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General Knowledge in Hindi 2

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पेश है हिन्दी में सामान्य ज्ञान (General Knowledge in Hindi) से सम्बन्धित जानकारी।

Rivers Related General Knowledge in Hindi

  • नील (Nile) नदी का उद्गम अफ्रीका के विक्टोरिया झील से होता है। यह भूमध्य सागर में जाकर समाप्त होती है।
  • अमेजन (Amazon) नदी का उद्गम पेरु के ग्लैशियर फेड झील से होता है। यह अटलांटिक महासागर में में जाकर समाप्त होती है।
  • मिसीसिपी मिसौरी (Mississippi Missouri) नदी का उद्गम मोन्टाना के रेड रॉक से होता है। यह मैक्सिको की खाड़ी में जाकर समाप्त होती है।
  • चांग जियांग (Chang Jiang) नदी का उद्गम चीन में तिब्बत के पठाऱ से होता है। यह चीन सागर में जाकर समाप्त होती है।
  • ओब (Ob) नदी का उद्गम रूस के अल्ताई पर्वत से होता है। यह ओब की खाड़ी में जाकर समाप्त होती है।
  • हुआंग हे (Huang He) नदी का उद्गम चीन के कुलान पर्वत से होता है। यह चिली की खाड़ी में जाकर समाप्त होती है।
  • येनिसेइ (Yenisei) नदी का उद्गम रूस के टान्नु ओला पर्वत से होता है। यह आर्कटिक महासागर में जाकर समाप्त होती है।
  • पराना (Parana) नदी का उद्गम परानैबा-ग्रांड नदी संगम रिओ डि ला प्लाटा में जाकर समाप्त होती है।
  • इर्टिश (Irtish) नदी का उद्गम रूस के अल्ताई पर्वत से होता है। यह ओब नदी में जाकर समाप्त होती है।
  • ज़ैरे (Zaire) नदी का उद्गम लुआलाब-लुआपुला संगम से होता है। यह अटलांटिक महासागर में जाकर समाप्त होती है।
  • हेइलांग (Heilong) नदी का उद्गम शिल्का-आर्गुन संगम से होता है। यह टाटर स्ट्रेट में जाकर समाप्त होती है।
  • लेना (Lena) नदी का उद्गम रूस के बैकल पर्वत से होता है। यह आर्कटिक महासागर में जाकर समाप्त होती है।
  • मैकेंजी (Mackenzie) नदी का उद्गम कनाडा के फिनले नदी से होता है। यह ब्यूफोर्ट सागर में जाकर समाप्त होती है।
  • नाइजर (Niger) नदी का उद्गम Guinea से होता है। यह गुएना की खाड़ी में जाकर समाप्त होती है।
  • मेकॉंग (Mekong) नदी का उद्गम तिब्बत की पहाड़ियों से होता है। यह दक्षिण चीन सागर में जाकर समाप्त होती है।
  • मिस्सीसिप्पी (Mississippi) नदी का उद्गम मिनेसोटा के इटास्का झील से होता है। यह मैक्सिको की खाड़ी में जाकर समाप्त होती है।
  • मिसौरी (Missouri) नदी का उद्गम मोन्टाना के जैफर्सन-मैडिसन संगम से होता है। यह मिस्सीसिप्पी नदी में जाकर समाप्त होती है।
  • वोल्गा (Volga) नदी का उद्गम रूस के वल्दाई का पठार से होता है। यह कैस्पियन सागर में जाकर समाप्त होती है।
  • मैडेइरा (Madeira) नदी का उद्गम बेनी-मौमोर संगम से होता है। यह अमेजान नदी में जाकर समाप्त होती है।
  • पुरुस (Purus) नदी का उद्गम पेरुवियन एन्डेस से होता है। यह अमेजान नदी में जाकर समाप्त होती है।
  • सो फ्रांसिस्को (São Francisco) नदी का उद्गम ब्राजील के दक्षिणपूर्व मिनास से होता है। यह अटलांटिक महासागर में जाकर समाप्त होती है।
  • युकोन (Yukon) नदी का उद्गम कनाडा के लेवेस-पेल्ली संगम से होता है। यह बेरिंग सागर में जाकर समाप्त होती है।
  • सेंट लॉरेंस (St. Lawrence) नदी का उद्गम ओंटारियो झील से होता है। यह सेंट लॉरेंस की खाड़ी में जाकर समाप्त होती है।
  • रियो ग्रैंड (Rio Grande) नदी का उद्गम सैन जौन पर्वत (San Juan Mts., Colorado) से होता है। यह मैक्सिको की खाड़ी में जाकर समाप्त होती है।
  • ब्रह्मपुत्र (Brahmaputra) नदी का उद्गम हिमालय से होता है। यह गंगा नदी में जाकर समाप्त होती है।
  • सिंधु (Indus) नदी का उद्गम हिमालय से होता है। यह अरब सागर में जाकर समाप्त होती है।
  • डेन्यूब (Danube) नदी का उद्गम जरंमनी ब्लैक फॉरेस्ट से होता है। यह काला सागर में जाकर समाप्त होती है।
  • यूफ्रेट्स (Euphrates) नदी का उद्गम मुराट नेहारी-कारा सु संगम (Murat Nehri-Kara confluence Turkey) से होता है। यह शाट-अल-अरब में जाकर समाप्त होती है।
  • डॉर्लिंग (Darling) नदी का उद्गम आस्ट्रेलिया के पूर्वी पर्वतमाला से होता है। यह मुर्रे नदी में जाकर समाप्त होती है।
  • जैम्बेजी (Zambezi) नदी का उद्गम 11°21′S, 24°22′E, Zambia से होता है। यह मोजाम्बिक चैनल में जाकर समाप्त होती है।
  • टोकांटिन्स (Tocantins) नदी का उद्गम ब्राजील के गोइस से होता है। यह पार नदी में जाकर समाप्त होती है।
  • मुर्रे (Murray) नदी का उद्गम आस्ट्रेलियन एल्प्स से होता है। यह हिंद महासागर में जाकर समाप्त होती है।
  • नेल्सन (Nelson) नदी का उद्गम कनाडा के बो नदी से होता है। यह हड्सन की खाड़ी में जाकर समाप्त होती है।
  • पारागुआ (Paraguay) नदी का उद्गम ब्राजील के माटो ग्रोसो से होता है। यह पराना नदी में जाकर समाप्त होती है।
  • उराल (Ural) नदी का उद्गम रूस के उराल पर्वत से होता है। यह कैस्पियन सागर में जाकर समाप्त होती है।
  • गंगा (Ganges) नदी का उद्गम हिमालय से होता है। यह बंगाल की खाड़ी में जाकर समाप्त होती है।
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General Knowledge in Hindi 1

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पेश है हिन्दी में सामान्य ज्ञान (General Knowledge in Hindi) से सम्बन्धित जानकारी।

Plateau Related General Knowledge in Hindi

  • धरातल के वे विशिष्ट स्थल रूप जो अपने इर्द-गिर्द के जमीन से पर्याप्त ऊँचें होते हैं तथा जिनके ऊपरी भाग चौड़े तथा सपाट होते हैं, पठार (plateau) कहलाते हैं|
  • पठारों में अवसादी चट्टानें पायी जाती हैं।
  • पठार की समुद्र तल से ऊंचाई 300 मीटर से 1000 मीटर तक होती है?
  • स्थलमंडल के 33% भाग पर पठार पाये जाते है।
  • चारों ओर से पर्वतमाला से घिरे पठार को अंतरापर्वतीय पठार कहा जाता है।
  • पामीर का पठार विश्व का सबसे ऊँचा पठार है।
  • पामीर के पठार को संसार की छत के नाम से भी जाना जाता है।
  • क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से तिब्बत का पठार विश्व का सबसे बड़ा पठार है।
  • तिब्बत का पठार हिमालय पर्वत और क्यूनलून पर्वत के मध्य स्थित है।
  • क्षेत्रफल की दृष्टि से तिब्बत का पठार विश्व का सबसे बड़ा पठार है।
  • जम्मू-कश्मीर में हिमानी निक्षेप से निर्मित होने वाले छोटे-छोटे पठारों को मर्ग या मार्ग कहते हैं. जैसे कि सोनमर्ग और गुलमर्ग|
  • टेलीग्राफिक पठार उत्तरी अटलांटिक महासागर में स्थित है।
  • पोटवार पठार पाकिस्तान में स्थित है।
  • लोयस पठार चीन में स्थित है।
  • मेसेटा का पठार स्पेन व पुर्तगाल के मध्य स्थित है।
  • मैसौरी का पठार अमेरिका में स्थित है।
  • विंध्य का पठार भारत में स्थित है।
  • विन्ध्य का पठार एक सीढ़ीनुमा पठार है।
  • राँची का पट पठार एक उत्थित पेनीप्लेन है।
  • बोलीविया के पठार से टिन धातु का सर्वाधिक उत्खन्न किया जाता है।
  • पठारों में खनिज तेल नहीं पाया जाता।
  • स्थलमंडल के कुल क्षेत्रफल का 41% हिस्सा मैदान है।
  • संसार के कुल फसलों तथा खाद्य वस्तुओं का 85% हिस्सा मैदानों में उगाया जाता है।
  • संसार की पूरी आबादी का 90% भाग मैंदानों में बसता है।
  • उत्तर-पश्चिम चीन का मैदान रेत व धूल कणों के जमाव से बना है।
  • सम्प्राय मैदान का निर्माण नदी के द्वारा होता है।
  • पेडीप्लेन मैदान का निर्माण पवन के द्वारा होता है।
  • मैदान की गणना द्वितीय श्रेणी के स्थलों में की जाती है।
  • कास्र्ट मैदानों में जहाँ-तहाँ स्थित अवशिष्ट टीलों को हयूंस कहा जाता है।
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Cricket in India – General Knowledge in Hindi

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आपके सामान्य ज्ञान (General Knowledge in Hindi) में बढ़ोत्तरी के लिए प्रस्तुत है –

भारत में क्रिकेट (Cricket in India)

general knowledge in hindi

क्रिकेट (Cricket), भारत का राष्ट्रीय खेल न होने के बावजूद भी, आज देश में सर्वाधिक लोकप्रिय खेल है। भारत में क्रिकेट के इतिहास पर यदि दृष्टि डालें तो पता चलता है कि भारत में क्रिकेट के अस्तित्व का आधार वहाँ पर ब्रिटिश राज का पनपना और उसका विकास होना ही रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार भारत में सन् 1721 में ईस्ट इण्डिया कंपनी के अंग्रेज नौकाचालकों द्वारा बड़ोदा के निकट कॉम्बे में पहली बार क्रिकेट खेलने का निश्चित सन्दर्भ मिलता है। यद्यपि कलकत्ता क्रिकेट एवं फुटबाल क्लब सन् 1792 में अस्तित्व में आया किन्तु सम्भवतः इस क्लब की स्थापना उससे पहले ही हो चुकी थी। अंग्रेजों के द्वारा टीपू सुल्तान की घेराबन्दी करके पराजित करने के पश्चात् सन् 1799 में दक्षिण भारत के श्रीरंगापटनम् में एक और क्लब स्थापित किया। सन् 1864 में मद्रास और कलकत्ता के मध्य हुए मैच को भारत में प्रथम श्रेणी के क्रिकेट का आरम्भ माना जा सकता है। 19 वीं सदी में मुंबई में हुए त्रिकोणीय और चतुष्कोणीय मैचों की भारत में क्रिकेट को स्थिरता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका रही।

भारतीयों में बंबई के अल्पसंख्यक पारसियों ने सर्वप्रथम उच्च स्तरीय क्रिकेट खेल का प्रदर्शन किया। सन् 1892 में एक क्रकेट मैच पारसियों तथा यूरोपियन्स के मध्य खेला गया, सन् 1907 और 1912 में क्रमशः हिन्दू और मुस्लिम टीम्स भी इस प्रतियोगिता में शामिल हो गए। पलवनकर बन्धु, शिवराम, गनपत और विट्ठल क्रिकेट के स्टार माने जाने लगे। उल्लेखनीय है कि पलवनकर बन्धु उस जाति से सम्बन्धित थे जिसे उस जमाने में अछूत समझा जाता था, किन्तु क्रिकेट के खेल में उन्हें बराबरी का दर्जा प्रदान किया गया।

सन् 1929 में ‘बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल फॉर क्रिकेट इन इण्डिया’ (Board of Control for Cricket in India) की स्थापना हुई जिसके तत्वावधान में पहली बार टेस्ट मैच का आयोजन हुआ। सन् 1935 में रनजी ट्रॉफी (Ranji Trophy) का आरम्भ हुआ जो कि आज तक जारी है।

भारतीय क्रिकेट टीम सन् 1983 में पहली बार विश्व चैम्पियन बनी, सन् 2003 में पुनः वर्ल्ड कप के फायनल मैच में पहुँची किन्तु भाग्य ने साथ नहीं दिया और फायनल मैच गई किन्तु आज सन् 2011 में उसे पुनः विश्व चैम्पियन बनने का अवसर प्राप्त हुआ।

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Interesting facts about Indian constitution in Hindi

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संविधान से सम्बन्धित रोचक बातें (Indian Constitution Interesting Facts in Hindi)

भारतीय संविधान (Indian constitution) के विषय में आपका सामान्य ज्ञान (General Knowledge) अवश्य ही बहुत ही अच्छा होगा क्योंकि इस विषय में अनेक प्रश्न पूछे जाते हैं। किन्तु यहाँ पर प्रस्तुत है भारतीय संविधान से सम्बन्धित रोचक बातें (Indian Constitution Facts in Hindi), जिनके बारे में शायद आप न जानते हों।

  • संविधान के एक भाग में कुछ ऐतिहासिक चित्रों तथा उनके बारे में विवरणों को दर्ज किया गया है। इन विवरणों को रामपुर के प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने में लिखा था। इस कार्य में उन्हें पाँच माह का समय लगा था। उन्होंने विवरणों को लिखने में 254 पेन होल्डर और 303 निब खर्च किये।
  • श्री राजजादा द्वारा हस्तलिखित पृष्ठों को, अपने सुन्दर हस्तलेख के लिए प्रसिद्ध, शान्तिनिकेतन के कलाकार नंदलाल बोस ने संविधान में सजाने का कार्य चार वर्ष में पूर्ण किया था। ऐतिहासिक घटनाओं से परिपूर्ण 221 पृष्ठों को सुन्दर हस्तलेख में सजाने के एवज में श्री नंदलाल बोस को 21000 रुपए का पारिश्रमिक प्रदान किया गया था।
  • संविधान के इन पृष्ठों में मोहनजोदड़ो और वैदिक काल से लेकर भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन तक की घटनाओं के दृष्यों को दर्शाते हैं। इन दृश्यों को सोने के फ्रेम में मढ़ा गया है। ये समस्त पृष्ठ आज भी संविधान की मूल प्रति के साथ संसद भवन में एक स्टील बॉक्स में सुरक्षित है।
  • 25 भागों, 448 लेखों और 12 अनुसूचियों वाला भारत का संविधान विश्व में सभी संप्रभु देशों के लिखित संविधान में सबसे लंबा संविधान है।
  • संविधान सभा, जिनकी पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई थी, संविधान के फाइनल ड्राफ्ट बनाने में 2 साल 11 माह और 18 दिन समय लगा था।
  • फाइनल ड्राफ्ट को अन्तिम रूप देने के लिए जब बहस और चर्चा के लिए रखा गया था, तो इसे अंतिम रूप देने से पहले 2000 से ज्यादा संशोधन किए गए थे।
  • यद्यपि भारत का संविधान 26 नवंबर 1949 तैयार हो गया था किन्तु उसे दो महीने के बाद 26 जनवरी 1950 को ही कानूनी तौर पर लागू किया गया था।
  • हस्तलिखित संविधान पर 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के 284 सदस्यों, जिनमें 15 महिला सदस्य भी शामिल थीं, द्वारा हस्ताक्षर किए गए। उसके दो दिन बाद 26 जनवरी को संविधान को लागू किया गया।
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Mathematics in ancient India – General Knowledge in Hindi

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हिन्दी में सामान्य ज्ञान (General Knowledge in Hindi) के अन्तर्गत् प्रस्तुत है मेरा लेख – प्राचीन भारत में गणित (Mathematics in ancient India)

प्राचीन आचार्यों ने धार्मिक अनुष्ठानों को के आयोजन के लिए विशिष्ट तिथियाँ नियत किया था जिनकी गणना के लिए ज्योतिष अर्थात् खगोल शास्त्र (Astronomy) का सम्पूर्ण ज्ञान आवश्यक था और खगोलीय गणनाएँ गणित के ज्ञान के बिना असम्भव थीं। इसी प्रकार से विभिन्न यज्ञों के लिए वेदियों का त्रिभुज, चतुर्भुज, षट्भुज, अष्टभुज, वृताकार आदि विभिन्न आकार में बनाने का विधान था जिसके लिए अंकगणित (arithmetic), बीजगणित (algebra), ज्यामिति (geometry),  त्रिकोणमिति (trignometry) आदि का ज्ञान होना अत्यावश्यक था। यही कारण है कि भारत में गणित का प्रचलन वैदिक काल से ही चला आ रहा है। वेदों के उपग्रन्थ शुल्बसूत्र में गणित के अनेक सूत्र पाए जाते हैं। प्राचीन भारत में अंकगणित (arithmetic), बीजगणित (algebra), ज्यामिति (geometry),  त्रिकोणमिति (trignometry) आदि गणित के अनेक विभागों में बहुत अधिक विकास हुआ था। आज जिसे स्कूलों में “पाइथागोरस साध्य” (Pythagoras’ Theorem) के नाम से पढ़ाया जाता है उसके विषय में पाइथागोरस से हजारों साल पूर्व हमारे देश के आचार्यों को जानकारी थी और उसके प्रयोग का विवरण बोधायन के शुल्बसूत्र में मिलता है।

सिंधु घाटी की सभ्यता (ई.पू. 2500 ई.पू. 1700 तक) के अवशेष भी भारत में गणित के ज्ञान होने को ही इंगित करते हैं। खुदाई में मिले मकानों का निर्माण पूर्णतः गणितीय विधियों के आधार पर ही हुआ था। हड़प्पा के निवासियों ने नापतौल (weights and measures) की एक विशिष्ट पद्धति का विकास कर लिया था और अंकों के दशमलव पद्धति से पूर्णतः परिचित थे। लंबाई को नापने के लिए उन्होंने विभिन्न प्रकार की इकाइयों की खोज कर ली थीं। उस जमाने का एक इंडस इंच आज के1.32 इंच (3.35 से.मी.) के बराबर हुआ करता था और उसका दसगुना अर्थात् 13.2 इंच के बराबर उनका एक फुट होता था। खुदाई में मिले एक कांसे की पट्टी (bronze rod) पर 0.367 इंच की दूरियों पर निशान बने मिले हैं जिससे यह जानकारी मिलती है कि 36.7 इंच की सौ इकाइयों वाली लंबाई नापने की उनके पास एक और पद्धति थी। उस स्केल पर बने निशानों की बराबर दूरी की विशुद्धता ने आज के विद्वानों को आश्चर्य में डाल रखा है।

प्राचीन वैदिक धर्म के क्षय होने के बाद से ईसा पश्चात् 500 तक का समय भारतीय गणित का अन्धकारमय समय माना जाता है। इस अन्धकारपूर्ण समय के व्यतीत हो जाने के आर्यभट्ट प्रथम ने भारत के प्राचीन गणित को पुनः एक नई दिशा देने का कार्य किया। आर्यभट्ट ने खगोल विद्या के एक नये युग का आरम्भ करते हुए सूर्य तथा चन्द्र ग्रहणों को समझने के लिए नए सिद्धान्त दिए तथा खगोलीय गणना को त्रिकोणमिति द्वारा करने कि विधि का विकास किया। आर्यभट्ट ने ही कुसुमपुर में गणित के केन्द्र की स्थापना की जहाँ पर गणित तथा खगोल शास्त्र के विभिन्न विषयों पर शोधकार्य हुआ करता था। उस काल में भारत में उज्जैन भी गणित का एक बहुत बड़ा केन्द्र था। वाराहमिहिर जैसे गणित के प्रकाण्ड पण्डित उज्जैन केन्द्र से ही सम्बन्धित थे। ईसा पश्चात् सातवीं शताब्दी में ब्रह्मगुप्त उज्जैन केन्द्र के एक और आधारस्तम्भ बने जिन्होनें अंकप्रणाली में बहुत से महत्वपूर्ण विकास के कार्य किया।

आर्यभट्ट प्रथम के समय से लगभग ईसा पश्चात् 150 तक के समय में  विभिन्न गणितज्ञों ने संख्या के सिद्धान्त (theory of numbers), अंकगणित कार्यप्रणाली  (arithmetical operations) ज्यामिति  (geometry), भिन्न कार्यप्रणाली (operations with fractions), सामान्य समीकरण (simple equations), क्यूबिक समीकरण (cubic equations), क्वार्टिक समीकरण (quartic equations), क्रमचय और संचय (permutations and combinations) जैसे गणित के विभिन्न विषयों में उल्लेखनीय कार्य किया। इसी दौरान भारतीय गणितज्ञों ने अनन्त के सिद्धान्त (theory of the infinite), जिसमें विभिन्न श्रेणी सापेक्षिक स्तर के अनन्त (different levels of infinity) शामिल थे, का आश्चर्यजनक रूप से विकास कर लिया, यहाँ तक कि 2 के आधार वाला लघुगुणक logarithms to base 2 तक को भी समझ लिया।

प्राचीन भारतीय ग्रंथों का शोधपूर्ण अध्ययन से प्राचीन भारतीय गणित तथा विज्ञान के विषय में और भी बहुत सारी महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की भरपूर सम्भावनाएँ हैं किन्तु ये समस्त ग्रंथ संस्कृत भाषा में है और हमारे साथ विडम्बना यह है कि भारतीय होने के बावजूद भी हम संस्कृत नहीं जानते। हमारे प्राचीन विद्वानों द्वारा खोजे तथा अन्वेषित किए गए खोजों तथा आविष्कारों को उनसे कई हजारों साल बाद पुनः खोज और अन्वेषित करके पाश्चात्य विद्वानों ने उन खोजों और आविष्कारों का श्रेय प्राप्त कर लिया है और हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि, जिन्होंने विश्व को अनेक महत्व वैज्ञानिक देन दिया है, उन श्रेय से वंचित रह गए हैं। भारत ने विश्व को क्या-क्या महत्वपूर्ण देन दिए हैं इस बात की जानकारी भी हम भारतीयों को विदेशी विद्वानों से ही मिलती है क्योंकि हम स्वयं को किसी प्रकार का अनुसन्धान करने में असफल पाते हैं। मैक्समूलर और कनिंघम जैसे अने पाश्चात्य विद्वान अपने शोधकार्यों के लिए अत्यन्त रुचि और लगन के साथ संस्कृत सीख सकते हैं किन्तु हम भारतीय नहीं।

विश्व के प्रायः समस्त विद्वान इस बात से सहमत हैं कि बौधायन, मानव, आपस्तम्ब, कात्यायन, पाणिनि, आर्यभट, वराहमिहिर, भास्कर १, ब्रह्मगुप्त, पृथूदक, हलायुध, आर्यभट २ आदि भारत प्राचीन विद्वानों के महत्वपूर्ण देन को संसार कभी भी नहीं भुला सकता।

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Post & Telegraph – General Knowledge in Hindi

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हिन्दी में सामान्य ज्ञान (General Knowledge in Hindi) के तहत प्रस्तुत है भारतीय डाक तार (Post and Telegraph) से सम्बन्धित प्रश्नावली।

भारत में सार्वजनिक डाक सेवा का आरम्भ कब हुआ?

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सन् 1837 में

भारत का पहला डाक टिकट किस गवर्नर जनरल के शासन काल में जारी किया गया?

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लॉर्ड डलहौजी के शासन काल में

भारत में मनीऑर्डर सेवा कब शुरू हुई?

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14 जनवरी, 1995

स्पीड पोस्ट सेवा कब आरम्भ किया गया?

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1 अप्रैल 1986 को

पिन कोड प्रणाली की शुरुवात कब हुई?

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सन् 1972 में

पिन कोड कितने अंकों का होता है?

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6 अंकों का

पिन कोड प्रणाली के अन्तर्गत भारत को मण्डलों में विभाजित किया गया है?

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आठ मण्डलों में

पिन कोड के छ: अंक किनके संकेत हैं?

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पहला अंक मण्डल, दूसरा और तीसरा अंक उप-मण्डल, चौथा अंक सर्विस रूट, पाँचवा और छठा अंक डिलीवरी ऑफिस

डाक विभाग ‘इंदिरा विकास पत्र’ जारी करती है। यह योजना कब आरम्भ हुई?

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नवम्बर 1986 में

किसान विकास पत्र योजना कब शुरू की गई?

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अप्रैल 1988 में

स्थानीय पत्रों के लिए डाक सेवा को क्या कहा जाता है?

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ग्रीन चैनल

डाकघरों की संख्या के आधार पर भारत का विश्व के देशों में कौन सा स्थान है?

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पहला

भारत में S.T.D. सेवा की शुरुआत कब हुई?.

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सन् 1960 में

भारत की पहली S.T.D. सेवा किन दो नगरों के बीच आरम्भ हुई?

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लखनऊ और कानपुर के बीच

भारत में कितने डाकघर हैं?

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लगभग 1.5 लाख

भारत के कुल डाकघरों का कितना % ग्रामीण क्षेत्रों में हैं?

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89%

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Passes in India – General Knowledge in Hindi

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हिन्दी में सामान्य ज्ञान (General Knowledge in Hindi) के तहत पेश है भारत के दर्रों (Passes in India) से सम्बन्धित जानकारी।

पर्वत श्रृंखलाओं में प्राकृतिक रूप से बने गलियारे दर्रे कहलाते हैं जो कि दो पर्वतीय स्थानों को जोड़ने के लिए मार्ग का काम करते हैं। दर्रे प्रायः पर्वतीय नदियों के उद्गम स्थल के पास पाये जाते हैं। दर्रों के माध्यम से अनेक सड़कों का निर्माण किया गया है; और अब तो सड़कें ही नहीं बल्कि रेल मार्गों का निर्माण भी दर्रों के माध्यम से किया जा रहा है। यही कारण है कि व्यापार, प्रवास, युद्ध आदि के सन्दर्भ में दर्रों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

दर्रों को अंग्रेजी में pass के अलावा gap, saddle, या col भी कहा जाता है।

कुछ महत्वपूर्ण दर्रे (Some Important Passes)

नाथूला दर्रा – महान हिमालय के अन्तर्गत आने वाला नाथूला दर्रा सिक्किम राज्य को चीन स्थित तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र को जोड़ता है। भारत और चीन के मध्य व्यापार इसी मार्ग के माध्यम से होता है। भारत-चीन युद्ध के दौरान इस दर्रे का महत्व काफ़ी बढ़ गया था।

खैबर दर्रा – खैबर दर्रा पाकिस्तान और अफगानिस्तान को जोड़ता है। यह दर्रा प्राचीन रेशम मार्ग का महत्वपूर्ण अंग था। अति प्राचीन काल से ही खैबर दर्रा दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के बीच एक व्यावसायिक मार्ग के रूप में कार्य करता रहा है। खैबर दर्रा सशस्त्र बलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्थल है।

काराकोरम दर्रा – काराकोरम दर्रा प्रागैतिहासिक काल से ही अत्यन्त महत्वपूर्ण दर्रा रहा है। प्राचीन काल में लद्दाख़ के लेह नगर और तारिम द्रोणी के यारकन्द क्षेत्र के बीच के व्यापार हेतु यही दर्रा मार्ग था।

जोजिला दर्रा – जोजिला दर्रा जम्मू से श्रीनगर को जोड़ता है।

भारत के दर्रे (Mountain Passes in India)

दर्रा राज्य ऊँचाई (फुट में) किन स्थानों को जोड़ता है
असीरगढ़ मध्य प्रदेश
Auden’s Col उत्तराखंड 17,552
बनिहाल दर्रा जम्मू और कश्मीर 9,291 जम्मू और कश्मीर
बड़ालाचा दर्रा हिमाचल प्रदेश 16,400
बोमडिला दर्रा अरुणाचल प्रदेश
चांगला दर्रा जम्मू और कश्मीर 17,585 लेह और चांगथांग
चंशल दर्राChanshal Pass हिमाचल प्रदेश 14,830
Dehra Compass जम्मू और कश्मीर
Debsa Pass हिमाचल प्रदेश 17,520
दिफू या डिफू दर्राDiphu Pass अरुणाचल प्रदेश 4,587
डोंगखाला दर्रा सिक्किम 12,000
धूमधार कांडी दर्रा उत्ताखंड
Fotu La जम्मू व कश्मीर 13,451
गोयेचा ला सिक्किम 16,207
हल्दीघाटी दर्रा राजस्थान
इंद्रहार दर्राIndrahar Pass हिमाचल प्रदेश 14,473
जेलेप ला सिक्किम 14,300
खारदुंग ला जम्मू व कश्मीर 17,582 लेह और नुब्रा
कोंगका दर्रा जम्मू व कश्मीर 16,965 लद्दाख और अक्साई चीन
लानाक दर्राLanak Pass जम्मू व कश्मीर 17,933 लद्दाख और तिब्बत
कुंजुम दर्राKunzum Pass हिमाचल प्रदेश 14,931 लाहौल और स्पीति
काराकोरम दर्रा जम्मू व कश्मीर लद्दाख और झिंजियांग
लिपुलेख दर्राLipulekh Pass उत्ताखंड 17,500
लुंगालाचा ला जम्मू व कश्मीर 16,600
लमखागा दर्रा हिमाचल प्रदेश 17,336
मारसिमिक लाMarsimik La जम्मू व कश्मीर 18,314
मयाली दर्रा उत्तराखंड 16,371
नामा दर्रा उत्तराखंड 18,399
Namika La जम्मू व कश्मीर 12,139
नाथूला दर्रा सिक्किम 14,140 सिक्किम और तिब्बत
पालघाट दर्रा केरल 750 केरल और तमिलनाडु
Thamarassery Pass केरल 1,700 मलाबार और मैसूर
Shenkottai pass केरल 690 ट्रैवनकोर और तमिलनाडु
पेंसी ला जम्मू व कश्मीर
रेजांग ला जम्मू व कश्मीर
रोहतांग दर्रा हिमाचल प्रदेश 13,051 मनाली और लाहौल
सासेर ला जम्मू व कश्मीर 17,753 नुब्रा और सियाचिन
सेला दर्रा अरुणाचल प्रदेश 14,000
शिपकी ला हिमाचल प्रदेश
सिआ लाSia La जम्मू व कश्मीर 18,337
शिंगो लाShingo La जम्मू व कश्मीर
स्पांगुर दर्रा जम्मू व कश्मीर
ग्योंग ला जम्मू व कश्मीर 18,655
बिलाफोंड ला जम्मू व कश्मीर 17,881
Sin La उत्तराखंड
Tanglang La जम्मू व कश्मीर 17,583
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Major Volcanos in the world – General Knowledge in Hindi

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हिन्दी में सामान्य ज्ञान (General Knowledge in Hindi) के तहत प्रस्तुत है ज्वालामुखियों (volcanoes) से सम्बन्धित जानकारी।

शंक्वाकार ऐसी पहाड़ी जिसकी सतह भीतर से फनल के जैसे खोखली होती है और जो पृथ्वी के भीतर के गर्म पदार्थों के ऊपर उठने के कारण बनी होती है, ज्वालामुखी (Volcano) कहलाता है। ज्वालामुखी (Volcano) की खोखली सतह पृथ्वी के भीतर तक गयी हुई होती हैं और उसमें से गर्म गैसें, लावा, भाप आदि निकलती हैं।

ज्वालामुखी (Volcano) से लावा, धुआँ, राख, कंकड़-पत्थर आदि का निकलना एक आकस्मिक घटना है।

ज्वालामुखी तीन प्रकार के होते हैं – सक्रिय ज्वालामुखी (Active Volcanoes), प्रसुप्त ज्वालामुखी (Dorment Volcanoes) और शान्त ज्वालामुखी (Extinct Volcanoes)।

सक्रिय ज्वालामुखी (Active Volcanoes) – जैसा कि नाम से ही विदित है, सक्रिय ज्वालामुखी में अक्सर विस्फोट और उद्भेदन होता ही रहता है तथा समय-समय पर लावा, धुआँ इत्यादि निकलते ही रहते हैं।

सुसुप्त ज्वालामुखी (Dorment Volcanoes) – जिन ज्वालामुखियों में लम्बे समय तक विस्फोट न हुआ हो किन्तु विस्फोट होने की सम्भावना बनी हो, वे प्रसुप्त ज्वालामुखी (Dorment Volcanoes) कहलाती हैं।

शान्त या मृत ज्वालामुखी (Extinct Volcanoes) – जिन ज्वालामुखियों विस्फोट होना बन्द हो चुका हो और न ही विस्फोट होने की कोई सम्भावना हो, वे शान्त ज्वालामुखी (Dorment Volcanoes) कहलाती हैं।

विश्व के प्रमुख ज्वालामुखी (Major Volcanos in the world)

नाम पर्वतमाला ऊँचाई (मीटर में) देश
ओजस डेल सालाडो एण्डीज 6885 अर्जेंटीना
ग्वालाटिरी एण्डीज 6060 चिली
कोटोपेक्सी एण्डीज 5897 इक्वेडोर
लेस्कर एण्डीज 5641 चिली
ट्यूपुनोटीटो एण्डीज 5640 चिली
पोपोकैटेपिटल आल्टाप्लेनो डि मेक्सिको 5451 मेक्सिको
नेवोडो डेल रुईज एण्डीज 5400 कोलम्बिया
सैंगे एण्डीज 5230 इक्वेडोर
क्ल्यूचेव्सकाया कामचटका प्रायद्वीप 4850 रूस
प्यूरेस एण्डीज 4590 कोलम्बिया
टाजुमुल्को एण्डीज 4220 ग्वाटेमाला
मौनालोआ हवाई 4170 सं.रा. अमेरिका
टकाना सारा मेड्रे 4078 ग्वाटेमाला
माउण्ट कैमरून मोनार्क 4070 कैमरून
माउण्ट इरेबस रोस I 3795 अंटार्टिका
रिन्दजानी लोम्बोक 3726 इण्डोनेशिया
पिको देल तेइदे टेनेराइफ 3718 स्पेन
सेमेरू जावा 3676 इण्डोनेशिया
नीरागोंगा याईरूंगा 3470 जायरे
कोरयाक्सकाया कामचटका प्रायद्वीप 3456 रूस
इराजू कॉर्डिलेरा 3452 कोस्टारिका
स्लामाट जावा 3428 इण्डोनेशिया
माउण्ट स्पर अलास्का 3374 सं.रा. अमेरिका
माउण्ट एटना सिसली 3308 इटली
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Component of Hindi Poetry – Chhand

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काव्य (Hindi Poetry) का दूसरा अंग है – छन्द (Chhand)

यहाँ पर हम जानकारी दे रहे हैं छन्द (Chhand) के विषय में।

वर्ण, मात्रा, गति, यति, लय और चरणान्त सम्बन्धी नियमों से युक्त रचना को छन्द (Chhand) कहते हैं।

वर्ण – वर्ण (अक्षर) दो प्रकार के होते हैं – दीर्घ अथवा गुरु और ह्रस्व अथवा लघु। गुरु को “ऽ” तथा लघु को “।” चिह्नों से प्रदर्शित किया जाता है।

मात्रा – अ, इ, उ, ऋ की मात्रा को एक और आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं तथा अः की मात्रा को दो मात्रा मानी जाती है। जैसे “राम” में प्रथम वर्ण “रा” गुरु अर्थात दो मात्रा वाली है और द्वितीय वर्ण “म” लघु अर्थात एक मात्रा वाली है अतः “राम” शब्द में कुल तीन मात्राएँ हुईं। संयुक्ताक्षर में प्रथम वर्ण की दो मात्राएँ मानी जाती हैं जैसे “मुक्त” में प्रथम अक्षर के लघु होते हुए भी उसे गुरु माना जावेगा।

लय – चरणों का के अन्तिम व्यञ्जन और मात्रा की समानता को लय या तुक कहा जाता है जैसे – “मांगी नाव न केवट आना। कहहिं तुम्हार मरमु मैं जाना॥” में “आना” और “जाना”।

गति – छन्दों की मात्राओं अथवा वर्णों में जो प्रवाह होता है उसे गति कहते हैं।

यति – छंदों को गाते समय बीच में जो हल्का सा रुकाव होता है उसे यति कहा जाता है।

गण – तीन मात्राओं के समूह को गण कहा जाता है। गण आठ प्रकार के होते हैं –

गण का नाम लक्षण चिह्न उदाहरण
यगण प्रथम वर्ण लघु, शेष गुरु ।ऽऽ दिखावा
मगण तीनों वर्ण गरु ऽऽऽ पाषाणी
तगण प्रथम दो गुरु अंतिम लघु ऽऽ। तालाब
रगण प्रथम और अन्तिम गुरु बीच का लघु ऽ।ऽ साधना
जगण प्रथम और अन्तिम लघु बीच का गुरु ।ऽ। पहाड़
भगण प्रथम गुरु शेष लघु ऽ।। भारत
नगण तीनों वर्ण लघु ।।। सरल
सगण प्रथम दो लघु अन्तिम गुरु ।।ऽ महिमा

गणो के नामों और लक्षणों को याद रखने के लिए सूत्र है – यमाताराजभानसलगा

छन्दों के भेद (Hindi Poetry – Kinds of Chhand)

मात्रा और वर्ण के आधार पर छन्द दो प्रकार के होते हैं – मात्रिक छंद और वर्णिक छन्द

मात्रिक छंद – मात्राओं की संख्या को ध्यान में रखकर रचे गये छंद मात्रिक छन्द कहलाते हैं।

वर्णिक छंद – वर्णों की संख्या को ध्यान में रखकर रचे गये छंद वर्णिक छन्द कहलाते हैं।

उपरोक्त दोनों ही प्रकार के छंद तीन प्रकार के होते हैं – सम, अर्द्ध सम और विषम

सम – जिन छन्दों के चारों चरणों की मात्राएँ या वर्ण एक से होते हैं वे सम कहलाते हैं जैसे चौपाई, इन्द्रबज्रा आदि।

अर्द्ध सम – जिन छन्दों में पहले और तीसरे तथा दूसरे और चौथे चरणों में मात्राएँ या वर्ण समान होते हैं वे अर्द्ध सम कहलाते हैं जैसे दोहा, सोरठा आदि।

विषम – जिन छन्दों में चार से अधिक चरण हों और वे एक समान न हों वे विषम छन्द कहलाते हैं जैसे कुण्डलिया, छप्पय आदि।

चौपाई  (Hindi Poetry – Choupai)

चौपाई एक मात्रिक छन्द है। यह एक सम छन्द है तथा इसके प्रत्येक चरण में सोलह मात्राएँ होती हैं।

उदाहरण –

सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥
गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥

दोहा (Hindi Poetry – Doha)

दोहा (Doha) एक मात्रिक छन्द है। यह एक अर्द्ध सम छन्द है तथा इसके पहले तथा तीसरे चरणों में तेरह-तेरह मात्राएँ एवं दूसरे तथा चौथे चरणों में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती हैं। पहले तथा तीसरे चरणों के अन्त में यति एवं दूसरे तथा चौथे चरणों के अन्त में गुरु लघु होना अनिवार्य होता है।

उदाहरण –

रहिमन निज मन की व्यथा, मन में राखो गोय।
सुन इठलैहैं लोग सब, बाँट न लैहैं कोय॥

सोरठा (Hindi Poetry – Sortha)

सोरठा (Sortha) एक मात्रिक छन्द है। यह एक अर्द्ध सम छन्द है। यह दोहे से ठीक उल्टा होता है क्योंकि इसके पहले तथा तीसरे चरणों में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ एवं दूसरे तथा चौथे चरणों में तेरह-तेरह मात्राएँ होती हैं। पहले तथा तीसरे चरणों के अन्त में तुकान्त तथा गुरु लघु होना अनिवार्य होता है।

उदाहरण –

सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेटे अटपटे।
विहँसे करुनाऐन, चितै जानकी लखन तन॥

रोला (Hindi Poetry – Rola)

रोला (Rola) चौबीस मात्राओं वाला छन्द है। ग्यारह और तेरह मात्राओं पर यति होती है।

उदाहरण –

शशि बिन सूनी रैन, ज्ञान बिन हिरदय सूनो।
घर सूनो बिन पुत्र, पत्र बिन तरुवर सूनो।
गज सूनो इक दन्त, और वन पुहुप विहूनो।
द्विज सूनो बिन वेद, ललित बिन सायर सूनो॥

कुण्डलिया (Hindi Poetry – Kundalia)

कुण्डलिया (Kundalia) छः चरणों का छन्द होता है जो एक दोहा और दो रोला को मिलाकर बनता है। दोहे का चौथा चरण पहले रोले का पहला चरण होता है। जिस शब्द से कुण्डलिया (Kundalia) शुरू होता है, उसी शब्द से ही समाप्त भी होता है।

उदाहरण –

गुनके गाहक सहस नर बिन गुन लहै न कोय।
जैसे कागा-कोकिला शब्द सुनै सब कोय।
शब्द सुनै सब कोय कोकिला सबै सुहावन।
दोऊ को इक रंग काग सब गनै अपावन॥
कह गिरधर कविराय सुनो हो ठाकुर मन के।
बिन गुन लहै न कोय सहस नर गाहक गुनके॥

हरिगीतिका (Hindi Poetry – Harigeetika)

हरिगीतिका (Harigeetika) अट्ठाइस मात्राओं का छन्द होता है। सोलह और बारह मात्राओं पर यति होती है तथा अन्त में लघु गुरु होता है।

उदाहरण –

इस भाँति जब शोकार्त जननी को विलोका राम ने।
कहते हुए यों वर वचन दी सान्त्वना भगवान ने।
जो सुवन निज माता पिता की उचित सेवा कर सका।
निज त्याग श्रद्धा भाव से मानस न जिसका भर सका॥

बरवै (Hindi Poetry – Barwai)

बरवै (Barwai) के प्रथम और तृतीय चरण में बारह-बारह मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में सात-सात मात्राएँ होती हैं।

उदाहरण –

चम्पक हरवा अंग मिलि, अधिक सुहाय।
जानि परै सिय हियरे, जब कुम्हलाय॥

गीतिका (Hindi Poetry – Geetika)

गीतिका (Geetika) छब्बीस मात्राओं का मात्रिक छन्द होता है। चौदह और बारह मात्राओं पर यति तथा अन्त में लघु गुरु होता है।

उदाहरण –

धर्म के मग में अधर्मी से कभी डरना नहीं।
चेतकर चलना कुमारग में कदम धरना नहीं।
शुद्ध भावों में भयानक भावना भरना नहीं।
ज्ञानवर्धक लेख लिखने में कमी करना नहीं॥

तोमर (Hindi Poetry – Tomr)

तोमर (Tomr) छन्द प्रत्येक चरण में बारह मात्राएँ होती हैं तथा अन्त में गुरु लघु होता है।

उदाहरण –

तब चले बान कराल। फुँकरत जनु बहु ब्याल॥
कोपेउ समर श्रीराम। चले विशिख निसित निकाम॥

रूपमाला (Rupmala)

रूपमाला (Rupmala) चौबीस मात्राओं का छन्द होता है, चौदह और दस पर यति होती है तथा अन्त में गुरु लघु होता है।

उदाहरण –

भूल जाते हैं जिसे हम, स्वप्न सा हर बार।
है वही बनता हमारे, स्वर्ग का आधार॥
यदि न होता कामना का, कोष अपने पास।
शून्य ही होता हृदय यों, है यथा आकाश॥

उल्लाला (Hindi Poetry – Ullala)

उल्लाला (Ullala) अट्ठाइस मात्राओं का छन्द होता है, पन्द्रह और तेरह पर यति होती है।

उदाहरण –

हे शरण दायिनी देवि तू, करती सबका त्राण है।
हे मातृभूमि सन्तान हम, तू जननी तू प्राण है॥

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Did Aryas come in India from outside? – History General Knowledge in Hindi

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इतिहास सामान्य ज्ञान (History General Knowledge in Hindi) के तहत पेश है आर्यों (Arya) के भारत में आने के विषय में कुछ प्रश्न।

क्या आर्य बाहर से भारत में आये थे? (Did Aryas come in India from outside?)

पश्चिमी विद्वानों का मत है कि आर्यों का एक समुदाय भारत मे लगभग 2000 इस्वी ईसा पूर्व आया। इन विद्वानों की कहानी यह है कि आर्य इण्डो-यूरोपियन बोली बोलने वाले, घुड़सवारी करने वाले तथा यूरेशिया के सूखे घास के मैदान में रहने वाले खानाबदोश थे जिन्होंने ई.पू. 1700 में भारत की सिन्धु घाटी की नगरीय सभ्यता पर आक्रमण कर के उसका विनाश कर डाला और इन्हीं आर्य के वंशजों ने उनके आक्रमण से लगभग 1200 वर्ष बाद आर्य या वैदिक सभ्यता की नींव रखी और वेदों की रचना की।

अब प्रश्न यह उठता है कि –

इस बात के सैकड़ों पुरातात्विक प्रमाण हैं कि सिन्धु घाटी के के लोग बहुत अधिक सभ्य और समृद्ध थे तो फिर इन तथाकथित घुड़सवार खानाबदोश आर्य जाति के विषय में कहीं कोई भी प्रमाण क्यों नहीं मिलता?

आखिर सिन्धु घाटी के लोग इनसे हारे कैसे?

यदि यह मान भी लिया जाए कि वे घुड़सवार खानाबदोश अधिक शक्तिशाली और बर्बर थे इसीलिए वे जीत गए तो सवाल यह पैदा होता है कि इस असभ्य जाति के लोग आखिर इतने सभ्य कैसे हो गए कि वेद जैसे ग्रंथों की रचना कर डाली?

यह स्वभाव से घुमक्कड़ जाति 1200 वर्षों तक कहाँ रही और क्या करती रही?

दूसरी ओर यह भी तथ्य है कि आर्यो के भारत मे आने का कोई प्रमाण न तो पुरातत्त्व उत्खननो से मिला है और न ही डी एन ए अनुसन्धानो से। मजे की बात यह भी है कि उन्हीं आर्यों द्वारा रचित वेद आदि ग्रंथों में भी आर्यों के द्वाराहड़प्पा सभ्यता या पर आक्रमण करने का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता। आर्य शब्द तो स्वयं ही कुलीनता और श्रेष्ठता का सूचक है फिर यह शब्द असभ्य, घुड़सवार, घुमन्तू खानाबदोश जाति के लिए कैसे प्रयुक्त हो सकता है?

वास्तविकता यह है कि उन्नीसवीं शताब्दी में एब्बे डुबोइस (Abbé Dubois) नामक एक फ्रांसीसी पुरातत्ववेत्ता भारत आया। वह कितना ज्ञानी था इस बात का अनुमान तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने प्राचीन भारतीय साहित्य में प्रलय के विषय में पढ़कर प्रलय को नूह और उसकी नाव के साथ जोड़ने का प्रयास किया था जो कि एकदम मूर्खतापूर्ण असंगत बात थी। एब्बे की पाण्डुलिपि आज के सन्दर्भ में पूरी तरह से अमान्य हो चुकी है। इन्हीं एब्बे महोदय ने भारतीय साहित्य का अत्यन्त ही त्रुटिपूर्ण तथा कपोलकल्पित वर्णन, आकलन और अनुवाद किया जिस पर जर्मन पुरातत्ववेत्ता मैक्समूलर ने, जो कि तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के नाक के बाल बने हुए थे, अपनी भूमिका लिखकर सच्चाई का ठप्पा लगा दिया। मैक्समूलर के द्वारा सच्चाई का ठप्पा लग जाने ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने आर्यों के द्वारा सिन्धुघाटी सभ्यता पर आक्रमण की कपोलकल्पित कहानी को इतिहास बना दिया।

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