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Is the History we read true?

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हमारा इतिहास (History) क्या हमारा ही इतिहास है?

आपको लगता है कि नहीं पता नहीं, पर मुझे तो यही लगता है कि आज जो हमारा इतिहास (History) पढ़ाया जाता है वह वास्तव में हमारा इतिहास है ही नहीं। वह तो उन क्रूर, कुटिल, अत्याचारी और हत्यारे लोगों का इतिहास है जिन्होंने अत्याचार और मक्कारी के बल पर भारत पर जबरन कब्जा कर लिया था। और दुख की बात तो यह है कि, आज पढ़ाए जाने वाले इतिहास में उन्हीं लोगों को ही महान बताया जाता है।

मुगल काल का इतिहास मुगलों के द्वारा और अंग्रेजों के समय का इतिहास अंग्रेजों के द्वारा लिखा गया है। अब जाहिर है कि मुगल मुगलों की और अंग्रेज ईसाइयों की श्रेष्ठता ही बयान करने की कोशिश करेगा और उसी हिसाब से वास्तविक घटनाओं को तोड़-मरोड़ कर ही इतिहास लिखेगा। मुगलों और अंग्रेजों, दोनो ही के इतिहासकारों को अच्छी तरह से मालूम था कि अत्यन्त प्राचीन काल से समस्त विश्व को ज्ञान, विज्ञान और गणित की शिक्षा प्रदान करने वाले भारत का अपना एक अनूठा इतिहास रहा है। किन्तु यदि वे भारत के उस सच्चे इतिहास को लिखते तो स्वयं को श्रेष्ठ कैसे सिद्ध कर पाते? स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए उन्होंने भारत के प्राचीन राजवंशों तथा उनकी वंशावलियों को अविश्वसनीय बता दिया, अनेक भारतीय साम्राज्यों के लिखित इतिहास को गायब कर दिया और हमारे प्राचीन ग्रन्थों मे उल्लेखित इतिहास को कल्पित कथाओं का रूप दे दिया।

दुर्भाग्य की बात तो यह है कि स्वतन्त्र होने के बाद भारत की सत्ता जिन लोगों के हाथ में आई वे शक्ल-सूरत से भारतीय दिखने वाले लोग भी मन से अंग्रेज ही थे, अंग्रेजियत उनके नस-नस में खून बनकर दौड़ रही थी। भारतीय दृष्टिकोण से भारत का सही इतिहास लिखा जाना भला उन्हें कैसे गवारा होता? पुराने इतिहास को तो उन्होंने सुधारा ही नहीं, उल्टे स्वतन्त्रता प्राप्ति के के पूर्व तथा पश्चात् के इतिहास को भी तोड़-मरोड़ कर कुछ तथाकथित विशिष्ट व्यक्तियों का इतिहास बना कर रख दिया। सारी उपलब्धियों का श्रेय उन तथाकथित विशिष्ट व्यक्तियों को दे दिया गया।

यदि आज भी हम अपने वास्तविक इतिहास को जान लें, अपनी प्राचीन संस्कृति और सभ्यता को महत्व दें, और निहित स्वार्थ को छोड़ कर विशुद्ध राष्ट्रीय भावना के साथ अपना काम करें तो संसार की कोई भी ताकत भारत को विश्व में प्रथम स्थान पाने से रोक नहीं सकती।

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How to manage when you can’t withdraw cash from Bank – Cashless Payment methods

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विमुद्रीकरण (demonetization) के बाद बगैर नगदी के भुगतान करना (cashless payment) एक बहुत बड़ी आवश्यकता बन गई है, नगरीय क्षेत्रों के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी। देश के प्रत्येक नागरिक के लिए, चाहे वह किसान हों, अध्यापक हो, सैनिक हो, अधिकारी हो, कर्मचारी हो, चाहे कुछ भी हो बगैर नगदी के भुगतान करने (cashless payment) के तरीकों को जानना जरूरी हो गया है। वर्तमान में नकदी (cash) की कमी को देखते हुए भारत सरकार भी बैंकिंग के डिजिटल विधि को युद्धस्तर पर बढ़ावा दे रही है।

तो आइये जानें बगैर नगदी के भुगतान करना (cashless payment) के तरीकों के बारे में

डिजिटल वैलेट्स (Digital Wallets)

छोटी राशियों जैसे कि सब्जी, दूध, किराना आदि खरीदी आदि के भुगतान के लिए डिजिटल वैलेट्स (Digital Wallets) सबसे सुगम तरीका है। डिजिटल वैलेट्स (Digital Wallets) को आप अपनी जेब में रखा हुआ मनीपर्स या नगदी का बटुआ समझ सकते हैं। जैसे आप अपनी जेब में मनीपर्स रखते हैं वैसे ही आप डिजिटल वैलेट्स (Digital Wallets) को आप अपने मोबाइल फोन में रख सकते हैं। मोबाइल फोन में डिजिटल वैलेट्स (Digital Wallets) रखने के बाद आपको नगद रुपया रखने की विशेष आवश्यकता नहीं है। बस आपके बैंक खाते में यथेष्ट राशि होनी चाहिए। बैंक खाते से आप अपने खर्च के लायक राशि को अपने मोबाइल के डिजिटल वैलेट्स (Digital Wallets) में डाल सकते हैं और फिर उसके द्वारा किसी भी चीज के लिए बिना नकदी के भुगतान कर सकते हैं।

पेटीएम, फ्रीचार्ज आदि डिजिटल वैलेट्स (Digital Wallets) सेवा के बड़े प्रदाता हैं।

किन्तु डिजिटल वैलेट्स (Digital Wallets) द्वारा भुगतान करने के लिए आपके मोबाइल में इन्टरनेट चलने की सुविधा होनी चाहिए।

यूएसएसडी ट्रांसफर (USSD transfer)

जिनके मोबाइल फोन में इन्टरनेट की सुविधा नहीं है उन लोगों के लिए यूएसएसडी ट्रांसफर (USSD transfer) बिना नगदी के भुगतान हेतु एक बड़ी राहत है। बस आपके मोबाइल को जिस बैंक में आपका खाता है उस बैंक में रजिस्टर्ड होना चाहिए। आप अपने रजिस्टर्ड मोबाइल में USSD कोड़ नंबर डायल करके मनी ट्रांसफर सहित विभिन्न बैंकिंग विकल्प प्राप्त कर सकते हैं। इस सेवा का विकास ग्रामीण जनता, जिन्हें प्रायः इंटरनेट सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाती, को ध्यान किया गया है। यह सेवा 11 क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध है।

UPI

यह भी मोबाइल बैंकिंग का एक भाग है जिसमें सुरक्षा पर अधिक ध्यान दिया गया है। NEFT का प्रयोग करके कैश ट्रांसफर करने पर आपको नगदी प्राप्त करने वाले को अपना बैंक खाता नंबर बताना पड़ता है किन्तु इस विधि में आप केवल यूजरनेम का प्रयोग करके कैश ट्रांसफर कर सकते हैं।
इस विधि को अधिक मोबाइल बैंकिंग की लेकिन सुरक्षा पर विशेष जोर देने के साथ एक हिस्सा है।

इंटरनेट बैंकिंग या मोबाइल बैंकिंग का प्रयोग करके आप इस सुविधा का लाभ ले सकते हैं।

नेट बैंकिंग (Net Banking)

नेट बैंकिंग अपने घर या कार्यालय में ही बैठकर अपने बैंक खाते का संचालन करने का एक बढ़िया तरीका है। घर बैठे ही आप अपने नेट बैंकिंग के लिए इन्टरनेट के माध्यम से सक्रिय करके अपना यूजरनेम और पासवर्ड बना सकते हैं। एक बार नेट बैंकिंग के सक्रिय हो जाने पर आप कभी भी, कहीं से भी अपने बैंक खाते का संचालन कर सकते हैं। मोबाइल रिचार्ज करना, रेलवे या एयर टिकट खरीदना, आनलाइन शॉपिंग करना, किसी को पैसे भेजना आदि अनेक कार्य आप नेट बैंकिंग की सहायता से अपने घर या कार्यालय से ही स्वयं कर सकते हैं।

मोबाइल बैंकिंग (Mobile Banking)

मोबाइल बैंकिंग ने तो आपके स्मार्टफोन को ही बैंकिंग पोर्टल में बदल कर रख दिया है। बस अपने स्मार्टफोन में अपने बैंक का मोबाइल बैंकिंग एप डाउन कर लीजिए और बैंक द्वारा दिये जाने वाली सारी सुविधाओं का लाभ ले लीजिए।

कैशलेस भुगतान के लिए क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड तो हैं ही। इनके बारे में तो आप जानते हैं ही, अब और क्या बताना?

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Narada cursed Vishnu – Stories from Ramcharitmanas 11

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आपके ज्ञानवर्धन हेतु प्रस्तुत है रामचरितमानस (Ramcharitmanas), जिसे कि तुलसी रामायण (Ramayana) के नाम से भी जाना जाता है, की कहानियाँ (Ramcharitmanas Stories or Ramayana Stories)

रामचरितमानस की कहानियाँ – नारद का विष्णु को शाप (Stories from Ramcharitmanas)
मोह के कारण नारद मुनि की बुद्ध भ्रष्ट हो गई थी, इससे वे विष्णु जी द्वारा राजकुमारी को ले जाते देख बहुत ही विकल हो गये। मानो गाँठ से छूटकर मणि गिर गई हो। मुनि की यह हालत देखकर शिव जी के गणों ने मुसकुरा कर कहा – जाकर दर्पण में अपना मुँह तो देखिये। ऐसा कहकर वे दोनों मुनि के शाप के डर से भयभीत होकर भागे। मुनि ने जल में झाँककर अपना मुँह देखा। अपना रूप देखकर उनका क्रोध बहुत बढ़ गया। उन्होंने शिव जी के उन गणों को शाप देते हुए कहा – तुम दोनों कपटी और पापी जाकर राक्षस हो जाओ। तुमने हमारी हँसी की, उसका फल चखो। अब फिर किसी मुनि की हँसी करना।

मुनि ने फिर जल में देखा, तो उन्हें अपना असली रूप प्राप्त हो गया; तब भी उन्हें सन्तोष नहिं हुआ। उनके ओंठ फड़क रहे थे और मन में क्रोध भरा था। तुरंत ही भगवान कमलापति के पास चले। मन में सोचते जाते थे कि जाकर या तो शाप दूँगा या प्राण दे दूँगा। उन्होंने जगत में मेरी हँसी करायी। दैत्यों के शत्रु भगवान हरि उन्हें बीच रास्त में ही मिल गये। साथ में लक्ष्मी जी और वही राजकुमारी थीं।

देवताओं के स्वामी भगवान ने मीठी वाणी में कहा – हे मुनि! व्याकुल की तरह कहाँ चले? ये शब्द सुनते ही नारद को बड़ा क्रोध आया, माया के वशीभूत होने के कारण मन में चेत नहीं रहा। मुनि ने कहा – तुम दूसरों की सम्पदा नहीं देख सकते, तुम्हारे ईर्ष्या और कपट बहुत हैं। समुद्र मथते समय तुमने शिव जी को बावला बना दिया और देवताओं को प्रेरित करके उन्हें विषपान कराया। असुरों को मदिरा और शिव जी को विष देकर तुमने स्वयं लक्ष्मी और सुन्दर कौस्तुभ मणि ले ली। तुम बड़े धोखेबाज और मतलबी हो। सदा कपट का व्यवहार करते हो। तुम परम स्वतन्त्र हो, सिर पर तो कोई है ही नहीं। इससे जब जो मन को भाता है, स्वच्छन्ता से वही करते हो। भले को बुरा और बुरे को भला कर देते हो। हृदय में हर्ष-विषाद कुछ भी नहीं लाते। सबको ठग-ठग कर परच गये हो और अत्यन्त निडर हो गये हो। अब तक तुमको किसी ने ठीक नहीं किया था। अब तुमने मुझ जैसे जबरदस्त से छेड़खानी की है, अतः अपने किये का फल अवश्य पाओगे। जिस मनुष्य शरीर को धारण कर तुमने मुझे ठगा है, तुम भी वही शरीर धारण करो, यह मेरा शाप है। तुमने हमारा रूप बन्दर सा बना दिया था, इससे बन्दर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। मैं जिस स्त्री को चाहता था, उससे मेरा वियोग कराकर तुमने मेरा बड़ा अहित किया है, इसलिए तुम भी स्त्री के वियोग में दुःखी होओगे।

मुनि के शाप को स्वीकार कर, हृदय में हर्षित होते हुए प्रभु ने नारद जी से बहुत विनती की और कृपानिधान भगवान ने अपनी माया की प्रबलता खींच ली। माया के हटते ही न तो वहाँ लक्ष्मी थीं और न वह राजकुमारी ही। तब मुने ने अत्यन्त भयभीत होकर श्री हरि के चरण पकड़ लिये और कहा – हे शरणागत के दुःखों को हरनेवाले! मेरी रक्षा कीजिए। हे कृपालु! मेरा शाप मिथ्या हो जाये।

तब दीनों पर दया करने वाले भगवान ने कहा – यह सब मेरी ही इच्छा से हुआ है।

मुनि ने कहा – मैंने आपको अनेक खोटे वचन कहे हैं। मेरे पाप कैसे मिटेंगे?

भगवान ने कहा – जाकर शंकर जी के शतनाम का जप करो, इससे हृदय में तुरंत शान्ति होगी। शिव जी के समान मुझे कोई प्रिय नहीं है, इस विश्वास को भूलकर भी न छोड़ना। हे मुनि! पुरारि (शिव जी) जिस पर कृपा नहीं करते वह मेरी भक्ति नहीं कर पाता।

बहुत प्रकार से मुनि को समझा-बुझा कर प्रभु अन्तर्धान हो गये और नारद जी श्री रामचन्द्र जी के गुणों का गान करते हुए सत्यलोक को चले।

शिव जी के गणों ने जब मुनि को मोहरहित और मन में बहुत प्रसन्न होकर मार्ग में जाते हुए देखा तब वे अत्यन्त भयभीत होकर नारद जी के पास आये और उनके चरण पकड़ कर दीन वचन बोले – हे मुनिराज! हम ब्राह्मण नहीं हैं, शिव जी के गण हैं। हमने बड़ा अपराध किया, जिसका फल हमने पा लिया। हे कृपालु! अब शाप दूर करने की कृपा कीजिये।

दीनों पर दया करने वाले नारद जी ने कहा – तुम दोनों जाकर राक्षस होओ, तुम्हें महान ऐश्वर्य, तेज और बल की प्राप्ति हो। तुम अपनी भुजाओं के बल से जब सारे विश्व को जीत लोगे, तब भगवान विष्णु मनुष्य का शरीर धारण तुमसे युद्ध करेंगे। युद्ध में भगवान विष्णु के हाथों से तुम्हारी मृत्यु होने पर तुम शापमुक्त हो जाओगे।

कालान्तर में वे दोनों शिव जी के गण रावण और कुम्भकर्ण हुए।

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Story of Vishwamohini – Stories from Ramcharitmanas 10

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आपके ज्ञानवर्धन हेतु प्रस्तुत है रामचरितमानस (Ramcharitmanas), जिसे कि तुलसी रामायण (Ramayana) के नाम से भी जाना जाता है, की कहानियाँ (Ramcharitmanas Stories or Ramayana Stories)

रामचरितमानस की कहानियाँ – विश्वमोहिनी (Stories from Ramcharitmanas)

श्री हरि ने, यह सोचकर कि मैं अवश्य ही वह उपाय करूँगा जिससे नारद मुनि का कल्याण और मेरा खेल हो, अपनी माया को प्रेरित किया तथा जिस रास्ते से नारद जी जा रहे थे उस रास्ते में सौ योजन का एक सुन्दर नगर रचा। उस नगर में शीलनिधि नाम का राजा रहता था, जिसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेना के समूह थे। उसका वैभव और विलास सौ इन्द्रों के समान था। वह रूप, तेज, बल और नीति का घर था। उसके विश्वमोहिनी (Vishwamohini) नाम की एक ऐसी रूपवती कन्या थी, जिसके रूप को देखकर लक्ष्मी जी भी मोहित हो जाएँ। वह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती थी, इसलिये वहाँ अगणित राजा आये हुए थे।

कौतुकवश नारद मुनि उस नगर में गये और नगरवासियों से उन्होंने सब हाल पूछा। सब समाचार सुनकर वे राजा के महल में आए। राजा ने पूजा करके मुनि को यथोचित आसन दिया। फिर राजा ने राजकुमारी को नारद जी को दिखलाया और पूछा कि हे नाथ! आप विचार करके इसके सब गुण-दोष कहिए।

उसके रूप को देखकर मुनि वैराग्य भूल गये। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने-आप को भी भूल गये और हृदय में हर्षित हुए, पर प्रकट रूप में उन लक्षणों को नहीं कहा। लक्षणों को देखकर वे मन में कहने लगे कि जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जायेगा और रणभूमि में कोई उसे जीत न सकेगा। यह शीलनिधि की कन्या जिसको वरेगी, सब चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे। सब लक्षणों को विचारकर मुनि ने अपने हृदय में रख लिया और राजा से कुछ अपनी ओर से बनाकर कह दिया।

फिर नारद जी ने वहाँ से प्रस्थान किया पर उनके मन में यह चिन्ता थी कि मैं सोच-विचार कर अब वही उपाय करूँ जिससे यह कन्या मुझे ही वरे। इसके लिए तो मुझे सुन्दर रूप चाहिये, जिसे देखकर राजकुमारी मुझ पर रीझ जाये और जयमाल मेरे गले में डाल दे। श्री हरि मेरे हितचिन्तक हैं अतः मैं उन्हीं से उनका सुन्दर रूप माँग लेता हूँ। ऐसा सोचकर नारद जी ने भगवान विष्णु का स्मरण किया और भगवान विष्णु उनके समक्ष प्रकट हो गये।

नारद जी ने बहुत आर्त होकर सब कथा कह सुनाई और प्रार्थना की कि हे प्रभो! आप अपना रूप मुझे दीजिये ताकि मैं उस कन्या को प्राप्त कर सकूँ। हे नाथ! जिस तरह मेरा हित हो, आप वही कीजिये। प्रभु ने कहा कि हे नारद जी! जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे। हे योगी मुनि! रोग से व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता। इसी प्रकार मैंने भी तुम्हारा हित करने की ठान ली है। ऐसा कहकर भगवान अन्तर्धान हो गए।

माया के वशीभूत नारद प्रभु की स्पष्ट वाणी को भी समझ न सके और स्वयंवर स्थल की ओर चल पड़े।

रामचरितमानस की कहानियाँ – विश्वमोहिनी का स्वयंवर (Stories from Ramcharitmanas)
विश्वमोहिनी के स्वयंवर में राजा लोग खूब सज-धज कर अपने आसन पर बैठे थे। नारद मुनि मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे कि मेरा रूप बड़ा सुन्दर है, मुझे छोड़ कन्या भूलकर भी दूसरे को न वरेगी। कृपानिधान भगवान ने मुनि के कल्याण के लिए उन्हें ऐसा कुरूप बना दिया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता, पर यह चरित कोई नहीं जान सका। सबने उन्हें नारद ही जानकर प्रणाम किया।

वहाँ शिव जी के दो गण भी थे। वे सब भेद जानते थे और ब्राह्मण का वेश बनाकर सारी लीला देखते फिरते थे। वे भी बड़े मौजी थे। वे शिव जी के दोनों गण भी नारद जी के पास जाकर बैठ गए। वे नारद जी को सुना-सुना कर व्यंग वचन कहते थे – भगवान ने इन्हें ऐसा सुन्दर रूप दिया है कि राजकुमारी रीझ जाएगी और “हरि” (वानर) जानकर इन्हीं को ही वरेंगी। यद्यपि मुनि उनकी अटपटी बातें सुन रहे थे, पर बुद्धि भ्रम से सनी होने के कारण वे बातें उनकी समझ में नहीं आती थीं और वे उन बातों को अपनी प्रशंसा समझ रहे थे।

राजकुमारी हाथ में वरमाला लिए सभा में पहुँची। राजकन्या को नारद जी का मुँह बन्दर जैसा दिखाई पड़ा इसलिए उसने नारद जी की ओर भूलवश भी नहीं ताका। नारद जी बार-बार उचकते और छटपटाते थे। उनकी दशा देखकर शिव जी के गण मुसकुराते थे। भगवान विष्णु भी राजा का शरीर धारण कर वहाँ उपस्थित थे। राजकुमारी ने हर्षित होकर भगवान विष्णु के गले में जयमाला डाल दी। लक्ष्मीनिवास भगवान दुलहिन को ले गए।

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Arrogance of Narad – Stories from Ramcharitmanas 9

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आपके ज्ञानवर्धन हेतु प्रस्तुत है रामचरितमानस (Ramcharitmanas), जिसे कि तुलसी रामायण (Ramayana) के नाम से भी जाना जाता है, की कहानियाँ (Ramcharitmanas Stories or Ramayana Stories)

रामचरितमानस की कहानियाँ – नारद का अहंकार (Stories from Ramcharitmanas)

एक बार नारद जी जब हिमालय में भ्रमण कर रहे थे तो वहाँ पर उन्हें एक बड़ी पवित्र गुफा दिखी जिसके समीप गंगा जी प्रवाहित हो रही थीं। वह गुफा नारज मुनि के मन को भा गई और वे वहाँ तप में लीन हो गये। नारद जी के इस तप को देखकर देवराज इन्द्र के मन में यह भय उत्पन्न हुआ कि नारद मेरा राज्य चाहते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि जगत् में जो कामी और लोभी होते हैं, वे कुटिल कौए की तरह सबसे डरते हैं, जैसे मूर्ख कुत्ता सिंह को देखकर सूखी हड्डी सूखी हड्डी लेकर भाग जाता है और वह मूर्ख यह यह समझता है कि कहीं उस हड्डी को सिंह छीन न ले।

इन्द्र ने नारद की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को भेजा। कामदेव ने वहाँ जाकर अपनी माया से वहाँ वसन्त ऋतु को उत्पन्न किया। तरह-तरह के वृक्षों पर रंग-बिरंगे फूल खिल गये, उन पर कोयलें कूकने लगीं और भौरे गुंजार करने लगे। कामाग्नि को भड़काने वाली शीतल, मन्द, सुगन्धित सुहावनी हवा चलने लगी। कामकला में निपुण रम्भा आदि देवांगनाएँ मधुर गान करने लगीं।

परन्तु कामदेव की कोई भी कला मुनि पर असर न कर सकी। तब पापी कामदेव अपने ही नाश के भय से डर गया और हार मानकर अपने सहायकों सहित नारद जी के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगा।

नारद जी के मन में कुछ भी क्रोध न आया और उन्होंने प्रिय वचन कहकर कामदेव को अपने स्थान में वापस भेज दिया।

इस घटना के बाद नारद जी के मन में इस बात का अहंकार हो गया कि हमने कामदेव को जीत लिया। नारद जी ने शिव जी के पास जाकर अहंकारपूर्वक पूरी घटना सुनाई।

शिव जी ने नारद की बात सुनकर नारद से कहा कि इस घटना का जिक्र आप श्री हरि से मत करना। अहंकार के मद में चूर कामदेव को शिव जी के वचन अच्छे नहीं लगे और वे विष्णु जी को यह घटना बताने के लिए वहाँ से चल पड़े।

रामचरितमानस की कहानियाँ – नारद का विष्णु जी को अपने काम-विजय के बारे में बताना (Stories from Ramcharitmanas)
शिव जी के बरजने के बाद भी नारद जी विष्णु जी से मिलने और उन्हें अपने द्वारा कामदेव पर विजय की बात बताने के लिए क्षीरसागर की तरफ चल पड़े। याज्ञवकल्क्य मुनि कहते हैं कि हे भरद्वाज! हरि की इच्छा बड़ी बलवान है। श्री रामचन्द्र जी जो करना चाहते हैं, वही होता है, ऐसा कोई भी नहीं है जो उसके विरुद्ध कर सके।

क्षीरसागर में पहुँचकर नारद जी ने कामदेव का सारा चरित्र भगवान विष्णु को सुना डाला। उनकी बात सुनकर भगवान रूखा मुँह करके कोमल वचन बोले – हे मुनिराज! मोह तो उसके मन में होता है जिसके हृदय में ज्ञान-वैराग्य नहीं है। आप तो ब्रह्मचर्य व्रत में तत्पर और धीरबुद्धि हैं। भला, कहीं आपको भी कामदेव सता सकता है? इस पर नारद जी ने अभिमानपूर्वक कहा – भगवन्! यह सब आपकी कृपा है।

फिर नारद जी भगवान के चरणों में सिर नवाकर वहाँ से चले गये।

करुणानिधान भगवान ने मन में विचारकर देखा कि नारद जी के मन में गर्व के भारी वृक्ष का अंकुर पैदा हो गया है, मैं उसे तुरन्त उखाड़ फेकूँगा क्योंकि सेवकों का हित करना हमारा प्रण है।

रामचरितमानस की कहानियाँ – विश्वमोहिनी (Stories from Ramcharitmanas)
श्री हरि ने, यह सोचकर कि मैं अवश्य ही वह उपाय करूँगा जिससे नारद मुनि का कल्याण और मेरा खेल हो, अपनी माया को प्रेरित किया तथा जिस रास्ते से नारद जी जा रहे थे उस रास्ते में सौ योजन का एक सुन्दर नगर रचा। उस नगर में शीलनिधि नाम का राजा रहता था, जिसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेना के समूह थे। उसका वैभव और विलास सौ इन्द्रों के समान था। वह रूप, तेज, बल और नीति का घर था। उसके विश्वमोहिनी नाम की एक ऐसी रूपवती कन्या थी, जिसके रूप को देखकर लक्ष्मी जी भी मोहित हो जाएँ। वह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती थी, इसलिये वहाँ अगणित राजा आये हुए थे।

कौतुकवश नारद मुनि उस नगर में गये और नगरवासियों से उन्होंने सब हाल पूछा। सब समाचार सुनकर वे राजा के महल में आए। राजा ने पूजा करके मुनि को यथोचित आसन दिया। फिर राजा ने राजकुमारी को नारद जी को दिखलाया और पूछा कि हे नाथ! आप विचार करके इसके सब गुण-दोष कहिए।

उसके रूप को देखकर मुनि वैराग्य भूल गये। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने-आप को भी भूल गये और हृदय में हर्षित हुए, पर प्रकट रूप में उन लक्षणों को नहीं कहा। लक्षणों को देखकर वे मन में कहने लगे कि जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जायेगा और रणभूमि में कोई उसे जीत न सकेगा। यह शीलनिधि की कन्या जिसको वरेगी, सब चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे। सब लक्षणों को विचारकर मुनि ने अपने हृदय में रख लिया और राजा से कुछ अपनी ओर से बनाकर कह दिया।

फिर नारद जी ने वहाँ से प्रस्थान किया पर उनके मन में यह चिन्ता थी कि मैं सोच-विचार कर अब वही उपाय करूँ जिससे यह कन्या मुझे ही वरे। इसके लिए तो मुझे सुन्दर रूप चाहिये, जिसे देखकर राजकुमारी मुझ पर रीझ जाये और जयमाल मेरे गले में डाल दे। श्री हरि मेरे हितचिन्तक हैं अतः मैं उन्हीं से उनका सुन्दर रूप माँग लेता हूँ। ऐसा सोचकर नारद जी ने भगवान विष्णु का स्मरण किया और भगवान विष्णु उनके समक्ष प्रकट हो गये।

नारद जी ने बहुत आर्त होकर सब कथा कह सुनाई और प्रार्थना की कि हे प्रभो! आप अपना रूप मुझे दीजिये ताकि मैं उस कन्या को प्राप्त कर सकूँ। हे नाथ! जिस तरह मेरा हित हो, आप वही कीजिये। प्रभु ने कहा कि हे नारद जी! जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे। हे योगी मुनि! रोग से व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता। इसी प्रकार मैंने भी तुम्हारा हित करने की ठान ली है। ऐसा कहकर भगवान अन्तर्धान हो गए।

माया के वशीभूत नारद प्रभु की स्पष्ट वाणी को भी समझ न सके और स्वयंवर स्थल की ओर चल पड़े।

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Bizarre procession and Marriage of Lord Shiva – Stories from Ramcharitmanas 8

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आपके ज्ञानवर्धन हेतु प्रस्तुत है रामचरितमानस (Ramcharitmanas), जिसे कि तुलसी रामायण (Ramayana) के नाम से भी जाना जाता है, की कहानियाँ (Ramcharitmanas Stories or Ramayana Stories)

रामचरितमानस की कहानियाँ – शिव जी की विचित्र बारात (Stories from Ramcharitmanas)

शिव जी के विवाह का सन्देश लेकर सप्तर्षि हिमाचल के पास गये और हिमवान् ने शिव जी को जामाता के रूप में सहर्ष स्वीकार कर लिया।

शिव जी के गण शिव जी का श्रृंगार करने लगे। जटाओं का मुकुट बनाकर उस पर साँपों का मौर सजाया गया। शिव जी ने साँपों के ही कुण्डल और कंकण पहने, शरीर पर विभूति रमायी और वस्त्र के स्थान पर बाघम्बर लपेट लिया। शिव जी के मस्तक पर चन्द्रमा, सिर पर गंगा जी, तीन नेत्र, साँपों का जनेऊ, गले में विष और छाती पर नरमुण्डों की माला थी। इस प्रकार उनका वेष अशुभ होने पर भी वे कल्याण के धाम और कृपालु हैं। एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू सुशोभित है। शिव जी बैल पर चढ़कर चले। बाजे बज रहे हैं। शिव जी को देखकर देवांगनाएँ मुसकरा रही हैं।

विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओं के समूह अपने-अपने वाहनों पर चढ़कर बारात में चले।

बारात में जाने के लिए शिव जी के समस्त गण आ पहुँचे। उनमें कोई बिना मुख का है, किसी के बहुत से मुख हैं, कोई बिना हाथ-पैर का है तो किसी के कई हाथ-पैर हैं। किसी की बहुत आँखें हैं तो किसी के एक भी आँख नहीं है। कोई बहुत मोटा-ताजा है तो कोई बहुत ही दुबला-पतला है। भयंकर गहने पहने, हाथ में कपाल लिये, शरीर में ताजा खून लपेटे, गधे, कुत्ते औ‌र सियार के जैसे मुखवाले शिव जी के अनगिनत वेषों को कौन गिने? बहुत प्रकार के प्रेत, पिशाच और योगनियों की जमातें हैं। उनका वर्णन करते नहीं बनता।

भूत-प्रेत नाचते और गाते हैं। जैसा दूल्हा है, वैसी ही बारात भी बनी है। मार्ग में चलते हुए भाँति-भाँति के कौतुक होते हैं।

रामचरितमानस की कहानियाँ – शिव जी की बारात देखकर मैना का विषाद (Stories from Ramcharitmanas)

हिमाचल ने ऐसा विचित्र मण्डप बनाया कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। जगत् के समस्त छोटे-बड़े पर्वत, नदियाँ, वन, समुद्र, तालाब आदि को हिमाचल ने विवाह का न्यौता भेजा और वे सभी इच्छानुसार रूप धारण कर विवाह में सम्मिलित होने पहुँच गये। हिमवान् ने सभी को सम्मानपूर्वक यथायोग्य निवासों में ठहराया।

बारात को निकट आई सुनकर नगर में चहल-पहल मच गई। अगवानी करने वाले लोग बनाव-श्रृंगार करके तथा नाना प्रकार की सवारियों को सजाकर आदरसहित बारात को लिवाने चले। किन्तु बारात को देखकर केवल बड़ी उम्र के कुछ समझदार लोग ही वहाँ डटे रहे, लड़के तो सब प्राण लेकर भागे। घर में जाकर उन्होंने बताया – क्या कहें, यह बारात है या यमराज की सेना? दूल्हा पागल है और बैल पर सवार है। साँप, कपाल और राख ही उसके गहने हैं। उनके माता-पिता ने उन्हें समझाया कि डर की कोई बात नहीं है, निडर रहो।

अगवान लोग बारात को लिवा लाये, उन्होंने सबको सुन्दर जनवासे में ठहराया। पार्वती जी मी माता मैना ने शुभ आरती सजाई और उनके साथ की स्त्रियाँ मंगलगीत गाने लगीं। किन्तु बारात को देखकर सभी डर के मारे घर में घुस गईं। मैना पार्वती जी को गोद में लेकर कहने लगीं – जिस विधाता ने तुमको सुन्दरता दी, उसने तुम्हारे लिए वर बावला कैसे बनाया? मैंने नारद का क्या बिगाड़ा था? मैं जीते-जी इस बावले वर से तुम्हारा विवाह न करूँगी। माता को विकल देखकर पार्वती जी ने कहा – जो मेरे भाग्य में बावला ही पति लिखा है तो किसी को क्यों दोष लगाया जाय? हे माता! कलंक मत लो, रोना छोड़ो, यह अवसर विषाद करने का नहीं है।

सबह हाल सुनकर हिमाचल नारद जी और सप्तर्षियों को साथ लेकर मैना के पास पहुँचे। नारद जी ने पार्वती जी के पूर्व जन्म की कथा सुनाते हुए कहा पहले वे दक्ष के घर जाकर जन्मी थीं और उनका नाम सती था जिन्होंने दक्ष यज्ञ में स्वयं को भस्म कर दिया था। पार्वती जी साक्षात् जगज्जननी, अजन्मा, अनादि और अविनाशी शक्ति हैं, वे सदा शिव जी के अर्द्धांग में रहती हैं।

नारद का वचन सुनकर सब का विषाद मिट गया।

रामचरितमानस की कहानियाँ – शिव जी का विवाह (Stories from Ramcharitmanas)

नगर में मंगलगीत गाये जाने लगे और सब ने भाँति-भाँति के सुवर्ण-कलश सजाये गये। पाकशास्त्र की रीति के अनुसार तरह-तरह के ज्योनार हुई। जिस घर में स्वयं माता भवानी रहती हों, वहाँ की ज्योनार का वर्णन कैसे किया जा सकता है? हिमाचल ने आदरपूर्वक सब बारातियों – विष्णु, ब्रह्मा तथा समस्त देवताओं – को बुलवाया और भोजन की पंगत बैठीं। चतुर रसोइये परोसने लगे। बारातियों को भोजन करते जान स्त्रियाँ मधुर स्वरों में गाली गाने लगीं। भोजन कर चुकने के बाद सबके हाथ-मुँह धुलवाकर पान दिये गये। फिर सब लोग, जो जहाँ ठहरे थे वहाँ चले गये।

फिर मुनियों ने हिमवान् को लगन पढ़कर सुनाया और विवाह का समय देखकर देवताओं को बुलवाया और यथायोग्य आसन दिये। वेद की रीति से वेदी सजाई गई और स्त्रियाँ सुन्दर श्रेष्ठ मंगलगीत गाने लगीं। मुनियों की आज्ञा से शिव जी और पार्वती जी ने गनेश जी का पूजन किया। (तुलसीदास जी कहते हैं) देवता अनादि होते हैं अतः इस बात को सुनकर कोई शंका न करे (कि गनेश जी तो शिव-पार्वती की सन्तान हैँ, अभी विवाह से पूर्व ही वे कहाँ से आ गये)।

वेदों में विवाह की जैसी रीति कही गई है, महामुनियों ने उसी रीति से विवाह सम्पन्न करवाया। पर्वतराज हिमाचल ने हाथ में कुश लेकर तथा कन्या का हाथ पकड़कर उन्हें शिव जी को समर्पित किया। शिव-पार्वती के पाणिग्रहण के समय हर्षित देवतागण शिव जी का जय-जयकार करने लगे। आकाश से नाना प्रकार के फूलों की वर्षा हुई। इस प्रकार से शिव-पार्वती का विवाह सम्पन्न हो गया। माता-पिता से आशीर्वाद प्राप्त कर पार्वती जी शिव जी के संग कैलाश पर्वत पर चली गईं।

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Burning of Kamadeva – Stories from Ramcharitmanas 7

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आपके ज्ञानवर्धन हेतु प्रस्तुत है रामचरितमानस (Ramcharitmanas), जिसे कि तुलसी रामायण (Ramayana) के नाम से भी जाना जाता है, की कहानियाँ (Ramcharitmanas Stories or Ramayana Stories)

रामचरितमानस की कहानियाँ – कामदेव का भस्म होना (Stories from Ramcharitmanas)

देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर पाँच बाण धारण करने वाले तथा मछली के चिह्नयुक्त ध्वजा धारण करने वाले कामदेव प्रकट हुए। देवताओं ने कामदेव से अपनी सारी विपत्ति कही। सुनकर कामदेव ने मन में विचार किया और हँसकर देवताओं से कहा कि शिव जी के साथ विरोध करने में मेरी कुशल नहीं है। तथापि मैं तुम्हारा काम तो करूँगा, क्योंकि वेद दूसरे के उपकार को परम धर्म बताते हैं। जो दूसरों के हित के लिये अपना शरीर त्याग देता है, संत सदा उसकी बड़ाई करते हैं।

ऐसा कहकर और सबको सिर नवाकर कामदेव अपने पुष्प के धनुष को हाथ में लेकर वसन्तादि सहायकों के साथ चले। चलते समय कामदेव ने ऐसा विचार किया कि शिव जी के साथ विरोध करने से मेरा मरण निश्चित है।

कामदेव ने अपना प्रभाव फैलाया और समस्त संसार को अपने वश में कर लिया। उनके कोप से क्षण भर में ही वेदों की सारी मर्यादा मिट गई। ब्रह्मचर्य, नियम, संयम, धीरज, धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सदाचार, जप, योग वैराग्य आदि सभी का लोप हो गया। विवेक भाग गया, सद्‌ग्रंथ पर्वत की कन्दराओं में जा छिपे। सारे जगत् में खलबली मच गई।

सम्पूर्ण जगत् में स्त्री-पुरुष संज्ञा वाले जितने चर-अचर प्राणी थे वे सब अपनी-अपनी मर्यादा छोड़कर काम के वश में हो गये। वृक्षों की डालियाँ लताओं की और झुकने लगीं, नदियाँ उमड़-उमड़ कर समुद्र की ओर दौड़ने लगीं। आकाश, जल और पृथ्वी पर विचरण करने वाले समस्त पशु-पक्षी सब कुछ भुला कर केवल काम के वश हो गये। सिद्ध, विरक्त, महामुनि और महायोगी भी काम के वश होकर योगरहित और स्त्री विरही हो गये। मनुष्यों की तो बात ही क्या कहें, पुरुषों को संसार स्त्रीमय और स्त्रियों को पुरुषमय प्रतीत होने लगा।

किन्तु कामदेव के इस कौतुक का शिव जी पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा। इससे कामदेव भी भयभीत हो गये किन्तु अपने कार्य को पूर्ण किये बिना वापस लौटने में उन्हें संकोच हो रहा था इसलिये उन्होंने तत्काल अपने सहायक ऋतुराज वसन्त को प्रकट कर किया। वृक्ष पुष्पों से सुशोभित हो गये, वन-उपवन, बावली-तालाब आदि परम सुहावने हो गये, शीतल-मंद-सुगन्धित पवन चलने लगा, सरोवर कमल पुष्पों से परिपूरित हो गये, पुष्पों पर भ्रमर गुंजार करने लगे। राजहंस, कोयल और तोते रसीली बोली बोलने लगे, अप्सराएँ नृत्य एवं गान करने लगीं।

इतने पर भी जब तपस्यारत शिव जी का कुछ भी प्रभाव न पड़ा तो क्रोधित कामदेव ने आम्रवृक्ष की डाली पर चढ़कर अपने पाँचों तीक्ष्ण पुष्प-बाणों को छोड़ दिया जो कि शिव जी के हृदय में जाकर लगे। उनकी समाधि टूट गई जिससे उन्हें अत्यन्त क्षोभ हुआ। आम्रवृक्ष की डाली पर कामदेव को देख कर क्रोधित हो उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया और देखते ही देखते कामदेव भस्म हो गये।

कामदेव की स्त्री रति अपने पति की यह दशा सुनते ही रुदन करते हुए शिव जी पास आई। उसके विलाप से द्रवित हो कर शिव जी ने कहा, “हे रति! विलाप मत कर। जब पृथ्वी के भार को उतारने के लिये यदुवंश में श्री कृष्ण अवतार होगा तब तेरा पति उनके पुत्र (प्रद्युम्न) के रूप में उत्पन्न होगा और तुझे पुनः प्राप्त होगा। तब तक वह बिना शरीर के ही इस संसार में व्याप्त होता रहेगा। अंगहीन हो जाने के कारण लोग अब कामदेव को अनंग के नाम से भी जानेंगे।”

इसके बाद ब्रह्मा जी सहित समस्त देवताओं ने शिव जी के पास आकर उनसे पार्वती जी से विवाह कर लेने के लिये प्रार्थना की जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।

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Terror of Tarkasur – Stories from Ramcharitmanas 6

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रामचरितमानस की कहानियाँ – तारकासुर का आतंक (Stories from Ramcharitmanas)

उसी समय तारक नाम का असुर हुआ जिसने अपने भुजबल, तेज और प्रताप से समस्त लोक और लोकपालों को जीत लिया तथा देवता सुख और सम्पत्ति से रहित हो गये। वह अजर-अमर था इसलिए किसी से जीता नहीं जाता था। जब देवता उसके साथ बहुत तरह की लड़ाइयाँ लड़कर हार गये तब उन्होंने ब्रह्मा जी के पास जाकर पुकार मचायी। ब्रह्मा जी ने सबको समझाकर कहा – इस दैत्य की मृत्यु तब होगी जब शिव जी के पुत्र उत्पन्न होंगे, इस असुर को केवल शिव जी के पुत्र ही जीत सकते हैं। मेरी बात सुनकर उपाय करो, ईश्वर सहायता करेंगे और काम हो जाएगा। सती जी ने जो दक्ष के यज्ञ में देह का त्याग किया था, उन्होंने अब हिमाचल के घर जाकर जन्म लिया है। उन्होंने शिव जी को पति रूप में पाने के लिए तप किया है, इधर शिव जी सब छोड़-छाड़ कर समाधि लगा बैठे हैं। तुम कामदेव को शिव जी के पास भेजो, वह शिव जी के मन में क्षोभ उत्पन्न कर उनकी समाधि भंग करे। तब हम जाकर शिव जी के चरणों में सिर रख देंगे और उन्हें राजी करके उनका विवाह करा देंगे।

सभी देवताओं ने कहा – यह सम्मति अच्छी है। और वे कामदेव को बुलाने के लिए उनकी स्तुति करने लगे।

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Test of Parvati’ love by Mahadev – Stories from Ramcharitmanas 5

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रामचरितमानस की कहानियाँ – पार्वती के प्रेम की परीक्षा (Stories from Ramcharitmanas)

जबसे सती जी ने शरीर त्याग किया, तब से शिव जी के मन में वैराग्य हो गया। वे सदा श्री रघुनाथ जी का नाम जपने लगे। इस प्रकार बहुत समय बीत गया। तब कृपालु श्री रामचन्द्र जी शिव जी के समक्ष प्रकट हुए और शिव जी को समझाया कि पार्वती जी का जन्म के विषय में बताया तथा शिव जी से कहा – हे शिव जी! यदि मुझ पर आपका स्नेह है तो मेरी विनती मानकर आप पार्वती जी के साथ विवाह कर ले। इतना कहकर श्री राम अन्तर्धान हो गये।

उसी समय वहाँ पर सप्तर्षियों का आगमन हुआ। प्रभु महादेव जी ने सप्तर्षियों से पार्वती जी के प्रेम की परीक्षा लेने के लिए कहा।

सप्तर्षियों ने पार्वती जी के पास जाकर कहा – हे शैलकुमारी! तुम किसलिए इतना कठोर तप कर रही हो? जब पार्वती जी ने उन्हें बताया कि वे शिव जी को पति रूप में पाना चाहती हैं तो सप्तर्षियों ने कहा – नारद की बातों को सुनकर तुमने ऐसा निश्चय किया है, पर आज तक नारद के उपदेश से किसी का भला नहीं हुआ है। स्वभाव से ही उदासीन, गुणहीन, निर्लज्ज, बुरे वेष वाला, नर-कपालों की माला पहनने वाला, कुलहीन, बिना घर-बार का, नंगा और शरीर पर साँपों को लपेटे रखने वाला शिव तुम्हारे योग्य नहीं है। यदि हमारा कहना मानो तो हम सुन्दर, सुशील, पवित्र और सुखदायक विष्णु जी से तुम्हारा विवाह करवा देंगे।

पार्वती जी ने सप्तर्षियों से कहा – हे मुनीश्वरों! मैनें जो निश्चय किया है वह अटल है, मेरा तो करोड़ जन्मों तक यही हठ रहेगा कि या तो शिव जी से विवाह करूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी।

सप्तर्षि पार्वती जी की प्रतिज्ञा सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और कहा – हे जगज्जननी! आप माया हैं और शिव जी महान हैं। ऐसा कहकर सप्तर्षि पार्वती जी के चरणों में सिर नवाकर चल दिये। उन्होंने हिमवान् के पास जाकर कहा कि वे पार्वती जो को वन से घर लिवा लायें।

तत्पश्चात उन्होंने शिव जी के पास जाकर सारा वृत्तान्त कहा। पार्वती जी के प्रेम को सुनकर शिव जी आनन्दमग्न हो गये।

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Birth of Parvati – Stories from Ramcharitmanas 4

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रामचरितमानस की कहानियाँ – पार्वती का जन्म (Stories from Ramcharitmanas)

सती का मरण सुनकर शिवजी के गण यज्ञ विध्वंस करने लगे। यज्ञ विध्वंस होते देखकर मुनीश्वर भृगु जी ने उसकी रक्षा की। जय यह समाचार शिव जी को मिला तो उन्होंने क्रोध करके वीरभद्र को भेजा जिन्होंने वहाँ जाकर यज्ञ का विध्वंस कर डाला और देवताओं को यथोचित दण्ड दिया। दक्ष की गति भी वही हुई तो शिवद्रोही की हुआ करती है।

सती ने मरते समय भगवान हरि से यह वर माँगा कि मेरा जन्म-जन्म में शिव जी के चरणों में अनुराग रहे। इसी कारण उन्होंने हिमाचल के घर जाकर पार्वती के रूप में जन्म लिया। जब नारद जी ने पार्वती के जन्म का समाचार सुना तो वे हिमाचल के घर पधारे। पर्वतराज ने उनका बड़ा आदर किया और चरण धोकर उनको उत्तम आसन दिया, अपनी स्त्री मैना सहित मुनि के चरणों में सिर नवाया तथा पुत्री को बुलवाकर मुनि के चरणों पर डाल दिया तथा कहा – हे मुनिवर! आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, अतः आप विचारकर कन्या के गुण-दोष कहिये।

नारद मुनि ने हँसकर रहस्ययुक्त कोमल वाणी से कहा – तुम्हारी कन्या सब गुणों की खान है। यह स्वभाव से ही सुन्दर, सुशील और समझदार है। उमा, अम्बिका और भवानी इसके नाम हैं। कन्या सब सुलक्षणों से सम्पन्न है, यह अपने पति को सदा प्यारी होगी। इसका सुहाग सदा अचल रहेगा और इसके माता-पिता यश पावेंगे। यह सारे जगत् में पूज्य होगी और इसकी सेवा करने से कुछ भी दुर्लभ न होगा। संसार में स्त्रियाँ इसका नाम स्मरण करके पतिव्रतरूपी तलवार की धार पर चढ़ जाएँगी। इसमें चार अवगुण हैं, उन्हें भी सुन लो। गुणहीन, मानहीन, माता-पिता विहीन, संशयहीन, योगी, जटाधारी, निष्कामहृदय, नंगा और अमंगल वेषवाला पति इस मिलेगा।

नारद मुनि की वाणी सुनकर और उसे हृदय में सत्य जानकर हिमवान् और उसकी पत्नी मैना को दुःख हुआ किन्तु पार्वती जी प्रसन्न हुईं। यह विचार कर कि देवर्षि के वचन अस्त्य नहीं हो सकते, पार्वी जी ने उन वचनों को हृदय में धारण कर लिया। उन्हें शिव जी के चरणकमलों में स्नेह उत्पन्न हो आया किन्तु यह सोचकर कि शिव जी का मिलना अत्यन्त कठिन है, उमा ने अपने प्रेम को अपने हृदय में ही छिपा लिया।

पर्वतराज ने हृदय में धीरज धारण कर नारद मुनि से कहा – हे नाथ! अब क्या उपाय करना चाहिए?

मुनीश्वर ने कहा – हे हिमवान्! विधाता ने ललाट पर जो कुछ लिख दिया है, उसको देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि कोई भी नहीं मिटा सकते। तो भी एक उपाय मैं बताता हूँ। यदि दैव सहायता करें तो वह सिद्ध हो सकता है। उमा को वर तो निःसन्देह वैसा ही मिलेगा जैसा कि मैंने तुम्हारे सामने वर्णन किया है। मैंने वर के जो-जो दोष बतलाए हैं, मेरे अनुमान से वे सभी शिव जी में हैं। यदि शिव जी के साथ विवाह हो जाय तो दोषों को भी सब लोग गुणों के समान ही कहेंगे। शिव जी सहज ही समर्थ हैं, क्योंकि वे भगवान हैं। इसलिए इस विवाह में सब प्रकार का कल्याण है। परन्तु महादेव जी की आराधना बड़ी कठिन है, फिर भी तप करने से वे बहु जल्द प्रसन्न हो जाते हैं। यदि तुम्हारी कन्या तप करे, तो त्रिपुरारि महादेव जी होनहार को मिटा सकते हैं। शिव जी वर देने वाले, शरणागतों के दुःखों का नाश करने वाले, कृपा के समुद्र और सेवकों के मन को प्रसन्न करने वाले हैं। हे पर्वतराज! तुम सन्देह को त्याग दो, कल्याण ही होगा।

ऐसा कहकर नारद मुनि ब्रह्मलोक को चले गये।

नारद जी के कथन को सत्य मानकर एवं शिव जी के चरणों को हृदय में धारण कर पार्वती जी वन में जाकर तप करने लगीं। दीर्घ काल के उपवास तथा तप से उमा का शरीर क्षीण हो गया देखकर आकाश से गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई – हे पर्वतराज की कुमारी! तेरा मनोरथ सफल हुआ। तू अब सारे असह्य क्लेशों को त्याग दे। अब तुझे शिव जी मिलेंगे।

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