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कर्ण का जन्म (Birth of Karna – Mythological Stories in Hindi)

महाभारत (Mahabharat) महाकाव्य में कर्ण (Karna) के जन्म की कथा आती है जो इस प्रकार है –

यदुवंशी राजा शूरसेन की पोषित कन्या थी जिसका नाम कुन्ती (Kunti) था। कुन्ती (Kunti) जब सयानी हुई तो पिता ने उसे घर आने वाले साधु-सन्तों, महात्माओं आदि की सेवा का काम सौंप दिया। पिता के अतिथिशाला में जो भी साधु-महात्मा, ऋषि-मुनि आदि आते, कुन्ती उनकी सेवा बहुत ही अच्छी तरह से किया करती थी। एक बार उसके अतिथिगृह में दुर्वासा ऋषि का आगमन हुआ। कुन्ती ने उनकी भी मन लगा कर सेवा की। कुन्ती की सेवा से खुश हो कर दुर्वासा ऋषि ने कहा, “पुत्री! मैं तुम्हारी सेवा से बहुत प्रसन्न हुआ हूँ इसलिए तुम्हें एक ऐसा मन्त्र देता हूँ जिसका प्रयोग से तू जिस देवता की याद करेगी वह उसी समय तेरे सामने आकर तेरी मनोकामना पूर्ण करेगा।”

इस प्रकार दुर्वासा ऋषि कुन्ती को मन्त्र प्रदान कर के चले गये।

एक दिन कुन्ती ने उस यह देखने के लिये कि मंत्र सच्चा है या नहीं, एक सुनसान जगह पर बैठकर उस मन्त्र का जाप करते हुये सूर्यदेव को याद किया। उसी पल सूर्यदेव वहाँ प्रकट हो कर बोले, “देवि! मुझे बताओ कि तुम मुझ से क्या चाहती हो। मैं तुम्हारी कामना अवश्य पूर्ण करूँगा।”

इस पर कुन्ती ने कहा, “हे देव! मुझे आपसे किसी भी प्रकार की अभिलाषा नहीं है। मैंने तो केवल मन्त्र की सत्यता परखने के लिये ही उसका जाप किया है।”

कुन्ती के इन वचनों को सुन कर सूर्यदेव बोले, “हे कुन्ती! मेरा आना व्यर्थ नहीं जा सकता। मैं तुम्हें एक अत्यन्त पराक्रमी तथा दानशील पुत्र प्रदान करता हूँ।”

इतना कह कर सूर्यदेव वहाँ से चले गये।

लाज के कारण कुन्ती ने यह बात किसी से नहीं कह सकी। समय आने पर उसके गर्भ से कवच-कुण्डल धारण किये हुये एक पुत्र उत्पन्न हुआ। कुन्ती ने उसे एक मंजूषा में रख कर रात के समय गंगा में बहा दिया। वह बालक बहता हुआ उस स्थान पर पहुँचा जहाँ पर धृतराष्ट्र का सारथी अधिरथ अपने घोड़े को गंगा नदी में पानी पिला रहा था। तभी उसे कवच-कुण्डल धारी शिशु दिखाई पड़ा। अधिरथ सन्तानहीन था इसलिये उसने बालक को अपने छाती से लगा लिया और घर ले गया। अधिरथ की पत्नी राधा भी बच्चे को पाकर बहुत खुश हुई। दोनों मिलकर उस अपने बेटे के जैसा पालने लगे। उस बालक के कान अति सुन्दर थे इसलिये उसका नाम कर्ण (Karna) रखा गया।

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