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स्वप्नवासवदत्ता की कथा (Story of Swapna Vasavadatta)

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प्रसिद्ध नाटक स्वप्नवासवदत्ता (Swapna Vasavadatta) के रचयिता महाकवि भास (Bhas) हैं। यहाँ पर हम आपके ज्ञानवर्धन हेतु पेश कर रहे हैं इस नाटक की कथा।

पुरुवंशीय राजा उदयन, स्वप्नवासवदत्ता (Swapna Vasavadatta) के नायक हैं। वे वत्स राज्य राज्य के राजा थे। उनकी राजधानी कौशाम्बी थी। आपको बता दें कि राजा उदयन के काल में राजगृह मगध राज्य की राजधानी थी और वहाँ का राजा अजातशत्रु का पुत्र दर्शक था। उज्जयिनी अवन्ति राज्य की राजधानी थी और राजा प्रद्योत उज्जयिनी के अधिपति थे। महाराज प्रद्योत के पास अत्यन्त विशाल सेना थी, इसी कारण से उन्हें महासेन के नाम से भी जाना जाता था।

महाराज उदयन अपने वीणा वादन के लिए प्रसिद्ध थे। उनके पास घोषवती नामक एक दिव्य वीणा थी। वे अपूर्व वीणा-वादन करते थे। एक बार प्रद्योत के मंत्री शालंकायन ने छल से उदयन को बंदी बना लिया। उदयन के वीणा-वादन की प्रसिद्धि राजा प्रद्योत ने भी सुना था। उन्होंने राजा उदयन को अपनी पुत्री वासवदत्ता को वीणा-वादन सिखाने के लिए आदेश दिया, जिसे राजा उदयन ने स्वीकार कर लिया। वीणा सीखने-सिखाने के दौरान उदयन और वासवदत्ता एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो गये।

इधर उदयन के अमात्य यौगन्धरायण उन्हें कैद से छुड़ाने की कोशिश कर रहे थे। यौगन्धरायण ने चतुराई के साथ राजा उदयन को उज्जयिनी के कैदखाने से छुड़ा लिया। राजा उदयन के साथ ही वासवदत्ता भी कौशाम्बी आ गईं। राजा उदयन ने वासवदत्ता से विवाह कर लिया।

उदयन वासवदत्ता के प्रेम में इतने खोये रहने लगे कि उन्हें राज-कार्य की सुधि ही नहीं रही। इस स्थिति का लाभ उठा कर आरुणि नामक उनके क्रूर शत्रु ने उनके राज्य को उनसे छीन लिया।

आरुणि से उदयन के राज्य को वापस लेने के लिये उनके मन्त्री यौगन्धरायण और रुम्णवान् प्रयत्नशील हो गये। किन्तु बिना किसी अन्य राज्य की सहायता के आरुणि को परास्त नहीं किया जा सकता था। वासवदत्ता के पिता प्रद्योत उदयन से नाराज थे और यौगन्धरायण को उनसे किसी प्रकार की उम्मीद नहीं थी।

यौगन्धरायन को ज्योतिषियों के द्वारा पता चलता है कि मगध-नरेश की बहन पद्मावती का विवाह जिन नरेश से होगा वे चक्रवर्ती सम्राट हो जायेंगे। यौगन्धरायण ने सोचा कि यदि किसी प्रकार से पद्मावती का विवाह उदयन से हो जाये तो उदयन को अवश्य ही उनका वत्स राज्य आरुणि से वापस मिल जायेगा साथ ही वे चक्रवर्ती सम्राट भी बन जायेंगे।

यौगन्धरायण भलीभाँति जानते थे कि उदयन अपनी पत्नी वासवदत्ता से असीम प्रेम करते हैं और वे अपने दूसरे विवाह के लिये कदापि राजी नहीं होंगे। अतएव उन्होंने वासवदत्ता और रुम्णवान् के साथ मिलकर एक योजना बनाई। योजना के अनुसार उदयन को राजपरिवार तथा विश्वासपात्र सहयोगियों के साथ लेकर आखेट के लिये वन में भेजा गया जहाँ वे सभी लोग शिविर में रहने लगे। एक दिन, जब उदयन मृगया के लिये गए हुए थे, शिविर में आग लगा दी गई। उदयन के वापस लौटने पर रुम्णवान ने उन्हें बताया कि वासवदत्ता शिविर में लगी आग में फँस गईं थी और उन्हें बचाने के लिये यौगन्धरायण वहाँ घुसे जहाँ पर दोनों ही जल मरे। उदयन इस समाचार से अत्यन्त दुःखी हुए किन्तु रुम्णवान तथा अन्य अमात्यों ने अनेकों प्रकार से सांत्वना देकर उन्हें सम्भाला।

इधर यौगन्धरायन वासवदत्ता को साथ लेकर परिव्राजक के वेश में मगध राजपुत्री पद्मावती के पास पहुँच गए और प्रच्छन्न वासवदत्ता (अवन्तिका) को पद्मावती के पास धरोहर के रूप में रख दिया। अवन्तिका पद्मावती की विशेष अनुग्रह पात्र बन गईं। उन्होंने महाराज उदयन का गुणगान कर कर के पद्मावती को उनके प्रति आकर्षित कर लिया।

उदयन दूसरा विवाह नहीं करना चाहते थे किन्तु रुम्णवान् ने उन्हें समझा-बुझा कर पद्मावती से विवाह के लिये राजी कर लिया। इस प्रकार उदयन का विवाह पद्मावती के साथ हो गया। विवाह के पश्चात मगध-नरेश की सहायता से उदयन ने आरुणि पर आक्रमण कर दिया और उसे परास्त कर अपना राज्य वापस ले लिया। अन्त में अत्यन्त नाटकीय ढंग से यौगन्धरायण और वासवदत्ता ने स्वयं को प्रकट कर दिया। यौगन्धरायण ने अपनी धृष्टता एवं दुस्साहस के लिये क्षमा निवेदन किया। यही इस नाटक ‘स्वप्नवासवदत्ता’ की कथावस्तु है। एक दृश्य में उदयन समुद्रगृह में विश्राम करते रहते हैं। वे स्वप्न में ‘हा वासवदत्ता’, ‘हा वासवदत्ता’ पुकारते रहते हैं उसी समय अवन्तिका (वासवदत्ता) वहाँ पहुँ जाती हैं। वे उनके लटकते हुये हाथ को बिस्तर पर रख कर निकल जाती हैं साथ ही उदयन की नींद खुल जाती है किन्तु वे निश्चय नहीं कर पाते कि उन्होंने वास्तव में वासवदत्ता को देखा है अथवा स्वप्न में। इसी घटना के के कारण नाटक का नाम ‘स्वप्नवासवदत्ता’ रखा गया।

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{*मफ्त Free} रिलायंस JIO फोन (रु.1500 डिपॉजिट) 4G VoLTE बुकिंग

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{*मफ्त} रिलायंस JIO फोन (Free Reliance JIO Phone) मात्र रु.0 में आप बुक कर सकते हैं। इसके लिए आपको मात्र रु.1500/- सिक्यूरिटी डिपॉजिट के रूप में जमा करना होगा। आनलाइन बुकिंग 24 अगस्त 2017 से शुरू होगा।

free jio phone

25 जुलाई 2017 को मुकेश अंबानी ने Free JIO Phone लांच करने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि Reliance JIO Phone बिल्कुल मुफ्त उपलब्ध होगा किन्तु इसके लिए मात्र रु.1500/- सिक्यूरिटी डिपॉजिट के रूप में जमा करना होगा। सिक्यूरिटी डिपॉजिट की यह राशि आपको तीन साल बाद वापस कर दी जायेगी।

Reliance JIO Phone योजना भारत के 50 करोड़ फीचर फोन उपयोगकर्ताओं को ध्यान में रखकर शुरू की गई है।

Free JIO Phone की यह योजना सभी भारतीयों के लिए है। श्री अंबानी ने उम्मीद जताई है कि इस योजना से देश में 2 जी फीचर फ़ोन का प्रचलन समाप्त हो जायेगा।

4G Volte Free Jio Phone के फीचर्स

अल्फान्यूमेरिक कीपैड
4-way नेवीगेशन
कॉम्पैक्ट डिजाइन
2.4* QVGA डिस्प्ले
बैटरी तथा चार्जर
माइक्रोफोन और स्पीकर
हेडफोन जैक
काल हिस्ट्री
फोन कान्टैक्त
रिंगटोन्स
टॉर्च लाइट
FM रेडियो
NFC के द्वारा डिजिटल पेमेंट सपोर्ट
SD कार्ड स्लॉट
काल्स तथा डेटा के लिए 4G VoLTE सपोर्ट

IO Free 4G Phone के टैरिफ प्लान

रु.153 प्रतिमाह
TV देखने के लिए Jio Phone TV-केबल पैक रु.309 में

उल्लेखनीय है कि भारत के लगभग आधे मोबाइल यूजर्स स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं जबकि अन्य आधे लोग फीचर फोन का। फीचर फोन उपयोगकर्ताओं को कॉल, पाठ या इंटरनेट ब्राउज़र का उपयोग करने की अनुमति तो देते हैं लेकिन इनमें ऐप की स्थापना के लिए सीमित क्षमता होती है।

Reliance JIO की यह योजना फीर फोन उपयोगकर्ताओं के लिए एक वरदान साबित होगा।

Reliance JIO के पास वैसे ही 100 मिलियन उपयोगकर्ता हैं। उम्मीद है कि इस नई योजना के शुरू होने के बाद Reliance JIO के पास और 100 मिलियन उपयोगकर्ता हो जायेंगे।

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प्रसिद्ध रोमांचक रचनाएँ (Famous Adventure Books)

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एक रोमांचक रचना (Adventure Book) मानव मन को हिलोर कर रख देती है। यही कारण है कि प्रायः लोग रोमांचक रचनाओं (Adventure Books) के दीवाने रहते हैं।

प्रस्तुत है विश्व प्रसिद्ध रोमांचक रचनाओं (Famous Adventure Books) से संबंधित जानकारी।

लुई स्टीवेंसन (Louis Stevenson) रचित ट्रेजर आइलैंड (Treasure Island)

रोमांचक उपन्यासों में यह सबसे अधिक जाना जाने वाला उपन्यास है। यह लुई स्टीवेंसन की सर्वश्रेष्ठ कृति है। समुद्री डाकुओं और गड़े सोने की खोज पर लिखी गई यह कथा प्रति पल पाठक के मन में रोमांच पैदा करता है।

जोहान डेविड विस (Johann David Wyss) रचित स्विस फैमिली राबिंसन (Swiss Family Robinson)

यह विनाशकारी जहाज़ की तबाही के परिणामस्वरूप एक रेगिस्तानी द्वीप में फँसे परिवार की कहानी है जिसे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए केवल प्राकृतिक रूप से उपलब्ध संसाधनों पर गुजारा करना पड़ता है। अत्यंत रोचक पुस्तक है।

टीपः उपरोक्त लिंक अंग्रेजी पुस्तक की है।

रुडयार्ड किपलिंग (Rudyard Kipling) रचित कैप्टन करेजियस (Captains Courageous)

यह एक धनाड्य उद्योगपति के बेटे हार्वे चीने के कारनामों की कहानी है जिसे यात्रा के दौरान पानी में फेंक दिया गया था और मछुआरों द्वारा बचा लिया गया था। अंततः उस बच्चे का संघर्ष उस एक सच्चा नाविक बना देता है।

एच. राइडर हैगर्ड (H. Rider Haggard) रचित शी (She)

कॉलेज के एक प्रोफेसर और उनके युवा शिष्य एक प्राचीन पेटी में मिले दस्तावेज के निर्देशों का पालन करते हुए अफ्रीका के जंगलों में पहुँच जाते हैं, जहाँ उनकी भेंट उस क्षेत्र में शासन करने वाली एक अमर महिला शासिका से होती है। हर पल रोमांच पैदा करने वाली कहानी है।

टीपः उपरोक्त लिंक अंग्रेजी पुस्तक की है।

एच. राइडर हैगर्ड (H. Rider Haggard) रचित अयेशाः द रिटर्न आफ शी (Ayesha: The Return of She)

यह उपरोक्त कहानी का ही दूसरा भाग हैं जिसकी पृष्ठभूमि हिमालय का एक गुप्त दुर्गम स्थल है। यह कहानी भी अत्यंत रोचक है।

टीपः उपरोक्त लिंक अंग्रेजी पुस्तक की है।

एच. राइडर हैगर्ड (H. Rider Haggard) रचित किंग सालोमंस माइंस (King Solomon’s Mines)

एलन क्वाटारेमेन को एक खोज और बचाव दल के साथ अफ़्रीका के अज्ञात क्षेत्र में जाता है और प्राचीन सभ्यता की खोज करता है। अफवाहों में प्रचलित राजा सुलैमान की खानों के स्थान की खोज के विषय में यह एक अत्यंत रोमांचक कथा है।

टीपः उपरोक्त लिंक अंग्रेजी पुस्तक की है।

आर्थर कॉनन डायल (Arthur Conan Doyle) रचित द लोस्ट वर्ल्ड (The Lost World)

आर्थर कॉनन डायल की यह कालातीत रचना है। इस क्लासिक ने अनगिनत युवावों की कल्पना को प्रेरित किया है। कथा का नायक, प्रोफेसर चैलेंजर, दक्षिण अमेरिका में एक अनदेखे पठार के दौरे पर जाता है जो डायनासोर और अन्य रहस्यमय प्राणियों से भरी हुई है।

टीपः उपरोक्त लिंक अंग्रेजी पुस्तक की है।

माइकल क्रिचटन (Michael Crichton) रचित जुरासिक पार्क (Jurassic Park)

जॉन हैमोंड का “जैविक संरक्षण” जुरासिक पार्क के रूप में जाना जाता है, जहां डायनासोर, एक बार फिर धरती पर घूमते हैं। अत्यंत रोमांचक कहानी जिस पर फिल्म भी बन चुकी है।

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चापेकर बंधुओं की वीरता और नेहरू शासन की नीचता

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लेख – सुरेश चिपलूनकर

सौजन्यः http://desicnn.com/

Chapekar Brothers

चापेकर बंधुओं (Chapekar Brothers) की वीरता और नेहरू शासन की नीचता जिन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में रूचि है, उन्होंने चाफेकर बंधुओं (Chapekar Brothers) का नाम जरूर सुना है. परन्तु चूँकि हमारी पाठ्यपुस्तकों में इन बंधुओं और इनके योगदान को उचित स्थान नहीं मिला है, इसलिए आजकल के युवाओं और बच्चों ने इनके बारे में कुछ नहीं जाना.
चाफेकर बंधुओं की ही तरह ऐसे कई दर्जनों बड़े क्रांतिकारी हुए हैं, जिन्हें इतिहास लेखन में तथा पाठ्यक्रमों में से बड़े धूर्ततापूर्ण पद्धति से गायब किया गया है. बहरहाल, लेख का विषय यह नहीं है.

इस लेख का मूल विषय यह है कि अंग्रेजों और भारतीयों के बीच सबसे बड़ा फर्क क्या है? वह है प्रशासनिक चुस्ती तथा अपने क्रांतिकारियों एवं हुतात्माओं का सम्मान. आप सोचेंगे इस बात का चाफेकर बंधुओं से क्या सम्बन्ध है? बिलकुल है… जैसे-जैसे आप पूरा लेख पढ़ेंगे तो जानेंगे, कि भारत की सरकारें और इसके “नकली इतिहासकार” कितने गिरे हुए लोग रहे होंगे. लेकिन इसके लिए सबसे पहले आपको चाफ़ेकर बंधुओं के योगदान को संक्षेप में जानना-समझना होगा. जो लोग जानते हैं, उनकी बात अलग है… परन्तु जो लोग इनके बारे में नहीं जानते हैं वे निश्चित रूप से आश्चर्यचकित हो जाएँगे.

चाफेकर बंधु यानी दामोदर हरि चाफेकर (Damodar Hari Chapekar), बालकृष्ण हरि चाफेकर (Balkrishna Hari Chapekar) तथा वासुदेव हरि चाफेकर (Vasudeo Hari Chapekar) को संयुक्त रूप से कहा जाता हैं। ये तीनों भाई बाल्यकाल से ही लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के सम्पर्क में थे। तीनों भाई तिलक जी को गुरुवत्‌ सम्मान देते थे। चाफेकर बंधु महाराष्ट्र के पुणे के पास चिंचवड़ नामक गाँव के निवासी थे। 22 जून 1897 को रैंड को मौत के घाट उतार कर भारत की आज़ादी की लड़ाई में प्रथम क्रांतिकारी धमाका करने वाले वीर दामोदर पंत चाफेकर का जन्म 24 जून 1869 को पुणे के ग्राम चिंचवड़ में प्रसिद्ध कीर्तनकार हरिपंत चाफेकर के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में हुआ था। उनके दो छोटे भाई क्रमशः बालकृष्ण चाफेकर एवं वसुदेव चाफेकर थे। बचपन से ही सैनिक बनने की इच्छा दामोदर पंत के मन में थी, विरासत में कीर्तनकार का यश-ज्ञान मिला ही था। महर्षि पटवर्धन एवं लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक उनके आदर्श थे।

तिलक जी की प्रेरणा से उन्होंने युवकों का एक संगठन व्यायाम मंडल तैयार किया। ब्रितानिया हुकूमत के प्रति उनके मन में बाल्यकाल से ही तिरस्कार का भाव था। दामोदर पंत चाफ़ेकर ने ही तत्कालीन बंबई में रानी विक्टोरिया के पुतले पर तारकोल पोत कर, गले में जूतों की माला पहना कर अपना रोष प्रकट किया था। 1894 से चाफेकर बंधुओं ने पूना में प्रति वर्ष शिवाजी एवं गणपति समारोह का आयोजन प्रारंभ कर दिया था। इन समारोहों में चाफेकर बंधु शिवाजी श्लोक एवं गणपति श्लोक का पाठ करते थे। उनका मानना था कि शिवाजी श्लोक के अनुसार, केवल शिवाजी की कहानी दोहराने मात्र से स्वाधीनता प्राप्त नहीं की जा सकती. आवश्यकता इस बात की है कि शिवाजी और बाजीराव की तरह तेज़ी से काम किए जाएं. आज हर भले आदमी को तलवार और ढाल पकड़नी चाहिए, यह जानते हुए कि हमें राष्ट्रीय संग्राम में जीवन का जोखिम उठाना होगा. गणपति श्लोक में धर्म और गाय की रक्षा के लिए कहा गया है. ये अंग्रेज़ कसाइयों की तरह गाय और बछड़ों को मार रहे हैं, उन्हें इस संकट से मुक्त कराओ. मरो, लेकिन अंग्रेजों को मारकर.

सन्‌ 1897 में पुणे नगर प्लेग जैसी भयंकर बीमारी से पीड़ित था। इस स्थिति में भी अंग्रेज अधिकारी जनता को अपमानित तथा उत्पीड़ित करते रहते थे। वाल्टर चार्ल्स रैण्ड तथा आयर्स्ट, ये दोनों अंग्रेज अधिकारी लोगों को जबरन पुणे से निकाल रहे थे। जूते पहनकर ही हिन्दुओं के पूजाघरों में घुस जाते थे। महिलाओं के साथ बेईज्जती करते थे. ये दोनों अधिकारी प्लेग पीड़ितों की सहायता की बजाय लोगों को प्रताड़ित करना ही अपना अधिकार समझते थे। किसी अत्याचार-अन्याय के सन्दर्भ में एक दिन तिलक जी ने चाफेकर बन्धुओं से कहा, “शिवाजी ने अपने समय में अत्याचार का विरोध किया था, किन्तु इस समय अंग्रेजों के अत्याचार के विरोध में तुम लोग क्या कर रहे हो?’ बस, इसके बाद इन तीनों भाइयों ने क्रान्ति का मार्ग अपना लिया। संकल्प लिया कि इन दोनों अंग्रेज अधिकारियों को छोड़ेंगे नहीं।

संयोगवश वह अवसर भी आया, जब २२ जून १८९७ को पुणे के “गवर्नमेन्ट हाउस’ में महारानी विक्टोरिया की षष्ठिपूर्ति के अवसर पर राज्यारोहण की हीरक जयन्ती मनायी जाने वाली थी। इसमें वाल्टर चार्ल्स रैण्ड और आयर्स्ट भी शामिल हुए। दामोदर हरि चाफेकर और उनके भाई बालकृष्ण हरि चाफेकर भी एक दोस्त विनायक रानडे के साथ वहां पहुंच गए और इन दोनों अंग्रेज अधिकारियों के निकलने की प्रतीक्षा करने लगे। रात १२ बजकर, १० मिनट पर रैण्ड और आयर्स्ट निकले और अपनी-अपनी बग्घी पर सवार होकर चल पड़े। योजना के अनुसार दामोदर हरि चाफेकर रैण्ड की बग्घी के पीछे चढ़ गए और उसे गोली मार दी, उधर बालकृष्ण हरि चाफेकर ने भी आर्यस्ट पर गोली चला दी। आयर्स्ट तो तुरन्त मर गया, किन्तु रैण्ड तीन दिन बाद अस्पताल में चल बसा। पुणे की उत्पीड़ित जनता चाफेकर-बन्धुओं की जय-जयकार कर उठी। गुप्तचर अधीक्षक ब्रुइन ने घोषणा की कि इन फरार लोगों को गिरफ्तार कराने वाले को २० हजार रुपए का पुरस्कार दिया जाएगा। (1897 में बीस हजार रूपए बहुत बड़ी रकम होती थी) चाफेकर बन्धुओं के क्लब में ही दो भाई थे – गणेश शंकर द्रविड़ और रामचन्द्र द्रविड़। इन दोनों ने पुरस्कार के लोभ में आकर अधीक्षक ब्रुइन को चाफेकर बन्धुओं का सुराग दे दिया। इसके बाद दामोदर हरि चाफेकर पकड़ लिए गए, लेकिन बालकृष्ण हरि चाफेकर फिर भी पुलिस के हाथ न लगे। सत्र न्यायाधीश ने दामोदर हरि चाफेकर को फांसी की सजा दी, और उन्होंने मन्द मुस्कान के साथ यह सजा सुनी। कारागृह में तिलक जी ने उनसे भेंट की और उन्हें “गीता’ प्रदान की। 18 अप्रैल 1898 को प्रात: वही “गीता’ पढ़ते हुए दामोदर हरि चाफेकर फांसीघर पहुंचे और फांसी के तख्ते पर लटक गए। उस क्षण भी वह “गीता’ उनके हाथों में थी।

उधर बालकृष्ण चाफेकर ने जब यह सुना कि उसको गिरफ्तार न कर पाने से चिढ़ी हुई पुलिस उसके सगे-सम्बंधियों को सता रही है, तो वह स्वयं पुलिस थाने में उपस्थित हो गए। बाद में तीसरे भाई वासुदेव चाफेकर ने अपने साथी महादेव गोविन्द विनायक रानडे को साथ लेकर उन गद्दार द्रविड़-बन्धुओं को जा घेरा, और उन्हें गोली मार दी। वह 8 फ़रवरी 1899 की रात थी। वासुदेव चाफेकर को 8 मई को और बालकृष्ण चाफेकर को 12 मई 1899 को पुणे के यरवदा कारागृह में फांसी दे दी गई। योजना में साथ देने वाले इनके साथी क्रांतिवीर महादेव गोविन्द विनायक रानडे को 10 मई 1899 को यरवदा कारागृह में ही फांसी दी गई।

यहाँ तक का यह गौरवशाली इतिहास पढ़कर निश्चित ही आपके रोंगटे खड़े हुए होंगे… लेकिन इस लेख का असली पेंच आगे है. वॉल्टर चार्ल्स रैंड अंग्रेज सरकार का ICS अफसर था, उस जमाने में ICS अफसर की धाक और दबदबा जबरदस्त होता था. 1897 में चाफेकर बंधुओं द्वारा मारे जाने से पहले उसने लगभग 13 वर्षों तक महारानी विक्टोरिया के सम्मान में भारत में अपनी सेवाएँ दीं. उसकी अधिकाँश नियुक्तियाँ मुम्बई-पुणे में ही हुईं. दूसरा अधिकारी जिसे चाफेकर बंधुओं ने गोली मारी, यानी आयर्स्ट वह रैंड से थोड़ी निचली पदवी पर था. हाल ही में ब्रिटिश लायब्रेरी के दस्तावेजों के अध्ययन का अध्ययन करते समय एक शोधकर्ता श्री संकेत कुलकर्णी के हाथ एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज लगा. इस दस्तावेज में 23 सितम्बर 1883 को रैंड के हस्ताक्षर युक्त पत्र भी है. इस पत्र में वॉल्टर रैंड लिखता है कि मैंने मुम्बई जाने के लिए विक्टोरिया जहाज में सीट बुक कर दी है, परन्तु अभी तक मुझे आधिकारिक आदेश प्राप्त नहीं हुआ, इसलिए मुझे जल्दी से जल्दी भेजने की व्यवस्था की जाए. 24 सितम्बर को तार सन्देश द्वारा यह पत्र भारत के दफ्तर में पहुँचता है और 26 सितम्बर को यानी केवल दो दिनों के भीतर वॉल्टर रैंड को वापस तार सन्देश द्वारा आदेश भी मिल जाते हैं… (यहाँ पर यह उदाहरण केवल इसलिए दिया गया, कि आज से लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व भी अंग्रेजों की प्रशासनिक मशीनरी कितनी चुस्त और समयबद्ध थी… उपरोक्त दोनों पत्र आज भी ब्रिटिश लायब्रेरी में सुरक्षित रखे हुए हैं… यह भी एक कौतूहल वाली बात है).

Chapekar Brothers

खैर… आगे बढ़ते हैं…. अंग्रेजों की कार्यपद्धति एवं उनकी प्रशासनिक व्यवस्था का एक और नमूना… वॉल्टर रैंड तथा आयर्स्ट की हत्या हो जाने के मात्र तीन माह के अन्दर श्रीमती रैंड और श्रीमती आयर्स्ट को “विशेष पेंशन” भी आरम्भ हो गई. 1897 में यानी आज से 120 वर्ष पहले, श्रीमती रैंड को 250 पौंड वार्षिक तथा उनके प्रत्येक बच्चे को 21 पौंड वार्षिक की पेंशन मिलने लगी. जबकि श्रीमती आयर्स्ट को उनके पति के ओहदे के अनुसार 150 पौंड वार्षिक तथा बच्चों को 15 पौंड वार्षिक की पेंशन मिलने लगी. चूँकि दोनों अधिकारी ऑन-ड्यूटी मारे गए थे, इसलिए उन्हें विशेष शहीद का दर्जा और पेंशन दी गई. (पेंशन संबंधी यह सभी दस्तावेज ब्रिटिश लायब्रेरी में सुरक्षित हैं).
अब आते हैं इस लेख के दर्दनाक अंत पर, जो आपको स्तब्ध कर देगा… दामोदर चाफ़ेकर की पत्नी श्रीमती दुर्गाबाई (जिनका आज कोई नाम तक नहीं जानता) उस समय केवल 17 वर्ष की युवती थीं. इसके बाद पूरे साठ वर्ष अर्थात 1956 तक वे जीवित रहीं. 1947 में भारत स्वतन्त्र हुआ… यानी स्वतंत्रता के पश्चात भी नौ वर्षों तक दुर्गाबाई जीवित थीं…. लेकिन हा दुर्भाग्य!!! भारत सरकार की तरफ से उन्हें कोई विशेष पेंशन मिलना तो दूर, उनके पति वीर स्वतंत्रता सेनानी थे यह दर्शाने वाली ताम्र पट्टिका तक उन्हें नसीब नहीं हुई. वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास से उनका नाम मिटाने की भरपूर कोशिश की, वह घृणित अध्याय अलग है. जरा सोचिये… चाफ़ेकर बंधुओं की वीरता, उनकी प्लानिंग… हँसते-हँसते फाँसी चढ़ना और फिर पूरे साठ वर्षों तक उनकी विधवा दुर्गाबाई का जीवन संघर्ष… उधर अंग्रेजों ने अपने अधिकारियों को “शहीद” का दर्जा देकर उनके पूरे परिवार का ध्यान रखा… और इधर भारत में सत्ता की मलाई चाटने वाले नेहरू की सरकार ने दुर्गाबाई को क्या दिया… उपेक्षा और अपमान.

देसी सीएनएन में लेख का यूआरएल –

http://desicnn.com/news/history-and-bravery-of-chapekar-brothers-of-pune-in-indian-independence-movement

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सोलह संस्कार (16 Samskars)

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वैदिक कर्मकाण्ड के अनुसार निम्न सोलह संस्कार (16 Samskars) होते हैं:

1. गर्भाधान संस्कारः उत्तम सन्तान की प्राप्ति के लिये प्रथम संस्कार।

2. पुंसवन संस्कारः गर्भस्थ शिशु के बौद्धि एवं मानसिक विकास हेतु गर्भाधान के पश्चात्् दूसरे या तीसरे महीने किया जाने वाला द्वितीय संस्कार।

3. सीमन्तोन्नयन संस्कारः माता को प्रसन्नचित्त रखने के लिये, ताकि गर्भस्थ शिशु सौभाग्य सम्पन्न हो पाये, गर्भाधान के पश्चात् आठवें माह में किया जाने वाला तृतीय संस्कार।

4. जातकर्म संस्कारः नवजात शिशु के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की कामना हेतु किया जाने वाला चतुर्थ संस्कार।

5. नामकरण संस्कारः नवजात शिशु को उचित नाम प्रदान करने हेतु जन्म के ग्यारह दिन पश्चात् किया जाने वाला पंचम संस्कार।

6. निष्क्रमण संस्कारः शिशु के दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करने की कामना के लिये जन्म के तीन माह पश्चात् चौथे माह में किया जाने वला षष्ठम संस्कार।

7. अन्नप्राशन संस्कारः शिशु को माता के दूध के साथ अन्न को भोजन के रूप में प्रदान किया जाने वाला जन्म के पश्चात् छठवें माह में किया जाने वाला सप्तम संस्कार।

8. चूड़ाकर्म (मुण्डन) संस्कारः शिशु के बौद्धिक, मानसिक एवं शारीरिक विकास की कामना से जन्म के पश्चात् पहले, तीसरे अथवा पाँचवे वर्ष में किया जाने वाला अष्टम संस्कार।

9. विद्यारम्भ संस्कारः जातक को उत्तमोत्तम विद्या प्रदान के की कामना से किया जाने वाला नवम संस्कार।

10. कर्णवेध संस्कारः जातक की शारीरिक व्याधियों से रक्षा की कामना से किया जाने वाला दशम संस्कार।

11. यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कारः जातक की दीर्घायु की कामना से किया जाने वाला एकादश संस्कार।

12. वेदारम्भ संस्कारः जातक के ज्ञानवर्धन की कामना से किया जाने वाला द्वादश संस्कार।

13. केशान्त संस्कारः गुरुकुल से विदा लेने के पूर्व किया जाने वाला त्रयोदश संस्कार।

14. समावर्तन संस्कारः गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने की कामना से किया जाने वाला चतुर्दश संस्कार।

15. पाणिग्रहण संस्कारः पति-पत्नी को परिणय-सूत्र में बाँधने वाला पंचदश संस्कार।

16. अन्त्येष्टि संस्कारः मृत्योपरान्त किया जाने वाला षष्ठदश संस्कार।

उपरोक्त सोलह संस्कारों में आजकल नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म (मुण्डन), यज्ञोपवीत (उपनयन), पाणिग्रहण और अन्त्येष्टि संस्कार ही चलन में बाकी रह गये हैं।

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विष्णु के अवतारों की कथा (Story of Incarnations of Lord Vishnu and Number of Shlokas in Puranas)

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आप के ज्ञान में वृद्धि हेतु प्रस्तुत है भगवान विष्णु के अवतारों की कथा (Story of Incarnations Lord Vishnu) एवं पुराणों में श्लोकों की संख्या (Shlokas in Puranas) के विषय में जानकारी।

Incornationas of Lord Vishnu

यह जानकारी भागवत (सुखसागर) से ली गई है।

महाप्रलय के पश्चात् भगवान विष्णु (Lord Vishnu) योग निद्रा में लीन हो जाते हैं।

अनन्तकाल के पश्चात योग निद्रा से जागने पर पुनः सृष्टि की रचना करने हेतु महातत्वों के योग से दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच भूतों से युक्त पुरुष रूप ग्रहण करते हैं।

उनकी नाभि से एक कमल प्रकट होकर क्षीर सागर से ऊपर आता है और उस कमल से ब्रह्मा की उत्पत्ति होती है।

क्षीरशायी भगवान का विराट रूप होता है। उस विराट रूप के सहस्त्रों सिर, सहस्त्रों कर्ण, सहस्त्रों नासिकाएँ, सहस्त्रों मुख, सहस्त्रों भुजाएँ तथा सहस्त्रों जंघायें होती हैं। वे सहस्त्रों मुकुट, कुण्डल, वस्त्र और आयुधों से युक्त होते हैं। उस विराट रूप में समस्त लोक ब्रह्माण्ड आदि व्याप्त रहते हैं, उसी के अंशों से समस्त प्राणियों की श्रृष्टि होती है तथा योगीजन उसी विराट रूप का अपनी दिव्य दृष्टि से दर्शन करते हैं।

भगवान का यही विराट स्वरूप भक्तों की रक्षा और दुष्टों के दमन के उद्देश्य से बार-बार अवतार लेते हैं।

  • भगवान ने कौमारसर्ग में सनक, सनन्दन, सनातन तथा सनत्कुमार ब्रह्मऋषियों का अवतार लिया। यह उनका पहला अवतार था।
  • पृथ्वी को रसातल से लाने के लिये भगवान ने दूसरी बार वाराह का अवतार लिया।
  • तीसरी बार ऋषियों को साश्वततंत्र, जिसे कि नारद पाँचरात्र भी कहते हैं और जिसमें कर्म बन्धनों से मुक्त होने का निरूपन है, का उपदेश देने के लिये नारद जी के रूप में अवतार लिया।
  • धर्म की पत्नी मूर्ति देवी के गर्भ से नारायण, जिन्होंने बदरीवन में जाकर घोर तपस्या की, का अवतरण हुआ। यह भगवान का चौथा अवतार है।
  • पाँचवाँ अवतार माता देवहूति के गर्भ से कपिल मुनि का हुआ जिन्होंने अपनी माता को सांख्य शास्त्र का उपदेश दिया।
  • छठवें अवतार में अनुसुइया के गर्भ से दत्तात्रयेय प्रगट हुये जिन्होंने प्रह्लाद, अलर्क आदि को ब्रह्मज्ञान दिया।
  • सातवीं बार आकूति के गर्भ से यज्ञ नाम से अवतार धारण किया।
  • नाभिराजा की पत्नी मेरु देवी के गर्भ से ऋषभदेव के नाम से भगवान का आठवाँ अवतार हुआ। उन्होंने परमहँसी का उत्तम मार्ग का निरूपण किया।
  • नवीं बार राजा पृथु के रूप में भगवान ने अवतार लिया और गौरूपिणी पृथ्वी से अनेक औषधियों, रत्नों तथा अन्नों का दोहन किया।
  • चाक्षुषमन्वन्तर में सम्पूर्ण पृथ्वी के जलमग्न हो जाने पर पृथ्वी को नौका बना कर वैवश्वत मनु की रक्षा करने हेतु दसवीं बार भगवान ने मत्स्यावतार लिया।
  • समुद्र मंथन के समय देवता तथा असुरों की सहायता करने के लिये ग्यारहवीं बार भगवान ने कच्छप के रूप में अवतार लिया।
  • बारहवाँ अवतार भगवान ने धन्वन्तरि के नाम से लिया जिन्होंने समुद्र से अमृत का घट निकाल कर देवताओं को दिया।
  • मोहिनी का रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाने के लिये भगवान ने तेरहवाँ अवतार लिया।
  • चौदहवाँ अवतार भगवान का नृसिंह के रूप में हुआ जिन्होंने हिरण्यकश्यपु दैत्य को मार कर प्रह्लाद की रक्षा की।
  • दैत्य बलि को पाताल भेज कर देवराज इन्द्र को स्वर्ग का राज्य प्रदान करने हेतु पन्द्रहवीं बार भगवान ने वामन के रूप में अवतार लिया।
  • अभिमानी क्षत्रिय राजाओं का इक्कीस बार विनाश करने के लिये सोलहवीं बार परशुराम के रूप में अवतार लिया।
  • सत्रहवीं बार पाराशर जी के द्वारा सत्यवती के गर्भ से भगवान ने वेदव्यास के रूप में अवतार धारण किया जिन्होंने वेदों का विभाजन कर के अने उत्तम ग्रन्थों का निर्माण किया।
  • राम के रूप में भगवान ने अठारहवीं बार अवतार ले कर रावण के अत्याचार से विप्रों, धेनुओं, देवताओं और संतों की रक्षा की।
  • उन्नसवीं बार भगवान ने सम्पूर्ण कलाओं से युक्त कृष्ण के रूप में अवतार लिया।
  • बुद्ध के रूप में भगवान का बीसवाँ अवतार हुआ।
  • कलियुग के अन्त में इक्कीसवीं बार विष्णु यश नामक ब्राह्मण के घर भगवान का कल्कि अवतार होगा।

जब जब दुष्टों का भार पृथ्वी पर बढ़ता है और धर्म की हानि होती है तब तब पापियों का संहार करके भक्तों की रक्षा करने के लिये भगवान अपने अंशावतारों व पूर्णावतारों से पृथ्वी पर शरीर धारण करते हैं।

पुराणों में श्लोक संख्या (Number of shlokas in Puranas)

सुखसागर के अनुसारः

(1) ब्रह्मपुराण में श्लोकों की संख्या दस हजार हैं।

(2) पद्मपुराण में श्लोकों की संख्या पचपन हजार हैं।

(3) विष्णुपुराण में श्लोकों की संख्या तेइस हजार हैं।

(4) शिवपुराण में श्लोकों की संख्या चौबीस हजार हैं।

(5) श्रीमद्भावतपुराण में श्लोकों की संख्या अठारह हजार हैं।

(6) नारदपुराण में श्लोकों की संख्या पच्चीस हजार हैं।

(7) मार्कण्डेयपुराण में श्लोकों की संख्या नौ हजार हैं।

(8) अग्निपुराण में श्लोकों की संख्या पन्द्रह हजार हैं।

(9) भविष्यपुराण में श्लोकों की संख्या चौदह हजार पाँच सौ हैं।

(10) ब्रह्मवैवर्तपुराण में श्लोकों की संख्या अठारह हजार हैं।

(11) लिंगपुराण में श्लोकों की संख्या ग्यारह हजार हैं।

(12) वाराहपुराण में श्लोकों की संख्या चौबीस हजार हैं।

(13) स्कन्धपुराण में श्लोकों की संख्या इक्यासी हजार एक सौ हैं।

(14) वामनपुराण में श्लोकों की संख्या दस हजार हैं।

(15) कूर्मपुराण में श्लोकों की संख्या सत्रह हजार हैं।

(16) मत्सयपुराण में श्लोकों की संख्या चौदह हजार हैं।

(17) गरुड़पुराण में श्लोकों की संख्या उन्नीस हजार हैं।

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Yudhishthir became prince – Mythological Stories in Hindi

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युधिष्ठिर का युवराज पद प्राप्त करना (Yudhishthir became prince – Mythological Stories in Hindi)

महाभारत (Mahabharat) महाकाव्य में युधिष्ठिर का युवराज पद प्राप्त करना, धृतराष्ट्र की चिन्ता तथा कणिक की कूटनीति की कथा आती है जो इस प्रकार है –

पाण्डवों के द्वारा द्रुपद को विजित कर लेने के एक वर्ष पश्चात् युधिष्ठिर को युवराज पद प्रदान कर दिया गया। अपने धैर्य, स्थिरता, सहिष्णुता, नम्रता, अविचल प्रेम, शील, सदाचार, विचारशीलता इत्यादि सद्गुणो के कारण युधिष्ठिर प्रजा के परमप्रिय राजा बन गए।

धनुर्विद्या तथा अस्त्र-शस्त्र संचालन में अर्जुन पहले ही अत्यन्त निपुण थे और एक दिन गुरु द्रोणाचार्य ने उन्हे ब्रह्मशिर नामक अचूक अस्त्र प्रदान करके तथा स्वयं द्रोणाचार्य के साथ कभी युद्ध होने का अवसर आने पर पीछे न हटने का अर्जुन से वचन ले कर उन्हें अजेय बना दिया। भीमसेन ने बलराम से गदायुद्ध का ज्ञान प्राप्त कर लिया, सहदेव ने वृहस्पति से नीतिशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की। अतिरथी नकुल भी अति विनीत होने के साथ ही साथ सभी प्रकार के युद्ध में पारंगत थे।

राज्य के प्रबन्ध में भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव युधिष्ठिर की वीरता तथा पराक्रम के साथ सदैव सहायता करते थे। युधिष्ठिर ने चारों दिशाओं में अनेक राज्यों पर विजय प्राप्त कर लिया और दिनों दिन पाण्डवों की श्रीवृद्धि होने लगी।

पाण्डवों की इस उन्नति से धृतराष्ट्र को अत्यन्त ईर्षा होने लगी और चिन्ता ने उसे व्याप्त लिया। धृतराष्ट्र के द्वारा अपने परम श्रेष्ठ तथा राजनीतिविशारद मन्त्री कणिक के समक्ष अपनी चिन्ता प्रकट करने पर कणिक ने कहा, “राजन्! राजा को सर्वदा दण्ड देने के लिए उद्यत रहना चाहिए तथा दैव के भरोसे न रह कर अपने पौरुष पर ही विश्वास करना चाहिए। शत्रु के साथ परिस्थिति अनुसार साम, दाम, दण्ड या भेद से काम लेना चाहिए। समय के अनुकूल न होने पर शत्रु के अधीन रहना चाहिए किन्तु अवसर प्राप्त होते ही उसे नष्ट कर देना चाहिए। यही राजनीति का मूल मन्त्र है। पाण्डुपुत्रों के साथ भी आपको ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए।”

कणिक की मन्त्रणा सुनकर धृतराष्ट्र ने उसके अनुरूप ही कार्य करने का निश्चय कर लिया।

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English Proverbs with Hindi meaning-1

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अंग्रेजी कहावतें – हिन्दी भावार्थ (English Proverbs with Hindi meaning)

कहावतें (Proverbs) को “गागर में सागर” कहा जा सकता है क्योंकि वे कम से कम शब्दों में बड़ी से बड़ी बातें कह जाती हैं। प्रस्तुत है महत्वपूर्ण अंग्रेजी कहावतों (English Proverbs) के हिन्दी अर्थ।

A journey of a thousand miles begins with one step.
हजारों मील की यात्रा भी एक कदम से शुरू होती है।

A bad penny always turns up.
खोटा सिक्का खोटा ही होता है।

A bean in liberty is better than a comfit in prison.
सम्पन्नतायुक्त गुलामी से विपन्नतायुक्त स्वतंत्रता बेहतर है।

A bellyful is one of meat, drink, or sorrow.
एक पेट मांस-मदिरा से भरा होता है तो एक दुःखों से।

A big tree attracts the woodsman’s axe.
एक बड़ा पेड़ सदा लकड़हारे की कुल्हाड़ी को आकर्षित करता है।

An apple a day keeps the doctor away.
प्रतिदिन एक सेब खाना डॉक्टर से दूरी बनाये रहता है।

A bad workman always blames his tools.
खराब कारीगर हमेशा हथियारों के दोष निकालता है।

A banker is someone who lends you an umbrella when the sun is shining, and who asks for it back when it starts to rain.
बैंकर वो होता है जो कि साधारण धूप रहने के वक्त आपको छाता उधार दे और पानी बरसते वक्त वापस माँग ले।

A bird in the hand is worth two in the bush.
झाड़ पर के दो पक्षियों से हाथ आया एक पक्षी कीमती होता है।

A chain is no stronger than its weakest link.
कोई भी जंजीर अपने कमजोर कड़ी से अधिक मजबूत नहीं होती।

A constant guest never welcomes.
हमेशा आने वाला मेहमान अपना सम्मान खो देता है।

A coward dies a thousand times before his death.
कायर आदमी अपनी मौत से पहले हजारों बार मरता है।

A friend in need is a friend indeed.
समय पर काम आने वाला ही सच्चा मित्र होता है।

A friend to all is a friend to none.
जो सभी का मित्र होता है वह किसी का मित्र नहीं होता।

A good beginning makes a good ending.
एक अच्छी शुरुवात आधी सफलता होती है।

A good man in an evil society seems the greatest villain of all.
खराब समाज में अच्छा आदमी सबसे बड़ा खलनायक होता है।

A guilty conscience needs no accuser.
भले आदमी को किसी पर दोष मढ़ने की आवश्यकता नहीं होती।

A half truth is a whole lie.
आधा सच पूरे झूठ के बराबर होता है।

A jack of all trades is master of none.
जो सभी धंधों का गुलाम होता है वह किसी धंधे का मालिक नहीं होता।

A lie can be halfway around the world before the truth gets its boots on.
सत्य से पराजित होने के पूर्व झूठ आधी दुनिया की यात्रा कर लेता है।

A little knowledge is a dangerous thing.
अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है। (नीम-हकीम खतरा-ए-जान।)

A loaded wagon makes no noise.
अधजल गगरी छलकत जाये।

A miss by an inch is a miss by a mile.
एक इंच की भूल अंततः एक मील की गलती साबित होती है।

A paragraph should be like a lady’s skirt: long enough to cover the essentials but short enough to keep it interesting.
एक पैराग्राफ किसी महिला के स्कर्ट के जैसे होता है, इतना लंबा कि सभी आवश्यक बातें निहित हो जायें और इतना छोटा कि रोचक लगे।

A picture is worth a thousand words.
एक चित्र हजार शब्दों के मूल्य के बराबर होता है।

A pot of milk is ruined by a drop of poison.
एक बूंद विष बर्तन भर दूध को को नष्ट कर देती है।

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Defeat of Drupad – Mythological Stories in Hindi

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द्रुपद की हार (Defeat of Drupad – Mythological Stories in Hindi)

महाभारत (Mahabharat) महाकाव्य में द्रुपद की हार (Defeat of Drupad) की कथा आती है जो इस प्रकार है –

पाण्डवों और कौरवों की शिक्षा पूरी हो पर राजकुमारों ने गुरु द्रोणाचार्य (Dronacharya) से पूछा कि वे गुरुदक्षिणा के रूप में क्या चाहते हैं। इस पर द्रोणाचार्य को याद आ गया कि राज द्रुपद ने कैसे उनका अपमान किया था। उस अपमान का बदला लेने के उद्देश्य से उन्होंने राजकुमारों से कहा, “शिष्यों! अगर तुम गुरुदक्षिणा देना ही चाहते हो तो पाञ्चाल के राजा द्रुपद को कैदी बना कर मेरे सामने लाओ। यही तुम लोगों की गुरुदक्षिणा होगी।”

गुरुदेव के इस प्रकार कहने पर सभी राजकुमार अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र ले कर पाञ्चाल देश की ओर चले।

पाञ्चाल पहुँचने पर अर्जुन ने द्रोणाचार्य से कहा, “गुरुदेव! आप पहले कौरवों को राजा द्रुपद से लड़ने के लिए कहिये। अगर वो लोग द्रुपद को कैद नहीं कर पायेंगे तो हम पाण्डव युद्ध करेंगे।”

गुरु के कहने पर दुर्योधन की अगुवाई में कौरवों ने पाञ्चाल पर हमला बोल दिया। दोनों पक्षों के बीच भयानक लड़ाई होने लगी पर आखिर में कौरव हार कर भाग निकले। कौरवों को भागत देख कर पाण्डवों ने लड़ाई शुरू कर दिया। भीमसेन और अर्जुन की वीरता के सामने पाञ्चाल नरेश की सेना टिक नहीं पाई। अर्जुन ने आगे बढ़ कर द्रुपद को हथकड़ी पहना दी और गुरु द्रोणाचार्य के सामने ले आये।

द्रुपद को कैदी के रूप में देख कर द्रोणाचार्य ने कहा, “हे द्रुपद! अब मैं तुम्हारे राज्य का मालिक हो गया हूँ। मैं तो तुम्हें अपना सखा समझ कर तुम्हारे पास आया था पर तुमने मुझे अपना मित्र स्वीकार नहीं किया था। अब बताओ क्या तुम मेरी मित्रता स्वीकार करते हो?”

द्रुपद ने शर्म से सिर झुका लिया और अपनी भूल के लिये माफी माँगते हुये बोले, “हे द्रोण! आपको अपना मित्र न मानना मेरी गलती थी और उसके लिये अब मेरे मन में बहुत पछतावा है। मैं और मेरा राज्य दोनों ही अब आपके हाथ में हैं, अब आपकी जैसी इच्छा हो करें।”

द्रोणाचार्य ने कहा, “तुमने कहा था कि मित्रता बराबर वालों में ही होती है। इसलिए मैं तुम्हारे बराबर बन कर मित्र भाव रखने के लिये तुम्हें तुम्हारा आधा राज्य लौटा रहा हूँ।”

इतना कह कर द्रोणाचार्य ने गंगा नदी के दक्षिणी तट का राज्य द्रुपद को दे दिया और बाकी को खुद रख लिया।

इसके बाद पाण्डवों ने बहुत सी दूसरी विद्याओं को भी सीखा। भीमसेन ने बलराम को गुरू मान कर खम्भ-गदा आदि की शिक्षा प्राप्त की। इस समय तक युधिष्ठिर के गुणों कि प्रशंसा देश-देशान्तर में होने लगी। समय आने पर धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर को युवराज के पद पर आसीन कर दिया।

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Karna and Arjun – Mythological Stories in Hindi

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कर्ण और अर्जुन (Karna and Arjun)

महाभारत में कर्ण (Karna) और अर्जुन (Arjun) की कथा आतो है, जो इस प्रकार है –

द्रोणाचार्य ने सोचा कि अब पाण्डव और कौरव राजकुमारों ने अस्त्र-शस्त्र चलाना कितना सीखा है इस बात की परीक्षा ले ली जाए। इसके लिये उन्होंने एक विशाल मण्डप बनावाया। उस मण्डप में राज परिवार के लोगों के साथ ही राज्य के जाने-माने लोग भी उपस्थित हुये। सबसे पहले भीम और दुर्योधन में गदा की लड़ाई हुई। दोनों ही पराक्रमी थे। लम्बे समय तक दोनों के बीच गदा लड़ाई चलती रही पर हार-जीत का फैसला नहीं हो पाया। आखिर में गुरु द्रोण का इशारा पाकर अश्वत्थामा ने दोनों को अलग कर दिया।

गदा लड़ाई के बाद अर्जुन (Arjun) अपनी धनुर्विद्या प्रस्तुत करने के लिये आये। उन्होंने सबसे पहले आग्नेयास्त्र चला कर भयानक आग पैदा किया फिर वरुणास्त्र चला कर पानी की बरसात की जिससे जलती हुई आग बुझ गई। इसके बाद उन्होंने वायु-अस्त्र चला कर आँधी उत्पन्न किया। फिर पार्जन्यास्त्र से बादल उत्पन्न कर के दिखाया। इतना ही नहीं अन्तर्ध्यान-अस्त्र चलाया और वहाँ पर उपस्थित लोगों की नजरों से गायब हो कर सभी को अचम्भित कर दिया। वहाँ पर उपस्थित सभी लोग उनकी धनुर्विद्या की तारीफ करने लगे।

अचानक उसी समय एक सूर्य के समान प्रकाशवान योद्धा हाथ में धनुष लिये रंगभूमि में उपस्थित हुये। वे कर्ण थे। कर्ण ने भी वह सब कर दिखाया जो अर्जुन ने किया था। अपने कौशलों का दिखा चुकने के बाद कर्ण ने अर्जुन से कहा, “यदि तुम्हें अपनी धनुर्विद्या पर इतना ही गर्व है तो मुझसे युद्ध करो।”

अर्जुन को कर्ण का इस प्रकार ललकारना बहुत बुरा लगा। अर्जुन ने कहा, “बिना बुलाये मेहमान की जो दशा होती है, आज मैं तुम्हारी भी वही दशा कर दूँगा।”

इस पर कर्ण ने कहा, “रंग मण्डप सबके लिये खुला होता है, यदि तुममें शक्ति है तो धनुष उठाओ।”

उनके इस विवाद को सुन कर नीति मर्मज्ञ कृपाचार्य बोल उठे, “कर्ण! अर्जुन कुन्ती के पुत्र हैं। वे अवश्य तुम्हारे साथ युद्ध के लिये प्रस्तुत होंगे। किन्तु युद्ध के पूर्व तुम्हें भी अपने वंश का परिचय देना होगा क्योंकि राजवंश के लोग कभी नीच वंश के लोगों के साथ युद्ध नहीं करते।”

कृपाचार्य की बात सुन कर कर्ण का मुख श्रीहीन हो गया और वे शर्मसार हो गये। कर्ण की ऐसी हालत देख कर उनके मित्र दुर्योधन ने कहा, “हे गुरुजनों एवं उपस्थित सज्जनों! मैं इसी क्षण अपने परम मित्र कर्ण को अंग देश का राजपद प्रदान करता हूँ। कर्ण अब अंग देश का राजा है। अब एक देश का राजा होने के नाते अब उन्हें अर्जुन से युद्ध का अधिकार मिल गया है।”

दुर्योधन की बात सुन कर भीम ने कर्ण से कहा, “भले ही तुम अब राजा हो गये हो, किन्तु हो तो तुम सूतपुत्र ही। तुम तो अर्जुन के हाथों मरने के भी योग्य नहीं हो। तुम्हारी भलाई इसी में है कि शीघ्र जाकर अपना घोड़े तथा रथ की देखभाल करो।”

वाद-विवाद बढ़ता गया और वातावरण में कटुता आने लगी। यह विचार कर के कि बात अधिक बढ़ने न पाये, द्रोणाचार्य एवं कृपाचार्य ने उस सभा को विसर्जित कर दिया।

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