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Story of Vishwamohini – Stories from Ramcharitmanas 10

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आपके ज्ञानवर्धन हेतु प्रस्तुत है रामचरितमानस (Ramcharitmanas), जिसे कि तुलसी रामायण (Ramayana) के नाम से भी जाना जाता है, की कहानियाँ (Ramcharitmanas Stories or Ramayana Stories)

रामचरितमानस की कहानियाँ – विश्वमोहिनी (Stories from Ramcharitmanas)

श्री हरि ने, यह सोचकर कि मैं अवश्य ही वह उपाय करूँगा जिससे नारद मुनि का कल्याण और मेरा खेल हो, अपनी माया को प्रेरित किया तथा जिस रास्ते से नारद जी जा रहे थे उस रास्ते में सौ योजन का एक सुन्दर नगर रचा। उस नगर में शीलनिधि नाम का राजा रहता था, जिसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेना के समूह थे। उसका वैभव और विलास सौ इन्द्रों के समान था। वह रूप, तेज, बल और नीति का घर था। उसके विश्वमोहिनी (Vishwamohini) नाम की एक ऐसी रूपवती कन्या थी, जिसके रूप को देखकर लक्ष्मी जी भी मोहित हो जाएँ। वह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती थी, इसलिये वहाँ अगणित राजा आये हुए थे।

कौतुकवश नारद मुनि उस नगर में गये और नगरवासियों से उन्होंने सब हाल पूछा। सब समाचार सुनकर वे राजा के महल में आए। राजा ने पूजा करके मुनि को यथोचित आसन दिया। फिर राजा ने राजकुमारी को नारद जी को दिखलाया और पूछा कि हे नाथ! आप विचार करके इसके सब गुण-दोष कहिए।

उसके रूप को देखकर मुनि वैराग्य भूल गये। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने-आप को भी भूल गये और हृदय में हर्षित हुए, पर प्रकट रूप में उन लक्षणों को नहीं कहा। लक्षणों को देखकर वे मन में कहने लगे कि जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जायेगा और रणभूमि में कोई उसे जीत न सकेगा। यह शीलनिधि की कन्या जिसको वरेगी, सब चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे। सब लक्षणों को विचारकर मुनि ने अपने हृदय में रख लिया और राजा से कुछ अपनी ओर से बनाकर कह दिया।

फिर नारद जी ने वहाँ से प्रस्थान किया पर उनके मन में यह चिन्ता थी कि मैं सोच-विचार कर अब वही उपाय करूँ जिससे यह कन्या मुझे ही वरे। इसके लिए तो मुझे सुन्दर रूप चाहिये, जिसे देखकर राजकुमारी मुझ पर रीझ जाये और जयमाल मेरे गले में डाल दे। श्री हरि मेरे हितचिन्तक हैं अतः मैं उन्हीं से उनका सुन्दर रूप माँग लेता हूँ। ऐसा सोचकर नारद जी ने भगवान विष्णु का स्मरण किया और भगवान विष्णु उनके समक्ष प्रकट हो गये।

नारद जी ने बहुत आर्त होकर सब कथा कह सुनाई और प्रार्थना की कि हे प्रभो! आप अपना रूप मुझे दीजिये ताकि मैं उस कन्या को प्राप्त कर सकूँ। हे नाथ! जिस तरह मेरा हित हो, आप वही कीजिये। प्रभु ने कहा कि हे नारद जी! जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे। हे योगी मुनि! रोग से व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता। इसी प्रकार मैंने भी तुम्हारा हित करने की ठान ली है। ऐसा कहकर भगवान अन्तर्धान हो गए।

माया के वशीभूत नारद प्रभु की स्पष्ट वाणी को भी समझ न सके और स्वयंवर स्थल की ओर चल पड़े।

रामचरितमानस की कहानियाँ – विश्वमोहिनी का स्वयंवर (Stories from Ramcharitmanas)
विश्वमोहिनी के स्वयंवर में राजा लोग खूब सज-धज कर अपने आसन पर बैठे थे। नारद मुनि मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे कि मेरा रूप बड़ा सुन्दर है, मुझे छोड़ कन्या भूलकर भी दूसरे को न वरेगी। कृपानिधान भगवान ने मुनि के कल्याण के लिए उन्हें ऐसा कुरूप बना दिया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता, पर यह चरित कोई नहीं जान सका। सबने उन्हें नारद ही जानकर प्रणाम किया।

वहाँ शिव जी के दो गण भी थे। वे सब भेद जानते थे और ब्राह्मण का वेश बनाकर सारी लीला देखते फिरते थे। वे भी बड़े मौजी थे। वे शिव जी के दोनों गण भी नारद जी के पास जाकर बैठ गए। वे नारद जी को सुना-सुना कर व्यंग वचन कहते थे – भगवान ने इन्हें ऐसा सुन्दर रूप दिया है कि राजकुमारी रीझ जाएगी और “हरि” (वानर) जानकर इन्हीं को ही वरेंगी। यद्यपि मुनि उनकी अटपटी बातें सुन रहे थे, पर बुद्धि भ्रम से सनी होने के कारण वे बातें उनकी समझ में नहीं आती थीं और वे उन बातों को अपनी प्रशंसा समझ रहे थे।

राजकुमारी हाथ में वरमाला लिए सभा में पहुँची। राजकन्या को नारद जी का मुँह बन्दर जैसा दिखाई पड़ा इसलिए उसने नारद जी की ओर भूलवश भी नहीं ताका। नारद जी बार-बार उचकते और छटपटाते थे। उनकी दशा देखकर शिव जी के गण मुसकुराते थे। भगवान विष्णु भी राजा का शरीर धारण कर वहाँ उपस्थित थे। राजकुमारी ने हर्षित होकर भगवान विष्णु के गले में जयमाला डाल दी। लक्ष्मीनिवास भगवान दुलहिन को ले गए।

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Arrogance of Narad – Stories from Ramcharitmanas 9

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आपके ज्ञानवर्धन हेतु प्रस्तुत है रामचरितमानस (Ramcharitmanas), जिसे कि तुलसी रामायण (Ramayana) के नाम से भी जाना जाता है, की कहानियाँ (Ramcharitmanas Stories or Ramayana Stories)

रामचरितमानस की कहानियाँ – नारद का अहंकार (Stories from Ramcharitmanas)

एक बार नारद जी जब हिमालय में भ्रमण कर रहे थे तो वहाँ पर उन्हें एक बड़ी पवित्र गुफा दिखी जिसके समीप गंगा जी प्रवाहित हो रही थीं। वह गुफा नारज मुनि के मन को भा गई और वे वहाँ तप में लीन हो गये। नारद जी के इस तप को देखकर देवराज इन्द्र के मन में यह भय उत्पन्न हुआ कि नारद मेरा राज्य चाहते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि जगत् में जो कामी और लोभी होते हैं, वे कुटिल कौए की तरह सबसे डरते हैं, जैसे मूर्ख कुत्ता सिंह को देखकर सूखी हड्डी सूखी हड्डी लेकर भाग जाता है और वह मूर्ख यह यह समझता है कि कहीं उस हड्डी को सिंह छीन न ले।

इन्द्र ने नारद की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को भेजा। कामदेव ने वहाँ जाकर अपनी माया से वहाँ वसन्त ऋतु को उत्पन्न किया। तरह-तरह के वृक्षों पर रंग-बिरंगे फूल खिल गये, उन पर कोयलें कूकने लगीं और भौरे गुंजार करने लगे। कामाग्नि को भड़काने वाली शीतल, मन्द, सुगन्धित सुहावनी हवा चलने लगी। कामकला में निपुण रम्भा आदि देवांगनाएँ मधुर गान करने लगीं।

परन्तु कामदेव की कोई भी कला मुनि पर असर न कर सकी। तब पापी कामदेव अपने ही नाश के भय से डर गया और हार मानकर अपने सहायकों सहित नारद जी के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगा।

नारद जी के मन में कुछ भी क्रोध न आया और उन्होंने प्रिय वचन कहकर कामदेव को अपने स्थान में वापस भेज दिया।

इस घटना के बाद नारद जी के मन में इस बात का अहंकार हो गया कि हमने कामदेव को जीत लिया। नारद जी ने शिव जी के पास जाकर अहंकारपूर्वक पूरी घटना सुनाई।

शिव जी ने नारद की बात सुनकर नारद से कहा कि इस घटना का जिक्र आप श्री हरि से मत करना। अहंकार के मद में चूर कामदेव को शिव जी के वचन अच्छे नहीं लगे और वे विष्णु जी को यह घटना बताने के लिए वहाँ से चल पड़े।

रामचरितमानस की कहानियाँ – नारद का विष्णु जी को अपने काम-विजय के बारे में बताना (Stories from Ramcharitmanas)
शिव जी के बरजने के बाद भी नारद जी विष्णु जी से मिलने और उन्हें अपने द्वारा कामदेव पर विजय की बात बताने के लिए क्षीरसागर की तरफ चल पड़े। याज्ञवकल्क्य मुनि कहते हैं कि हे भरद्वाज! हरि की इच्छा बड़ी बलवान है। श्री रामचन्द्र जी जो करना चाहते हैं, वही होता है, ऐसा कोई भी नहीं है जो उसके विरुद्ध कर सके।

क्षीरसागर में पहुँचकर नारद जी ने कामदेव का सारा चरित्र भगवान विष्णु को सुना डाला। उनकी बात सुनकर भगवान रूखा मुँह करके कोमल वचन बोले – हे मुनिराज! मोह तो उसके मन में होता है जिसके हृदय में ज्ञान-वैराग्य नहीं है। आप तो ब्रह्मचर्य व्रत में तत्पर और धीरबुद्धि हैं। भला, कहीं आपको भी कामदेव सता सकता है? इस पर नारद जी ने अभिमानपूर्वक कहा – भगवन्! यह सब आपकी कृपा है।

फिर नारद जी भगवान के चरणों में सिर नवाकर वहाँ से चले गये।

करुणानिधान भगवान ने मन में विचारकर देखा कि नारद जी के मन में गर्व के भारी वृक्ष का अंकुर पैदा हो गया है, मैं उसे तुरन्त उखाड़ फेकूँगा क्योंकि सेवकों का हित करना हमारा प्रण है।

रामचरितमानस की कहानियाँ – विश्वमोहिनी (Stories from Ramcharitmanas)
श्री हरि ने, यह सोचकर कि मैं अवश्य ही वह उपाय करूँगा जिससे नारद मुनि का कल्याण और मेरा खेल हो, अपनी माया को प्रेरित किया तथा जिस रास्ते से नारद जी जा रहे थे उस रास्ते में सौ योजन का एक सुन्दर नगर रचा। उस नगर में शीलनिधि नाम का राजा रहता था, जिसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेना के समूह थे। उसका वैभव और विलास सौ इन्द्रों के समान था। वह रूप, तेज, बल और नीति का घर था। उसके विश्वमोहिनी नाम की एक ऐसी रूपवती कन्या थी, जिसके रूप को देखकर लक्ष्मी जी भी मोहित हो जाएँ। वह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती थी, इसलिये वहाँ अगणित राजा आये हुए थे।

कौतुकवश नारद मुनि उस नगर में गये और नगरवासियों से उन्होंने सब हाल पूछा। सब समाचार सुनकर वे राजा के महल में आए। राजा ने पूजा करके मुनि को यथोचित आसन दिया। फिर राजा ने राजकुमारी को नारद जी को दिखलाया और पूछा कि हे नाथ! आप विचार करके इसके सब गुण-दोष कहिए।

उसके रूप को देखकर मुनि वैराग्य भूल गये। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने-आप को भी भूल गये और हृदय में हर्षित हुए, पर प्रकट रूप में उन लक्षणों को नहीं कहा। लक्षणों को देखकर वे मन में कहने लगे कि जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जायेगा और रणभूमि में कोई उसे जीत न सकेगा। यह शीलनिधि की कन्या जिसको वरेगी, सब चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे। सब लक्षणों को विचारकर मुनि ने अपने हृदय में रख लिया और राजा से कुछ अपनी ओर से बनाकर कह दिया।

फिर नारद जी ने वहाँ से प्रस्थान किया पर उनके मन में यह चिन्ता थी कि मैं सोच-विचार कर अब वही उपाय करूँ जिससे यह कन्या मुझे ही वरे। इसके लिए तो मुझे सुन्दर रूप चाहिये, जिसे देखकर राजकुमारी मुझ पर रीझ जाये और जयमाल मेरे गले में डाल दे। श्री हरि मेरे हितचिन्तक हैं अतः मैं उन्हीं से उनका सुन्दर रूप माँग लेता हूँ। ऐसा सोचकर नारद जी ने भगवान विष्णु का स्मरण किया और भगवान विष्णु उनके समक्ष प्रकट हो गये।

नारद जी ने बहुत आर्त होकर सब कथा कह सुनाई और प्रार्थना की कि हे प्रभो! आप अपना रूप मुझे दीजिये ताकि मैं उस कन्या को प्राप्त कर सकूँ। हे नाथ! जिस तरह मेरा हित हो, आप वही कीजिये। प्रभु ने कहा कि हे नारद जी! जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे। हे योगी मुनि! रोग से व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता। इसी प्रकार मैंने भी तुम्हारा हित करने की ठान ली है। ऐसा कहकर भगवान अन्तर्धान हो गए।

माया के वशीभूत नारद प्रभु की स्पष्ट वाणी को भी समझ न सके और स्वयंवर स्थल की ओर चल पड़े।

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Bizarre procession and Marriage of Lord Shiva – Stories from Ramcharitmanas 8

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रामचरितमानस की कहानियाँ – शिव जी की विचित्र बारात (Stories from Ramcharitmanas)

शिव जी के विवाह का सन्देश लेकर सप्तर्षि हिमाचल के पास गये और हिमवान् ने शिव जी को जामाता के रूप में सहर्ष स्वीकार कर लिया।

शिव जी के गण शिव जी का श्रृंगार करने लगे। जटाओं का मुकुट बनाकर उस पर साँपों का मौर सजाया गया। शिव जी ने साँपों के ही कुण्डल और कंकण पहने, शरीर पर विभूति रमायी और वस्त्र के स्थान पर बाघम्बर लपेट लिया। शिव जी के मस्तक पर चन्द्रमा, सिर पर गंगा जी, तीन नेत्र, साँपों का जनेऊ, गले में विष और छाती पर नरमुण्डों की माला थी। इस प्रकार उनका वेष अशुभ होने पर भी वे कल्याण के धाम और कृपालु हैं। एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू सुशोभित है। शिव जी बैल पर चढ़कर चले। बाजे बज रहे हैं। शिव जी को देखकर देवांगनाएँ मुसकरा रही हैं।

विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओं के समूह अपने-अपने वाहनों पर चढ़कर बारात में चले।

बारात में जाने के लिए शिव जी के समस्त गण आ पहुँचे। उनमें कोई बिना मुख का है, किसी के बहुत से मुख हैं, कोई बिना हाथ-पैर का है तो किसी के कई हाथ-पैर हैं। किसी की बहुत आँखें हैं तो किसी के एक भी आँख नहीं है। कोई बहुत मोटा-ताजा है तो कोई बहुत ही दुबला-पतला है। भयंकर गहने पहने, हाथ में कपाल लिये, शरीर में ताजा खून लपेटे, गधे, कुत्ते औ‌र सियार के जैसे मुखवाले शिव जी के अनगिनत वेषों को कौन गिने? बहुत प्रकार के प्रेत, पिशाच और योगनियों की जमातें हैं। उनका वर्णन करते नहीं बनता।

भूत-प्रेत नाचते और गाते हैं। जैसा दूल्हा है, वैसी ही बारात भी बनी है। मार्ग में चलते हुए भाँति-भाँति के कौतुक होते हैं।

रामचरितमानस की कहानियाँ – शिव जी की बारात देखकर मैना का विषाद (Stories from Ramcharitmanas)

हिमाचल ने ऐसा विचित्र मण्डप बनाया कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। जगत् के समस्त छोटे-बड़े पर्वत, नदियाँ, वन, समुद्र, तालाब आदि को हिमाचल ने विवाह का न्यौता भेजा और वे सभी इच्छानुसार रूप धारण कर विवाह में सम्मिलित होने पहुँच गये। हिमवान् ने सभी को सम्मानपूर्वक यथायोग्य निवासों में ठहराया।

बारात को निकट आई सुनकर नगर में चहल-पहल मच गई। अगवानी करने वाले लोग बनाव-श्रृंगार करके तथा नाना प्रकार की सवारियों को सजाकर आदरसहित बारात को लिवाने चले। किन्तु बारात को देखकर केवल बड़ी उम्र के कुछ समझदार लोग ही वहाँ डटे रहे, लड़के तो सब प्राण लेकर भागे। घर में जाकर उन्होंने बताया – क्या कहें, यह बारात है या यमराज की सेना? दूल्हा पागल है और बैल पर सवार है। साँप, कपाल और राख ही उसके गहने हैं। उनके माता-पिता ने उन्हें समझाया कि डर की कोई बात नहीं है, निडर रहो।

अगवान लोग बारात को लिवा लाये, उन्होंने सबको सुन्दर जनवासे में ठहराया। पार्वती जी मी माता मैना ने शुभ आरती सजाई और उनके साथ की स्त्रियाँ मंगलगीत गाने लगीं। किन्तु बारात को देखकर सभी डर के मारे घर में घुस गईं। मैना पार्वती जी को गोद में लेकर कहने लगीं – जिस विधाता ने तुमको सुन्दरता दी, उसने तुम्हारे लिए वर बावला कैसे बनाया? मैंने नारद का क्या बिगाड़ा था? मैं जीते-जी इस बावले वर से तुम्हारा विवाह न करूँगी। माता को विकल देखकर पार्वती जी ने कहा – जो मेरे भाग्य में बावला ही पति लिखा है तो किसी को क्यों दोष लगाया जाय? हे माता! कलंक मत लो, रोना छोड़ो, यह अवसर विषाद करने का नहीं है।

सबह हाल सुनकर हिमाचल नारद जी और सप्तर्षियों को साथ लेकर मैना के पास पहुँचे। नारद जी ने पार्वती जी के पूर्व जन्म की कथा सुनाते हुए कहा पहले वे दक्ष के घर जाकर जन्मी थीं और उनका नाम सती था जिन्होंने दक्ष यज्ञ में स्वयं को भस्म कर दिया था। पार्वती जी साक्षात् जगज्जननी, अजन्मा, अनादि और अविनाशी शक्ति हैं, वे सदा शिव जी के अर्द्धांग में रहती हैं।

नारद का वचन सुनकर सब का विषाद मिट गया।

रामचरितमानस की कहानियाँ – शिव जी का विवाह (Stories from Ramcharitmanas)

नगर में मंगलगीत गाये जाने लगे और सब ने भाँति-भाँति के सुवर्ण-कलश सजाये गये। पाकशास्त्र की रीति के अनुसार तरह-तरह के ज्योनार हुई। जिस घर में स्वयं माता भवानी रहती हों, वहाँ की ज्योनार का वर्णन कैसे किया जा सकता है? हिमाचल ने आदरपूर्वक सब बारातियों – विष्णु, ब्रह्मा तथा समस्त देवताओं – को बुलवाया और भोजन की पंगत बैठीं। चतुर रसोइये परोसने लगे। बारातियों को भोजन करते जान स्त्रियाँ मधुर स्वरों में गाली गाने लगीं। भोजन कर चुकने के बाद सबके हाथ-मुँह धुलवाकर पान दिये गये। फिर सब लोग, जो जहाँ ठहरे थे वहाँ चले गये।

फिर मुनियों ने हिमवान् को लगन पढ़कर सुनाया और विवाह का समय देखकर देवताओं को बुलवाया और यथायोग्य आसन दिये। वेद की रीति से वेदी सजाई गई और स्त्रियाँ सुन्दर श्रेष्ठ मंगलगीत गाने लगीं। मुनियों की आज्ञा से शिव जी और पार्वती जी ने गनेश जी का पूजन किया। (तुलसीदास जी कहते हैं) देवता अनादि होते हैं अतः इस बात को सुनकर कोई शंका न करे (कि गनेश जी तो शिव-पार्वती की सन्तान हैँ, अभी विवाह से पूर्व ही वे कहाँ से आ गये)।

वेदों में विवाह की जैसी रीति कही गई है, महामुनियों ने उसी रीति से विवाह सम्पन्न करवाया। पर्वतराज हिमाचल ने हाथ में कुश लेकर तथा कन्या का हाथ पकड़कर उन्हें शिव जी को समर्पित किया। शिव-पार्वती के पाणिग्रहण के समय हर्षित देवतागण शिव जी का जय-जयकार करने लगे। आकाश से नाना प्रकार के फूलों की वर्षा हुई। इस प्रकार से शिव-पार्वती का विवाह सम्पन्न हो गया। माता-पिता से आशीर्वाद प्राप्त कर पार्वती जी शिव जी के संग कैलाश पर्वत पर चली गईं।

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Burning of Kamadeva – Stories from Ramcharitmanas 7

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रामचरितमानस की कहानियाँ – कामदेव का भस्म होना (Stories from Ramcharitmanas)

देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर पाँच बाण धारण करने वाले तथा मछली के चिह्नयुक्त ध्वजा धारण करने वाले कामदेव प्रकट हुए। देवताओं ने कामदेव से अपनी सारी विपत्ति कही। सुनकर कामदेव ने मन में विचार किया और हँसकर देवताओं से कहा कि शिव जी के साथ विरोध करने में मेरी कुशल नहीं है। तथापि मैं तुम्हारा काम तो करूँगा, क्योंकि वेद दूसरे के उपकार को परम धर्म बताते हैं। जो दूसरों के हित के लिये अपना शरीर त्याग देता है, संत सदा उसकी बड़ाई करते हैं।

ऐसा कहकर और सबको सिर नवाकर कामदेव अपने पुष्प के धनुष को हाथ में लेकर वसन्तादि सहायकों के साथ चले। चलते समय कामदेव ने ऐसा विचार किया कि शिव जी के साथ विरोध करने से मेरा मरण निश्चित है।

कामदेव ने अपना प्रभाव फैलाया और समस्त संसार को अपने वश में कर लिया। उनके कोप से क्षण भर में ही वेदों की सारी मर्यादा मिट गई। ब्रह्मचर्य, नियम, संयम, धीरज, धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सदाचार, जप, योग वैराग्य आदि सभी का लोप हो गया। विवेक भाग गया, सद्‌ग्रंथ पर्वत की कन्दराओं में जा छिपे। सारे जगत् में खलबली मच गई।

सम्पूर्ण जगत् में स्त्री-पुरुष संज्ञा वाले जितने चर-अचर प्राणी थे वे सब अपनी-अपनी मर्यादा छोड़कर काम के वश में हो गये। वृक्षों की डालियाँ लताओं की और झुकने लगीं, नदियाँ उमड़-उमड़ कर समुद्र की ओर दौड़ने लगीं। आकाश, जल और पृथ्वी पर विचरण करने वाले समस्त पशु-पक्षी सब कुछ भुला कर केवल काम के वश हो गये। सिद्ध, विरक्त, महामुनि और महायोगी भी काम के वश होकर योगरहित और स्त्री विरही हो गये। मनुष्यों की तो बात ही क्या कहें, पुरुषों को संसार स्त्रीमय और स्त्रियों को पुरुषमय प्रतीत होने लगा।

किन्तु कामदेव के इस कौतुक का शिव जी पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा। इससे कामदेव भी भयभीत हो गये किन्तु अपने कार्य को पूर्ण किये बिना वापस लौटने में उन्हें संकोच हो रहा था इसलिये उन्होंने तत्काल अपने सहायक ऋतुराज वसन्त को प्रकट कर किया। वृक्ष पुष्पों से सुशोभित हो गये, वन-उपवन, बावली-तालाब आदि परम सुहावने हो गये, शीतल-मंद-सुगन्धित पवन चलने लगा, सरोवर कमल पुष्पों से परिपूरित हो गये, पुष्पों पर भ्रमर गुंजार करने लगे। राजहंस, कोयल और तोते रसीली बोली बोलने लगे, अप्सराएँ नृत्य एवं गान करने लगीं।

इतने पर भी जब तपस्यारत शिव जी का कुछ भी प्रभाव न पड़ा तो क्रोधित कामदेव ने आम्रवृक्ष की डाली पर चढ़कर अपने पाँचों तीक्ष्ण पुष्प-बाणों को छोड़ दिया जो कि शिव जी के हृदय में जाकर लगे। उनकी समाधि टूट गई जिससे उन्हें अत्यन्त क्षोभ हुआ। आम्रवृक्ष की डाली पर कामदेव को देख कर क्रोधित हो उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया और देखते ही देखते कामदेव भस्म हो गये।

कामदेव की स्त्री रति अपने पति की यह दशा सुनते ही रुदन करते हुए शिव जी पास आई। उसके विलाप से द्रवित हो कर शिव जी ने कहा, “हे रति! विलाप मत कर। जब पृथ्वी के भार को उतारने के लिये यदुवंश में श्री कृष्ण अवतार होगा तब तेरा पति उनके पुत्र (प्रद्युम्न) के रूप में उत्पन्न होगा और तुझे पुनः प्राप्त होगा। तब तक वह बिना शरीर के ही इस संसार में व्याप्त होता रहेगा। अंगहीन हो जाने के कारण लोग अब कामदेव को अनंग के नाम से भी जानेंगे।”

इसके बाद ब्रह्मा जी सहित समस्त देवताओं ने शिव जी के पास आकर उनसे पार्वती जी से विवाह कर लेने के लिये प्रार्थना की जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।

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Terror of Tarkasur – Stories from Ramcharitmanas 6

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रामचरितमानस की कहानियाँ – तारकासुर का आतंक (Stories from Ramcharitmanas)

उसी समय तारक नाम का असुर हुआ जिसने अपने भुजबल, तेज और प्रताप से समस्त लोक और लोकपालों को जीत लिया तथा देवता सुख और सम्पत्ति से रहित हो गये। वह अजर-अमर था इसलिए किसी से जीता नहीं जाता था। जब देवता उसके साथ बहुत तरह की लड़ाइयाँ लड़कर हार गये तब उन्होंने ब्रह्मा जी के पास जाकर पुकार मचायी। ब्रह्मा जी ने सबको समझाकर कहा – इस दैत्य की मृत्यु तब होगी जब शिव जी के पुत्र उत्पन्न होंगे, इस असुर को केवल शिव जी के पुत्र ही जीत सकते हैं। मेरी बात सुनकर उपाय करो, ईश्वर सहायता करेंगे और काम हो जाएगा। सती जी ने जो दक्ष के यज्ञ में देह का त्याग किया था, उन्होंने अब हिमाचल के घर जाकर जन्म लिया है। उन्होंने शिव जी को पति रूप में पाने के लिए तप किया है, इधर शिव जी सब छोड़-छाड़ कर समाधि लगा बैठे हैं। तुम कामदेव को शिव जी के पास भेजो, वह शिव जी के मन में क्षोभ उत्पन्न कर उनकी समाधि भंग करे। तब हम जाकर शिव जी के चरणों में सिर रख देंगे और उन्हें राजी करके उनका विवाह करा देंगे।

सभी देवताओं ने कहा – यह सम्मति अच्छी है। और वे कामदेव को बुलाने के लिए उनकी स्तुति करने लगे।

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Test of Parvati’ love by Mahadev – Stories from Ramcharitmanas 5

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रामचरितमानस की कहानियाँ – पार्वती के प्रेम की परीक्षा (Stories from Ramcharitmanas)

जबसे सती जी ने शरीर त्याग किया, तब से शिव जी के मन में वैराग्य हो गया। वे सदा श्री रघुनाथ जी का नाम जपने लगे। इस प्रकार बहुत समय बीत गया। तब कृपालु श्री रामचन्द्र जी शिव जी के समक्ष प्रकट हुए और शिव जी को समझाया कि पार्वती जी का जन्म के विषय में बताया तथा शिव जी से कहा – हे शिव जी! यदि मुझ पर आपका स्नेह है तो मेरी विनती मानकर आप पार्वती जी के साथ विवाह कर ले। इतना कहकर श्री राम अन्तर्धान हो गये।

उसी समय वहाँ पर सप्तर्षियों का आगमन हुआ। प्रभु महादेव जी ने सप्तर्षियों से पार्वती जी के प्रेम की परीक्षा लेने के लिए कहा।

सप्तर्षियों ने पार्वती जी के पास जाकर कहा – हे शैलकुमारी! तुम किसलिए इतना कठोर तप कर रही हो? जब पार्वती जी ने उन्हें बताया कि वे शिव जी को पति रूप में पाना चाहती हैं तो सप्तर्षियों ने कहा – नारद की बातों को सुनकर तुमने ऐसा निश्चय किया है, पर आज तक नारद के उपदेश से किसी का भला नहीं हुआ है। स्वभाव से ही उदासीन, गुणहीन, निर्लज्ज, बुरे वेष वाला, नर-कपालों की माला पहनने वाला, कुलहीन, बिना घर-बार का, नंगा और शरीर पर साँपों को लपेटे रखने वाला शिव तुम्हारे योग्य नहीं है। यदि हमारा कहना मानो तो हम सुन्दर, सुशील, पवित्र और सुखदायक विष्णु जी से तुम्हारा विवाह करवा देंगे।

पार्वती जी ने सप्तर्षियों से कहा – हे मुनीश्वरों! मैनें जो निश्चय किया है वह अटल है, मेरा तो करोड़ जन्मों तक यही हठ रहेगा कि या तो शिव जी से विवाह करूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी।

सप्तर्षि पार्वती जी की प्रतिज्ञा सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और कहा – हे जगज्जननी! आप माया हैं और शिव जी महान हैं। ऐसा कहकर सप्तर्षि पार्वती जी के चरणों में सिर नवाकर चल दिये। उन्होंने हिमवान् के पास जाकर कहा कि वे पार्वती जो को वन से घर लिवा लायें।

तत्पश्चात उन्होंने शिव जी के पास जाकर सारा वृत्तान्त कहा। पार्वती जी के प्रेम को सुनकर शिव जी आनन्दमग्न हो गये।

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Birth of Parvati – Stories from Ramcharitmanas 4

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रामचरितमानस की कहानियाँ – पार्वती का जन्म (Stories from Ramcharitmanas)

सती का मरण सुनकर शिवजी के गण यज्ञ विध्वंस करने लगे। यज्ञ विध्वंस होते देखकर मुनीश्वर भृगु जी ने उसकी रक्षा की। जय यह समाचार शिव जी को मिला तो उन्होंने क्रोध करके वीरभद्र को भेजा जिन्होंने वहाँ जाकर यज्ञ का विध्वंस कर डाला और देवताओं को यथोचित दण्ड दिया। दक्ष की गति भी वही हुई तो शिवद्रोही की हुआ करती है।

सती ने मरते समय भगवान हरि से यह वर माँगा कि मेरा जन्म-जन्म में शिव जी के चरणों में अनुराग रहे। इसी कारण उन्होंने हिमाचल के घर जाकर पार्वती के रूप में जन्म लिया। जब नारद जी ने पार्वती के जन्म का समाचार सुना तो वे हिमाचल के घर पधारे। पर्वतराज ने उनका बड़ा आदर किया और चरण धोकर उनको उत्तम आसन दिया, अपनी स्त्री मैना सहित मुनि के चरणों में सिर नवाया तथा पुत्री को बुलवाकर मुनि के चरणों पर डाल दिया तथा कहा – हे मुनिवर! आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, अतः आप विचारकर कन्या के गुण-दोष कहिये।

नारद मुनि ने हँसकर रहस्ययुक्त कोमल वाणी से कहा – तुम्हारी कन्या सब गुणों की खान है। यह स्वभाव से ही सुन्दर, सुशील और समझदार है। उमा, अम्बिका और भवानी इसके नाम हैं। कन्या सब सुलक्षणों से सम्पन्न है, यह अपने पति को सदा प्यारी होगी। इसका सुहाग सदा अचल रहेगा और इसके माता-पिता यश पावेंगे। यह सारे जगत् में पूज्य होगी और इसकी सेवा करने से कुछ भी दुर्लभ न होगा। संसार में स्त्रियाँ इसका नाम स्मरण करके पतिव्रतरूपी तलवार की धार पर चढ़ जाएँगी। इसमें चार अवगुण हैं, उन्हें भी सुन लो। गुणहीन, मानहीन, माता-पिता विहीन, संशयहीन, योगी, जटाधारी, निष्कामहृदय, नंगा और अमंगल वेषवाला पति इस मिलेगा।

नारद मुनि की वाणी सुनकर और उसे हृदय में सत्य जानकर हिमवान् और उसकी पत्नी मैना को दुःख हुआ किन्तु पार्वती जी प्रसन्न हुईं। यह विचार कर कि देवर्षि के वचन अस्त्य नहीं हो सकते, पार्वी जी ने उन वचनों को हृदय में धारण कर लिया। उन्हें शिव जी के चरणकमलों में स्नेह उत्पन्न हो आया किन्तु यह सोचकर कि शिव जी का मिलना अत्यन्त कठिन है, उमा ने अपने प्रेम को अपने हृदय में ही छिपा लिया।

पर्वतराज ने हृदय में धीरज धारण कर नारद मुनि से कहा – हे नाथ! अब क्या उपाय करना चाहिए?

मुनीश्वर ने कहा – हे हिमवान्! विधाता ने ललाट पर जो कुछ लिख दिया है, उसको देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि कोई भी नहीं मिटा सकते। तो भी एक उपाय मैं बताता हूँ। यदि दैव सहायता करें तो वह सिद्ध हो सकता है। उमा को वर तो निःसन्देह वैसा ही मिलेगा जैसा कि मैंने तुम्हारे सामने वर्णन किया है। मैंने वर के जो-जो दोष बतलाए हैं, मेरे अनुमान से वे सभी शिव जी में हैं। यदि शिव जी के साथ विवाह हो जाय तो दोषों को भी सब लोग गुणों के समान ही कहेंगे। शिव जी सहज ही समर्थ हैं, क्योंकि वे भगवान हैं। इसलिए इस विवाह में सब प्रकार का कल्याण है। परन्तु महादेव जी की आराधना बड़ी कठिन है, फिर भी तप करने से वे बहु जल्द प्रसन्न हो जाते हैं। यदि तुम्हारी कन्या तप करे, तो त्रिपुरारि महादेव जी होनहार को मिटा सकते हैं। शिव जी वर देने वाले, शरणागतों के दुःखों का नाश करने वाले, कृपा के समुद्र और सेवकों के मन को प्रसन्न करने वाले हैं। हे पर्वतराज! तुम सन्देह को त्याग दो, कल्याण ही होगा।

ऐसा कहकर नारद मुनि ब्रह्मलोक को चले गये।

नारद जी के कथन को सत्य मानकर एवं शिव जी के चरणों को हृदय में धारण कर पार्वती जी वन में जाकर तप करने लगीं। दीर्घ काल के उपवास तथा तप से उमा का शरीर क्षीण हो गया देखकर आकाश से गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई – हे पर्वतराज की कुमारी! तेरा मनोरथ सफल हुआ। तू अब सारे असह्य क्लेशों को त्याग दे। अब तुझे शिव जी मिलेंगे।

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Check your gk – General Knowledge Quiz (18)

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अपना सामान्य ज्ञान (General Knowledge) परखिये इन प्रश्नों को हल करके।

(Check your gk – General Knowledge)

1. यदि राज्य सभा किसी धन विधेयक में सारभूत संशोधन करती है, तो तत्पश्चात् क्या होगा?

(a) लोक सभा, राज्य सभा की अनुशंसाओं को स्वीकार करे या अस्वीकार करे, इस विधेयक पर आगे कार्यवाही कर सकती है
(b) लोक सभा विधेयक पर आगे कोई विचार नहीं कर सकती
(c) लोक सभा विधेयक को पुनर्विचार के लिए राज्य सभा को लौटा सकती है
(d) राष्ट्रपति विधेयक को पारित करने के लिए संयुक्त बैठक आहूत कर सकता है

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(a) लोक सभा, राज्य सभा की अनुशंसाओं को स्वीकार करे या अस्वीकार करे, इस विधेयक पर आगे कार्यवाही कर सकती है

2. निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा एक सही है?

(a) भारत में एक ही व्यक्ति को एक ही समय में दो या अधिक राज्यों में राज्यपाल नियुक्त नहीं किया जा सकता
(b) भारत में राज्यों के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश राज्य के राज्यपाल द्वारा नियुक्त किए जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं
(c) भारत के संविधान में राज्यपाल को उसके पद से हटाने हेतु कोई भी प्रक्रिया अधिकथित नहीं है
(d) विधायी व्यवस्था वाले संघ राज्यक्षेत्र में मुख्यमंत्री की नियुक्ति उपराज्यपाल द्वारा बहुमत के आधार पर, की जाती है

उत्तर दिखायें

(d) विधायी व्यवस्था वाले संघ राज्यक्षेत्र में मुख्यमंत्री की नियुक्ति उपराज्यपाल द्वारा बहुमत के आधार पर, की जाती है

3. निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा एक सही सुमेलित है?

क्र. भौगोलिक लक्षण प्रदेश
(a) एबिसिनी पठार अरब
(b) एटलस पर्वत उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका
(c) गुयाना उच्चभूमि दक्षिण-पश्चिमी अफ्रीका
(d) ओकावांगो द्रोणी पैटागोनिया

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(b) एटलस पर्वत उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका

4. भारतीय शिलावास्तु के इतिहास के सन्दर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1. बादामी की गुफ़ाएँ भारत की प्राचीनतम अवशिष्ट शैलकृत गुफ़ाएँ हैं।
2. बाराबर की शैलकृत गुफ़ाएँ सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा मूलतः आजीविकों के लिए बनवाई गई थीं।
3. एलोरा में, गुफ़ाएँ विभिन्न धर्मों के लिए बनाई गई थीं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं

(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर दिखायें

(b) केवल 2 और 3

5. पुनरवोगज DNA प्रौद्योगिकी (अनुवांशिक इंजीनियती) जीनों को स्थानान्तरित होने देता है

1. पौधों की विभिन्न जातियों में
2. जन्तुओं से पौधों में
3. सूक्ष्मजीवों से उच्चतर जीवों में

नीचे दिए गये कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर दिखायें

(a) केवल 1

6. भारत की यात्रा करने वाले चीनी यात्री युआन च्यांग (व्हेन त्सांग) ने तत्कालीन भारत की सामान्य दशाओं और संस्कृति का वर्णन किया है। इस सन्दर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

1. सड़क और नदी-मार्ग लूटमार से पूरी तरह सुरक्षित थे।
2. जहाँ तक अपराधों के लिए दण्ड का प्रश्न है, अग्नि, जल व विष द्वारा सत्यपरीक्षा किया जाना ही किसी भी व्यक्ति की निर्दोषिता अथवा दोष के निर्णय के साधन थे।
3. व्यापारियों को नौघाटों और नाकों पर शुल्क देना पड़ता था।

नीचे दिए गये कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

(a) केवल 1
(b) केवल 2 and 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर दिखायें

(b) केवल 2 and 3

7. निम्नलिखत पर विचार कीजिएः

1. तारा कछुआ
2. मॉनीटर छिपकली
3. वामन सूअर
4. स्पाइडर वानर

उपर्युक्त में कौन-से भारत में प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं?

(a) केवल 1, 2 और 3
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर दिखायें

(a) केवल 1, 2 और 3

8. निम्नलिखित में से कौन-से भारत के कुछ भागों में पीने के जल में प्रदूषक के रूप में पाए जाते हैं?

1. आर्सेनिक
2. सारबिटॉल
3. फ्लुओराइड
4. फार्मेल्डिहाइड
5. यूरेनियम

नीचे दिए गये कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 2, 4 और 5
(c) केवल 1, 3 और 5
(d) 1, 2, 3, 4 और 5

उत्तर दिखायें

(a) केवल 1 और 3

9. भारतीय इतिहास के सन्दर्भ में, प्रान्तों से संविधान सभा के सदस्य

(a) उन प्रान्तों के लोगों द्वारा सीधे निर्वाचित हुए थे
(b) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग द्वारा नामित हुए थे
(c) प्रान्तीय विधान सभाओं द्वारा निर्वाचित हुए थे
(d) सरकार द्वारा, संवैधानिक मामलों में उनकी विशेषज्ञता के लिए चुने गए थे

उत्तर दिखायें

(c) प्रान्तीय विधान सभाओं द्वारा निर्वाचित हुए थे

10. निम्नलिखित जन्तुओं पर विचार कीजिएः

1. समुद्री गाय
2. समुद्री घोड़ा
3. समुद्री सिंह

उपर्युक्त में से कौन-सा/से स्तनधारी है/हैं?

(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर दिखायें

(b) केवल 1 और 3

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Daksh Yajna & Sati Dah – Stories from Ramcharitmanas 3

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आपके ज्ञानवर्धन हेतु प्रस्तुत है रामचरितमानस (Ramcharitmanas), जिसे कि तुलसी रामायण (Ramayana) के नाम से भी जाना जाता है, की कहानियाँ (Ramcharitmanas Stories or Ramayana Stories)

रामचरितमानस की कहानियाँ – दक्ष यज्ञ एवं सती दाह (Ramcharitmanas)

कैलास पर्वत पर पहुँच कर शिव जी सती जी से विमुख रहने लगे, अपनी विमुखता को छिपाने के लिए वे तप में लीन रहने लगे। सती जी भी समझ गईं कि स्वामी ने मेरा त्याग कर दिया है। वे ईश्वर से प्रार्थना करने लगीं कि मेरी यह देह जल्दी से छूट जाए।

उन्हीं दिनों सती जी के पिता दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। शिव जी से अप्रसन्न दक्ष ने उस यज्ञ के लिए शिव जी को निमन्त्रित नहीं किया था। उस यज्ञ में भाग लेने के लिए देवता, गन्धर्व, नाग, किन्नर, सिद्ध आदि अपने अपने विमानों से तेज गति से जाने लगे। जब सती जी ने देखा अनेकों प्रकार के सुन्दर विमान आकाश में चले जा रहे हैं तो उन्होंने शिव जी से उन पूछा कि वे विमान कहाँ जा रहे हैं। शिव जी ने बताया कि वे सारे विमान दक्ष के यज्ञ में भाग लेने जा रहे हैं।

पिता के यज्ञ की बात सुनकर सती जी प्रसन्न हुईं और विचार करने लगीं कि इसी बहाने कुछ दिन पिता के घर जाकर रहूँ। उन्होंने शिव जी से कहा कि हे प्रभो! मेरे पिता के घर बहुत बड़ा उत्सव है। यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं भी वहाँ जाऊँ। शिव जी ने कहा कि तुमने बात तो अच्छी कही है, किन्तु उन्होंने हमें न्यौता नहीं भेजा है। दक्ष ने अपनी सभी पुत्रियों को बुलाया है किन्तु मुझसे बैर होने के कारण उन्होंने तुम्हें भी भुला दिया। यदि कोई बिना बुलाए पिता, गुरु, स्वामी या मित्र के यहाँ जाता है तो उसका कल्याण कभी भी नहीं होता। इसलिए हे भवानी! तुम यदि बिना बुलाए पिता के घर जाओगी तो न तो शील-स्नेह रहेगा और न ही मान-मर्यादा रहेगी।

किन्तु सती जी को शिव जी की बात समझ में नहीं आई और वे जाने के लिए हठ करने लगीं। उनके हठ को देखकर त्रिपुरारि महादेव जी ने अपने मुख्य गणों के साथ उन्हें विदा कर दिया।

जब सती जी पिता के घर पहुँचीं तो, सिवाय उनकी माता के, किसी ने भी उनकी आवभगत नहीं की। पिता ने तो कुशल तक नहीं पूछी बल्कि उन्हें देखकर दक्ष के सारे अंग जल उठे।

दक्ष ने यज्ञ में सभी देवताओं के भाग रखे थे किन्तु महादेव जी का भाग नहीं रखा था। अपने स्वामी का यह देखकर सती जी का हृदय जल उठा। वे उस सभा में बोलीं – हे सभासदों! जिन लोगों ने यहाँ शिव जी की निन्दा की या सुनी है, उन सबको उसका फल तत्काल मिलेगा और मेरे पिता दक्ष भी भलीभाँति पछताएँगे। मैं अपने स्वामी का अपमान कदापि नहीं सह सकती अतः मैं इस शरीर को तुरन्त त्या दूँगी।

ऐसा कहकर सती जी ने योगाग्नि में अपना शरीर भस्म कर डाला। सारी यज्ञशाला में हाहाकार मच गया।

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क्या आपको अपने मोबाइल के लिए Jio Sim Card प्राप्त करने में परेशानी हो रही है?

तो यह पोस्ट अवश्य आपके लिए सहायक सिद्ध होगी।

Jio Sim Card मुफ्त में कैसे प्राप्त करें (How to get Jio Sim Card)

यह पोस्ट उनके लिए है जिन्हें Jio Sim Card आसानी से प्राप्त करने में कठिनाई हो रही है।

यह तो आप जानते ही होंगे कि रिलायंस ने Jio Sim Card धारी को 31 दिसम्बर 2016 तक मुफ्त अनलिमिटेड डाटा और लाइफटाइम के लिए मुफ्त टॉकटाइम देने की घोषणा की है।

31 दिसम्बर 2016 के बाद आपको मात्र रु.249 में छः माह के लिए अनलिमिटेड डाटा मिल सकेगा।

अस्तु, Jio Sim Card प्राप्त करने से पहले आप कृपया सुनिश्चित कर लें कि –

आपके पास LTE (4G) मोबाइल है क्योंकि Jio Sim Card अन्य मोबाइल, जैसे कि 2G या 3G मोबाइल, में काम नहीं करेगा।

आपके क्षेत्र में रिलायंस का नेटवर्क उपलब्ध है।

आपके पास एक मान्य ID Proof, जैसे कि आधार कार्ड, वोटर कार्ड आदि, है।

तो अब असली विषय पर आते हैं याने कि Jio Sim Card मुफ्त में कैसे प्राप्त करें (How to get Jio Sim Card)

सबसे पहले आप अपने LTE (4G) मोबाइल में गूगल प्लेस्टोर से MyJio app डाउनलोड कर लें। यह एप आपके लिए एक Unique Code generate करेगा जो कि आपके जियो सिम कार्ड की प्राप्ति में सहायक होगा।

इस एप को खोलने पर आपको “Get Jio Sim” विकल्प मिलेगा। इस विकल्प को आप क्लिक कर दें। “Get Jio Sim” को टच करने से यह क्लिक हो जायेगा।

अब आप सावधानीपूर्वक अपना लोकेशन, अर्थात् राज्य एवं शहर का नाम, चुनिये।

फिर आप अपना वर्तमान मोबाइल नंबर एन्टर कीजिये।

आपको अपने मोबाइल में एक OTP (one time password) प्राप्त होगा।

इस OTP को आप वेरीफिकेशन बॉक्स में एन्टर करें।

इसके पश्चात नियम और शर्तों को स्वीकार करे।

अब आपको एक barcode मिलेगा जो कि स्वतः ही आपके फोन के गैलरी में सेव्ह हो जायेगा।

अब आप बारकोड का प्रिंटआउट के साथ अपना मोबाइल लेकर नजदीकी Reliance Digital Xpress या Reliance Digital Xpress mini जाकर अपना सिम प्राप्त कर सकते हैं, वो भी मुफ्त में।

बारकोड प्रिंटआउट के साथ अपना ID Proof और अपना दो पासपोर्ट साइज फोटो ले जाना मत भूलियेगा।

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