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आपके ज्ञानवर्धन हेतु प्रस्तुत है रामचरितमानस (Ramcharitmanas), जिसे कि तुलसी रामायण (Ramayana) के नाम से भी जाना जाता है, की कहानियाँ (Ramcharitmanas Stories or Ramayana Stories)

रामचरितमानस की कहानियाँ – नारद का अहंकार (Stories from Ramcharitmanas)

एक बार नारद जी जब हिमालय में भ्रमण कर रहे थे तो वहाँ पर उन्हें एक बड़ी पवित्र गुफा दिखी जिसके समीप गंगा जी प्रवाहित हो रही थीं। वह गुफा नारज मुनि के मन को भा गई और वे वहाँ तप में लीन हो गये। नारद जी के इस तप को देखकर देवराज इन्द्र के मन में यह भय उत्पन्न हुआ कि नारद मेरा राज्य चाहते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि जगत् में जो कामी और लोभी होते हैं, वे कुटिल कौए की तरह सबसे डरते हैं, जैसे मूर्ख कुत्ता सिंह को देखकर सूखी हड्डी सूखी हड्डी लेकर भाग जाता है और वह मूर्ख यह यह समझता है कि कहीं उस हड्डी को सिंह छीन न ले।

इन्द्र ने नारद की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को भेजा। कामदेव ने वहाँ जाकर अपनी माया से वहाँ वसन्त ऋतु को उत्पन्न किया। तरह-तरह के वृक्षों पर रंग-बिरंगे फूल खिल गये, उन पर कोयलें कूकने लगीं और भौरे गुंजार करने लगे। कामाग्नि को भड़काने वाली शीतल, मन्द, सुगन्धित सुहावनी हवा चलने लगी। कामकला में निपुण रम्भा आदि देवांगनाएँ मधुर गान करने लगीं।

परन्तु कामदेव की कोई भी कला मुनि पर असर न कर सकी। तब पापी कामदेव अपने ही नाश के भय से डर गया और हार मानकर अपने सहायकों सहित नारद जी के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगा।

नारद जी के मन में कुछ भी क्रोध न आया और उन्होंने प्रिय वचन कहकर कामदेव को अपने स्थान में वापस भेज दिया।

इस घटना के बाद नारद जी के मन में इस बात का अहंकार हो गया कि हमने कामदेव को जीत लिया। नारद जी ने शिव जी के पास जाकर अहंकारपूर्वक पूरी घटना सुनाई।

शिव जी ने नारद की बात सुनकर नारद से कहा कि इस घटना का जिक्र आप श्री हरि से मत करना। अहंकार के मद में चूर कामदेव को शिव जी के वचन अच्छे नहीं लगे और वे विष्णु जी को यह घटना बताने के लिए वहाँ से चल पड़े।

रामचरितमानस की कहानियाँ – नारद का विष्णु जी को अपने काम-विजय के बारे में बताना (Stories from Ramcharitmanas)
शिव जी के बरजने के बाद भी नारद जी विष्णु जी से मिलने और उन्हें अपने द्वारा कामदेव पर विजय की बात बताने के लिए क्षीरसागर की तरफ चल पड़े। याज्ञवकल्क्य मुनि कहते हैं कि हे भरद्वाज! हरि की इच्छा बड़ी बलवान है। श्री रामचन्द्र जी जो करना चाहते हैं, वही होता है, ऐसा कोई भी नहीं है जो उसके विरुद्ध कर सके।

क्षीरसागर में पहुँचकर नारद जी ने कामदेव का सारा चरित्र भगवान विष्णु को सुना डाला। उनकी बात सुनकर भगवान रूखा मुँह करके कोमल वचन बोले – हे मुनिराज! मोह तो उसके मन में होता है जिसके हृदय में ज्ञान-वैराग्य नहीं है। आप तो ब्रह्मचर्य व्रत में तत्पर और धीरबुद्धि हैं। भला, कहीं आपको भी कामदेव सता सकता है? इस पर नारद जी ने अभिमानपूर्वक कहा – भगवन्! यह सब आपकी कृपा है।

फिर नारद जी भगवान के चरणों में सिर नवाकर वहाँ से चले गये।

करुणानिधान भगवान ने मन में विचारकर देखा कि नारद जी के मन में गर्व के भारी वृक्ष का अंकुर पैदा हो गया है, मैं उसे तुरन्त उखाड़ फेकूँगा क्योंकि सेवकों का हित करना हमारा प्रण है।

रामचरितमानस की कहानियाँ – विश्वमोहिनी (Stories from Ramcharitmanas)
श्री हरि ने, यह सोचकर कि मैं अवश्य ही वह उपाय करूँगा जिससे नारद मुनि का कल्याण और मेरा खेल हो, अपनी माया को प्रेरित किया तथा जिस रास्ते से नारद जी जा रहे थे उस रास्ते में सौ योजन का एक सुन्दर नगर रचा। उस नगर में शीलनिधि नाम का राजा रहता था, जिसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेना के समूह थे। उसका वैभव और विलास सौ इन्द्रों के समान था। वह रूप, तेज, बल और नीति का घर था। उसके विश्वमोहिनी नाम की एक ऐसी रूपवती कन्या थी, जिसके रूप को देखकर लक्ष्मी जी भी मोहित हो जाएँ। वह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती थी, इसलिये वहाँ अगणित राजा आये हुए थे।

कौतुकवश नारद मुनि उस नगर में गये और नगरवासियों से उन्होंने सब हाल पूछा। सब समाचार सुनकर वे राजा के महल में आए। राजा ने पूजा करके मुनि को यथोचित आसन दिया। फिर राजा ने राजकुमारी को नारद जी को दिखलाया और पूछा कि हे नाथ! आप विचार करके इसके सब गुण-दोष कहिए।

उसके रूप को देखकर मुनि वैराग्य भूल गये। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने-आप को भी भूल गये और हृदय में हर्षित हुए, पर प्रकट रूप में उन लक्षणों को नहीं कहा। लक्षणों को देखकर वे मन में कहने लगे कि जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जायेगा और रणभूमि में कोई उसे जीत न सकेगा। यह शीलनिधि की कन्या जिसको वरेगी, सब चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे। सब लक्षणों को विचारकर मुनि ने अपने हृदय में रख लिया और राजा से कुछ अपनी ओर से बनाकर कह दिया।

फिर नारद जी ने वहाँ से प्रस्थान किया पर उनके मन में यह चिन्ता थी कि मैं सोच-विचार कर अब वही उपाय करूँ जिससे यह कन्या मुझे ही वरे। इसके लिए तो मुझे सुन्दर रूप चाहिये, जिसे देखकर राजकुमारी मुझ पर रीझ जाये और जयमाल मेरे गले में डाल दे। श्री हरि मेरे हितचिन्तक हैं अतः मैं उन्हीं से उनका सुन्दर रूप माँग लेता हूँ। ऐसा सोचकर नारद जी ने भगवान विष्णु का स्मरण किया और भगवान विष्णु उनके समक्ष प्रकट हो गये।

नारद जी ने बहुत आर्त होकर सब कथा कह सुनाई और प्रार्थना की कि हे प्रभो! आप अपना रूप मुझे दीजिये ताकि मैं उस कन्या को प्राप्त कर सकूँ। हे नाथ! जिस तरह मेरा हित हो, आप वही कीजिये। प्रभु ने कहा कि हे नारद जी! जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे। हे योगी मुनि! रोग से व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता। इसी प्रकार मैंने भी तुम्हारा हित करने की ठान ली है। ऐसा कहकर भगवान अन्तर्धान हो गए।

माया के वशीभूत नारद प्रभु की स्पष्ट वाणी को भी समझ न सके और स्वयंवर स्थल की ओर चल पड़े।

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