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सोलह संस्कार (16 Samskars)

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वैदिक कर्मकाण्ड के अनुसार निम्न सोलह संस्कार (16 Samskars) होते हैं:

1. गर्भाधान संस्कारः उत्तम सन्तान की प्राप्ति के लिये प्रथम संस्कार।

2. पुंसवन संस्कारः गर्भस्थ शिशु के बौद्धि एवं मानसिक विकास हेतु गर्भाधान के पश्चात्् दूसरे या तीसरे महीने किया जाने वाला द्वितीय संस्कार।

3. सीमन्तोन्नयन संस्कारः माता को प्रसन्नचित्त रखने के लिये, ताकि गर्भस्थ शिशु सौभाग्य सम्पन्न हो पाये, गर्भाधान के पश्चात् आठवें माह में किया जाने वाला तृतीय संस्कार।

4. जातकर्म संस्कारः नवजात शिशु के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की कामना हेतु किया जाने वाला चतुर्थ संस्कार।

5. नामकरण संस्कारः नवजात शिशु को उचित नाम प्रदान करने हेतु जन्म के ग्यारह दिन पश्चात् किया जाने वाला पंचम संस्कार।

6. निष्क्रमण संस्कारः शिशु के दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करने की कामना के लिये जन्म के तीन माह पश्चात् चौथे माह में किया जाने वला षष्ठम संस्कार।

7. अन्नप्राशन संस्कारः शिशु को माता के दूध के साथ अन्न को भोजन के रूप में प्रदान किया जाने वाला जन्म के पश्चात् छठवें माह में किया जाने वाला सप्तम संस्कार।

8. चूड़ाकर्म (मुण्डन) संस्कारः शिशु के बौद्धिक, मानसिक एवं शारीरिक विकास की कामना से जन्म के पश्चात् पहले, तीसरे अथवा पाँचवे वर्ष में किया जाने वाला अष्टम संस्कार।

9. विद्यारम्भ संस्कारः जातक को उत्तमोत्तम विद्या प्रदान के की कामना से किया जाने वाला नवम संस्कार।

10. कर्णवेध संस्कारः जातक की शारीरिक व्याधियों से रक्षा की कामना से किया जाने वाला दशम संस्कार।

11. यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कारः जातक की दीर्घायु की कामना से किया जाने वाला एकादश संस्कार।

12. वेदारम्भ संस्कारः जातक के ज्ञानवर्धन की कामना से किया जाने वाला द्वादश संस्कार।

13. केशान्त संस्कारः गुरुकुल से विदा लेने के पूर्व किया जाने वाला त्रयोदश संस्कार।

14. समावर्तन संस्कारः गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने की कामना से किया जाने वाला चतुर्दश संस्कार।

15. पाणिग्रहण संस्कारः पति-पत्नी को परिणय-सूत्र में बाँधने वाला पंचदश संस्कार।

16. अन्त्येष्टि संस्कारः मृत्योपरान्त किया जाने वाला षष्ठदश संस्कार।

उपरोक्त सोलह संस्कारों में आजकल नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म (मुण्डन), यज्ञोपवीत (उपनयन), पाणिग्रहण और अन्त्येष्टि संस्कार ही चलन में बाकी रह गये हैं।

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मातृभूमि (Matribhoomi)

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प्रस्तुत है मैथिलीशरण गुप्त (Mithilisharan Gupt) की रचना मातृभूमि (Matribhoomi)

नीलाम्बर परिधान हरित तट पर सुन्दर है,
सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है,
नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं,
बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है,
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की।
हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की॥

जिसके रज में लोट-लोट कर बड़े हुये हैं,
घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुये हैं,
परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये,
जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाये,
हम खेले-कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में।
हे मातृभूमि! तुझको निरख, मग्न क्यों न हों मोद में?

पा कर तुझसे सभी सुखों को हमने भोगा,
तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा?
तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है,
बस तेरे ही सुरस-सार से सनी हुई है,
फिर अन्त समय तू ही इसे अचल देख अपनायेगी।
हे मातृभूमि! यह अन्त में तुझमें ही मिल जायेगी॥

निर्मल तेरा नीर अमृत के से उत्तम है,
शीतल मंद सुगंध पवन हर लेता श्रम है,
षट्ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भुत क्रम है,
हरियाली का फर्श नहीं मखमल से कम है,
शुचि-सुधा सींचता रात में, तुझ पर चन्द्रप्रकाश है।
हे मातृभूमि! दिन में तरणि, करता तम का नाश है॥

सुरभित, सुन्दर, सुखद, सुमन तुझ पर खिलते हैं,
भाँति-भाँति के सरस, सुधोपम फल मिलते है,
औषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली,
खानें शोभित कहीं धातु वर रत्नों वाली,
जो आवश्यक होते हमें, मिलते सभी पदार्थ हैं।
हे मातृभूमि! वसुधा, धरा, तेरे नाम यथार्थ हैं॥

क्षमामयी, तू दयामयी है, क्षेममयी है,
सुधामयी, वात्सल्यमयी, तू प्रेममयी है,
विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुःखहर्त्री है,
भय निवारिणी, शान्तिकारिणी, सुखकर्त्री है,
हे शरणदायिनी देवि, तू करती सब का त्राण है।
हे मातृभूमि! सन्तान हम, तू जननी, तू प्राण है॥

जिस पृथ्वी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे,
उससे हे भगवान! कभी हम रहें न न्यारे,
लोट-लोट कर वहीं हृदय को शान्त करेंगे,
उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे,
उस मातृभूमि की धूल में, जब पूरे सन जायेंगे।
होकर भव-बन्धन- मुक्त हम, आत्म रूप बन जायेंगे॥

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सामान्य ज्ञान क्विज – 332 (General Knowledge Quiz)

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हिन्दी में सामान्य ज्ञान क्विज (GK in Hindi)

General Knowledge in Hindi
सामान्य ज्ञान (General Knowledge in Hindi) बढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका है क्विज (gk Quiz in Hindi) हल करना।

ज्ञान सागर हिन्दी वेबसाइट के क्विजों में मुख्यतः सामान्य ज्ञान से सम्न्धित सवाल (General Knowledge Questions) पूछे जाते हैं।

क्विज (gk Quiz in Hindi) हल करने से न केवल आपका मनोरंजन होता है बल्कि आपका online gk practice test in Hindi भी हो जाता है।

तो हो जाइए तैयार अपना सामान्य ज्ञान (Samanya Gyan in Hindi) बढ़ाने के लिए!

यदि आप मोबाइल से क्विज देख रहे हैं और क्विज दिखाई नहीं दे रहा है तो कृपया पेज के सबसे नीचे जाएँ और View Non-AMP Version को क्लिक या स्पर्श करें, क्विज दिखाई देने लगेगा।

आपकी असुविधा के लिए खेद है। जल्दी ही इस बग को सुधार लेने का प्रयास जारी है।

General Knowledge in Hindi

निम्न में से कौन सा वातावरण में मीथेन उत्सर्जन का स्रोत है?





जब किसी राज्य की आर्थिक व्यवस्था की उत्पादक क्षमता पर्याप्त नौकरियाँ जुटा पाने के लिए अपर्याप्त होता है, तो उसे किस प्रकार की बेरोजगारी कहा जाता है?





पृथ्वी की सतह पर की उस काल्पनिक रेखा को जो लगभग 180 डिग्री मेरिडियन का अनुसरण करता है, क्या कहा जाता है?





निम्न में से कौन सी संधि यूरोपीय संघ का आधार है?





लंदन से 10:30 बजे सुबह प्रसारित होने वाला समाचार बगदाद (45° E) में किस समय सुनाई देगा?





निम्न में से किस गवर्नर-जनरल ने टीपू सुल्तान के विरुद्ध त्रिपक्षीय गठबंधन का गठन किया था?





पेट के रंगीन एक्स-रे परीक्षण से पहले रोगियों को उपयुक्त मात्रा में "साल्ट ऑफ बेरियम" दिए जाने का क्या कारण है?





विकास की नेहरू-महालनोबिस रणनीति ने किन पंचवर्षीय योजनाओं को निर्देशित किया था?





डंकन दर्रा कहाँ स्थित है?





हड़प्पा सभ्यता का कौन सा स्थल जल प्रबंधन के लिए जाना जाता है?







यद्यपि क्विज (gk Quiz) बनाने में पूरी सावधानी बरती गई है तथापि किसी भी प्रकार की गलती हो जाने की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता। यदि आपको कहीं कोई गलती मिलती है तो कृपया सूचित करने का कष्ट करें ताकि उचित सुधार किया जा सके।

प्रयास किया गया है कि यह हिन्दी क्विज आपका सामान्य ज्ञान बढ़ाने के साथ ही विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं (competitive exams) के लिए भी उपयोगी सिद्ध हो।

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निज भाषा उन्नति अहै (Nij Bhasha Unnati Ahai)

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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (Bhartendu Harishchandra) आधुनिक हिन्दी के प्रथम साहित्यकार थे। उनकी रचना निज भाषा उन्नति अहै (Nij Bhasha Unnati Ahai) ने लोगों को निज भाषा (Nij Bhasha) अर्थात् स्वयं की भाषा हिन्दी की ओर आकर्षित किया। प्रस्तुत है उनकी यह रचना।

निज भाषा उन्नति अहै (Nij Bhasha Unnati Ahai)

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥
अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन॥

निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्लै है सोय।
लाख उपाय अनेक यों, भले करे किन कोय॥
इक भाषा इक जीव इक, मति सब घर के लोग।
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग॥

और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात।
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात॥
तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय।
यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय

भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात।
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात॥
सब मिल तासों छाँड़ि कै, दूजे और उपाय।
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय॥

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विष्णु के अवतारों की कथा (Story of Incarnations of Lord Vishnu and Number of Shlokas in Puranas)

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आप के ज्ञान में वृद्धि हेतु प्रस्तुत है भगवान विष्णु के अवतारों की कथा (Story of Incarnations Lord Vishnu) एवं पुराणों में श्लोकों की संख्या (Shlokas in Puranas) के विषय में जानकारी।

Incornationas of Lord Vishnu

यह जानकारी भागवत (सुखसागर) से ली गई है।

महाप्रलय के पश्चात् भगवान विष्णु (Lord Vishnu) योग निद्रा में लीन हो जाते हैं।

अनन्तकाल के पश्चात योग निद्रा से जागने पर पुनः सृष्टि की रचना करने हेतु महातत्वों के योग से दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच भूतों से युक्त पुरुष रूप ग्रहण करते हैं।

उनकी नाभि से एक कमल प्रकट होकर क्षीर सागर से ऊपर आता है और उस कमल से ब्रह्मा की उत्पत्ति होती है।

क्षीरशायी भगवान का विराट रूप होता है। उस विराट रूप के सहस्त्रों सिर, सहस्त्रों कर्ण, सहस्त्रों नासिकाएँ, सहस्त्रों मुख, सहस्त्रों भुजाएँ तथा सहस्त्रों जंघायें होती हैं। वे सहस्त्रों मुकुट, कुण्डल, वस्त्र और आयुधों से युक्त होते हैं। उस विराट रूप में समस्त लोक ब्रह्माण्ड आदि व्याप्त रहते हैं, उसी के अंशों से समस्त प्राणियों की श्रृष्टि होती है तथा योगीजन उसी विराट रूप का अपनी दिव्य दृष्टि से दर्शन करते हैं।

भगवान का यही विराट स्वरूप भक्तों की रक्षा और दुष्टों के दमन के उद्देश्य से बार-बार अवतार लेते हैं।

  • भगवान ने कौमारसर्ग में सनक, सनन्दन, सनातन तथा सनत्कुमार ब्रह्मऋषियों का अवतार लिया। यह उनका पहला अवतार था।
  • पृथ्वी को रसातल से लाने के लिये भगवान ने दूसरी बार वाराह का अवतार लिया।
  • तीसरी बार ऋषियों को साश्वततंत्र, जिसे कि नारद पाँचरात्र भी कहते हैं और जिसमें कर्म बन्धनों से मुक्त होने का निरूपन है, का उपदेश देने के लिये नारद जी के रूप में अवतार लिया।
  • धर्म की पत्नी मूर्ति देवी के गर्भ से नारायण, जिन्होंने बदरीवन में जाकर घोर तपस्या की, का अवतरण हुआ। यह भगवान का चौथा अवतार है।
  • पाँचवाँ अवतार माता देवहूति के गर्भ से कपिल मुनि का हुआ जिन्होंने अपनी माता को सांख्य शास्त्र का उपदेश दिया।
  • छठवें अवतार में अनुसुइया के गर्भ से दत्तात्रयेय प्रगट हुये जिन्होंने प्रह्लाद, अलर्क आदि को ब्रह्मज्ञान दिया।
  • सातवीं बार आकूति के गर्भ से यज्ञ नाम से अवतार धारण किया।
  • नाभिराजा की पत्नी मेरु देवी के गर्भ से ऋषभदेव के नाम से भगवान का आठवाँ अवतार हुआ। उन्होंने परमहँसी का उत्तम मार्ग का निरूपण किया।
  • नवीं बार राजा पृथु के रूप में भगवान ने अवतार लिया और गौरूपिणी पृथ्वी से अनेक औषधियों, रत्नों तथा अन्नों का दोहन किया।
  • चाक्षुषमन्वन्तर में सम्पूर्ण पृथ्वी के जलमग्न हो जाने पर पृथ्वी को नौका बना कर वैवश्वत मनु की रक्षा करने हेतु दसवीं बार भगवान ने मत्स्यावतार लिया।
  • समुद्र मंथन के समय देवता तथा असुरों की सहायता करने के लिये ग्यारहवीं बार भगवान ने कच्छप के रूप में अवतार लिया।
  • बारहवाँ अवतार भगवान ने धन्वन्तरि के नाम से लिया जिन्होंने समुद्र से अमृत का घट निकाल कर देवताओं को दिया।
  • मोहिनी का रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाने के लिये भगवान ने तेरहवाँ अवतार लिया।
  • चौदहवाँ अवतार भगवान का नृसिंह के रूप में हुआ जिन्होंने हिरण्यकश्यपु दैत्य को मार कर प्रह्लाद की रक्षा की।
  • दैत्य बलि को पाताल भेज कर देवराज इन्द्र को स्वर्ग का राज्य प्रदान करने हेतु पन्द्रहवीं बार भगवान ने वामन के रूप में अवतार लिया।
  • अभिमानी क्षत्रिय राजाओं का इक्कीस बार विनाश करने के लिये सोलहवीं बार परशुराम के रूप में अवतार लिया।
  • सत्रहवीं बार पाराशर जी के द्वारा सत्यवती के गर्भ से भगवान ने वेदव्यास के रूप में अवतार धारण किया जिन्होंने वेदों का विभाजन कर के अने उत्तम ग्रन्थों का निर्माण किया।
  • राम के रूप में भगवान ने अठारहवीं बार अवतार ले कर रावण के अत्याचार से विप्रों, धेनुओं, देवताओं और संतों की रक्षा की।
  • उन्नसवीं बार भगवान ने सम्पूर्ण कलाओं से युक्त कृष्ण के रूप में अवतार लिया।
  • बुद्ध के रूप में भगवान का बीसवाँ अवतार हुआ।
  • कलियुग के अन्त में इक्कीसवीं बार विष्णु यश नामक ब्राह्मण के घर भगवान का कल्कि अवतार होगा।

जब जब दुष्टों का भार पृथ्वी पर बढ़ता है और धर्म की हानि होती है तब तब पापियों का संहार करके भक्तों की रक्षा करने के लिये भगवान अपने अंशावतारों व पूर्णावतारों से पृथ्वी पर शरीर धारण करते हैं।

पुराणों में श्लोक संख्या (Number of shlokas in Puranas)

सुखसागर के अनुसारः

(1) ब्रह्मपुराण में श्लोकों की संख्या दस हजार हैं।

(2) पद्मपुराण में श्लोकों की संख्या पचपन हजार हैं।

(3) विष्णुपुराण में श्लोकों की संख्या तेइस हजार हैं।

(4) शिवपुराण में श्लोकों की संख्या चौबीस हजार हैं।

(5) श्रीमद्भावतपुराण में श्लोकों की संख्या अठारह हजार हैं।

(6) नारदपुराण में श्लोकों की संख्या पच्चीस हजार हैं।

(7) मार्कण्डेयपुराण में श्लोकों की संख्या नौ हजार हैं।

(8) अग्निपुराण में श्लोकों की संख्या पन्द्रह हजार हैं।

(9) भविष्यपुराण में श्लोकों की संख्या चौदह हजार पाँच सौ हैं।

(10) ब्रह्मवैवर्तपुराण में श्लोकों की संख्या अठारह हजार हैं।

(11) लिंगपुराण में श्लोकों की संख्या ग्यारह हजार हैं।

(12) वाराहपुराण में श्लोकों की संख्या चौबीस हजार हैं।

(13) स्कन्धपुराण में श्लोकों की संख्या इक्यासी हजार एक सौ हैं।

(14) वामनपुराण में श्लोकों की संख्या दस हजार हैं।

(15) कूर्मपुराण में श्लोकों की संख्या सत्रह हजार हैं।

(16) मत्सयपुराण में श्लोकों की संख्या चौदह हजार हैं।

(17) गरुड़पुराण में श्लोकों की संख्या उन्नीस हजार हैं।

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Yudhishthir became prince – Mythological Stories in Hindi

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युधिष्ठिर का युवराज पद प्राप्त करना (Yudhishthir became prince – Mythological Stories in Hindi)

महाभारत (Mahabharat) महाकाव्य में युधिष्ठिर का युवराज पद प्राप्त करना, धृतराष्ट्र की चिन्ता तथा कणिक की कूटनीति की कथा आती है जो इस प्रकार है –

पाण्डवों के द्वारा द्रुपद को विजित कर लेने के एक वर्ष पश्चात् युधिष्ठिर को युवराज पद प्रदान कर दिया गया। अपने धैर्य, स्थिरता, सहिष्णुता, नम्रता, अविचल प्रेम, शील, सदाचार, विचारशीलता इत्यादि सद्गुणो के कारण युधिष्ठिर प्रजा के परमप्रिय राजा बन गए।

धनुर्विद्या तथा अस्त्र-शस्त्र संचालन में अर्जुन पहले ही अत्यन्त निपुण थे और एक दिन गुरु द्रोणाचार्य ने उन्हे ब्रह्मशिर नामक अचूक अस्त्र प्रदान करके तथा स्वयं द्रोणाचार्य के साथ कभी युद्ध होने का अवसर आने पर पीछे न हटने का अर्जुन से वचन ले कर उन्हें अजेय बना दिया। भीमसेन ने बलराम से गदायुद्ध का ज्ञान प्राप्त कर लिया, सहदेव ने वृहस्पति से नीतिशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की। अतिरथी नकुल भी अति विनीत होने के साथ ही साथ सभी प्रकार के युद्ध में पारंगत थे।

राज्य के प्रबन्ध में भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव युधिष्ठिर की वीरता तथा पराक्रम के साथ सदैव सहायता करते थे। युधिष्ठिर ने चारों दिशाओं में अनेक राज्यों पर विजय प्राप्त कर लिया और दिनों दिन पाण्डवों की श्रीवृद्धि होने लगी।

पाण्डवों की इस उन्नति से धृतराष्ट्र को अत्यन्त ईर्षा होने लगी और चिन्ता ने उसे व्याप्त लिया। धृतराष्ट्र के द्वारा अपने परम श्रेष्ठ तथा राजनीतिविशारद मन्त्री कणिक के समक्ष अपनी चिन्ता प्रकट करने पर कणिक ने कहा, “राजन्! राजा को सर्वदा दण्ड देने के लिए उद्यत रहना चाहिए तथा दैव के भरोसे न रह कर अपने पौरुष पर ही विश्वास करना चाहिए। शत्रु के साथ परिस्थिति अनुसार साम, दाम, दण्ड या भेद से काम लेना चाहिए। समय के अनुकूल न होने पर शत्रु के अधीन रहना चाहिए किन्तु अवसर प्राप्त होते ही उसे नष्ट कर देना चाहिए। यही राजनीति का मूल मन्त्र है। पाण्डुपुत्रों के साथ भी आपको ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए।”

कणिक की मन्त्रणा सुनकर धृतराष्ट्र ने उसके अनुरूप ही कार्य करने का निश्चय कर लिया।

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English Proverbs with Hindi meaning-1

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अंग्रेजी कहावतें – हिन्दी भावार्थ (English Proverbs with Hindi meaning)

कहावतें (Proverbs) को “गागर में सागर” कहा जा सकता है क्योंकि वे कम से कम शब्दों में बड़ी से बड़ी बातें कह जाती हैं। प्रस्तुत है महत्वपूर्ण अंग्रेजी कहावतों (English Proverbs) के हिन्दी अर्थ।

A journey of a thousand miles begins with one step.
हजारों मील की यात्रा भी एक कदम से शुरू होती है।

A bad penny always turns up.
खोटा सिक्का खोटा ही होता है।

A bean in liberty is better than a comfit in prison.
सम्पन्नतायुक्त गुलामी से विपन्नतायुक्त स्वतंत्रता बेहतर है।

A bellyful is one of meat, drink, or sorrow.
एक पेट मांस-मदिरा से भरा होता है तो एक दुःखों से।

A big tree attracts the woodsman’s axe.
एक बड़ा पेड़ सदा लकड़हारे की कुल्हाड़ी को आकर्षित करता है।

An apple a day keeps the doctor away.
प्रतिदिन एक सेब खाना डॉक्टर से दूरी बनाये रहता है।

A bad workman always blames his tools.
खराब कारीगर हमेशा हथियारों के दोष निकालता है।

A banker is someone who lends you an umbrella when the sun is shining, and who asks for it back when it starts to rain.
बैंकर वो होता है जो कि साधारण धूप रहने के वक्त आपको छाता उधार दे और पानी बरसते वक्त वापस माँग ले।

A bird in the hand is worth two in the bush.
झाड़ पर के दो पक्षियों से हाथ आया एक पक्षी कीमती होता है।

A chain is no stronger than its weakest link.
कोई भी जंजीर अपने कमजोर कड़ी से अधिक मजबूत नहीं होती।

A constant guest never welcomes.
हमेशा आने वाला मेहमान अपना सम्मान खो देता है।

A coward dies a thousand times before his death.
कायर आदमी अपनी मौत से पहले हजारों बार मरता है।

A friend in need is a friend indeed.
समय पर काम आने वाला ही सच्चा मित्र होता है।

A friend to all is a friend to none.
जो सभी का मित्र होता है वह किसी का मित्र नहीं होता।

A good beginning makes a good ending.
एक अच्छी शुरुवात आधी सफलता होती है।

A good man in an evil society seems the greatest villain of all.
खराब समाज में अच्छा आदमी सबसे बड़ा खलनायक होता है।

A guilty conscience needs no accuser.
भले आदमी को किसी पर दोष मढ़ने की आवश्यकता नहीं होती।

A half truth is a whole lie.
आधा सच पूरे झूठ के बराबर होता है।

A jack of all trades is master of none.
जो सभी धंधों का गुलाम होता है वह किसी धंधे का मालिक नहीं होता।

A lie can be halfway around the world before the truth gets its boots on.
सत्य से पराजित होने के पूर्व झूठ आधी दुनिया की यात्रा कर लेता है।

A little knowledge is a dangerous thing.
अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है। (नीम-हकीम खतरा-ए-जान।)

A loaded wagon makes no noise.
अधजल गगरी छलकत जाये।

A miss by an inch is a miss by a mile.
एक इंच की भूल अंततः एक मील की गलती साबित होती है।

A paragraph should be like a lady’s skirt: long enough to cover the essentials but short enough to keep it interesting.
एक पैराग्राफ किसी महिला के स्कर्ट के जैसे होता है, इतना लंबा कि सभी आवश्यक बातें निहित हो जायें और इतना छोटा कि रोचक लगे।

A picture is worth a thousand words.
एक चित्र हजार शब्दों के मूल्य के बराबर होता है।

A pot of milk is ruined by a drop of poison.
एक बूंद विष बर्तन भर दूध को को नष्ट कर देती है।

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Defeat of Drupad – Mythological Stories in Hindi

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द्रुपद की हार (Defeat of Drupad – Mythological Stories in Hindi)

महाभारत (Mahabharat) महाकाव्य में द्रुपद की हार (Defeat of Drupad) की कथा आती है जो इस प्रकार है –

पाण्डवों और कौरवों की शिक्षा पूरी हो पर राजकुमारों ने गुरु द्रोणाचार्य (Dronacharya) से पूछा कि वे गुरुदक्षिणा के रूप में क्या चाहते हैं। इस पर द्रोणाचार्य को याद आ गया कि राज द्रुपद ने कैसे उनका अपमान किया था। उस अपमान का बदला लेने के उद्देश्य से उन्होंने राजकुमारों से कहा, “शिष्यों! अगर तुम गुरुदक्षिणा देना ही चाहते हो तो पाञ्चाल के राजा द्रुपद को कैदी बना कर मेरे सामने लाओ। यही तुम लोगों की गुरुदक्षिणा होगी।”

गुरुदेव के इस प्रकार कहने पर सभी राजकुमार अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र ले कर पाञ्चाल देश की ओर चले।

पाञ्चाल पहुँचने पर अर्जुन ने द्रोणाचार्य से कहा, “गुरुदेव! आप पहले कौरवों को राजा द्रुपद से लड़ने के लिए कहिये। अगर वो लोग द्रुपद को कैद नहीं कर पायेंगे तो हम पाण्डव युद्ध करेंगे।”

गुरु के कहने पर दुर्योधन की अगुवाई में कौरवों ने पाञ्चाल पर हमला बोल दिया। दोनों पक्षों के बीच भयानक लड़ाई होने लगी पर आखिर में कौरव हार कर भाग निकले। कौरवों को भागत देख कर पाण्डवों ने लड़ाई शुरू कर दिया। भीमसेन और अर्जुन की वीरता के सामने पाञ्चाल नरेश की सेना टिक नहीं पाई। अर्जुन ने आगे बढ़ कर द्रुपद को हथकड़ी पहना दी और गुरु द्रोणाचार्य के सामने ले आये।

द्रुपद को कैदी के रूप में देख कर द्रोणाचार्य ने कहा, “हे द्रुपद! अब मैं तुम्हारे राज्य का मालिक हो गया हूँ। मैं तो तुम्हें अपना सखा समझ कर तुम्हारे पास आया था पर तुमने मुझे अपना मित्र स्वीकार नहीं किया था। अब बताओ क्या तुम मेरी मित्रता स्वीकार करते हो?”

द्रुपद ने शर्म से सिर झुका लिया और अपनी भूल के लिये माफी माँगते हुये बोले, “हे द्रोण! आपको अपना मित्र न मानना मेरी गलती थी और उसके लिये अब मेरे मन में बहुत पछतावा है। मैं और मेरा राज्य दोनों ही अब आपके हाथ में हैं, अब आपकी जैसी इच्छा हो करें।”

द्रोणाचार्य ने कहा, “तुमने कहा था कि मित्रता बराबर वालों में ही होती है। इसलिए मैं तुम्हारे बराबर बन कर मित्र भाव रखने के लिये तुम्हें तुम्हारा आधा राज्य लौटा रहा हूँ।”

इतना कह कर द्रोणाचार्य ने गंगा नदी के दक्षिणी तट का राज्य द्रुपद को दे दिया और बाकी को खुद रख लिया।

इसके बाद पाण्डवों ने बहुत सी दूसरी विद्याओं को भी सीखा। भीमसेन ने बलराम को गुरू मान कर खम्भ-गदा आदि की शिक्षा प्राप्त की। इस समय तक युधिष्ठिर के गुणों कि प्रशंसा देश-देशान्तर में होने लगी। समय आने पर धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर को युवराज के पद पर आसीन कर दिया।

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Karna and Arjun – Mythological Stories in Hindi

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कर्ण और अर्जुन (Karna and Arjun)

महाभारत में कर्ण (Karna) और अर्जुन (Arjun) की कथा आतो है, जो इस प्रकार है –

द्रोणाचार्य ने सोचा कि अब पाण्डव और कौरव राजकुमारों ने अस्त्र-शस्त्र चलाना कितना सीखा है इस बात की परीक्षा ले ली जाए। इसके लिये उन्होंने एक विशाल मण्डप बनावाया। उस मण्डप में राज परिवार के लोगों के साथ ही राज्य के जाने-माने लोग भी उपस्थित हुये। सबसे पहले भीम और दुर्योधन में गदा की लड़ाई हुई। दोनों ही पराक्रमी थे। लम्बे समय तक दोनों के बीच गदा लड़ाई चलती रही पर हार-जीत का फैसला नहीं हो पाया। आखिर में गुरु द्रोण का इशारा पाकर अश्वत्थामा ने दोनों को अलग कर दिया।

गदा लड़ाई के बाद अर्जुन (Arjun) अपनी धनुर्विद्या प्रस्तुत करने के लिये आये। उन्होंने सबसे पहले आग्नेयास्त्र चला कर भयानक आग पैदा किया फिर वरुणास्त्र चला कर पानी की बरसात की जिससे जलती हुई आग बुझ गई। इसके बाद उन्होंने वायु-अस्त्र चला कर आँधी उत्पन्न किया। फिर पार्जन्यास्त्र से बादल उत्पन्न कर के दिखाया। इतना ही नहीं अन्तर्ध्यान-अस्त्र चलाया और वहाँ पर उपस्थित लोगों की नजरों से गायब हो कर सभी को अचम्भित कर दिया। वहाँ पर उपस्थित सभी लोग उनकी धनुर्विद्या की तारीफ करने लगे।

अचानक उसी समय एक सूर्य के समान प्रकाशवान योद्धा हाथ में धनुष लिये रंगभूमि में उपस्थित हुये। वे कर्ण थे। कर्ण ने भी वह सब कर दिखाया जो अर्जुन ने किया था। अपने कौशलों का दिखा चुकने के बाद कर्ण ने अर्जुन से कहा, “यदि तुम्हें अपनी धनुर्विद्या पर इतना ही गर्व है तो मुझसे युद्ध करो।”

अर्जुन को कर्ण का इस प्रकार ललकारना बहुत बुरा लगा। अर्जुन ने कहा, “बिना बुलाये मेहमान की जो दशा होती है, आज मैं तुम्हारी भी वही दशा कर दूँगा।”

इस पर कर्ण ने कहा, “रंग मण्डप सबके लिये खुला होता है, यदि तुममें शक्ति है तो धनुष उठाओ।”

उनके इस विवाद को सुन कर नीति मर्मज्ञ कृपाचार्य बोल उठे, “कर्ण! अर्जुन कुन्ती के पुत्र हैं। वे अवश्य तुम्हारे साथ युद्ध के लिये प्रस्तुत होंगे। किन्तु युद्ध के पूर्व तुम्हें भी अपने वंश का परिचय देना होगा क्योंकि राजवंश के लोग कभी नीच वंश के लोगों के साथ युद्ध नहीं करते।”

कृपाचार्य की बात सुन कर कर्ण का मुख श्रीहीन हो गया और वे शर्मसार हो गये। कर्ण की ऐसी हालत देख कर उनके मित्र दुर्योधन ने कहा, “हे गुरुजनों एवं उपस्थित सज्जनों! मैं इसी क्षण अपने परम मित्र कर्ण को अंग देश का राजपद प्रदान करता हूँ। कर्ण अब अंग देश का राजा है। अब एक देश का राजा होने के नाते अब उन्हें अर्जुन से युद्ध का अधिकार मिल गया है।”

दुर्योधन की बात सुन कर भीम ने कर्ण से कहा, “भले ही तुम अब राजा हो गये हो, किन्तु हो तो तुम सूतपुत्र ही। तुम तो अर्जुन के हाथों मरने के भी योग्य नहीं हो। तुम्हारी भलाई इसी में है कि शीघ्र जाकर अपना घोड़े तथा रथ की देखभाल करो।”

वाद-विवाद बढ़ता गया और वातावरण में कटुता आने लगी। यह विचार कर के कि बात अधिक बढ़ने न पाये, द्रोणाचार्य एवं कृपाचार्य ने उस सभा को विसर्जित कर दिया।

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Story of Eklavya – Mythological Stories in Hindi

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एकलव्य की कथा (Story of Eklavya – Mythological Stories in Hindi)

महाभारत (Mahabharat) महाकाव्य में एकलव्य की कथा (Story of Eklavya) आती है जो इस प्रकार है –

द्रोणाचार्य पाण्डवों और कौरवों को अस्त्र-चलाने की विधिवत शिक्षा देने लगे। उन राजकुमारों में अर्जुन के अत्यन्त प्रतिभावान तथा गुरुभक्त होने के कारण वे द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य थे। द्रोणाचार्य का अपने पुत्र अश्वत्थामा पर भी विशेष अनुराग था इसलिये धनुर्विद्या में वे भी सभी राजकुमारों में अग्रणी थे, किन्तु अर्जुन अश्वत्थामा से भी अधिक प्रतिभावान थे। एक रात्रि को गुरु के आश्रम में जब सभी शिष्य भोजन कर रहे थे तभी अकस्मात् हवा के झौंके से दीपक बुझ गया। अर्जुन ने देखा अन्धकार हो जाने पर भी भोजन के कौर को हाथ मुँह तक ले जाता है। इस घटना से उन्हें यह समझ में आया कि निशाना लगाने के लिये प्रकाश से अधिक अभ्यास की आवश्यकता है और वे रात्रि के अन्धकार में निशाना लगाने का अभ्यास करना आरम्भ कर दिया। गुरु द्रोण उनके इस प्रकार के अभ्यास से अत्यन्त प्रसन्न हुये। उन्होंने अर्जुन को धनुर्विद्या के साथ ही साथ गदा, तोमर, तलवार आदि शस्त्रों के प्रयोग में निपुण कर दिया।

उन्हीं दिनों हिरण्य धनु नामक निषाद का पुत्र एकलव्य भी धनुर्विद्या सीखने के उद्देश्य से द्रोणाचार्य के आश्रम में आया किन्तु निम्न वर्ण का होने के कारण द्रोणाचार्य ने उसे अपना शिष्य बनाना स्वीकार नहीं किया। निराश हो कर एकलव्य वन में चला गया। उसने द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई और उस मूर्ति को गुरु मान कर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। एकाग्रचित्त से साधना करते हुये अल्पकाल में ही वह धनु्र्विद्या में अत्यन्त निपुण हो गया।

एक दिन सारे राजकुमार गुरु द्रोण के साथ आखेट के लिये उसी वन में गये जहाँ पर एकलव्य आश्रम बना कर धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था। राजकुमारों का कुत्ता भटक कर एकलव्य के आश्रम में जा पहुँचा। एकलव्य को देख कर वह भौंकने लगा। इससे क्रोधित हो कर एकलव्य ने उस कुत्ते अपना बाण चला-चला कर उसके मुँह को बाणों से से भर दिया। एकलव्य ने इस कौशल से बाण चलाये थे कि कुत्ते को किसी प्रकार की चोट नहीं लगी किन्तु बाणों से बिंध जाने के कारण उसका भौंकना बन्द हो गया।

कुत्ते के लौटने पर जब अर्जुन ने धनुर्विद्या के उस कौशल को देखा तो वे द्रोणाचार्य से बोले, “हे गुरुदेव! इस कुत्ते के मुँह में जिस कौशल से बाण चलाये गये हैं उससे तो प्रतीत होता है कि यहाँ पर कोई मुझसे भी बड़ा धनुर्धर रहता है।” अपने सभी शिष्यों को ले कर द्रोणाचार्य एकलव्य के पास पहुँचे और पूछे, “हे वत्स! क्या ये बाण तुम्हीं ने चलाये है?” एकलव्य के स्वीकार करने पर उन्होंने पुनः प्रश्न किया, “तुम्हें धनुर्विद्या की शिक्षा देने वाले कौन हैं?” एकलव्य ने उत्तर दिया, “गुरुदेव! मैंने तो आपको ही गुरु स्वीकार कर के धनुर्विद्या सीखी है।” इतना कह कर उसने द्रोणाचार्य की उनकी मूर्ति के समक्ष ले जा कर खड़ा कर दिया।

द्रोणाचार्य नहीं चाहते थे कि कोई अर्जुन से बड़ा धनुर्धारी बन पाये। वे एकलव्य से बोले, “यदि मैं तुम्हारा गुरु हूँ तो तुम्हें मुझको गुरुदक्षिणा देनी होगी।” एकलव्य बोला, “गुरुदेव! गुरुदक्षिणा के रूप में आप जो भी माँगेंगे मैं देने के लिये तैयार हूँ।” इस पर द्रोणाचार्य ने एकलव्य से गुरुदक्षिणा के रूप में उसके दाहिने हाथ के अँगूठे की माँग की। एकलव्य ने सहर्ष अपना अँगूठा दे दिया। इस प्रकार एकलव्य अपने हाथ से धनुष चलाने में असमर्थ हो गया तो अपने पैरों से धनुष चलाने का अभ्यास करना आरम्भ कर दिया।

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