करै बुराई सुख चहै कैसे पावै कोइ। रोपै बिरवा आक को आम कहाँ ते होइ॥ भली करत लागति बिलम बिलम न बुरे विचार। भवन बनावत दिन लगै ढाहत लगत न वार॥ जाही ते कछु पाइए करिए ताकी आस। रीते सरवर पै गए कैसे बुझत पियास॥ अपनी पहुँच बिचार कै करतब करिए ...