबान के चले जाने के बाद घूमते-घूमते, गलियों का हिसाब करते-करते, अंत में मकान के सामने पहुँच गया।
उसने देखा – तिवारी महाराज एक मोटी लाठी पटक रहे हैं और न जाने क्या अंट-शंट बकते-झकते जा रहे हैं। साथ ही एक-दूसरे व्यक्ति तिमंजिले से हिंदी और अंग्रेजी में इसका उत्तर भी दे रहे हैं और घोड़े के चाबुक से बीच-बीच में सट-सट का शब्द भी कर रहे हैं। तिवारी से नीचे उतरने को कह रहे हैं और वह उनको ऊपर बुला रहा है। शिष्टाचार के इस आदान-प्रदान में जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है उसे न कहना ही उचित है।
अपूर्व ने सीढ़ी पर से तेजी से ऊपर चढ़कर तिवारी का लाठीवाला हाथ जोर से पकड़कर कहा, ”क्या पागल हो गया है?” इतना कहकर उसे ठेलता हुआ घर के अंदर ले गया। अंदर आकर वह क्रोध, क्षोभ और दु:ख से रोते हुए बोला, ”यह देखिए, उस हरामजादे ने क्या किया है।”
उस कांड को देखते ही अपूर्व की थकान, नींद, भूख और प्यास एकदम हवा हो गई। खिचड़ी के हाँडी से अभी तक भाप तथा मसाले की भीनी-भीनी गंध निकल रही है, लेकिन उसके ऊपर, नीचे, आस-पास, चारों ओर पानी फैला हुआ है। दूसरे कमरे में जाकर देखा, उसका साफ-सुथरा बिछौना मैले काले पानी से सन गया है। कुर्सी पर पानी, टेबल पर पानी, यहाँ तक कि पुस्तकें भी पानी में भीग गई हैं।
अपूर्व ने पूछा, ”यह सब क्या हुआ?”
तिवारी ने दुर्घटना का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए बताया, ”अपूर्व के जाने के कुछ देर बाद ही साहब घर में आए। आज ईसाइयों का कोई त्यौहार है। पहले गाना-बजाना और फिर नृत्य आरम्भ हुआ और जल्दी ही दोनों के संयोग से यह शास्त्रीय संगीत इतना असहाय हो उठा कि तिवारी को आशंका होने लगी कि लकड़ी की छत साहब का इतना आनंद शायद सहन न कर पाएगी तभी रसोई के पास ऊपर से पानी गिरने लगा? भोजन नष्ट हो जाने के भय से तिवारी ने बाहर जाकर इसका विरोध किया। लेकिन साहब चाहे काला हो या गोरा – देशी आदमी की ऐसी अभद्रता नहीं सह सकता। वह उत्तेजित हो उठा और देखते-ही-देखते अंदर जाकर बाल्टी पर बाल्टी पानी ढरकाना आरम्भ कर दिया। इसके बाद जो कुछ हुआ वह अपूर्व ने अपनी आँखों से देख लिया।
कुछ देर मौन रहकर अपूर्व बोला, ”साहब के कमरे में क्या कोई और नहीं है।”
”शायद कोई हो। कोई उसे पियक्कड़ साले के साथ दाँत किट-किटकर तो कर रहा था।” अपूर्व समझ गया कि किसी ने उसे रोकने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन हम लोगों के दुर्भाग्य को तिल भर भी कम नहीं कर सका।
अपूर्व चुप रहा। जो होना था हो चुका था। लेकिन अब शांति थी।
अपूर्व ने हँसने की कोशिश करके कहा, ”तिवारी, ईश्वर की इच्छा न होने पर इसी तरह मुँह का ग्रास निकल जाता है। आओ, समझ लें कि हम लोग आज भी जहाज में ही हैं। चिउड़ा-मिठाई अब कुछ बची है। रात बीत ही जाएगी।”
तिवारी ने सिर हिलाकर हुंकारी भरी और उस हाँडी की ओर फिर एक बार हसरत भरी नजरों से देखकर चिउड़ा-मिठाई लेने के लिए उठ खड़ा हुआ। सौभाग्य से खाने-पीने के सामान का संदूक रसोईघर के कोने में रखा था। इसलिए ईसाई का पानी इसे अपवित्र नहीं कर पाया था।
फलाहार जुटाते हुए तिवारी ने रसोईघर से कहा, ”बाबू, यहाँ तो रहना हो नहीं सकेगा।”
अपूर्व अन्यमनस्क भाव से बोला, ”हाँ, लगता तो ऐसा ही है।”
तिवारी उसके परिवार का पुराना नौकर है। आते समय उसका हाथ पकड़कर माँ ने जो बातें समझाकर बताई थीं, उन्हीं को याद कर उद्विग्न स्वर में बोला, ”नहीं बाबू, इस घर में अब एक दिन भी नहीं। क्रोध में आकर काम अच्छा नहीं हुआ। मैंने साहब को गालियाँ दी हैं।”
अपूर्व ने कहा, ”उसे गालियाँ न देकर मारना ठीक था।”
तिवारी में अब क्रोध के स्थान पर सद्बुद्धि पैदा हो रही थी। हम लोग बंगाली हैं।
अपूर्व मौन ही रहा। साहस पाकर तिवारी ने पूछा, ”ऑफिस के दरबान जी से कहकर कल सवेरे ही क्या इस घर को छोड़ा नहीं जा सकता? मेरा तो विचार है कि छोड़ देना ठीक होगा।”
अपूर्व ने कहा, ”अच्छी बात है, देखा जाएगा।” दुर्जनों के प्रति उसे कोई शिकायत नहीं है। समय नष्ट न करके चुपचाप जगह छोड़ देना ही उसने उचित समझ लिया है। बोला, ”अच्छी बात है, ऐसा ही होगा। तुम भोजन आदि का प्रबंध करो।”
”अभी करता हूँ बाबू!” कहकर कुछ निश्चिंत होकर अपने काम में लग गया।
लेकिन उसी की बातों का सूत्र पकड़कर, ऊपर वाले फिरंगी का दुर्व्यवहर याद कर अचानक अपूर्व का समूचा बदन क्रोध से जलने लगा। मन में विचार आया कि हम लोगों ने चुपचाप, बिना कुछ सोचे-समझे इसे सहन कर लेना ही अपना कर्त्तव्य समझ लिया है। इसीलिए दूसरों को चोट पहुँचाने का अधिकार स्वयं ही दृढ़ तथा उग्र हो उठा है। इसीलिए तो आज मेरा नौकर भी मुझको तुरंत भागकर आत्महत्या करने का उपदेश देने का साहस कर रहा है। तिवारी बेचारा रसोईघर में फलाहार ठीक कर रहा था। वह जान भी न सका। उसकी लाठी लेकर अपूर्व बिना आहट किए धीरे-धीरे बाहर निकला और सीढ़ियों से ऊपर चढ़ गया।
दूसरी मंजिल पर साहब के बंद द्वार को खटखटाना आरम्भ किया। कुछ देर बाद एक भयभीत नारी कंठ ने अंग्रेजी में कहा, ”कौन है?”
”मैं नीचे रहता हूँ और उस आदमी को देखना चाहता हूँ।”
”क्यों?”
”उसे दिखाना है कि उसने मेरा कितना नुकसान किया है।”
”वह सो रहे हैं।”
अपूर्व ने कठोर स्वर में कहा, ”जगा दीजिए। यह सोने का समय नहीं है। रात को सोते समय मैं तंग करने नहीं आऊँगा। लेकिन इस समय उसके मुँह से उत्तर सुने बिना नहीं जाऊँगा।”
लेकिन न तो द्वार ही खुला और न ही कोई उत्तर ही आया। दो-एक मिनट प्रतीक्षा करने के बाद अपूर्व ने फिर चिल्लाकर कहा, ”मुझे जाना है, उसे बाहर भेजिए।”
इस बार वह विनम्र और मधुर नारी स्वर द्वार के समीप सुनाई दिया, ”मैं उनकी लड़की हूँ। पिताजी की ओर से क्षमा माँगती हूँ। उन्होंने जो कुछ किया है, सचेत अवस्था में नहीं किया। आप विश्वास रखिए, आपकी जो हानि हुई है कल हम उसे यथाशक्ति पूरी कर देंगे।”
लड़की के स्वर से अपूर्व कुछ नर्म पड़ गया। लेकिन उसका क्रोध कम नहीं हुआ। बोला, ”उन्होंने बर्बर की तरह मेरा बहुत नुकसान किया। उससे भी अधिक उत्पात किया है। मैं विदेशी आदमी हूँ। लेकिन आशा करता हूँ कि कल सुबह मुझसे स्वयं मिलकर इस झगड़े को समाप्त कर लेने की कोशिश करेंगे।”
लड़की ने कहा, ”अच्छी बात है।” फिर कुछ देर चुप रहकर बोली, ”आपकी तरह हम लोग भी यहाँ बिल्कुल नए हैं। कल शाम को ही मालपीन से आए हैं।”
और कुछ न कहकर अपूर्व धीरे-धीरे उतर आया। देखा, तिवारी भोजन की व्यवस्था में ही लगा था।
थोड़ा-सा खा-पीकर अपूर्व सोने के कमरे में आकर भीगे तकिए को ही लगाकर सो गया। प्रवास के लिए घर से बाहर पाँव रखने के समय से लेकर अब तक विपत्तियों की सीमा नहीं रही थी। सुख-शांति हीन, चिंता ग्रस्त मन में एक ही बात बार-बार उठ रही थी – उस ईसाई लड़की की बात! वह नहीं जानता कि देखने में वह कैसी है। क्या उम्र है, कैसा स्वभाव है। लेकिन इतना जरूर जान गया कि उसका उच्चारण अंग्रेजों जैसा नहीं है और जो भी हो, ईसाई के नाते स्वयं को राजा की जाति का समझकर पिता की भाँति घमंडी नहीं है। अपने पिता के अन्याय तथा उत्पात के लिए उसने लज्जा अनुभव की है। उसकी भयभीत, विनम्र स्वर में क्षमा-याचना, उसे अपने कर्कश तथा तीव्र अभियोग की तुलना में असंगत-सी लगी। उसका स्वभाव उग्र नहीं है। कड़ी बात कहने में उसे हिचक होती है।
तभी बिहारी का मोटा कंठ स्वर उसके कानों तक पहुँचा। वह कह रहा था, ”नहीं मेम साहब यह आप ले जाइए। बाबू भोजन कर चुके। हम लोग यह सब छूते तक नहीं।”
अपूर्व उठ बैठा और उस ईसाई लड़की के शब्दों को कान लगाकर सुनने की कोशिश करने लगा। तिवारी बोला, ”कौन कहता है कि हमने भोजन नहीं किया? यह आप ले जाइए। बाबू सुनेंगे तो नाराज होंगे।”
अपूर्व ने धीरे-धीरे बाहर आकर पूछा, ”क्या बात है तिवारी?”
लड़की जल्दी से पीछे हट गई। शाम हो चली थी लेकिन कहीं भी रोशनी नहीं जली थी। लड़की का रंग अंग्रेजों जैसा सफेद नहीं है लेकिन खूब साफ है। उम्र उन्नीस-बीस या कुछ अधिक होगी। कुछ लंबी होने से दुबली जान पड़ती है। ऊपरी होंठ के नीचे सामने के दोनों दाँतों को कुछ ऊँचा न समझा जाए तो चेहरे की बनावट अच्छी है। पैरों में चप्पल, शरीर पर भड़कीली-सी साड़ी, चाल-ढाल कुछ बंगाली और कुछ पारसी जान पड़ती है। एक डाली में कुछ नारंगी, नाशपाती, दो-चार अनार और अंगूर का एक गुच्छा सामने धरती पर रखे हैं।
अपूर्व ने पूछा, ”यह सब क्या है?”
लड़की ने अंग्रेजी में धीरे से उत्तर दिया – ”आज हमारा त्यौहार है। माँ ने भेजा है। आज तो आपका खाना भी नहीं हुआ।”
अपूर्व ने कहा, ”अपनी माँ को हम लोगों की ओर से धन्यवाद देना और कहना कि हमारा खाना हो गया है।”
लड़की चुप थी। अपूर्व ने पूछा, ”हमारा खाना नहीं हुआ, आपको यह कैसे पता लगा?”
लड़की ने लज्जित स्वर में कहा, ”इसीलिए तो झगड़ा हुआ था।”
अपूर्व बोला, ”नहीं। वास्तव में हमारा खाना हो चुका है।”
लड़की बोली, ”हो सकता है। लेकिन यह तो बाजार के फल हैं, इनमें कोई दोष नहीं है।”
अपूर्व समझ गया कि उसे किसी प्रकार शांत करने के लिए दोनों अपरिचित स्त्रियों के उद्वेग की सीमा नहीं है। कुछ देर पहले वह अपने स्वभाव का जो परिचय दे आया है, उससे न जाने क्या होगा? यह सोचकर उसे प्रसन्न करने के लिए ही तो यह भेंट लेकर आई है इसलिए मीठे स्वर में बोला, ”नहीं, कोई दोष नहीं है।” फिर तिवारी से बोला, ”ले लो, इनमें कोई दोष नहीं है महाराज।”
तिवारी इससे प्रसन्न नहीं हुआ। बोला, ”रात में हम लोगों को जरूरत नहीं है। और माँ ने मुझे यह सब करने के लिए बार-बार मना किया है। मेम साहब, आप इन्हें ले जाइए। हमें जरूरत नहीं है।”
माँ ने मना किया है या कर सकती हैं, इसमें असम्भव कुछ भी नहीं था और वर्षों के विश्वसनीय तिवारी को इन सब झंझटों को सौंपकर उसका अभिभावक भी वह नियुक्त कर सकती हैं, यह भी सम्भव है। अभी संकुचित, लज्जित और अपरिचित लड़की, जो उसे प्रसन्न करने उसके द्वार पर आई है, उसे उपहार की सामान्य वस्तुओं को अस्पृश्य कहकर अपमानित करने को भी वह उचित न मान सका। तिवारी ने कहा, ”यह हम सब नहीं छुएँगे मेम साहब। इन्हें उठा ले जाइए। मैं इस स्थान को धो डालूँ।”
लड़की कुछ देर चुपचाप खड़ी रही। फिर डाली उठाकर धीमे-धीमे चली गई।
अपूर्व ने धीमे और रूखे स्वर में कहा, ”न खाते, लेकिन लेकर चुपके से फेंक तो सकते थे।”
तिवारी बोला, ”नष्ट करने का क्या लाभ होता बाबू?”
”मूर्ख, गँवार कहीं का,” इतना कहकर अपूर्व सोने चला गया। बिस्तर पर लेटकर पहले तिवारी के प्रति क्रोध से उसका सम्पूर्ण शरीर जलने लगा।
अपूर्व की इच्छा थी कि सुबह बाजार घूम आए। लेकिन न जा सका। क्योंकि ऊपर वाला साहब कब क्षमा-याचना करने आएगा, इसका कुछ ठीक नहीं था। वह आएगा अवश्य, इसमें कोई संदेह नहीं था। आज जब उसका नशा टूटेगा तब उसकी पत्नी और बेटी, उसे किसी भी दशा में छोडेंग़ी नहीं। क्योंकि उनके द्वारा ऐसा संकेत वह कल ही पा चुका था। नींद टूटने के बाद से वह लड़की कई बार याद आई। नींद में भी उसकी भद्रता, सौजन्यता और उसका विनम्र कंठ स्वर कानों में एक परिचित सुर की भाँति आते-जाते रहे। अपने शराबी पिता के दुराचार के कारण उस लड़की की लज्जा की सीमा नहीं थी। मूर्ख तिवारी के रूखे व्यवहार से अपूर्व भी लज्जा का अनुभव कर रहा था।
अचानक सिर के ऊपर पड़ोसियों के जाग उठने की आहट आई और प्रत्येक आहट से वह आशा करने लगा कि साहब उसके द्वार पर आकर खड़ा है। क्षमा तो वह करेगा ही, यह निश्चित है। लेकिन विगत दिन की वीभत्सता, क्या करने से सरल और सामान्य होकर विषाद का चिद्द मिटा देगी? यही उसकी चिंता का विषय था। आशा और उद्वेग के साथ प्रतीक्षा करते-करते जब नौ बज गए तो सुना, साहब नीचे उतर रहे हैं। उनके पीछे भी दो पैरों का शब्द सुनाई दिया। थोड़ी देर बाद ही उनके द्वार का लोहे का कड़ा जोर से बज उठा। तिवारी ने आकर कहा, ”बाबू, ऊपर वाला साहब कड़ा हिला रहा है।”
अपूर्व ने कहा, ”दरवाजा खोलकर उनको आने दो।”
तिवारी के दरवाजा खोलते ही अपूर्व ने अत्यंत गम्भीर आवाज सुनी, ”तुम्हारा साहब कहाँ है?”
उत्तर में तिवारी ने कहा, ठीक-ठाक सुनाई नहीं पड़ा।
स्वर से अपूर्व चौंक पड़ा, बाप रे! यह क्या सामान्य कंठ स्वर है?
सोचा, शायद साहब ने सवेरे उठते ही शराब पी ली है। इसलिए इस समय जाना उचित है या नहीं। सोचने से पहले ही फिर उधर से आदेश हुआ, ”बुलाओ जल्दी।”
अपूर्व धीरे-धीरे पास जाकर खड़ा हो गया। साहब ने एक पल उसे ऊपर से नीचे तक देखकर अंग्रेजी में पूछा, ”अंग्रेजी जानते हो?”
”जानता हूँ।”
”मेरे सो जाने के बाद कल तुम ऊपर गए थे?”
”जी हाँ।”
”लाठी ठोंकी थी? अनाधिकार प्रवेश करने के लिए दरवाजा तोड़ने की कोशिश की थी?”
अपूर्व विस्मय के मारे स्तब्ध हो गया। साहब ने कहा-”संयोग से दरवाजा खुला होता तो तुम कमरे में घुसकर मेरी पत्नी या बेटी पर आक्रमण कर बैठते। इसीलिए मेरे जागते रहने पर नहीं गए?”
अपूर्व ने धीमे स्वर से कहा, ”आप तो सो रहे थे, कैसे पता चला?”
साहब ने कहा, ”मेरी लड़की ने मुझे बताया है। उसे तुमने गाली भी दी।”
इतना कहकर उसने बगल में खड़ी लड़की की ओर उँगली से इशारा किया, यह वही लड़की है। कल भी इसे अपूर्व अच्छी तरह नहीं देख पाया था। आज भी साहब के विशाल शरीर की आड़ में उसकी साड़ी की किनारी को छोड़ और कुछ भी नहीं देख पाया। सिर हिलाकर उसने पिता की हाँ-में-हाँ मिलाई या नहीं, यह भी समझ में नहीं आया। लेकिन इतना अवश्य समझ गया कि यह लोग भले आदमी नहीं हैं। सारे मामले को जान-बूझकर विकृत और उलटा करके सिद्ध करने का प्रयत्न कर रहे हैं। इसलिए बहुत सतर्क रहने की जरूरत है।
साहब ने कहा, ”मैं जाग रहा होता तो तुम्हें लात मारकर धकेल देता। तुम्हारे मुँह में एक भी दाँत साबुत न रहने देता। लेकिन यह अवसर अब खो चुका हूँ। इसलिए पुलिस के हाथ से जो कुछ न्याय मिलेगा उतना ही लेकर संतुष्ट होना पड़ेगा। हम लोग जा रहे हैं। तुम इसके लिए तैयार रहना।”
अपूर्व ने सिर हिलाकर कहा, ”अच्छी बात है।” लेकिन उसका मुँह उतर-सा गया।
साहब ने लड़की का हाथ पकड़कर कहा, ”चलो!” और सीढ़ी से उतरते-उतरते बोला, ”मैंने तो पहले ही कहा था बाबू, कि जो होना था हो गया। अब उन्हें और छेड़ने की जरूरत नहीं है। वह साहब और मेम ठहरे।”
अपूर्व ने कहा, ”साहब-मेम ठहरे तो इससे क्या होता है?”
तिवारी ने कहा, ”यह लोग पुलिस में जो गए हैं।”
अपूर्व ने कहा, ”जाने से क्या होता है?”
तिवारी ने व्याकुल होकर कहा, ”बड़े बाबू को तार कर दूं? छोटे बाबू, उन्हें बुला ही लिया जाए।”
”क्या पागल हो गया है तिवारी जा उधर देख। खाना सारा जल गया होगा। साढ़े दस बजे मुझे ऑफिस जाना है,” इतना कहकर वह अपने कमरे में चला गया। तिवारी रसोईघर में चला गया। लेकिन रसोई बनाने से लेकर बाबू के ऑफिस जाने तक का सभी कुछ उसके लिए अत्यंत अर्थहीन हो गया।
वह करुणामयी के हाथ का बना हुआ आदमी है इसलिए मन कितना ही दुश्चिन्ताग्रस्त क्यों न हो, हाथ के काम में कहीं भूल-चूक नहीं होती। यथासमय भोजन करने बैठकर अपूर्व ने उसे उत्साहित करने के अभिप्राय से भोजन की कुछ बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा की तथा दो-एक ग्रास मुँह में डालकर बोला, ”तिवारी, आज का भोजन तो मानो अमृत ही बनाया है। कई दिनों से अच्छी तरह भोजन नहीं किया था। कैसा डरपोक आदमी है तू? माँ ने भी अच्छे आदमी को साथ भेजा है।”
तिवारी ने कहा, ”हूँ।”
अपूर्व ने उसकी ओर देखकर हँसते हुए कहा, ”मुँह एकदम हाँडी जैसा क्यों बना रखा है? उस हरामजादे फिरंगी की धमकी देखी? पुलिस में जा रहा है। अरे जाता क्यों नहीं? जाकर क्या करेगा, सुनें तो? तेरा कोई गवाह है?”
तिवारी ने कहा, ”मेम साहब को भी क्या गवाही की जरूरत है?”
अपूर्व ने कहा, ”उनके लिए क्या कोई दूसरे नियम-कानून हैं फिर वह मेम साहब कैसे? रंग तो मेरे पॉलिश किए हुए जूते की ही तरह है?”
तिवारी मौन रहा।
कुछ देर चुपचाप भोजन करने के बाद अपूर्व ने मुँह ऊपर उठाया। कहा, ”और वह लड़की भी कितनी दुष्ट है। कल इस तरह आई जैसे भीगी बिल्ली हो। और ऊपर जाते ही इतनी झूठ-मूठ बातें जोड़ दी।”
तिवारी बोला, ”ईसाई है न?”
”जानते हो तिवारी, जो असली साहब हैं वह इनसे घृणा करते हैं। एक मेज पर बैठकर कभी नहीं खिलाते। चाहे कितना ही हैट-कोट पहनें और गिरजे में जाएँ।”
तिवारी ने ऐसा कभी नहीं सोचा था। छोटे बाबू का ऑफिस जाने का समय हो रहा है। अब घर में अकेले उसका समय कैसे कटेगा? साहब थाने गया है। हो सकता है, लौटकर दरवाजा तोड़ डाले। हो सकता है, पुलिस साथ लेकर आए। हो सकता है उसे बांधकर ले जाए। क्या होगा? कौन जाने।
अपूर्व भोजन करने के बाद कपड़े पहन रहा था। तिवारी ने कमरे का पर्दा हटाकर कहा, ”देखकर जाते तो अच्छा होता।”
”क्या देखकर जाता?”
”उनके लौटने की राह….।”
अपूर्व ने कहा, ”यह कैसे हो सकता है? आज मेरी नौकरी का पहला दिन है। लोग क्या सोचेंगे?”
तिवारी चुप रह गया।
अपूर्व ने कहा, ”तू दरवाजा बंद करके निश्चिंत बैठा रह, मैं जल्दी ही लौटूंगा। कोई दरवाजा नहीं तोड़ सकता।”
तिवारी ने कहा, ”अच्छा।” लेकिन उसने एक लम्बी सांस दबा रखने की जो कोशिश की उसे अपूर्व ने देख लिया। बाहर जाते समय तिवारी ने भारी गले से कहा, ”पैदल मत जाना छोटे बाबू! किराए की गाड़ी ले लेना।”
”अच्छा,” कहकर अपूर्व नीचे उतर गया। उसके चलने का ढंग ऐसा था, जैसे नई नौकरी के प्रति उसके मन में कोई हर्ष न हो।


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