Archives for General - Page 4

Don’t you feel strange after reading Indian History?

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अपने इतिहास को पढ़कर क्या अजीब-सा नहीं लगता?

हमारा इतिहास (Indian History) हमें बताता हैं कि अहिंसा, महात्मा गांधी, कांग्रेस आदि के कारण अंग्रेजों ने भारत को छोड़ा और हमारा देश स्वतन्त्र हुआ।

यह सब पढ़कर बड़ा अजीब-सा लगता है मुझे। सोचने लगता हूँ कि क्या अहिंसा और सत्याग्रह के कारण डाकू, स्वार्थी, क्रूर, कुटिल, अत्याचारी, हत्यारे, निर्दय, अवसरवादी, अतिमहत्वाकांक्षी अंग्रेजों का हृदय परिवर्तन हो गया?

मुझे विश्वास नहीं हो पाता, और शायद कभी होगा भी नही, कि ऐसा हुआ था। यही कारण है कि इतिहास की पुस्तकों को (Indian History) पढ़कर मुझे अजीब-सा लगने लगता है।

क्या आपको नहीं लगता ऐसा? क्या आप विश्वास करते हैं कि केवल एक व्यक्ति की अगुवाई में एक पार्टी अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से एक परतन्त्र देश को स्वतन्त्र करा सकता है?

जिस काल में अंग्रेजों ने भारत (1947) छोड़ा लगभग उसी काल में उन्हें अपने न्यू जीलैंड  (1947), बर्मा (1948), सीलोन (1948) Palestine (1948) आदि उपनिवेशों को भी छोड़ना पड़ा था।

यह तो हो ही नहीं सकता कि अहिंसा और सत्याग्रह का प्रभाव अंग्रेजों पर इतना अधिक पड़ा हो को भारत के अलावा उन्होंने अपने उपरोक्त उपनिवेशों को भी छोड़ दिया हो।

स्पष्ट है कि अंग्रेजों के समक्ष अपने उपनिवेशों को छोड़ने की विवशता थी।

वास्तविकता यही है कि द्वितीय विश्वयुद्ध ने ब्रिटिश साम्राज्य को खोखला करके रख दिया था और उसके कारण अंग्रेज अपने उपनिवेशों में अपना नियन्त्रण रख पाने में स्वयं को असमर्थ पा रहे थे।

इस विवशता के चलते उन्हें निश्चय करना पड़ा कि धक्के देकर निकाले जाने की अपेक्षा सत्ता छोड़कर इज्जत के साथ निकल लेना ही अधिक अच्छा है।

भारत में तो उनकी स्थिति और भी खराब हो गई थी। सेना उनके पास थी नहीं, वे तो स्थानीय सैनिकों को वेतन देकर उन्हीं के बल पर राज्य कर रहे थे।

समय बीतने के साथ स्थानीय सैनिकों में जागरूकता आ गई थी जिसके कारण अंग्रेजों के लिए भारत में सैनिकों का मिल पाना बहुत मुश्किल कार्य हो गया था।

यदि अग्रेज भारत को न छोड़ने का निश्चय करते तो नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज उन्हें रौंद कर रख देती।

वैसे भी अंग्रेज कुटिल अवश्य थे किन्तु बुद्धिमान भी थे, वे जानते थे कि किसी भी देश को हमेशा के लिए गुलाम बनाकर नहीं रखा जा सकता, एक न एक दिन उन्हें आजाद करना ही पड़ेगा।

भारत को आसानी के साथ छोड़ देने के निश्चय के पीछे उनकी यह बुद्धिमत्ता भी एक कारण थी।

किन्तु इतिहास की पुस्तकों में अंग्रेजों के भारत छोड़ने का पूरा-पूरा श्रेय व्यक्तिविशेष, दलविशेष, अहिंसा और सत्याग्रह को दे दिया गया।

क्या यह अजीब नहीं लगता आपको?

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Jio Offers in Hindi – free free free

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Reliance Jioरिलायंस कंपनी के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने अनेक Jio Offers घोषित किये हैं जो इस प्रकार से हैं –

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विशेष त्यौहारों के समय भी मैसेज का रेट नहीं बढ़ाया जायेगा।

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Albert Einstein’s Interesting Stories in Hindi

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अल्बर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein) के बारे में भला कौन नहीं जानता? वे एक महान वैज्ञानिक थे।

Gyan Sagar gk में प्रस्तुत अल्बर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein) के बारे में रोचक जानकारी।

Albert Einstein

महान वैज्ञानिक आइंस्टीन के कुछ मजेदार किस्से

(1)

प्रायः लोग अल्बर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein) से उनके सापेक्षता सिद्धान्त (जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिव्हिटी) को सरल शब्दों में समझाने के लिए निवेदन किया करते थे। जवाब में आइंस्टीन कहते थे, “आप अपने हाथ को जलती अंगीठी के ठीक ऊपर एक मिनट के लिए रखिये तो वह एक मिनट आपको एक घण्टे के बराबर लगेगा और किसी सुन्दर महिला के साथ एक घण्टे तक बैठिये तो वह एक घण्टा आपको एक मिनट के बराबर लगेगा। यही सापेक्षता है।”

(2)

एक दिन अल्बर्ट आइंस्टीन भाषण देने जा रहे थे तो रास्ते में उनके ड्राइव्हर ने कहा कि आपका भाषण मैं इतनी बार सुन चुका हूँ कि लोगों के सामने मैं ही आपका भाषण दे सकता हूँ। यह कहकर कि ‘ठीक है आज तुम्हीं भाषण देना’ आइंस्टीन ने ड्राइव्हर की पोशाक पहन कर उसका स्थान ले लिया और अपना स्थान ड्राइव्हर को दे दिया।

भाषण हॉल में ड्राइव्हर ने सचमुच, आइंस्टीन के जैसे ही, धुआँधार भाषण दिया। भाषण देने के बाद जब लोगों ने प्रश्न पूछने शूरू किए और ड्राइव्हर पूरे आत्मविश्वास के साथ जवाब भी सही दिए। किन्तु किसी एक ने ऐसा कठिन प्रश्न पूछ लिया कि ड्राइव्हर को उसका उत्तर नहीं पता था। इस पर ड्राइव्हर ने कहा, “अरे इस प्रश्न का जवाब तो इतना सरल है कि मेरा ड्राइव्हर बता देगा।” ऐसा कहकर उसने ड्राइव्हर वाली पोशाक पहने आइंस्टीन को जवाब देने के लिए खड़ा कर दिया।

(3)

जब आइंस्टीन प्रिंसटन यूनिव्हर्सिटी में कार्यरत थे तो एक दिन यूनिव्हर्सिटी से घर वापस आते समय वे अपने घर का पता ही भूल गए। यद्यपि प्रिंसटन के अधिकतर लोग आइंस्टीन को पहचानते थे, किन्तु जिस टैक्सी में वे बैठे थे उसका ड्राइव्हर भी उन्हें पहचानता नहीं था। आइंस्टीन ने ड्राइव्हर से कहा, “क्या तुम्हें आइंस्टीन का पता मालूम है?” ड्राइव्हर ने जवाब दिया, “प्रिंसटन में भला कौन उनका पता नहीं जानेगा? यदि आप उनसे मिलना चाहते हैं तो मैं आपको उनके घर तक पहुँचा सकता हूँ।” तब आइंस्टीन ने ड्राइव्हर को बताया कि वे स्वयं ही आइंस्टीन हैं और अपने घर का पता भूल गए हैं। यह जानकर ड्राइव्हर ने उन्हें उनके घर तक पहुँचाया और आइंस्टीन के बार-बार आग्रह के बावजूद भी, टैक्सी का भाड़ा भी नहीं लिया।

(4)

एक बार आइंस्टीन प्रिंसटन से कहीं जाने के लिए ट्रेन से सफर कर रहे थे। जब टिकट चेकर उनके पास आया तो वे अपनी टिकट ढ़ूँढ़ने के लिए जेबें टटोलने लगे। जेब में टिकट के न मिलने पर उन्होंने अपने सूटकेस को चेक किया। वहाँ भी टिकट को नदारद पाकर अपनी सीट के आस-पास खोजने लगे। यह देखकर चेकर ने कहा कि यदि टिकट गुम हो गई है तो कोई बात नहीं, वह उन्हें अच्छी प्रकार से पहचानता है और उसे विश्वास है कि टिकट जरूर खरीदी गई होगी।

चेकर जब बोगी के सभी लोगों का टिकट चेक करके वापस जा रहा था तो उसने देखा कि आइंस्टीन अपनी सीट के नीचे टिकट ढ़ूँढ़ रहे हैं। तब चेकर फिर से उन्हे कहा कि वे टिकट के लिए परेशान न हों, उनसे टिकट नहीं माँगा जाएगा।

चेकर की बातें सुनकर आइंस्टीन ने कहा, “पर टिकट के बिना मुझे पता कैसे चलेगा कि मैं जा कहाँ रहा हूँ?”

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Glory of Ancient India

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भारत की प्राचीन गौरव-गाथा क्या हमें याद है?

Glory of Ancient India

भारत की प्राचीन गौरव-गाथा (Glory of ancient India) को सम्पूर्ण विश्व मानता है। किन्तु दुःख की बात तो यह है कि हम भारतीय ही अपनी प्राचीन सभ्यता, जीवन और परिपाटी को भूल चुके हैं।

आज से हजारों वर्ष पूर्व पंजाब का आविष्कार और संस्थापन करने वाले आर्यों की उन असाधारण विजयों के संस्कार क्या हमें याद हैं?

मैं उन्हीं आर्यों की बात कर रहा हूँ जिन्होंने भारत की शश्य-श्यामला भूमि में प्रबल राज्यों की स्थापना की थी। उन्हीं आर्यों ने भारत के प्रशान्त वातावरण में अगम्य-अगाध अध्यात्मतत्व को खोज निकाला था जो कि अत्यन्त प्राचीन होते हुए भी आज तक ताजे और बहुमूल्य बने हुए हैं।

क्या हम जानते हैं कि कुरुओं और पांचालों की प्राचीन राजधानियाँ कहाँ थीं? क्या हमें पता है कि मगध के राजसिंहासन पर बैठ कर कब-कब किन-किन हिन्दू सम्राटों ने शासन किया था?

हम तो यह भी नहीं जानते कि हमारे किन पूर्वजों ने विशाल महासागरों को अतिक्रान्त करके चीन, अरब, यवद्वीप और पाताल में अपने उपनिवेश कायम किए थे।

क्या हमें आन्ध्र, गुप्त, नाग आदि महाराज्यों के विषय में जानकारी है?

शकों ने किस प्रकार से भारत को आक्रान्त किया था और विक्रम ने उन्हें कैसे पददलित किया था?

एलोरा और अजन्ता की गुफाएँ, साँची के स्तूप, भुवनेश्वर और जगन्नाथ के मन्दिरों का निर्माण किस-किस ने किया था?

इस उद्देश्य से कि हम भारतीय अपनी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति, गौरव को भूल जाएँ, एक सुनियोजित शिक्षा-नीति के तहत भारतीयों को अंग्रेजी की शिक्षा देने का आरम्भ सन् 1835 में आरम्भ किया गया, जो कि कमोबेश आज तक चली आ रही है।

इस शिक्षा-नीति का निर्माण लॉर्ड मैकॉले ने किया था जिसने सन् 1833 में चार्टर पर पार्लियामेंट में भाषण देते हुए कहा था, “मैं चाहता हूँ कि भारत में यूरोप के समस्त रीति-रिवाजों को जारी किया जाए, जिससे हम अपनी कला और आचारशास्त्र, साहित्य और कानून का अमर साम्राज्य भारत में कायम करें। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हम भारतवासियों की एक ऐसी श्रेणी उत्पन्न करें जो हमारे और उन करोड़ों के बीच में, जिन पर हमें शासन करना है, दुभाषिए का काम दें; जिनके खून तो हिन्दुस्तानी हों, पर रुचि अंग्रेजी हो। संक्षेप में अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय तन से भारतीय, पर मन से अंग्रेज हो जाएँ, जिससे अंग्रेजों का विरोध करने की उनकी भावना ही नष्ट हो जाए।”

परन्तु, जिन दिनों मैकॉले ने अपने उपरोक्त विचार व्यक्त किए थे, उसी काल में अनेक पाश्चात्य विद्वानों की नजर भारतीय सांस्कृतिक सम्पदा पर भी पड़ रही थी।

उन दिनों के पहले तक यूरोप भारत को धन-धान्य से भरा-पूरा, नवाबों और मुग़लों का देश समझता था और उसकी दृष्टि लूट-खसोट पर थी, सभ्यता और संस्कृति के उद्गम के सम्बन्ध में यूरोप का विश्वास था कि उसका आरम्भ यूनान और फिलिस्तीन से हुआ है; वे यह भी समझते थे कि वही देश संसार में सबसे प्राचीन सभ्यता वाले हैं।

भारत को तब तक यूरोप के लोग एक अर्द्धसभ्य देश समझते थे। परन्तु जब यूरोप के निवासियों ने संस्कृत सीखी तो उनका परिचय उपनिषद् तथा कुछ जैन और बौद्ध ग्रन्थों से हुआ।

जिन दिनों प्लासी का युद्ध हो रहा था, उन्हीं दिनों दुपरोन नामक एक फ्रेंच नवयुवक भारत में प्राचीन पाण्डुलिपयाँ यत्नपूर्वक खोजता फिर रहा था। वह भारत से लगभग अस्सी पाण्डुलिपयाँ अपने साथ फ्रांस ले गया।

उन पाण्डुलिपियों में एक पाण्डुलिपि दाराशिकोह द्वारा फारसी-अनूदित उपनिषदों की भी थी। दुपरोन ने लैटिन में इसका अनुवाद करके ‘औपलिखत’ नाम से प्रकाशित किया।

‘औपलिखत’ को पढ़कर जर्मन का प्रसिद्ध दार्शनिक शॉपेनहार आश्चर्यविमूढ़ हो गया और उसके मुँह से ये उद्गार निकले कि ‘इसने मेरी आत्मा की गहराई को हिलकोर दिया है। इसके प्रत्येक शब्द से मौलिक विचार ऊपर उठते हैं जिससे भारतीय विचारधारा का वातावरण आप ही उठ खड़ा होता है। ऐसा प्रतीत होता है मानों ये विचार हमारे अपने आत्मिक बन्धु के विचार हों। हमारे मनों पर जो यहूदी-संस्कारों की रूढ़ियाँ और अंधविश्वास छाए हुए हैं, वे इन विचारों के स्पर्श-मात्र से एकबारगी ही गायब हो जाते हैं। सारे संसार में इसके जोड़ का कोई और ग्रन्थ नहीं हो सकता। जीवन-भरफ में मुझे यही एक आश्वासन प्राप्त हुआ है और मृत्युपर्यन्त यह मेरे साथ रहेगा।’

जर्मनी में उपनिषदों के अध्ययन से विचारों का जागरण उसी प्रकार से हुआ जैसे रिनासां के समय में प्राचीन यूनानी साहित्य के सम्पर्क से सारे यूरोप में हुआ था।

इसके बाद जोहान फिक्टे और पॉल दूसान ने वेदान्त के सत्य को संसार का सबसे बड़ा सत्य माना, और नीत्शे ने मनुस्मृति को पढ़ा तो उसने उसे बाइबिल से कई गुना श्रेष्ठ कहा।

न्याय के क्षेत्र में हिन्दुओं पर शासन उन्हीं के धर्म-शास्त्रो के अनुसार करने के विचार से वारेन हेस्टिंग्ज ने पहले-पहल धर्म-शास्त्रों का अनुवाद फारसी और अंग्रेजी भाषा में कराया।

इसके अतिरिक्त विलायत से आए हुए जजों और वकीलों को उसने संस्कृत पढ़ने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने यद्यपि कचहरी की आवश्यकता के लिए संस्कृत पढ़ी, पर जब उन्होंने वहाँ का भाव-गाम्भीर्य और विचारों का मार्दव देखा तो वे एकबारगी अभिभूत हो उठे।

इसके बाद सन् 1784 में सर विलियम जोन्स ने, जो उन दिनों कलकत्ता के प्रधान न्यायाधीश थे, एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना की तथा स्वयं कालिदास की ‘शकुन्तला’ का अनुवाद किया और ‘ऋतुसंहार’ का एक सम्पादित संस्करण प्रकाशित कराया।

उसके एक बरस बाद सर चार्ल्स विलिकिन्स ने ‘भगवद्गीता’ का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया।

सर जोन्स संस्कृत पर मुग्ध हो गए। उन्होंने सन् 1784 में मानव-धर्मशास्त्र नाम से मनुस्मृति का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया और जब सन् 1786 में एशियाटिक सोसाइटी का अधिवेशन हुआ तो यह घोषणा कर दी कि संस्कृत परम अद्भुत भाषा है, और लैटिन और ग्रीक से अधिक सम्पन्न है।

उन्होंने यह भी विचार प्रकट किया कि गोथिक और केल्टिक भाषा-परिवार का उद्गम संस्कृत ही है। आगे इसी बुनियाद पर फ्रांजवाय, मैक्समूलर और ग्रिम ने तुलनात्मक भाषा-विज्ञान का महल खड़ा किया।

इसके तत्काल बाद यूरोप के पण्डितों ने निरुक्त और व्याकरण का मनन किया और फोनेटिक्स लिखना आरम्भ किया।

विलियम जोन्स की मृत्यु के बाद उनके कनिष्ठ सहकारी हेनरी टॉमस कोलब्रुक एक महान प्राच्यविद्या-विशारद प्रसिद्ध हुए। इन्होंने हिन्दू-धर्मशास्त्र, दर्शन, व्याकरण, ज्योतिष और धर्म का बड़ा ही गम्भीर अध्ययन एशियाटिक रिसर्चेज में प्रकाशित किया। वेदों का भी एक प्रामाणिक विवरण ‘आन द वेदाज’ सबसे प्रथम उन्होंने निकाला।

मैक्समूलर, जो कि एक जर्मन होने के बावजूद अंग्रेजी शासन का एक स्तम्भ था, ने सायण के भाष्य पर महत्वपूर्ण अध्ययन किया और उसके बाद उसने वेदों का भाष्य किया, जिसने पूरे यूरोप की आँखें खोल दीं।

वेदभाष्य से बढ़कर एक काम उसने  यह किया कि तुलनात्मक भाषा-विज्ञान और तुलनात्मक अध्ययन की परम्परा स्थापित की।

इसका परिणाम यह हुआ कि यूरोप के मोह-अन्धकार का पर्दा फट गया। अब तक वे जो यह मानते आ रहे थे कि फिलिस्तीन और यूनान सबसे पुराने देश हैं, और हिब्रू भाषा सबसे पुरानी है, ये सब मान्ताएँ बिखर गईं।

मैक्समूलर ने प्रमाणित कर दिया कि संसार की प्राचीनतम जाति आर्य है और प्राचीनतम साहित्य वेद है।

इस प्रकार जर्मन विद्वानों ने भारतीय साहित्य, दर्शन और धर्म का जो बखान किया, उसने ईसाइयों के उस प्रचार को भी मिथ्या कर दिया जो वे भारत से बाहर करते थे कि भारत अर्द्ध-शिक्षित देश है।

श्लीगल बन्धुओं ने जर्मन भाषा के द्वारा यूरोप में भारतीय ज्ञान का काफी विस्तार किया। वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, मनुस्मृति, शकुन्तला और वेणीसंहार को देखकर जर्मन कवि और विद्वान विस्मय से मूढ़-मुग्ध हो गए।

इस साहित्य के भाव और विचार नये क्षितिज के थे। श्लीगल ने गीता की प्रशंसा पागलों की भाँति की और कहा, “ओ ईश्वरत्व के व्याख्याता, तुम्हारी वाणी के प्रभाव से मनुष्य का हृदय ऐसे अकथनीय आनन्द की भूमि में पहुँच जाता है, जो अत्यन्त उच्च, सनातन और ईश्वरीय है। मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ और तुम्हारे चरणों में अपना अभिनन्दन भेंट करता हूँ।”

भारतीय काव्यों की विलक्षणता पर सकर्ट ने प्रकाश डाला। गेटे ने शकुन्तला पर प्रशस्ति लिखी। गेटे आदि ने संस्कृत-परम्पराओं को अपनाया और श्लीगल से हाइने तक जर्मन कविता में भारतीय भाव फैलते ही रहे।

यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि हम समस्त संसार द्वारा स्तुत्य अपनी ही संस्कृति, सभ्यता, और गौरव को निरन्तर रूप से भुलाते ही चले जा रहे हैं।

(विचार, भाव तथा सामग्री आचार्य चतुरसेन के उपन्यास “सोना और खून” से साभार)

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Tees Saal ka Itihas – Sharad Joshi

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Sharad Joshi

प्रस्तुत है श्री शरद जोशी (Sharad Joshi) जी की व्यंग रचना – तीस साल का इतिहास – जिसे उन्होंने वर्ष 1977 में लिखा था।

शरद जोशी (Sharad Joshi) की व्यंग रचना – तीस साल का इतिहास (Tees Saal ka Itihas)

कांग्रेस को राज करते करते तीस साल बीत गए। कुछ कहते हैं, तीन सौ साल बीत गए। गलत है। सिर्फ तीस साल बीते। इन तीस सालों में कभी देश आगे बढ़ा, कभी कांग्रेस आगे बढ़ी। कभी दोनों आगे बढ़ गए, कभी दोनों नहीं बढ़ पाए। फिर यों हुआ कि देश आगे बढ़ गया और कांग्रेस पीछे रह गई। तीस सालों की यह यात्रा कांग्रेस की महायात्रा है। वह खादी भंडार से आरम्भ हुई और सचिवालय पर समाप्त हो गई।

पूरे तीस साल तक कांग्रेस हमारे देश पर तम्बू की तरह तनी रही, गुब्बारे की तरह फैली रही, हवा की तरह सनसनाती रही, बर्फ सी जमी रही। पूरे तीस साल तक कांग्रेस ने देश में इतिहास बनाया, उसे सरकारी कर्मचारियों ने लिखा और विधानसभा के सदस्यों ने पढ़ा। पोस्टरों, किताबों, सिनेमा की स्लाइडों, गरज यह है कि देश के जर्रे-जर्रे पर कांग्रेस का नाम लिखा रहा। रेडियो, टीवी डाक्यूमेंट्री, सरकारी बैठकों और सम्मेलनों में, गरज यह कि दसों दिशाओं में सिर्फ एक ही गूँज थी और वह कांग्रेस की थी। कांग्रेस हमारी आदत बन गई। कभी न छूटने वाली बुरी आदत। हम सब यहाँ-वहाँ से दिल दिमाग और तोंद से कांग्रेसी होने लगे। इन तीस सालों में हर भारतवासी के अंतर में कांग्रेस गेस्ट्रिक ट्रबल की तरह समा गई।

जैसे ही आजादी मिली कांग्रेस ने यह महसूस किया कि खादी का कपड़ा मोटा, भद्दा और खुरदुरा होता है और बदन बहुत कोमल और नाजुक होता है। इसलिए कांग्रेस ने यह निर्णय लिया कि खादी को महीन किया जाए, रेशम किया जाए, टेरेलीन किया जाए। अंग्रेजों की जेल में कांग्रेसी के साथ बहुत अत्याचार हुआ था। उन्हें पत्थर और सीमेंट की बेंचों पर सोने को मिला था। आजादी के बाद अच्छी क्वालिटी की कपास का उत्पादन बढ़ाया गया, उसके गद्दे-तकिये भरे गए। और कांग्रेसी उस पर विराज कर, टिक कर देश की समस्याओं पर चिंतन करने लगे। देश में समस्याएँ बहुत थीं, कांग्रेसी भी बहुत थे। समस्याएँ बढ़ रही थीं, कांग्रेस भी बढ़ रही थी।

एक दिन ऐसा आया की समस्याएँ कांग्रेस हो गईं और कांग्रेस समस्या हो गई। दोनों बढ़ने लगे। पूरे तीस साल तक देश ने यह समझने की कोशिश की कि कांग्रेस क्या है? खुद कांग्रेसी यह नहीं समझ पाये कि कांग्रेस क्या है? लोगों ने कांग्रेस को ब्रह्म की तरह नेति-नेति के तरीके से समझा। जो दाएँ नहीं है वह कांग्रेस है। जो बाएँ नहीं है वह कांग्रेस है। जो मध्य में भी नहीं है वह कांग्रेस है। जो मध्य से बाएँ है वह कांग्रेस है। मनुष्य जितने रूपों में मिलता है, कांग्रेस उससे ज्यादा रूपों में मिलती है। कांग्रेस सर्वत्र है। हर कुर्सी पर है। हर कुर्सी के पीछे है। हर कुर्सी के सामने खड़ी है। हर सिद्धांत कांग्रेस का सिद्धांत है। इन सभी सिद्धांतों पर कांग्रेस तीस साल तक अचल खड़ी हिलती रही।

तीस साल का इतिहास साक्षी है कांग्रेस ने हमेशा संतुलन की नीति को बनाए रखा। जो कहा वो किया नहीं, जो किया वो बताया नहीं, जो बताया वह था नहीं, जो था वह गलत था। अहिंसा की नीति पर विश्वास किया और उस नीति को संतुलित किया लाठी और गोली से। सत्य की नीति पर चली, पर सच बोलने वाले से सदा नाराज रही। पेड़ लगाने का आन्दोलन चलाया और ठेके देकर जंगल के जंगल साफ़ कर दिए। राहत दी मगर टैक्स बढ़ा दिए। शराब के ठेके दिए, दारु के कारखाने खुलवाए; पर नशाबंदी का समर्थन करती रही।

हिंदी की हिमायती रही अंग्रेजी को चालू रखा। योजना बनायी तो लागू नहीं होने दी। लागू की तो रोक दिया। रोक दिया तो चालू नहीं की। समस्याएँ उठी तो कमीशन बैठे, रिपोर्ट आई तो पढ़ा नहीं। कांग्रेस का इतिहास निरन्तर सन्तुलन का इतिहास है। समाजवाद की समर्थक रही, पर पूंजीवाद को शिकायत का मौका नहीं दिया। नारा दिया तो पूरा नहीं किया। प्राइवेट सेक्टर के खिलाफ पब्लिक सेक्टर को खड़ा किया, पब्लिक सेक्टर के खिलाफ प्राइवेट सेक्टर को। दोनों के बीच खुद खड़ी हो गई। तीस साल तक खड़ी रही।

एक को बढ़ने नहीं दिया। दूसरे को घटने नहीं दिया। आत्मनिर्भरता पर जोर देते रहे, विदेशों से मदद माँगते रहे। ‘यूथ’ को बढ़ावा दिया, बुड्द्धों को टिकिट दिया। जो जीता वह मुख्यमंत्री बना, जो हारा सो गवर्नर हो गया। जो केंद्र में बेकार था उसे राज्य में भेजा, जो राज्य में बेकार था उसे उसे केंद्र में ले आए। जो दोनों जगह बेकार थे उसे एम्बेसेडर बना दिया। वह देश का प्रतिनिधित्व करने लगा। एकता पर जोर दिया आपस में लड़ते रहे। जातिवाद का विरोध किया, मगर अपनेवालों का हमेशा ख्याल रखा। प्रार्थनाएं सुनीं और भूल गए। आश्वासन दिए, पर निभाए नहीं। जिन्हें निभाया वे आश्वश्त नहीं हुए। मेहनत पर जोर दिया, अभिनन्दन करवाते रहे। जनता की सुनते रहे अफसर की मानते रहे। शांति की अपील की, भाषण देते रहे। खुद कुछ किया नहीं दूसरे का होने नहीं दिया। संतुलन की इन्तहा यह हुई कि उत्तर में जोर था तब दक्षिण में कमजोर थे। दक्षिण में जीते तो उत्तर में हार गए।

तीस साल तक, पूरे तीस साल तक, कांग्रेस एक सरकार नहीं, एक संतुलन का नाम था। संतुलन, तम्बू की तरह तनी रही, गुब्बारे की तरह फैली रही, हवा की तरह सनसनाती रही बर्फ सी जमी रही पूरे तीस साल तक। कांग्रेस अमर है। वह मर नहीं सकती। उसके दोष बने रहेंगे और गुण लौट-लौट कर आएँगे। जब तक पक्षपात, निर्णयहीनता ढीलापन, दोमुँहापन, पूर्वाग्रह, ढोंग, दिखावा, सस्ती आकांक्षा और लालच कायम है, इस देश से कांग्रेस को कोई समाप्त नहीं कर सकता। कांग्रेस कायम रहेगी। दाएँ, बाएँ, मध्य, मध्य के मध्य, गरज यह कि कहीं भी किसी भी रूप में आपको कांग्रेस नजर आएगी। इस देश में जो भी होता है अंततः कांग्रेस होता है। जनता पार्टी भी अंततः कांग्रेस हो जाएगी। जो कुछ होना है उसे आखिर में कांग्रेस होना है। तीस नहीं तीन सौ साल बीत जाएँगे, कांग्रेस इस देश का पीछा नहीं छोड़ने वाली!

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English Education in India

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Gyan Sagar gk में प्रस्तुत है भारत में अंग्रेजी शिक्षा (English Education in India) पर लेख।

भारत में अंग्रेजी शिक्षा (English Education in India)

जब भारत को एक ब्रिटिश उपनिवेश बना लिया गया तो सुचारु रूप से शासन तथा व्यवस्था चलाने के लिए अंग्रेजों को बड़ी संख्या में अधिकारियों तथा कर्मचारियों, विशेषकर क्लर्कों, की आवश्यकता महसूस हुई। अधिकारी नियुक्त करने के लिए तो वे ब्रिटेन से अंग्रेजों को, अच्छी कमाई का प्रलोभन देकर, भारत ले आते थे किन्तु वहाँ से क्लर्कों को भी लाना उनके लिए बहुत कठिन और खर्चीला कार्य था। अतः उन्होंने भारतीय लोगों को क्लर्क के रूप में नियुक्त करने का निश्चय किया। चूँकि उनके समस्त कार्य अंग्रेजी में ही होते थे, भारतीय क्लर्कों को अंग्रेजी को ज्ञान होना अत्यावश्यक था। इस बात को ध्यान में रखते हुए ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सन् 1813 में भारतीयों को अंग्रेजी सिखाने के लिए कुछ धन का प्रावधान रखा ताकि उन्हें भारत से ही क्लर्क तथा अनुवादक प्राप्त हो सकें। 1833 के चार्टर एक्ट के पश्चात् भारत में अंग्रेजी अधिकारिक रूप से कार्यालयीन भाषा बन गई। सन् 1844 में लॉर्ड हॉर्डिंग्ज ने घोषणा की कि अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जाएगी। इस घोषणा के पीछे क्लर्क और अनुवादक प्राप्त करने के साथ ही निम्न उद्देश्य भी थे जैसे किः

वे समझते थे कि अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय ब्रिटिश उपनिवेश के प्रति अधिक निष्ठावान रहेंगे।

इस घोषणा से भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करने वाली मिशनरियों को फायदा मिलेगा क्योंकि उन्हें लगता था कि अंग्रेजी पढ़ा-लिखा व्यक्ति, चाहे वह प्रभावशाली भारतीय परिवार का ही क्यों न हो, आसानी के साथ अपना धर्म त्यागकर ईसाई धर्म अपना लेगा।

यहाँ पर यह बताना अनुपयुक्त नहीं होगा कि उन दिनों भारत की अपनी एक अलग शिक्षा-व्यवस्था हुआ करती थी। अध्यापन का कार्यभार ब्राह्मणों पर होता था और वे अपने घरों में विद्यार्थियों को शिक्षा दिया करते थे। शिक्षा के लिए किसी प्रकार की फीस नहीं होती थी, जहाँ धनी वर्ग के लोग अपनी सन्तानों की शिक्षा के एवज में ब्राह्मणों को पर्याप्त से भी अधिक धन-धान्य तथा जमीन-जायजाद तक दान में दे देते थे वहीं निर्धनों की सन्तान मुफ्त में शिक्षा पाते थे। गाँवों की ग्राम पंचायतों के नियन्त्रण में भी पाठशालाओं का संचालन हुआ करता था। उच्च संस्कृत-साहित्य की शिक्षा हेतु नगरों में विद्यापीठ हुआ करते थे। उर्दू-फारसी की शिक्षा के लिए बहुत सारे मक़तब और मदरसे भी कायम थे।

अंग्रेजों ने भारत में अपना उपनिवेश स्थापित तो कर लिया था पर उसे कायम रखने में भारत की यह शिक्षा व्यवस्था बहुत बड़ी बाधा थी। कुछ उदारवादी भारतीयों ने, यह सोचकर कि अंग्रेजी शिक्षा से पाश्चात्य संस्कृति, दर्शन तथा साहित्य का ज्ञान होगा, अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण करना आरम्भ कर दिया किन्तु उनकी संख्या नगण्य थी। किन्तु अंग्रेज तो चाहते थे कि अधिक से अधिक संख्या में भारतीय अंग्रेजी के भक्त बन जाएँ इसलिए उन्होंने मक्कारी से काम लिया और सरकारी नौकरी का प्रलोभन देना शुरू किया। मध्यम वर्गीय भारतीयों के लिए, जिनकी स्थिति उन दिनों बहुत अच्छी नहीं थी, यह एक बहुत बड़ा प्रलोभन था क्योंकि सरकारी नौकरी में वेतन तो अच्छा था ही और ‘ऊपर की कमाई’ भी होती थी। ‘ऊपर की कमाई’ को भारत में एक प्रकार से अंग्रेजों की ही देन ही कहा जा सकता है क्योंकि अंग्रेजों ने ऐसे-ऐसे सरकारी नियम-कानून बना रखे थे जिससे कि भारतीयों को येन-केन-प्रकारेन लूटा जा सके। अब यदि अंग्रेज अधिकारियों को भारतीयों को लूटने का भरपूर अवसर प्राप्त था तो भला सरकारी नौकरी करने वाले स्थानीय लोगों को भला लूट का थोड़ा-बहुत हिस्सा ‘ऊपर की कमाई’ के रूप में कैसे न मिलता। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो भारतीयों को अंग्रेजों के साथ अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय सरकारी नौकर भी लूटने लगे। भारतीय शिक्षा जहाँ लोगों मे संतोष, त्याग और परमार्थ की भावना उत्पन्न करती थी वहीं अंग्रेजी शिक्षा उनमें लोभ और स्वार्थ की भावना ही पैदा करती थी, अंग्रेजी शिक्षा-व्यवस्था का आधार लूट-खसोट जो था। अंग्रेजों की लूट का आलम यह था कि तंग आकर किसानों ने किसानी छोड़ दी, पुराने खानदान गारत कर दिए गए, ग्राम पंचायतों को नष्ट कर डाला गया और उनके द्वारा संचालित पाठशालाओं को तोड़ डाला गया, न्याय प्रक्रिया को ऐसा जटिल बना दिया गया कि केवल आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग ही न्यायालय से कुछ उम्मीद रख पाते थे, गरीब जनता के लिए न तो कानून था और न ही इन्साफ। पुलिस के चक्कर में जो फँस जाता था उसका तो बेड़ा ही गर्क हो जाता था। भारत के अत्यन्त कुशल कारीगरों को अयोग्य और असहाय बना दिया गया ताकि हस्तनिर्मित वस्तुओं के स्थान पर अंग्रेजों के यंत्र निर्मित वस्तुएँ बेची जा सकें।

अस्तु, अंग्रेजी पढ़े लोगों की कमाई और रुतबा देखकर भारतीयों का अंग्रेजी के प्रति रुझान बढ़ता ही चला गया। अंग्रेज समझ रहे थे कि अंग्रेजी शिक्षा का असर भारतीयों पर वैसा ही पड़ रहा है जैसा वे चाहते थे। यह उनकी एक बहुत बड़ी सफलता थी। अपनी इस सफलता से उत्साहित होकर उन्होंने समस्त भारतीयों को तन से भारतीय किन्तु मन से अंग्रेज बनाने की वृहत् योजना बना डाली जिसके तहत सन् 1835 में “मैकॉले के मिनट” का सूत्रपात किया गया। “मैकॉले का मिनट” अंग्रेजों की एक बहुत बड़ी मक्कारी थी किन्तु भारतीय उस मक्कारी को समझ नहीं पाए क्योंकि उसे भारत में शिक्षा के विकास तथा लोककल्याण का मुखौटा पहना दिया गया था। भारतीयों को इसके विषय में लच्छेदार भाषा में बताया गया कि इसका उद्देश्य “साहित्य का पुरुद्धार करना तथा साहित्य को बढ़ावा देना, भारत के शिक्षित निवासियों को प्रोत्साहन देना तथा विज्ञान का परिचय तथा बढ़ावा देना” है। (“For the revival and promotion of literature and the encouragement of the learned natives of India, and for the introduction and promotion of a knowledge of the sciences among the inhabitants of the British territories.”)

उपरोक्त मिनट के पीछे छुपी हुई मक्कारी धूर्त मैकॉले के उस स्पष्टीकरण में स्पष्ट नजर आती है जिसमें उसने कहा था, “हमें एक ऐसा वर्ग बनाने की पुरजोर कोशिश करनी ही होगी जो हमारे और उन करोड़ों के बीच में, जिन पर हमें शासन करना है, दुभाषिए का काम करें; जिनके खून तो हिन्दुस्तानी हों, पर रुचि, खयाल और बोली अंग्रेजी हो।” (“We must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern, a class of persons Indian in blood and color, but English in taste, in opinions, words and intellect.”)

मक्कार मैकॉले भारतीयों के मनो-मस्तिष्क में अंग्रेजी भाषा को कूट-कूट कर भर देना चाहता था ताकि भारतीयों के दिलो-दिमाग से अंग्रेज और अग्रेजी विरोधी भावना ही खत्म हो जाए, और, हमारे दुर्भाग्य से, वह अपने इस उद्देश्य में न केवल सफल हुआ बल्कि बुरी तरह से सफल हुआ। हम शिक्षा में रमकर अपनी संस्कृति, सभ्यता, साहित्य, रीति-रिवाज आदि सब को भूलते चले गए।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भी दुर्भाग्य ने हमारा साथ नहीं छोड़ा क्योंकि सत्ता की बागडोर अंग्रेजों द्वारा बनाए गए भारतीय अंग्रजों के हाथ में आ गया और उन्होंने भारत में विदेशियों के बनाए शिक्षा-नीति और व्यवस्था को जारी रहने दिया जिसका परिणाम आज यह देखने को मिलता है कि हमारे अपने बच्चे ही हमसे पूछते हैं कि ‘चौंसठ याने सिक्सटी’ फोर ही होता है ना? हिन्दी गिनती, हिन्दी माह, हिन्दी वर्णमाला क्या होते हैं, उन्हें मालूम ही नहीं है।

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