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Story of Eklavya – Mythological Stories in Hindi

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एकलव्य की कथा (Story of Eklavya – Mythological Stories in Hindi)

महाभारत (Mahabharat) महाकाव्य में एकलव्य की कथा (Story of Eklavya) आती है जो इस प्रकार है –

द्रोणाचार्य पाण्डवों और कौरवों को अस्त्र-चलाने की विधिवत शिक्षा देने लगे। उन राजकुमारों में अर्जुन के अत्यन्त प्रतिभावान तथा गुरुभक्त होने के कारण वे द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य थे। द्रोणाचार्य का अपने पुत्र अश्वत्थामा पर भी विशेष अनुराग था इसलिये धनुर्विद्या में वे भी सभी राजकुमारों में अग्रणी थे, किन्तु अर्जुन अश्वत्थामा से भी अधिक प्रतिभावान थे। एक रात्रि को गुरु के आश्रम में जब सभी शिष्य भोजन कर रहे थे तभी अकस्मात् हवा के झौंके से दीपक बुझ गया। अर्जुन ने देखा अन्धकार हो जाने पर भी भोजन के कौर को हाथ मुँह तक ले जाता है। इस घटना से उन्हें यह समझ में आया कि निशाना लगाने के लिये प्रकाश से अधिक अभ्यास की आवश्यकता है और वे रात्रि के अन्धकार में निशाना लगाने का अभ्यास करना आरम्भ कर दिया। गुरु द्रोण उनके इस प्रकार के अभ्यास से अत्यन्त प्रसन्न हुये। उन्होंने अर्जुन को धनुर्विद्या के साथ ही साथ गदा, तोमर, तलवार आदि शस्त्रों के प्रयोग में निपुण कर दिया।

उन्हीं दिनों हिरण्य धनु नामक निषाद का पुत्र एकलव्य भी धनुर्विद्या सीखने के उद्देश्य से द्रोणाचार्य के आश्रम में आया किन्तु निम्न वर्ण का होने के कारण द्रोणाचार्य ने उसे अपना शिष्य बनाना स्वीकार नहीं किया। निराश हो कर एकलव्य वन में चला गया। उसने द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई और उस मूर्ति को गुरु मान कर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। एकाग्रचित्त से साधना करते हुये अल्पकाल में ही वह धनु्र्विद्या में अत्यन्त निपुण हो गया।

एक दिन सारे राजकुमार गुरु द्रोण के साथ आखेट के लिये उसी वन में गये जहाँ पर एकलव्य आश्रम बना कर धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था। राजकुमारों का कुत्ता भटक कर एकलव्य के आश्रम में जा पहुँचा। एकलव्य को देख कर वह भौंकने लगा। इससे क्रोधित हो कर एकलव्य ने उस कुत्ते अपना बाण चला-चला कर उसके मुँह को बाणों से से भर दिया। एकलव्य ने इस कौशल से बाण चलाये थे कि कुत्ते को किसी प्रकार की चोट नहीं लगी किन्तु बाणों से बिंध जाने के कारण उसका भौंकना बन्द हो गया।

कुत्ते के लौटने पर जब अर्जुन ने धनुर्विद्या के उस कौशल को देखा तो वे द्रोणाचार्य से बोले, “हे गुरुदेव! इस कुत्ते के मुँह में जिस कौशल से बाण चलाये गये हैं उससे तो प्रतीत होता है कि यहाँ पर कोई मुझसे भी बड़ा धनुर्धर रहता है।” अपने सभी शिष्यों को ले कर द्रोणाचार्य एकलव्य के पास पहुँचे और पूछे, “हे वत्स! क्या ये बाण तुम्हीं ने चलाये है?” एकलव्य के स्वीकार करने पर उन्होंने पुनः प्रश्न किया, “तुम्हें धनुर्विद्या की शिक्षा देने वाले कौन हैं?” एकलव्य ने उत्तर दिया, “गुरुदेव! मैंने तो आपको ही गुरु स्वीकार कर के धनुर्विद्या सीखी है।” इतना कह कर उसने द्रोणाचार्य की उनकी मूर्ति के समक्ष ले जा कर खड़ा कर दिया।

द्रोणाचार्य नहीं चाहते थे कि कोई अर्जुन से बड़ा धनुर्धारी बन पाये। वे एकलव्य से बोले, “यदि मैं तुम्हारा गुरु हूँ तो तुम्हें मुझको गुरुदक्षिणा देनी होगी।” एकलव्य बोला, “गुरुदेव! गुरुदक्षिणा के रूप में आप जो भी माँगेंगे मैं देने के लिये तैयार हूँ।” इस पर द्रोणाचार्य ने एकलव्य से गुरुदक्षिणा के रूप में उसके दाहिने हाथ के अँगूठे की माँग की। एकलव्य ने सहर्ष अपना अँगूठा दे दिया। इस प्रकार एकलव्य अपने हाथ से धनुष चलाने में असमर्थ हो गया तो अपने पैरों से धनुष चलाने का अभ्यास करना आरम्भ कर दिया।

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Chanakya Sutra in Hindi 9

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चाणक्य (Chanakya) के बारे में भला कौन नहीं जानता? वे मौर्य युग के प्रकाण्ड पण्डित एवं महान राजनीतिज्ञ थे। उनकी चाणक्य नीति (Chanakya Neeti) विश्व भर में प्रसिद्ध है।

प्रस्तुत है उनकी लिखी चाण्क्य सूत्र (Chanakya Sutra)

chanakya neeti

  • यदि मुक्ति की कामना करते हो तो समस्त विषय-वासनाओं को विष की भाँति त्यागक दया, पवित्रता, नम्रता और क्षमाशीलता को अपनाओ।
  • दूसरों के दोषों को उजागर करने वाले नीच व्यक्ति उसी प्रकार से नष्ट हो जाते हैं जिस प्रकार से साँप के घर में रहने वाला दीमक।
  • प्रतीत होता है कि सृष्टि के निर्माणकर्ता ब्रह्मा जी को किसी ने यह सलाह नहीं दी कि वे सोने को सुगन्ध, ईख को फल, चन्दन वृक्ष को फूल, विद्वान को धन और राजा को दीर्घायु प्रदान करते।
  • औषधियों में अमृत, इन्द्रिय सुखों में भोजन, इन्द्रयों में नेत्र एवं शरीर के अंगों में सिर प्रधान होते हैं।
  • जो ब्राह्मण सूर्य तथा चन्द्रग्रहण की सटीक भविष्यवाणी करता है वह वास्तव में विद्वान होता है; क्योंकि आकाश में न तो कोई दूत जा सकता है और न ही वहाँ से कोई संदेश लाया जा सकता है।
  • विद्यार्थी, सेवक, पथिक, भूखा आदमी, भयभीत व्यक्ति, कोष का रक्षक और द्वारपाल यदि सो जाएँ तो उन्हें तत्काल जगा देना चाहिए।
  • सर्प, राजा, सिंह, बर्र, बालक, दूसरे का कुत्ता और मूर्ख व्यक्ति को कभी भी सोते से नहीं जगाना चाहिए।
  • धन कमाने के लिए वेदपाठ करने वाला और शूद्रों का अन्न खाने वाला ब्राह्मण शक्तिहीन होते हैं; वे उस सर्प के समान हैं जिनमें विष नहीं; वे न तो शाप दे सकते हैं और न ही वरदान।
  • जिसके क्रोध से भय नहीं उत्पन्न नहीं होता, जिसकी प्रसन्नता से लाभ नहीं होता और जिनमें दण्ड देने का सामर्थ्य नहीं हो ऐसा व्यक्ति कुछ भी नहीं कर सकता।
  • साँप के विष से अधिक उसका फुँफकारना भय उत्पन्न करता है अतः विषहीन होने के बावजूद भी सर्प को फुँफकारना चाहिए।
  • स्वयं के द्वारा गूथे हार को स्वयं पहनने से, स्वयं के द्वारा घिसे चंदन को स्वयं लगाने से और स्वयं के द्वारा रचित स्त्रोत को स्वयं पढ़ने से वैभव का नाश होता है।
  • ईख, तिल, क्षुद्र स्त्री, स्वर्ण, धरती, चंदन, दही, और पान को जितना अधिक मथा जाता है, उनसे उतनी ही अधिक प्राप्ति होती है।
  • दरिद्रता में भी धैर्य रखना चाहिए, नये वस्त्र न होने पर पुराने वस्त्रों को भी स्वच्छ रखना चाहिए, बासी हो जाने पर अन्न को गरम करके खाना चाहिए और कुरूप होने पर सद्व्यवहार से लोगों को प्रभावित करना चाहिए।
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Chanakya Sutra in Hindi 8

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चाणक्य (Chanakya) के बारे में भला कौन नहीं जानता? वे मौर्य युग के प्रकाण्ड पण्डित एवं महान राजनीतिज्ञ थे। उनकी चाणक्य नीति (Chanakya Neeti) विश्व भर में प्रसिद्ध है।

प्रस्तुत है उनकी लिखी चाण्क्य सूत्र (Chanakya Sutra)

chanakya neeti

  • निम्न वर्ग के लोग धन की कामना करते हैं और मध्यम वर्ग के लोग धन तथा यश दोनों की; किन्तु उच्च वर्ग के लोग सिर्फ यश की ही कामना करते हैं क्योंकि यश धन से श्रेष्ठ है।
  • जिस प्रकार दीपक अन्धकार को खाकर कालिख बनाता है अर्थात् काली वस्तु को खाकर काली वस्तु ही बनाता है, उसी प्रकार से मनुष्य जैसा अन्न खाता है वैसा ही विचार बनाता है।
  • बुद्धिमान पुरुष के लिए यही उचित है कि वह अपना धन गुणी तथा योग्य व्यक्ति को दे, किसी अन्य को नहीं क्योंकि समुद्र का जल मेघो के मुँह में जाकर मीठा हो जाता है तथा पृथ्वी के चर-अचर जीवों को जीवनदान देकर कई करोड़ गुना होकर फिर से समुद्र में चला जाता है।
  • तत्वदर्शियों ने कहा है कि एक मलेच्छ हजारों चाण्डालों से भी अधिक नीच होता है, मलेच्छ से बढ़कर नीच अन्य कोई भी नहीं है।
  • शरीर पर तेल लगाने के बाद, शरीर पर चिता का धुआँ लग जाने के बाद, स्त्री संभोग करने के बाद और बाल कटवाने के बाद मनुष्य तब तक चाण्डाल (अशुद्ध) रहता है जब तक कि वह स्नान न कर ले।
  • अपच की अवस्था में जल पीने पर जल औषधि के समान है; भोजन पच जाने के पश्चात जल पीने पर जल शक्तिवर्धक है; भोजन करते समय बीच-बीच में थोड़ा-थोड़ा जल पीने पर जल अमृत के समान है किन्तु भोजन समाप्त करने के तत्काल बाद जल पीने पर जल विष के समान है।
  • ज्ञान को कर्म का रूप न देने पर ज्ञान व्यर्थ हो जाता है; ज्ञान से हीन व्यक्ति मृतक के समान है; सेनापति न होने पर सेना नष्ट हो जाती है; और पति के बिना पत्नी पतित हो जाती है।
  • बुढ़ापे में पत्नी की मृत्यु हो जाना, धन-सम्पदा का बंधु-बांधवों के हाथों चले जाना और भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर होना व्यक्ति के लिए दुर्भाग्य है।
  • यज्ञ कर्मों को न करके केवल वेद मंत्रों का उच्चारण करना व्यर्थ है; दान किये बिना यज्ञ करना व्यर्थ है; और भाव (प्रेम) न होने पर सिद्धि व्यर्थ है।
  • सोने, चांदी, तांबे, पीतल, लकड़ी, पत्थर इत्यादि से बनी मूर्ति में देवता को विद्यमान मानकर उसकी पूजा करनी चाहिए। मनुष्य जिस भाव से पूजा करता है, ईश्वर उसे वैसी ही सिद्धि प्रदान करते हैं।
  • संयम के समान कोई तप नहीं है; संतोष के समान कोई सुख नहीं है; लोभ के समान कोई रोग नहीं है; और दया के समान कोई गुण नहीं है।
  • क्रोध साक्षात यमराज है; लोभ साक्षात वैतरणी (नरक में बहने वाली नदी) है; ज्ञान साक्षात कामधेनु है; और संतोष साक्षात नन्दनवन (देवराज इन्द्र की वाटिका) है।
  • रूप की शोभा गुण में है; कुल की शोभा शील में है; विद्या की शोभा सिद्धि में है; और धन की शोभा भोग में है।
  • गुण न होने पर रूप व्यर्थ है; दुष्ट स्वभाव होने पर कुल का नाश हो जाता है; लक्ष्य न होने पर सिद्धि व्यर्थ है; और सदुपयोग न करने पर धन व्यर्थ है।
  • भूमि के भीतर का जल पवित्र होता है; परिवार को समर्पित पतिव्रता स्त्री पवित्र होती है; लोककल्याण करने वाला राजा पवित्र होता है; और सन्तोष करने वाला ब्राह्मण पवित्र होता है।
  • असन्तोषी ब्राह्मण, सन्तोषी राजा, लज्जाशील वेश्या और निर्लज्ज कुलीन स्त्री का नाश जल्दी ही हो जाता है।
  • उच्च कुल में जन्मे अज्ञानी एवं मूर्ख का कोई सम्मान नहीं करता जबकि नीच कुल में जन्मे विद्वान का सभी देवता के समान सम्मान करते हैं।
  • विद्वान ही सर्वत्र सम्मान पाता है; विद्या ही श्रेष्ठ है; विद्या की सर्वत्र पूजा होती है।
  • विद्या से हीन सुन्दर, युवा और कुलीन व्यक्ति पलाश के फूल के समान होता है जिसमें सुन्दरता तो होती है किन्तु सुगन्ध नहीं होती।
  • मांस-मदिरा का सेवन करने वाले तथा विद्या से हीन व्यक्ति मनुष्य के रूप में पशु और धरती के लिए बोझ होते हैं।
  • यज्ञ के पश्चात भोजन न करवाने पर यज्ञ राजा को जलाता है; अशुद्ध मंत्रोच्चार करने पर यज्ञ ऋत्विज (यज्ञ सम्पन्न करने वाला ब्राह्मण) को जलाता है; और यज्ञ के पश्चात दान न करने पर यज्ञ यजमान को जलाता है।
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Story of Kripacharya and Dronacharya – Mythological Stories in Hindi

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कृपाचार्य एवं द्रोणाचार्य की कथा (Story of Kripacharya and Dronacharya – Mythological Stories in Hindi)

महाभारत (Mahabharat) महाकाव्य में कृपाचार्य तथा द्रोणाचार्य (Kripacharya and Dronacharya) की कथा आती है जो इस प्रकार है –

गौतम ऋषि के एक पुत्र थे जिनका नाम शरद्वान था। शरद्वान धनुष-बाण के साथ ही पैदा हुए थे। उनका मन वेदाभ्यास में जरा भी नहीं लगता था पर धनुर्विद्या से उन्हें बहुत प्रेम था। वे धनुष-बाण चलाने की विद्या में इतने माहिर हो गये कि देवताओं के राजा इन्द्र भी उनसे डरने लगे। शरद्वान को धनुर्विद्या की साधना से डिगाने के लिये इन्द्र ने उनके पास नामपदी नाम की एक देवकन्या को भेज दिया। उस देवकन्या की सुन्दरता से प्रभावित होकर शरद्वान इतने कामपीड़ित हुये कि उनका वीर्य स्खलित हो कर एक सरकंडे पर आ गिरा। इससे वह सरकंडा दो भागों में बँट गया। उस सरकंडे के एक भाग से कृप नामक बालक का जन्म हुआ और दूसरे भाग से कृपी नामक कन्या पैदा हुई। कृप भी धनुष-बाण चलाने की विद्या में अपने पिता के समान ही माहिर हो गये।

कृप की धनुर्विद्या में निपुणता को देख कर भीष्म ने उन्हें पाण्डवों और कौरवों की शिक्षा-दीक्षा के लिये नियुक्त कर दिया और वे कृपाचार्य के नाम से विख्यात हुये।

बहुत पहले की बात है एक बार भरद्वाज मुनि गंगा नदी में नहाने गये। जब वे गंगा नदी के पास पहुँचे तो वहाँ पर घृतार्ची नाम की एक अप्सरा स्नान करके निकल रही थी। उस अप्सरा को देख कर भरद्वाज मुनि के मन में काम वासना से ग्रसित हो गये और उनका वीर्य स्खलित हो गया। उन्होंने उस वीर्य को एक यज्ञ पात्र में रख दिया।

समय बीतने पर उस यज्ञ पात्र से एक बालक पैदा हुआ जिसका नाम भरद्वाज जी ने द्रोण रख दिया। द्रोण अपने पिता के आश्रम में ही रहते हुये वेदाभ्यास करने लगे तथा अस्त्र-शस्त्र चलाने की विद्या सीखने लगे। धीरे-धीरे द्रोण चारों वेदों और अस्त्र-शस्त्र की विद्या में माहिर हो गये। द्रोण के साथ प्रषत् नाम के राजा का बेटा द्रुपद भी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। उन दोनों में गाढ़ी दोस्ती हो गई।

एक बार द्रोण को पता चला कि परशुराम जी अपनी सारी सम्पत्ति को ब्राह्मणों में दान कर के महेन्द्राचल पर्वत पर तप करने जा रहे हैं। द्रोण भी उनके पास पहुँचे और उनसे दान देने का अनुरोध किया। परशुराम बोले, “वत्स! तुम बहुत देर से आये हो, मैंने तो अब तक अपना सब कुछ ब्राह्मणों को दान में दे डाला है। अब मेरे पास केवल अस्त्र-शस्त्र ही बाकी बचे हैं। तुम चाहो तो उन्हें दान में ले सकते हो।”

द्रोण तो उनके अस्त्र-शस्त्रों को ही दान में लेने गये थे। इसलिये वे बोले, “हे गुरुदेव! आपके अस्त्र-शस्त्र पाकर मुझे बहुत खुशी होगी, पर आपको मुझे इन अस्त्र-शस्त्रों को चलाने की शिक्षा भी देनी होगी और इनके सारे विधि-विधान भी बताने होंगे।”

इस प्रकार द्रोण परशुराम के शिष्य बन गये और अस्त्र-शस्त्रादि सहित समस्त विद्याओं के बहुत बड़े ज्ञाता हो गये।

जब उनकी शिक्षा पूरी हो गई तो द्रोण वापस लौट आये और उनका विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी के साथ हो गया। कृपी से उनका एक बेटा हुआ जिसके पैदा होते समय उसके मुँह से घोड़े के जैसी आवाज निकली। अश्व जैसी ध्वनि करने के कारण उसका नाम अश्वत्थामा रखा गया।

द्रोण को किसी भी राजा का आश्रय प्राप्त नहीं था इसलिए वे अपनी पत्नी कृपी तथा पुत्र अश्वत्थामा के साथ गरीबी में गुजारा कर रहे थे। एक दिन उनका बेटा अश्वत्थामा दूध पीने के लिये मचल उठा। पर अपनी गरीबी के कारण द्रोण अपने पुत्र के लिये गाय के दूध की व्यवस्था भी न कर सके। उन्हें अपनी निर्धनता पर बड़ा दुख हुआ। एकाएक उन्हें अपने बचपन के सखा राजा द्रुपद की याद आ गई जो कि पांचाल देश के राजा बन चुके थे। द्रोण ने द्रुपद के पास जाकर कहा, “मित्र! मैं तुम्हारा सहपाठी रह चुका हूँ। मुझे दूध के लिये एक गाय की जरूरत है और तुमसे सहायता प्राप्त करने की उम्मीद ले कर मैं तुम्हारे पास आया हूँ।”

राजा बन जाने पर द्रुपद अपनी पुरानी दोस्ती को भूल चुका था और उनमें घमंड भी आ गया था। इसलिए वे द्रोण पर बिगड़ उठे और कहा, “तुम्हें मुझको अपना दोस्त बताते हुये शर्म नहीं आती? दोस्ती सिर्फ समान वर्ग के लोगों में होती है, तुम जैसे निर्धन और मुझ जैसे राजा में नहीं।”

अपमानित होकर द्रोण वहाँ से लौट आये और कृपाचार्य के घर रहने लगे। एक दिन युधिष्ठिर आदि राजकुमार जब गेंद खेल रहे थे तो उनकी गेंद एक कुएँ में गिर गई। उधर से गुजरते हुये द्रोण से राजकुमारों ने गेंद को कुएँ से निकालने लिये अनुरोध किया। द्रोण ने कहा, “यदि तुम लोग मेरे तथा मेरे परिवार के लिये भोजन की व्यवस्था करो तो मैं तुम्हारा गेंद निकाल दूँगा।”

युधिष्ठिर बोले, “देव! यदि हमारे दादा जी की अनुमति होगी तो हमेशा के लिए आप और आपके परिवार के लिये भोजन की व्यवस्था हो जाएगी।”

द्रोणाचार्य ने उसी क्षण एक मुट्ठी सींक लेकर उसे मन्त्र से अभिमन्त्रित किया और एक सींक से गेंद को छेदा। फिर दूसरे सींक से गेंद में फँसे सींक को छेदा। इस प्रकार सींक से सींक को छेदते हुये गेंद को कुएँ से निकाल दिया।

जब भीष्म को इस अद्भुत प्रयोग के बारे में पता चला और द्रोण के समस्त विषयों मे प्रकाण्ड पण्डित होने के बारे में जानकारी हुई तो भीष्म पितामह ने उन्हें राजकुमारों के उच्च शिक्षा के नियुक्त कर राजाश्रय में ले लिया और वे द्रोणाचार्य (Dronacharya) के नाम से विख्यात हुये।

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Chanakya Sutra in Hindi 7

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चाणक्य (Chanakya) के बारे में भला कौन नहीं जानता? वे मौर्य युग के प्रकाण्ड पण्डित एवं महान राजनीतिज्ञ थे। उनकी चाणक्य नीति (Chanakya Neeti) विश्व भर में प्रसिद्ध है।

प्रस्तुत है उनकी लिखी चाण्क्य सूत्र (Chanakya Sutra)

chanakya neeti

  • बुद्धिमान व्यक्ति धन के नाश, मन के संताप, पत्नी के दोष, स्वयं के द्वारा खाये जाने वाले धोखा और स्वयं के अपमान को किसी को नहीं बताते।
  • वही व्यक्ति सुखी होता है जो धन सम्बन्धी व्यवहार करने में, ज्ञानर्जन में, भोजन करने में और ईमानदारी से काम करने में संकोच नहीं करता।
  • जो सुख संतोषी व्यक्ति को संतोष प्राप्त करने में मिलता है वही सुख लोभी व्यक्ति को धन प्राप्त करने पर भी नहीं मिलता।
  • स्वयं की पत्नी से, उपलब्ध भोजन से और अपने कमाये धन से हमेशा संतुष्ट रहना चाहिए। किन्तु विद्याभ्यास, तप और परोपकार करने में हमेशा असंतुष्ट रहना चाहिए।
  • दो ब्राह्मणों, ब्राह्मण और यज्ञ की अग्नि, पति और पत्नी, स्वामी और सेवक तथा हल और बैल के बीच कभी नहीं पड़ना चाहिए।
  • अग्नि, गुरु, ब्राह्मण, गाय, कन्या, वृद्ध और बालक को कभी भी चरण से स्पर्श नहीं करना चाहिए।
  • सींग वाले पशु से दस हाथ की, घोड़े से सौ हाथ की और हाथी से हजार हाथ की दूरी रखना चाहिए किन्तु जिस स्थान में दुष्ट हों उस स्थान का ही त्याग कर देना चाहिए।
  • हाथी को अंकुश से, घोड़े को चाबुक से, सींग वाले पशु को डंडे से और दुष्ट व्यक्ति को तलवार से नियन्त्रित करना चाहिए।
  • ब्राह्मण भोजन पाकर, मोर मेघ की गर्जन सुनकर, साधु दूसरों की सम्पन्नता देखकर और दुष्ट दूसरों को विपत्ति में देखकर प्रसन्न होते हैं।
  • स्वयं से अधिक शक्तिशाली को समझौता करके, अपने समान शक्ति वाले को स्थिति अनुसार युद्ध या समझौता करके और अपने से दुर्बल को अपनी शक्ति का प्रभाव दिखाकर वश में करना चाहिए।
  • राजा की शक्ति बाहुबल में, ब्राह्मण की शक्ति ज्ञान में और स्त्री की शक्ति सौन्दर्य तथा माधुर्य में होती है।
  • अत्यधिक सरल और सीधा होना भी अच्छी बात नहीं है; वन के सीधे वृक्ष ही काटे जाते हैं, टेढ़े नहीं।
  • जिस प्रकार से सरोवर के पानी सूख जाने पर हंस सरोवर को छोड़ देता है उसी प्रकार से व्यक्ति के सद्व्यवहार करना छोड़ देने पर लोग उससे नाता तोड़ लेते हैं।
  • जिस प्रकार से स्थिर जल से प्रवाहित जल अच्छा होता है उसी प्रकार से संचित किये जाने वाले धन से दान दिया जाने वाला धन अच्छा होता है।
  • संसार में जिस व्यक्ति के पास धन है उसके सभी मित्र और सगे-सम्बन्धी हैं, वही श्रेष्ठ माना जाता है, उसे ही मान-सम्मान मिलता है और वही शानोशौकत से जीता है।
  • परोपकार करना, मधुर वचन कहना, भगवान की आराधना करना और ब्राह्मण को भोजन तथा दान से सन्तुष्ट करना सद्पुरुए और देवताओं के गुण हैं।
  • अत्यधिक क्रोध करना, कठोर वचन कहना, सम्बन्धियों से बैर रखना, नीच व्यक्ति से मित्रता करना तथा नीच कुल के व्यक्ति की नौकरी करना – ये पाँच कार्य ऐसे हैं जो भूलोक में ही नरक के दुखों का आभास कराते हैं।
  • शेर की मांद में जाकर गजमुक्ता पाया जा सकता है और सियार के मांद में जाकर सिर्फ बछड़े की पूँछ या गधे का चमड़ा ही पाया जा सकता है।
  • विद्या से हीन व्यक्ति किसी कुत्ते की पूँछ के समान होता है जिससे न तो इज्जत ढाँकी जा सकती है और न ही मक्खियों को दूर किया जा सकता है।
  • वाणी की पवित्रता, मन की स्वच्छता और इन्द्रियों को वश में रखने का तब तक कुछ भी महत्व नहीं है जब तक कि मन में करुणा न हो।
  • जिस प्रकार से दिखाई न देने के बावजूद भी फूल में सुगंध, तिल में तेल, लकड़ी में अग्नि, दूध में घी और गन्ने में गुड़ विद्यमान रहता है उसी प्रकार से शरीर में आत्मा विद्यमान रहती है।
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Birth of Duryodhana and other Kauravas – Mythological Stories in Hindi

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दुर्योधन तथा अन्य कौरवों का जन्म (Birth of Duryodhana and other Kauravas)

महाभारत (Mahabharat) महाकाव्य में दुर्योधन तथा अन्य कौरवों का जन्म (Birth of Duryodhana and other Kauravas) की कथा आती है जो इस प्रकार है –

एक बार वेदव्यास हस्तिनापुर पहुँचे। वहाँ पर गांधारी ने उनकी बहुत सेवा की। गांधारी की सेवा से प्रसन्न होकर वेद व्यास जी ने उससे वर माँगने के लिए कहा। गांधारी ने पति के समान पुत्र पाने का वर माँगा और वेदव्यास ने तथास्तु कह दिया।

कुछ दिनों बाद गांधारी गर्भवती हो गई। गांधारी का वह गर्भ दो साल तक उसके पेट ही में रहा। तब तक कुन्ती के गर्भ से युधिष्ठिर का जन्म हो चुका था। इससे गांधारी को बहुत अधिक क्षोभ हुआ और उसने गुस्से मेँ आकर अपने पेट पर जोर का मुक्का मार कर गिरा दिया। गर्भ से निकले हुए पिंड को गंगा में बहा देने का निश्चय कर लिया। अपने योगबल से वेदव्यास को यह सब कुछ पता चल गया। वे तत्काल गांधारी के पास पहुँचे और गांधारी से कहा, “गांधारी, तूने यह गलत किया है। मेरा दिया हुआ वर कभी झूठा नहीं हो सकता। अब तुम जल्दी से सौ कुण्ड तैयार करवा कर उनमें घी भरवा दो।”

गांधारी ने वेदव्यास के कहे अनुसार वैसा ही किया। वेदव्यास ने उस पिंड पर अभिमन्त्रित जल छिड़का तो उस पिंड के अँगूठे के पोरुवे के बराबर सौ टुकड़े हो गये। वेदव्यास ने उन सौ टुकड़ों को घी से भरे सौ कुण्डों में रख दिया और उन्हें दो साल बाद खोलने का आदेश देकर चले गये।

दो साल के बाद उन्हीं कुण्डों में से दुर्योधन और अन्य कौरवों के साथ एक पुत्री का जन्म हुआ। पुत्री का नाम दुश्शला रखा गया। दुर्योधन के जन्म के दिन ही कुन्ती के गर्भ से महापराक्रमी भीम का जन्म हुआ।

इधर दुर्योधन जन्म लेते ही गधे के जैसा रेंकने लगा। इस पर ज्योतिषियों ने धृतराष्ट्र से कहा, “राजन! आपका यह पुत्र कुल का नाश करने वाला होगा। इसे त्याग देना ही उचित है।”

पर पुत्र के मोह के कारण धृतराष्ट्र उसे त्याग नहीं सके।

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Chanakya Sutra in Hindi 6

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चाणक्य (Chanakya) के बारे में भला कौन नहीं जानता? वे मौर्य युग के प्रकाण्ड पण्डित एवं महान राजनीतिज्ञ थे।

प्रस्तुत है उनकी लिखी चाण्क्य सूत्र (Chanakya Sutra)

chanakya neeti

  • शास्त्रों के श्रवण से धर्म का ज्ञान होता है, द्वेष का नश होता है, ज्ञान की प्राप्ति होती है और माया से आसक्ति दूर होती है।
  • पक्षियों में कौवा नीच है; पशुओं में कुत्ता नीच है; तपस्वियों में पाप करने वाला तपस्वी घृणास्पद है; और मनुष्यों में दूसरों की निन्दा करने वाला सबसे बड़ा चांडाल है।
  • राख से माँजने पर काँसे का बर्तन शुद्ध होता है; इमली से माँजने से तांबे का बर्तन शुद्ध होता है; रजस्वला होकर स्त्री शुद्ध होती है; और तीव्र गति से प्रवाहित होकर नदी निर्मल होती है।
  • राजा, ब्राह्मण और योगी भ्रमण में जाते हैं तो सम्मानित होते हैं; किन्तु घर से बाहर अकारण भ्रमण करने वाली स्त्री भ्रष्ट होती है।
  • पास में धन होने पर अनेक मित्र व सम्बन्धी बनते हैं; धनवान ही सद्पुरुष एवं पण्डित कहलाता है।
  • होनी अर्थात् ईश्वरेच्छा जैसी होती है वैसी ही बुद्धि और कर्म हो जाते हैं; सहायक भी ईश्वरेच्छा से प्राप्त होते हैं।
  • काल ही पंच भूतो (पृथ्वी,जल, वायु, अग्नि, आकाश) को पचाता है; काल ही प्राणियों का संहार करता है; काल की सीमा को कोई भी नहीं लांघ सकता; काल के जागृत होने पर प्राणी सुसुप्त अवस्था में चला जाता है।
  • जन्म से अंधे व्यक्ति को दिखाई नहीं देता; कामासक्त व्यक्ति को सुझाई नहीं देता; मद से मतवाला व्यक्ति सोच नहीं सकता; और स्वार्थी व्यक्ति को स्वयं में कोई दोष दिखाई नहीं देता।
  • जीव अनेक प्रकार के अच्छे-बुरे कर्म करता है और अपने कर्मों के फल को भोगता है; जीव स्वयं संसार के माया-मोह में फँसता है और अन्त में संसार को त्याग देता है।
  • राजा को प्रजा के द्वारा किये गए पाप को, राजपुरोहित को राजा के द्वारा किए गये पाप को, पति को पत्नी के द्वारा किए गये पाप को और गुरु को शिष्यों के द्वारा किए गये पाप को भोगना पड़ता है।
  • कर्ज में डूबा रहने वाला पिता शत्रु है; व्याभिचारिणी माता शत्रु है; मूर्ख पुत्र शत्रु है; और सुन्दर स्त्री शत्रु है।
  • लोभी को धन से, घमंडी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को उसके अनुसार व्यवहार से और पंडित को सच्चाई से वश में करना चाहिए।
  • दुष्ट राजा के राज्य में रहने की अपेक्षा बिना राज्य के ही रहना उत्तम है; दुष्ट मित्र के साथ रहने की अपेक्षा बिना मित्र के ही रहना उत्तम है; नीच शिष्य बनाने अपेक्षा शिष्य न बनाना ही उत्तम है; और दुष्ट एवं कुलटा स्त्री के साथ रहने की अपेक्षा बिना स्त्री के ही रहना उत्तम है।
  • दुष्ट राजा के राज्य में प्रजा को सुख कहाँ? दुष्ट मित्र के साथ रहने से शान्ति कहाँ? दुष्ट एवं कुलटा नारी के संग रहने में सुख कहाँ? नीच शिष्य को ज्ञान देने में कीर्ति कहाँ?
  • मनुष्य को शेर तथा बगुले से एक, गधे से तीन, मुर्गे से चार, कौवे से पाँच और कुत्ते से छः गुण सीखना चाहिए।
  • जिस प्रकार से सिंह अपने शिकार को, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, एक बार पकड़ लेता है तो छोड़ता नहीं, उसी प्रकार से किसी काम को, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, एक बार हाथ में ले लेने के बाद छोड़ना नहीं चाहिए।
  • जिस प्रकार से बगुला अपने समस्त इन्द्रियों को संयम में रखकर शिकार करता है उसी प्रकार देश, काल और अपने सामर्थ्य को ध्यान में रखकर कार्य करना चाहिए।
  • बहुत थक जाने के बावजूद भी बोझ ढोना, ठंडे-गर्म का विचार न करना, सदा संतोषपूर्वक विचरण करना, ये तीन बातें गधे से सीखनी चाहिए।
  • ब्राह्ममुहूर्त में जागना, रण में पीछे न हटना, किसी वस्तु का बन्धुओ में बराबर भाग करना और स्वयं आक्रमण करके दूसरे से अपने भक्ष्य को छीन लेना, ये चार बातें मुर्गे से सीखनी चाहिए।
  • गुप्त स्थान में मैथुन करना, छिपकर चलना, समय-समय पर सभी इच्छित वस्तुओं का संग्रह करना, सभी कार्यो में सावधानी रखना और किसी पर भी जल्दी विश्वास न करना – ये पाँच बातें कौवे से सीखना चाहिए।
  • भोजन करने की अत्यधिक शक्ति रखने के बावजूद भी थोड़े भोजन से ही संतुष्ट हो जाना, गहरी नींद में भी जरा-सा खटका होने पर ही जाग जाना, अपने रक्षक से प्रेम करना और शूरता दिखाना – ये छः गुण कुत्ते से सीखना चाहिए।
  • उपरोक्त गुणों को अपने जीवन में उतारकर आचरण करने वाला मनुष्य सदैव सभी कार्यो में विजय प्राप्त करता है।
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Birth of Pandavas – Mythological Stories in Hindi

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पाण्डवों का जन्म (Birth of Pandavas)

महाभारत (Mahabharat) महाकाव्य में पाण्डवों का जन्म (Birth of Pandavas) की कथा आती है जो इस प्रकार है –

पाण्डु (Pandu) अपने दोनों पत्नियों के साथ वन में रहने लगे। एक बार अमावस्या के दिन पाण्डु ने देखा कि बड़े-बड़े ऋषि-मुनि ब्रह्मा के दर्शन के लिये जा रहे हैं। जब पाण्डु ने स्वयं को भी अपने साथ ले जाने के लिए उनसे अनुरोध किया तो ऋषि-मुनियों ने कहा, “हे राजन! बिना सन्तान वाला कोई भी व्यक्ति ब्रह्मलोक नहीं जा सकता। इसलिए हम आपको अपने साथ नहीं ले जा सकते।”

यह सुनकर पाण्डु को बहुत दुख हुआ और वे कुन्ती से बोले- “हे कुन्ती! सन्तान के बिना तो मेरा जन्म ही बेकार है। बगैर सन्तान का कोई भी व्यक्ति पितृ-ऋण, ऋषि-ऋण, देव-ऋण तथा मनुष्य-ऋण से मुक्ति नहीं पा सकता। अब मेरा जीना व्यर्थ है।”

पाण्डु के दुख को देखकर कुन्ती बोली़, “हे आर्यपुत्र! मेरे पास दुर्वासा ऋषि का दिया हुआ एक ऐसा मन्त्र है जिससे मैं किसी भी देवता को बुलाकर अपनी इच्छा की वस्तु पा सकती हूँ। आप आदेश दें कि सन्तान पाने के लिए मैं किस देवता को बुलाऊँ?”

इस पर पाण्डु ने धर्मराज को बुलाने का आदेश दिया। कुंती के आह्वान पर धर्मराज ने आकर उसे एक पुत्र होने का वर दिया, जिसका नाम युधिष्ठर रखा गया।

बाद में पाण्डु ने कुन्ती को फिर से पुत्र पाने के लिए पहली बार वायु देव को और दूसरी बार इन्द्र देव को बुलाने की आज्ञा दी। वायुदेव से भीम तथा इन्द्र से अर्जुन नामक पुत्र उत्पन्न हुए। फिर पाण्डु की आज्ञा से कुन्ती ने माद्री को भी उस मन्त्र की दीक्षा दी। इस मंत्र की सहायता से माद्री ने अश्विनीकुमारों को बुलाया और नकुल तथा सहदेव का जन्म हुआ।

एक दिन राजा पाण्डु माद्री के साथ जंगल में नदी के किनारे भ्रमण कर रहे थे। वातावरण अत्यन्त रमणीक था और शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु चल रही थी। एकाएक हवा के झोंके से माद्री का वस्त्र उड़ गया। इससे पाण्डु का मन चंचल हो उठा और वे मैथुन में प्रवृत हुये ही थे कि ऋषि किन्दम के शाप के कारण उनकी मृत्यु हो गई। खुद को पाण्डु की मृत्यु का कारण मानकर माद्री भी उनके साथ सती हो गई, पर पुत्रों के पालन-पोषण के लिये कुन्ती हस्तिनापुर लौट आई।

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Chanakya Sutra in Hindi 5

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चाणक्य (Chanakya) के बारे में भला कौन नहीं जानता? वे मौर्य युग के प्रकाण्ड पण्डित एवं महान राजनीतिज्ञ थे।

प्रस्तुत है उनकी लिखी चाण्क्य सूत्र (Chanakya Sutra)

chanakya neeti

  • द्विजों के लिए अग्नि पूज्य है; अन्य वर्ण के लोगों के लिए ब्राह्मण पूज्य है; पत्नी के लिए पति पूज्य है; और मध्याह्नभोज के समय आने वाला अतिथि सभी के लिए पूज्य है।
  • जिस प्रकार से सोने को घिसकर, काटकर, गरम करके और पीटकर परखा जाता है, उसी प्रकार से व्यक्ति को उसके त्याग, आचरण, गुण तथा व्यवहार से परखा जाता है।
  • भय से तभी तक भयभीत होना चाहिए जब तक भय आने की आशंका हो, किन्तु भय के आ जाने पर निःसंकोच उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
  • जैसे बेर के पेड़ में फले सारे बेर एक जैसे नहीं होते, उसी प्रकार से एक ही गर्भ से और एक ही नक्षत्र में उत्पन्न व्यक्तियों के स्वभाव भी एक जैसे नहीं होते।
  • किसी वस्तु के प्रति आसक्ति नहीं होने पर उस वस्तु का अधिकारी भी नहीं बना जा सकता। वासना का त्याग कर देने वाला श्रृंगार नहीं करता; मूर्ख व्यक्ति मृदुभाषी नहीं होता; और स्पष्ट बात करने वाला धोखा नहीं देता।
  • मूर्ख विद्वान से इर्ष्या करते हैं; दरिद्र धनवान से इर्ष्या करते हैं; बुरे आचरण वाली स्त्री पतिव्रता से इर्ष्या करती हैं; और कुरूप स्त्री सुन्दर स्त्री से इर्ष्या करती हैं।
  • आलस्य से विद्या का नाश होता है; भरोसा कर के दूसरों को दे देने से धन का नाश होता है; लापरवाही से बुआई करने पर बीजों का नाश होता है; और सेनापति के बिना सेना का नाश होता है।
  • विद्या अभ्यास से आती है; कुल का बड़प्पन सुशील स्वभाव से होता है; श्रेष्ठता की पहचान गुणों से होती है; और क्रोध का पता आँखों से चलता है।
  • धर्म की रक्षा धन से होती है; ज्ञान की रक्षा निरन्तर साधना से होती है; राजकोप से मृदु स्वभाव द्वारा रक्षा होती है और घर की रक्षा कर्तव्य परायण गृहणी से होती है।
  • वैदिक पाण्डित्य तथा शास्त्रों के ज्ञान को को व्यर्थ बताने वाले लोग स्वयं व्यर्थ हैं।
  • दान से दारिद्र्य का; सदाचार से दुर्भाग्य का; विवेक से अज्ञान का; और परीक्षण से भय का नाश होता है।
  • काम वासना से बढ़कार कोई रोग नहीं होता; मोह से बढ़कर कोई शत्रु नहीं होता; क्रोध से बढ़कर कोई आग नहीं होता; और ज्ञान से बढ़कर कोई सुख नहीं होता।
  • व्यक्ति अकेला ही जन्म लेता है, अकेला ही मरता है, अकेला ही अपने अच्छे बुरे कर्मों को भोगता है और अकेला ही नर्क में जाता है या मोक्ष प्राप्त करता है।
  • ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि में स्वर्ग तुच्छ है; पराक्रमी योद्धा की दृष्टि में जीवन तुच्छ है; इन्द्रियों को जीत लेने वाले की दृष्टि में स्त्री तुच्छ है; तत्वज्ञानी की दृष्टि में समस्त संसार तुच्छ है।
  • विदेश में विद्या मित्र है; घर में पत्नी मित्र है; रोगी के लिए औषधि मित्र है; और मरने वाले के लिए धर्म मित्र है।
  • समुद्र होने वाली वर्षा व्यर्थ है; तृप्त व्यक्ति को भोजन कराना व्यर्थ है; धनी व्यक्ति को दान देना व्यर्थ है; और दिन में दिया जलाना व्यर्थ है।

 

  • वर्षा के जल के समान कोई जल नहीं है; आत्मबल के समान कोई बल नहीं है; नेत्र की ज्योति के समान कोई प्रकाश नहीं है; और अन्न के समान कोई सम्पत्ति नहीं है।
  • निर्धन को धन की कामना होती है; पशु को वाणी की कामना होती है; मनुष्य को स्वर्ग की कामना होती है; और देवताओं को मोक्ष की कामना होती है।
  • सत्य से पृथ्वी टिकी है; सत्य से सूर्य प्रकाशित है; सत्य से वायु प्रवाहित होती है; संसार के समस्त पदार्थों में सत्य ही निहित है।
  • लक्ष्मी अस्थिर है; प्राण अस्थिर है; संसार में सिर्फ धर्म ही स्थिर है।
  • पुरुषों में नाई धूर्त होता है; पक्षियों में कौवा धूर्त होता है; पशुओं में गीदड़ धूर्त होता है; और औरतों में मालिन धूर्त होती है।
  • जन्म देने वाला, यज्ञोपवीत संस्कार कराने वाला, विद्या प्रदान करने वाला, अन्न देने वाला और भय से मुक्ति दिलाने वाला – ये पाँच पिता कहे गए हैं।
  • राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, पत्नी की माता तथा स्वयं की माता को माता समझना चाहिए।
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Pandu cursed by Kindam Rishi – Mythological Stories in Hindi

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किन्दम ऋषि (Kindam Rish) का पाण्डु को शाप (Pandu cursed by Kindam Rishi)

महाभारत (Mahabharat) महाकाव्य में किन्दम ऋषि का पाण्डु को शाप की कथा आती है जो इस प्रकार है –

राजा पाण्डु एक बार जंगल में शिकार खेलने गये। वह वन हिंसक जानवरों से भरा हुआ और बड़ा भयंकर था। वन में घूमते-घूमते उन्हें एक हिरणों का एक मैथुनरत जोड़ा दिखाई दिया। पाण्डु ने उसी क्षण अपने बाण से उस हिरण को घायल कर दिया। मरने के पहले उस हिरण ने पाण्डु से कहा, “हे राजन! तुम्हारे जैसा कठोर आदमी इस संसार में कोई भी नहीं होगा। बड़े से बड़ा कामी, क्रोधी, बुद्धिहीन और पापी आदमी भी ऐसा कठोर काम नहीं करता। मैंने आपका क्या अपराध किया था जो आपने मुझे मारा? मैं एक तपस्वी ऋषि हूँ और मेरा नाम किन्दम है। मनुष्य के रूप मैथुन कर्म करने में मुझे लाज आ रही थी इसलिए मैंने मृग का रूप धारण किया था। मैं ब्राह्मण हूँ। पर इस बात से अनजान होने के कारण आपको ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगेगा। परन्तु जिस अवस्था में आपने मुझे मारा है, वह किसी के वध करने के लिए सर्वथा अनुपयुक्त थी। तूने मुझे मैथुन के समय तीर मारा है तो मैं भी तुझे शाप देता हूँ कि जब कभी भी तू मैथुनरत होगा तेरी मृत्यु हो जायेगी।” इतना कहकर किन्दम ने अपने प्राण त्याग दिए।

इस शाप से पाण्डु को बहुत दुःख हुआ और वे अपनी रानियों से बोले, “हे देवियों! अब मैं अपनी सारी वासनाओं का त्याग कर इस जंगल में ही रहूँगा। तुम लोग हस्तिनापुर लौट जाओ़।”

यह सुन कर दोनों रानियों ने दुःखी होकर कहा, “स्वामी! हम आपके बिना एक पल भी जिन्दा नहीं रह सकतीं। आप हमें भी वन में अपने साथ रखने की कृपा कीजिये।”

पाण्डु ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और उन्हें वन में अपने साथ रहने की अनुमति दे दी।

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