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प्रेमचंद

यही प्रस्ताव स्वीकृत हुआ। दो मोटरें चलीं। एक मिस मालती ड्राइव कर रही थीं, दूसरी खुद रायसाहब। कोई बीस-पच्चीस मील पर पहाड़ी प्रांत शुरू हो गया। दोनों तरफ ऊँची पर्वत-माला दौड़ी चली आ रही थी। सड़क भी पेंचदार होती जाती थी। कुछ दूर की चढ़ाई के बाद एकाएक ढाल आ गया और मोटर वेग से नीचे की ओर चली। दूर से नदी का पाट नजर आया, किसी रोगी की भाँति दुर्बल, निस्पंद। कगार पर एक घने वट वृक्ष की छाँह में कारें रोक दी गईं और लोग उतरे। यह सलाह हुई कि दो-दो की टोली बने और शिकार खेल कर बारह बजे तक यहाँ आ जाए। मिस मालती मेहता के साथ चलने को तैयार हो गईं। खन्ना मन में ऐंठ कर रह गए। जिस विचार से आए थे, उसमें जैसे पंचर हो गया। अगर जानते, मालती दगा देगी, तो घर लौट जाते, लेकिन रायसाहब का साथ उतना रोचक न होते हुए भी बुरा न था। उनसे बहुत-सी मुआमले की बातें करनी थीं। खुर्शेद और तंखा बच रहे। उनकी टोली बनी-बनाई थी। तीनों टोलियाँ एक-एक तरफ चल दीं।

कुछ दूर तक पथरीली पगडंडी पर मेहता के साथ चलने के बाद मालती ने कहा, “तुम तो चले ही जाते हो। जरा दम ले लेने दो।”

मेहता मुस्कराए, “अभी तो हम एक मील भी नहीं आए। अभी से थक गईं?”

“थकी नहीं, लेकिन क्यों न जरा दम ले लो।”

“जब तक कोई शिकार हाथ न आ जाय, हमें आराम करने का अधिकार नहीं।”

“मैं शिकार खेलने न आई थी।”

मेहता ने अनजान बन कर कहा, “अच्छा, यह मैं न जानता था। फिर क्या करने आई थीं?”

“अब तुमसे क्या बताऊँ।”

“हिरनों का एक झुंड चरता हुआ नजर आया। दोनों एक चट्टान की आड़ में छिप गए और निशाना बाँध कर गोली चलाई। निशाना खाली गया। झुंड भाग निकला। मालती ने पूछा – अब?”

“कुछ नहीं, चलो फिर कोई शिकार मिलेगा।”

दोनों कुछ देर तक चुपचाप चलते रहे। फिर मालती ने जरा रुक कर कहा, “गरमी के मारे बुरा हाल हो रहा है। आओ, इस वृक्ष के नीचे बैठ जायँ।”

“अभी नहीं। तुम बैठना चाहती हो, तो बैठो। मैं तो नहीं बैठता।”

“बड़े निर्दयी हो तुम। सच कहती हूँ।”

“जब तक कोई शिकार न मिल जाय, मैं बैठ नहीं सकता।”

“तब तो तुम मुझे मार ही डालोगे। अच्छा बताओ, रात तुमने मुझे इतना क्यों सताया? मुझे तुम्हारे ऊपर बड़ा क्रोध आ रहा था। याद है, तुमने मुझे क्या कहा था तुम हमारे साथ चलेगा दिलदार? मैं न जानती थी, तुम इतने शरीर हो। अच्छा, सच कहना, तुम उस वक्त मुझे अपने साथ ले जाते?”

मेहता ने कोई जवाब न दिया, मानो सुना ही नहीं।

दोनों कुछ दूर चलते रहे। एक तो जेठ की धूप, दूसरे पथरीला रास्ता। मालती थक कर बैठ गई।

मेहता खड़े-खड़े बोले, “अच्छी बात है, तुम आराम कर लो। मैं यहीं आ जाऊँगा।”

“मुझे अकेले छोड़ कर चले जाओगे?”

“मैं जानता हूँ, तुम अपने रक्षा कर सकती हो!”

“कैसे जानते हो?”

“नए युग की देवियों की यही सिफत है। वह मर्द का आश्रय नहीं चाहतीं, उससे कंधा मिला कर चलना चाहती हैं।”

मालती ने झेंपते हुए कहा, “तुम कोरे फिलासफर हो मेहता, सच।”

सामने वृक्ष पर एक मोर बैठा हुआ था। मेहता ने निशाना साधा और बंदूक चलाई। मोर उड़ गया।

मालती प्रसन्न हो कर बोली, “बहुत अच्छा हुआ। मेरा शाप पड़ा।”

मेहता ने बंदूक कंधों पर रख कर कहा, “तुमने मुझे नहीं, अपने आपको शाप दिया। शिकार मिल जाता, तो मैं दस मिनट की मुहलत देता। अब तो तुमको फौरन चलना पड़ेगा।”

मालती उठ कर मेहता का हाथ पकड़ती हुई बोली, “फिलासफरों के शायद हृदय नहीं होता। तुमने अच्छा किया, विवाह नहीं किया, उस गरीब को मार ही डालते। मगर मैं यों न छोडूँगी। तुम मुझे छोड़ कर नहीं जा सकते।”

मेहता ने एक झटके से हाथ छुड़ा लिया और आगे बढ़े।

मालती सजल नेत्र हो कर बोली, “मैं कहती हूँ, मत जाओ। नहीं मैं इसी चट्टान पर सिर पटक दूँगी।”

मेहता ने तेजी से कदम बढ़ाए। मालती उन्हें देखती रही। जब वह बीस कदम निकल गए, तो झुँझला कर उठी और उनके पीछे दौड़ी। अकेले विश्राम करने में कोई आनंद न था।

समीप आ कर बोली, “मैं तुम्हें इतना पशु न जानती थी।”

“मैं जो हिरन मारूँगा, उसकी खाल तुम्हें भेंट करूँगा।”

“खाल जाय भाड़ में। मैं अब तुमसे बात न करूँगी।”

“कहीं हम लोगों के हाथ कुछ न लगा और दूसरों ने अच्छे शिकार मारे तो मुझे बड़ी झेंप होगी।”

एक चौड़ा नाला मुँह फैलाए बीच में खड़ा था। बीच की चट्टानें उसके दाँतों-सी लगती थीं। धार में इतना वेग था कि लहरें उछली पड़ती थीं। सूर्य मध्याह्न आ पहुँचा था और उसकी प्यासी किरणें जल में क्रीड़ा कर रही थीं।

मालती ने प्रसन्न हो कर कहा, “अब तो लौटना पड़ा।”

“क्यों उस पार चलेंगे। यहीं तो शिकार मिलेंगे।”

“धारा में कितना वेग है। मैं तो बह जाऊँगी।”

“अच्छी बात है। तुम यहीं बैठो, मैं जाता हूँ।”

“हाँ, आप जाइए। मुझे अपने जान से बैर नहीं है।”

मेहता ने पानी में कदम रखा और पाँव साधते हुए चले। ज्यों-ज्यों आगे जाते थे, पानी गहरा होता जाता था। यहाँ तक कि छाती तक आ गया।

मालती अधीर हो उठी। शंका से मन चंचल हो उठा। ऐसी विकलता तो उसे कभी न होती थी। ऊँचे स्वर में बोली, “पानी गहरा है। ठहर जाओ, मैं भी आती हूँ।”

“नहीं-नहीं, तुम फिसल जाओगी। धार तेज है।”

“कोई हरज नहीं, मैं आ रही हूँ। आगे न बढ़ना, खबरदार।”

मालती साड़ी ऊपर चढ़ा कर नाले में पैठी। मगर दस हाथ आते-आते पानी उसकी कमर तक आ गया।

मेहता घबड़ाए। दोनों हाथ से उसे लौट जाने को कहते हुए बोले, “तुम यहाँ मत आओ मालती! यहाँ तुम्हारी गर्दन तक पानी है।”

मालती ने एक कदम और आगे बढ़ कर कहा, “होने दो। तुम्हारी यही इच्छा है कि मैं मर जाऊँ तो तुम्हारे पास ही मरूँगी।”

मालती पेट तक पानी में थी। धार इतनी तेज थी कि मालूम होता था, कदम उखड़ा। मेहता लौट पड़े और मालती को एक हाथ से पकड़ लिया।

मालती ने नशीली आँखों में रोष भर कर कहा, “मैंने तुम्हारे-जैसा बेदर्द आदमी कभी न देखा था। बिलकुल पत्थर हो। खैर, आज सता लो, जितना सताते बने, मैं भी कभी समझूँगी।”

मालती के पाँव उखड़ते हुए मालूम हुए। वह बंदूक सँभालती हुई उनसे चिमट गई।

मेहता ने आश्वासन देते हुए कहा, “तुम यहाँ खड़ी नहीं रह सकती। मैं तुम्हें अपने कंधों पर बिठाए लेता हूँ।”

मालती ने भृकुटी टेढ़ी करके कहा, “तो उस पार जाना क्या इतना जरूरी है?”

मेहता ने कुछ उत्तर न दिया। बंदूक कनपटी से कंधों पर दबा ली और मालती को दोनों हाथों से उठा कर कंधों पर बैठा लिया।

मालती अपने पुलक को छिपाती हुई बोली, “अगर कोई देख ले?”

“भद्दा तो लगता है।”

दो पग के बाद उसने करुण स्वर में कहा, “अच्छा बताओ, मैं यहीं पानी में डूब जाऊँ, तो तुम्हें रंज हो या न हो? मैं तो समझती हूँ, तुम्हें बिलकुल रंज न होगा।”

मेहता ने आहत स्वर से कहा, “तुम समझती हो, मैं आदमी नहीं हूँ?”

“मैं तो यही समझती हूँ, क्यों छिपाऊँ।”

“सच कहती हो मालती?”

“तुम क्या समझते हो?”

“मैं! कभी बतलाऊँगा।”

पानी मेहता की गर्दन तक आ गया। कहीं अगला कदम उठाते ही सिर तक न आ जाए। मालती का हृदय धक-धक करने लगा। बोली, “मेहता, ईश्वर के लिए अब आगे मत जाओ, नहीं, मैं पानी में कूद पडूँगी।”

उस संकट में मालती को ईश्वर याद आया, जिसका वह मजाक उड़ाया करती थी। जानती थी, ईश्वर कहीं बैठा नहीं है, जो आ कर उन्हें उबार लेगा, लेकिन मन को जिस अवलंब और शक्ति की जरूरत थी, वह और कहाँ मिल सकती थी?

पानी कम होने लगा था। मालती ने प्रसन्न हो कर कहा, “अब तुम मुझे उतार दो।”

“नहीं-नहीं, चुपचाप बैठी रहो। कहीं आगे कोई गढ़ा मिल जाए।”

“तुम समझते होगे, यह कितनी स्वार्थिन है।”

“मुझे इसकी मजदूरी दे देना।”

मालती के मन में गुदगुदी हुई।

“क्या मजदूरी लोगे?”

“यही कि जब तुम्हारे जीवन में ऐसा ही कोई अवसर आए, तो मुझे बुला लेना।”

किनारे आ गए। मालती ने रेत पर अपने साड़ी का पानी निचोड़ा, जूते का पानी निकाला, मुँह-हाथ धोया, पर ये शब्द अपने रहस्यमय आशय के साथ उसके सामने नाचते रहे।

उसने इस अनुभव का आनंद उठाते हुए कहा, “यह दिन याद रहेगा।”

मेहता ने पूछा, “तुम बहुत डर रही थीं?”

“पहले तो डरी, लेकिन फिर मुझे विश्वास हो गया कि तुम हम दोनों की रक्षा कर सकते हो।”

मेहता ने गर्व से मालती को देखा, “उनके मुख पर परिश्रम की लाली के साथ तेज था।”

“मुझे यह सुन कर कितना आनंद आ रहा है, तुम यह समझ सकोगी मालती?”

“तुमने समझाया कब? उलटे और जंगलों में घसीटते फिरते हो, और अभी फिर लौटती बार यही नाला पार करना पड़ेगा। तुमने कैसी आफत में जान डाल दी। मुझे तुम्हारे साथ रहना पड़े, तो एक दिन न पटे।”

मेहता मुस्कराए। इन शब्दों का संकेत खूब समझ रहे थे।

“तुम मुझे इतना दुष्ट समझती हो! और जो मैं कहूँ कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ, तो तुम मुझसे विवाह करोगी?”

“ऐसे काठ-कठोर से कौन विवाह करेगा। रात-दिन जला कर मार डालोगे।”

और मधुर नेत्रों से देखा, मानो कह रही हो, “इसका आशय तुम खूब समझते हो। इतने बुद्धू नहीं हो।”

मेहता ने जैसे सचेत हो कर कहा, “तुम सच कहती हो मालती! मैं किसी रमणी को प्रसन्न नहीं रख सकता। मुझसे कोई स्त्री प्रेम का स्वाँग नहीं कर सकती। मैं उसके अंतस्तल तक पहुँच जाऊँगा। फिर मुझे उससे अरुचि हो जायगी।”

मालती काँप उठी। इन शब्दों में कितना सत्य था।

उसने पूछा, “अच्छा बताओ, तुम कैसे प्रेम से संतुष्ट होगे?”

“बस यही कि जो मन में हो, वही मुख पर हो! मेरे लिए रंग-रूप और हाव-भाव और नाजो-अंदाज का मूल्य उतना ही है, जितना होना चाहिए। मैं वह भोजन चाहता हूँ, जिससे आत्मा की तृप्ति हो। उत्तेजक और शोषक पदार्थो की मुझे जरूरत नहीं।”

मालती ने होंठ सिकोड़ कर ऊपर को साँस खींचते हुए कहा, “तुमसे कोई पेश न पाएगा। एक ही घाघ हो। अच्छा बताओ, मेरे विषय में तुम्हारा क्या खयाल है?”

मेहता ने नटखटपन से मुस्करा कर कहा, “तुम सब कुछ कर सकती हो, बुद्धिमती हो, चतुर हो, प्रतिभावान हो, दयालु हो, चंचल हो, स्वाभिमानी हो, त्याग कर सकती हो, लेकिन प्रेम नहीं कर सकती।”

मालती ने पैनी दृष्टि से ताक कर कहा, “झूठे हो तुम, बिलकुल झूठे। मुझे तुम्हारा यह दावा निस्सार मालूम होता है कि तुम नारी-हृदय तक पहुँच जाते हो।”

दोनों नाले के किनारे-किनारे चले जा रहे थे। बारह बज चुके थे, पर अब मालती को न विश्राम की इच्छा थी, न लौटने की। आज के संभाषण में उसे एक ऐसा आनंद आ रहा था, जो उसके लिए बिलकुल नया था। उसने कितने ही विद्वानों और नेताओं को एक मुस्कान में, एक चितवन में, एक रसीले वाक्य में उल्लू बना कर छोड़ दिया था। ऐसी बालू की दीवार पर वह जीवन का आधार नहीं रख सकती थी। आज उसे वह कठोर, ठोस, पत्थर-सी भूमि मिल गई थी, जो फावड़ों से चिनगारियाँ निकाल रही थी और उसकी कठोरता उसे उत्तरोत्तर मोहे लेती थी।

जारी….

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