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Story of Dushyant and Shakuntala – Mythological Stories in Hindi

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पौराणिक कथाओं (Mythological Stories in Hindi) के अन्तर्गत प्रस्तुत है दुष्यन्त और शकुन्तला की कथा (Story of Dushyant and Shakuntala – Mythological Stories in Hindi)

दुष्यन्त (Dushyant) कुरुवंश के महाप्रतापी राजा थे। एक बार वे वन में शिकार खेलने गये। शिकार का पीछा करते हुए वे कण्व ऋषि के आश्रम में जा पहुँचे। उस आश्रम में एक अनुपम सुन्दरी सोलह वर्षीय बालिका ने उनका स्वागत करते हुए कहा, “महर्षि कण्व तो सोमतीर्थ की यात्रा के लिए गये हैं, किन्तु आश्रम में आपका स्वागत है।”

दुष्यन्त ने पूछा, “आप कौन हैं?”

बालिका ने उत्तर दिया, “मेरा नाम शकुन्तला (Shakuntala) है, मैं महर्षि कण्व की पुत्री हूँ।”

बालिका का उत्तर सुनकर राजा ने कहा, “महर्षि तो आजन्म ब्रह्मचारी हैं फिर आप उनकी पुत्री कैसे हुईं?”

बालिका बोली, “वास्तव में मेरे माता-पिता मेनका और विश्वामित्र हैं। मेरा जन्म होने पर मेरी माता मुझे वन में छोड़ कर चली गईं थी। महर्षि कण्व मुझे वन से उठाकर ले आये और पुत्री के समान मेरा पालन-पोषण किया, अतः मैं महर्षि कण्व की पुत्री हुई। वन में शाकुन्त नाम के पक्षी ने मेरी रक्षा की थी इसलिए महर्षि ने मेरा नाम शकुन्तला रखा।”

दुष्यन्त और शकुन्तला दोनों ही एक-दूसरे पर मोहित हो गये। राजा ने शकुन्तला से विवाह का प्रस्ताव रखा तो शकुन्तला ने प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और दोनों ने गान्धर्व रीति से विवाह कर लिया। कुछ दिनों तक पति-पत्नी की तरह रह कर दुष्यन्त शकुन्तला से विदा हुए क्योंकि उन्हें हस्तिनापुर जाकर अपना राज-काज चलाना था। विदा होते समय उन्होंने यादगार के तौर पर अपनी अँगूठी शकुन्तला को दे दी।

अब शकुन्तला प्रतिदिन अपने पति की याद में विकल रहने लगी। किसी बात की सुध-बुध उसे नहीं रहती थी। ऐसे में एक दिन आश्रम में दुर्वासा ऋषि पधारे। किन्तु शकुन्तला को उनके आने का ज्ञान नहीं हुआ। दुर्वासा ऋषि ने इसे अपना अपमान समझकर शकुन्तला को शाप दे दिया कि जिसके ध्यान में डूबे होने के कारण तूने मेरा अपमान किया है वह तुझे भूल जायेगा। शाप सुनकर शकुन्तला को होश आया और वह दुर्वासा ऋषि के पैरों में गिरकर क्षमा माँगने लगी। ऋषि ने उसे क्षमा करते हुए कहा कि दुष्यन्त तुझे भूल तो अवश्य जायेगा किन्तु तू उसे उसके द्वारा दी गई कोई निशानी दिखायेगी तो उसे तेरी याद आ जायेगी।

शकुन्तला गर्भवती हो चुकी थी और नित्यप्रति अपने पति की याद करते रहती थी किन्तु शाप के कारण दुष्यन्त उसे भूल चुके थे इसलिए उसे लेने के लिए वापस नहीं आये। कुछ दिनों में ही महर्षि कण्व यात्रा से वापस आ गये। सारी बातें जानने पर उन्होंने शकुन्तला को अपने शिष्यों के साथ दुष्यन्त के पास हस्तिनापुर भिजवा दिया। हस्तिनापुर जाते समय रास्ते में एक सरोवर में आचमन करते समय शकुन्तला की उँगली से वह अँगूठी सरोवर में गिर गई जिसका पता शकुन्तला को न लगा।

हस्तिनापुर पहुँचने पर दुष्यन्त शापवश भूले हुए होने के कारण शकुन्तला को अपनी पत्नी स्वीकार करने से इंकार कर दिया। शकुन्तला ने वह अँगूठी दिखानी चाही किन्तु वह तो सरोवर में खो चुकी थी।

कण्व ऋषि के शिष्यों ने भी शकुन्तला को अपने साथ वापस ले जाने से मना कर दिया क्योंकि विवाहित कन्या को उसके पति के घर में ही रहना चाहिए।

शकुन्तला दुख के कारण मूर्च्छित हो गई तो उसकी माता मेनका एक ज्योति-पुंज के रूप में आकर उसे उठा ले गई।

उधर सरोवर में गिरी अँगूठी को एक मछली ने निगल लिया। उस मछली को एक मछुवारे ने पकड़ लिया। मछली के पेट से अमूल्य अँगूठी निकलने पर मछुवारे ने उसे राजा को सौंप दिया। अँगूठी देखते ही दुष्यन्त को सारी बातें याद आ गईं और वे विरह से व्याकुल हो गये। उन्होंने शकुन्तला की बहुत खोज की पर वह नहीं मिली।

उन्हीं दिनों देवराज इन्द्र का दुर्जय नामक राक्षस से युद्ध हुआ तो इन्द्र ने दुष्यन्त से सहायता माँगी। दुष्यन्त राज्य का सारा काम-काज मन्त्रियों के हाथों छोड़ कर इन्द्र की सहायता करने मातलि के साथ इन्द्रलोक चले गये। दुष्यन्त की सहायता से युद्ध में इन्द्र की जीत हुई। कुछ दिनों इन्द्र के आतिथि बन कर रहने के बाद दुष्यन्त वापस अपने राज्य के लिए लौटे। रास्ते में वे हेमकूट पर्वत पर मारीच ऋषि के आश्रम में रुके जहाँ पर उन्हें एक ऐसा तेजस्वी बालक दिखाई दिया जो सिंह के बच्चे के साथ खेलते हुए उसके दाँत गिनने की कोशिश कर रहा था। बालक के हाथ में चक्रवर्ती होने के लक्षण देखकर वे समझ गये कि यह पुरुवंशी है तथा शकुन्तला का पुत्र है। शकुन्तला भी वहाँ पर आ गई। राजा उससे अपने व्यहार के लिए क्षमा माँगा। महर्षि मारीच ने शकुन्तला को उसके पुत्र सर्वदमन सहित दुष्यन्त को सौंप दिया। अपनी पत्नी तथा पुत्र के साथ दुष्यन्त हस्तिनापुर वापस लौट गये।

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अंग्रेजी शिक्षा एवं संस्कृति का आखिर इतना मोह क्यों?

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लेखः परमानंद रेड्डी
डी/19 सेक्टर-1 देवेन्द्र नगर, रायपुर
फो. – 09303904649

भारत से अपना बिस्तर-बोरिया लपेट कर गए अंग्रेजों को साठ वर्ष से अधिक हो गया है,पर अंग्रेजी शिक्षा (English Education) आज भी जारी है । अंत समय में भारत के गली-कूचों  में भी “अंग्रेजों भारत छोड़ो” (Quit India) का नारा लगने लगा था। पर बड़े आश्चर्य की बात है कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी हम भारतीयों के मन में अंग्रेजों की भाषा और संस्कृति का मोह कम होने की बजाय दिन प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहा है। गली कूचों में अंग्रेजी भाषा के काण्वेन्ट स्कूलों की भरमार होते जा रही है जो अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति के विस्तार का केन्द्र बन गए हैं। जिस परिवार में सदस्यों को इंग्लिश का ‘ई’ भी नहीं मालूम, उस परिवार में बच्चे अपनी माँ को “मम्मी” या “मॉम” बोलते नजर आते हैं। हमारे “माँ” शब्द में जो स्वाभाविकता, जो मिठास, जो गहराई और जो अंतरंगता है, वह “मम्मी” या “मॉम” शब्द में कहाँ है? “माँ” शब्द का उच्चारण हृदय को पारकर, ॐ या राम की तरह, नाभि स्थान से उच्चारित होता प्रतीत होता है, जबकि “मम्मी” या “मॉम” शब्द का उच्चारण हमारे कण्ठ स्थल को भी छू नहीं पाता। फिर भी लोग अंग्रेजियत के दीवाने हैं। हमारे बच्चे चरण वंदना, प्रणाम या नमस्कार के बदले “हाय” या “बाय” करते नजर आते हैं। “सुन्दरता” की जगह “विद्रूपता” को अपनाने में आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है?

अब तो हमारे देश में ऐसा माहौल बनते जा रहा है कि हमारे सभ्यता, संस्कृति और शिक्षा का मापदण्ड अंग्रेजियत को माना जाने लगा है। अंग्रेजियत से इतना अधिक लगाव देखकर ऐसा लगता है कि हमने आखिर अंग्रेजों को भारत से भगाया ही क्यों था? यदि हम उनसे मिन्नत करते कि हमें केवल “सत्ता की कुर्सी” सौंप दो और शान से भारत में ही रहकर हम भारतवासियों को अंग्रेजियत में पारंगत कर दो तो शायद वे इस शर्त को बेझिझक शीघ्र स्वीकार कर लेते और हमें भी अंग्रेजियत के रंग में रंगने इतना अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ता।

क्या यह हमारे लिए गर्व की बात है कि हमारे देश का नाम भारत न होकर “इण्डिया” ज्यादा प्रचलन में है? हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी होने के बावजूद, वह आज भी अंग्रेजी भाषा की दासी बनी हुई है तथा हमारी संसद में, महत्वपूर्ण गोष्ठियों में, सर्वोच्च न्यायालय तथा सभी उच्च न्यायालयों में सम्पूरण कार्य तथा शासकीय कार्यालयों का अधिकांश कार्य आज भी बड़ी शान से अंग्रेजी में चलाया जाता है। हमारे बच्चों की आधे से ज्यादा क्षमता एवं ऊर्जा केवल अंग्रेजी भाषा का व्याकरण और स्पैलिंग समझने में ही समाप्त हो जाती है। उन्हें हम आज तक यह समझा नहीँ पाये हैं कि अंग्रेजी भाषा का शब्द PUT पुट लेकिन BUT बट क्यों होता है? अंग्रेजी भाषा की इस भूल-भुलैया एवं विलक्षणता के कारण हमारे बच्चों के पास किसी भी विषय की गहराई में जाने, उसे समझने तथा ज्ञान बढ़ा कर “नोबल प्राइज” अर्जित करने  के लिए क्षमता तथा ऊर्जा शेष ही कहाँ बचती है? जिस प्रकार एक जमाने में अंग्रेजी साम्राज्य में सूर्य कभी अस्त नहीं होता था, उसी प्रकार भारत में भी अंग्रेजियत बरकरार बनी रहेगी, इसमें किसी भी प्रकार की आशंका या शक का कोई कारण दूर-दूर तक भी नहीं दिखाई पड़ रहा है। लगता है एक दिन हमारी देश-भक्ति का मापदण्ड भी यह अंग्रेजेयत बन कर ही रहेगी। किसी को कोई आपत्ति करने का साहस भी नहीं होगा। Long live English language and English culure (अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजी सभ्यता एवं संस्कृति जिंदाबाद), यह हम सब भारतीयों का आज का नारा और अंग्रेजों के प्रति हमारी आदरांजलि भी है। अंग्रेजों ने अपने साम्राज्य को सुदृढ़ बनाने एक मुहावरा का आविष्कार किया था कि “King can do no wrong” (राजा कभी कोई गलती नहीं करता) उसी प्रकार हम भी अंग्रेजी सभ्यता को आदरांजलि तथा अपनी सभ्यता को श्रद्धांजलि देते हुए बड़ी शान से आज निःसंकोच कह सकते हैं कि अंग्रेजी भाषा, संस्कृति एवं सभ्यता में लाख विसंगतियाँ होने के बावजूद वह हमें अपने प्राणों से भी ज्यादा प्रिय है। क्योंकि प्यार अंधा होता है (Love is blind) इसलिए हम लाचार हैं। इस मामले में हो सके तो हमें माफ करना – अंग्रेजों को भारत से भगा देने का हम शायद तहेदिल से प्रायश्चित कर रहे हैं। इसीलिए लोग ठीक ही कहते हैं कि – “अंग्रेज तो चले गए, पर अपनी औलाद यहाँ छोड़ गए”।

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India or Bharat?

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इण्डिया दैट इज भारत (India that is Bharat)

यह तो आप सभी जानते हैं कि हमारे देश का नाम भारत है; किन्तु समस्त संसार के लोग इसे भारत नहीं बल्कि ‘इण्डिया’ के नाम से जानते हैं।

मूलरूप से हमारे देश का नाम भारत है पर जब हमारे देश पर मुगलों का आधिपत्य हो गया तो मुगलों ने इसका नाम ‘हिन्दुस्तान’ रख दिया और हमारा देश भारत से ‘हिन्दुस्तान’ बन गया। फिर हमारे देश पर अंग्रेजों का वर्चस्व हो गया तो उन्होंने हमारे देश का नाम ‘इण्डिया’ रख दिया और हमारा देश ‘इण्डिया’ कहलाने लगा।

उपरोक्त बातों के प्रकाश में स्पष्ट लक्षित होता है कि हमारे देश के नाम को कोई भी विदेशी बदल सकता है। ठीक उसी प्रकार से जैसे कि किसी का नाम उसके माता पिता ने ‘कालीचरण’ रखा किन्तु कोई उसे ‘कालू’ कहने लगे या कोई अन्य दूसरा उसे ‘कल्लू’ बुलाने लगे।

कालीचरण को भले ही ‘कालू’ या ‘कल्लू’ कहलाना बुरा लगे किन्तु हम भारतीयों को हमारे देश भारत का नाम बदल जाने का कभी भी बुरा नहीं लगता। यदि बुरा लगता तो हमारे संविधान के प्रथम पृष्ठ में “India, that is Bharat” (इण्डिया, जो कि भारत है) क्यों लिखा जाता?

साफ नजर आता है कि हमारा संविधान ‘इण्डिया’ नाम को ‘भारत’ नाम से अधिक महत्व देता है और सिर्फ ‘भारत’ नाम को ‘इण्डिया’ के बिना अधूरा बताता है।

‘भारत’ एक व्यक्तिवाचक संज्ञा (Proper Noun) है। यह तो प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि व्यक्तिवाचक संज्ञा (Proper Noun) को चाहे किसी भी भाषा में बोला या लिखा जाए, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। क्या ‘चन्द्रप्रकाश’ नाम को अंग्रेजी में ‘Moonlight’ या उर्दू में ‘रोशनी-ए-माहताब’ के रूप में बदला जा सकता है? किन्तु भारत को, व्यक्तिवाचक संज्ञा (Proper Noun) होने के बावजूद भी, अंग्रेजी में ‘India’ के रूप में बदला जा सकता है। हमें स्वयं को भारतीय कहलाने की अपेक्ष ‘इण्डियन’ कहलाने में अधिक गर्व का अनुभव होता है। आखिर अंग्रेजों तथा अंग्रेजी का हम पर इतना अधिक प्रभाव क्यों है?

अंग्रेजी ने हमारे यहाँ के बहुत सारे नामों को बदल कर रख दिया है, पुण्यसलिला गंगा ‘गेंजेस’ हो गई हैं, भगवान राम “लॉर्ड रामा” हो गए हैं। किसी विषय पर जब कभी भी संगोष्ठी का आयोजन होता है तो वहाँ निमन्त्रित अधिकतर विद्वजन अपना शोधपत्र या भाषण अंग्रेजी में ही पढ़ना पसन्द करते हैं और अपने भाषणों में “पाटलिपुत्र” को “पाटलिपुत्रा” तथा राम को “रामा” कहते हैं।

“बम्बई” बदल कर “मुम्बई” हो गया क्योंकि मुम्बईवासियों को बम्बई नाम की अपेक्षा मुम्बई नाम अधिक गौरवशाली लगता है, “मद्रास” बदल कर “चेन्नई” हो गया क्योंकि चेन्नईवासियों को मद्रास नाम की अपेक्षा चेन्नई नाम अधिक गौरवशाली लगता है, “कलकत्ता” बदल कर “कोलकाता” हो गया क्योंकि कोलकातावासियों को कलकत्ता नाम की अपेक्षा कोलकाता नाम अधिक गौरवशाली लगता है। पर कभी “इण्डिया” बदल कर “भारत” होगा इस बात में संशय ही होता है क्योंकि भारतवासियों तथा भारत के संविधान को भारत की अपेक्षा इण्डिया नाम ही अधिक गौरवशाली लगता है।

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Indain precious artifacts in British museums

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ब्रिटेन के तमाम संग्रहालयों में मौजूद बेशकीमती कलाकृतियों और जवाहरातों (Indain precious artifacts) को भारत वापस लाने के मुद्दे भारतीय मूल के ब्रितानी सांसद, कीथ वाज़ समेत कई समूह पिछले कई वर्षों से को उठाते रहे हैं और इन लोगों ने मोदी जी की यात्रा के दौरान इस मुद्दे को उठाए जाने का आग्रह भी किया है.

आइये जानें कि वे प्रमुख कलाकृतियाँ या रत्न कौन से हैं:

कोहिनूर हीरा (Kohinoor Diamond)

Kohinoor Diamond

आंध्र प्रदेश की एक खान से निकला कोहिनूर हीरा पूरे 720 कैरेट का हुआ करता था. अलाउद्दीन खिलजी के जनरल मालिक काफ़ूर ने इसे जीता था और ये वर्षों तक खिलजी वंश के ख़ज़ाने में रहा.

मुग़ल शासक बाबर के पास पहुँचने के बाद इसने मुग़लों के साथ कई सौ वर्ष बिताए. शाहजहाँ के मयूर सिंहासन पर अपनी चमक फैलाने के बाद कोहिनूर हीरा महाराज रंजीत सिंह तक के पास पहुंचा.

आख़िरकार एक तोहफ़े के तौर पर कोहिनूर ब्रिटेन की महारानी को सौंपा गया और तब से ये महारानी के ताज में जड़ा हुए हैं.

वो बात दूसरी है कि एक ज़माने में दुनिया के सबसे बड़े हीरों में शुमार कोहिनूर अब सिर्फ 105 कैरेट का ही रह गया है.

सुल्तानगंज बुद्ध (Sultanganj Buddha)

Sultanganj Buddha

सन् 1861 में सुल्तानगंज, जो कि बिहार के सुल्तानगंज जिले का एक शहर है, में रेलवे निर्माण हेतु खुदाई में लगभग 500 कि.ग्रा. वजनी बुद्ध की सम्पूर्ण प्रतिमा प्राप्त हुई थी जिसे कि रेलवे इंजीनियर ई.बी. हारिस (E.B Harris) के द्वारा तत्काल बर्मिंघम भेज दिया गया। पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार यह मूर्ति सन् 500 और सन 700 के दौरान की है। आज भी बुद्ध की यह प्रतिमा बर्मिंघम म्यूजियम एंड आर्ट गैलरी में रखी हुई है, जबकि कायदे से इसे भारत वापस लाना चाहिए।

टीपू की तलवार और अंगूठी (Tipu Sultan’s Sword & Ring)

Tipu Sultan's Sword

मैसूर के शेर – टीपू सुल्तान – के वीरगति प्राप्त करने के बाद ब्रिटिश सेना ने उनकी अँगूठी और तलवार को हथिया लिया। साथ ही उनके शस्त्रागार को भी लूट लिया।

टीपू सुल्तान की अँगूठी और तलवार के साथ ही उनके शस्त्रागार और खजाने की अनेक अमूल्य वस्तुओं को ब्रिटिश म्यूजियम में रखा गया था।

सन् 2010 में टीपू सुल्तान की तलवार को पांच लाख से अधिक पाउंड में नीलाम कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि वह तलवार दो सौ साल पुरानी पुरानी थी।

टीपू सुल्तान की अँगूठी में राम नाम अंकित है।

Tipu Sultan's Ring

महाराजा रणजीत सिंह का राज सिंहासन (Maharaja Ranjeet Sing’s Throne)

Ranjit Singh's Throne

महाराजा रणजीत सिंह का सोने से मढ़ा अमूल्य राज सिंहासन वी एंड ए म्यूजियम में रखा हुआ है।

इसी प्रकार से और भी अनेक अमूल्य भारतीय कलाकृतियाँ तथा रत्न ब्रिटेन के कब्जे में हैं।

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महान कवि तुलसीदास (Great Poet Tulsidas)

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संत तुलसीदास (Tulsidas)

तुलसीदास (Tulsidas) जी का जन्म सन् 1554में बांदा जिले के राजापुर नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे एवं माता का नाम हुलसी था।

तुलसीदास के बचपन का नाम रामबोला था। बालक रामबोला अत्यन्त प्रखर बुद्धि के थे और उन्होंने अल्पकाल में विद्या सीख ली। युवावस्था प्राप्त करने पर उनका विवाह रत्नावली नामक सुन्दर कन्या के साथ हो गया। तुलसीदास का अपनी पत्नी से इतना अधिक प्रेम था कि वे एक पल भी उनके बगैर नहीं रहते थे। एक बार जब रत्नावली मायके गईं तो वे उसी रात, अत्यन्त विषम परिस्थितियों के बावजूद, उनके पास जा पहुँचे। उनकी इस अधीरता को देखकर रत्नावली ने उन्हें निम्न शब्दों में धिक्कारा –

“लाज न आवत आपको, दौरे आयहु साथ।
धिक् धिक् ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ॥
अस्थिचर्ममय देह यह, ता पर ऐसी प्रीति।
तिसु आधो रघुबीरपद, तो न होति भवभीति॥”

(आपको जरा भी शर्म नहीं आई जो दौड़ते हुए आ गये। ऐसे प्रेम को भला मैं क्या कहूँ, आपके इस प्रेम पर धिक्कार है। मेरे हाड़-मांस के इस शरीर पर जितनी आसक्ति आपकी है, उससे आधी आसक्ति यदि भगवान में होती तो आप भवसागर से तर जाते।)

तुलसीदास जी को रत्नावली के ये शब्द लग गये और वे एक क्षण भी रुके बिना वहाँ से प्रयाग चले गए और भगवान श्री राम के भक्त बन गए। सन् 1631 की रामनवमी के दिन उन्होंने रामचरितमानस की रचना आरम्भ की और दो वर्ष, सात माह, छब्बीस दिन में इसे पूर्ण किया। तुलसीदास जी रचित अन्य रचनाएँ हैं –

विनयपत्रिका
कवितावली
दोहावली
कवित्त रामायण
गीतावली
रामललानहछू
वैराग्य-संदीपनी
बरवै रामायण
पार्वती-मंगल
जानकी-मंगल
रामाज्ञाप्रश्न
श्रीकृष्ण-गीतावली
सतसई
छंदावली रामायण
कुंडलिया रामायण
राम शलाका
संकट मोचन
करखा रामायण
रोला रामायण
झूलना
छप्पय रामायण
कलिधर्माधर्म निरुपण

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Some Tales of the Great Scientist Einstein

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(1)

अक्सर लोग अल्बर्ट आइंस्टाइन (Albert Einstein) से उनके सापेक्षता सिद्धान्त (जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिव्हिटी) को सरल शब्दों में समझाने के लिए निवेदन किया करते थे। जवाब में आइंस्टाइन कहते थे, “आप अपने हाथ को जलती अंगीठी के ठी ऊपर एक मिनट के लिए रखिये तो वह एक मिनट आपको एक घण्टे के बराबर लगेगा और किसी सुन्दर महिला के साथ एक घण्टे तक बैठिये तो वह एक घण्टा आपको एक मिनट के बराबर लगेगा। यही सापेक्षता है।”

(2)

एक दिन अल्बर्ट आइंस्टाइन भाषण देने जा रहे थे तो रास्ते में उनके ड्राइव्हर ने कहा कि आपका भाषण मैं इतनी बार सुन चुका हूँ कि लोगों के सामने मैं ही आपका भाषण दे सकता हूँ। यह कहकर कि ‘ठीक है आज तुम्हीं भाषण देना’ आइंस्टाइन ने ड्राइव्हर की पोशाक पहन कर उसका स्थान ले लिया और अपना स्थान ड्राइव्हर को दे दिया।

भाषण हॉल में ड्राइव्हर ने सचमुच, आइंस्टाइन के जैसे ही, धुआँधार भाषण दिया। भाषण देने के बाद जब लोगों ने प्रश्न पूछने शूरू किए और ड्राइव्हर पूरे आत्मविश्वास के साथ जवाब भी सही दिए। किन्तु किसी एक ने ऐसा कठिन प्रश्न पूछ लिया कि ड्राइव्हर को उसका उत्तर नहीं पता था। इस पर ड्राइव्हर ने कहा, “अरे इस प्रश्न का जवाब तो इतना सरल है कि मेरा ड्राइव्हर बता देगा।” ऐसा कहकर उसने ड्राइव्हर वाली पोशाक पहने आइंस्टाइन को जवाब देने के लिए खड़ा कर दिया।

(3)

जब आइंस्टाइन प्रिंसटन यूनिव्हर्सिटी में कार्यरत थे तो एक दिन यूनिव्हर्सिटी से घर वापस आते समय वे अपने घर का पता ही भूल गए। यद्यपि प्रिंसटन के अधिकतर लोग आइंस्टाइन को पहचानते थे, किन्तु जिस टैक्सी में वे बैठे थे उसका ड्राइव्हर भी उन्हें पहचानता नहीं था। आइंस्टाइन ने ड्राइव्हर से कहा, “क्या तुम्हें आइंस्टाइन का पता मालूम है?” ड्राइव्हर ने जवाब दिया, “प्रिंसटन में भला कौन उनका पता नहीं जानेगा? यदि आप उनसे मिलना चाहते हैं तो मैं आपको उनके घर तक पहुँचा सकता हूँ।” तब आइंस्टीन ने ड्राइव्हर को बताया कि वे स्वयं ही आइंस्टाइन हैं और अपने घर का पता भूल गए हैं। यह जानकर ड्राइव्हर ने उन्हें उनके घर तक पहुँचाया और आइंस्टाइन के बार-बार आग्रह के बावजूद भी, टैक्सी का भाड़ा भी नहीं लिया।

(4)

एक बार आइंस्टाइन प्रिंसटन से कहीं जाने के लिए ट्रेन से सफर कर रहे थे। जब टिकट चेकर उनके पास आया तो वे अपनी टिकट ढ़ूँढ़ने के लिए जेबें टटोलने लगे। जेब में टिकट के न मिलने पर उन्होंने अपने सूटकेस को चेक किया। वहाँ भी टिकट को नदारद पाकर अपनी सीट के आस-पास खोजने लगे। यह देखकर चेकर ने कहा कि यदि टिकट गुम हो गई है तो कोई बात नहीं, वह उन्हें अच्छी प्रकार से पहचानता है और उसे विश्वास है कि टिकट जरूर खरीदी गई होगी।

चेकर जब बोगी के सभी लोगों का टिकट चेक करके वापस जा रहा था तो उसने देखा कि आइंस्टाइन अपनी सीट के नीचे टिकट ढ़ूँढ़ रहे हैं। तब चेकर फिर से उन्हे कहा कि वे टिकट के लिए परेशान न हों, उनसे टिकट नहीं माँगा जाएगा।

चेकर की बातें सुनकर आइंस्टाइन ने कहा, “पर टिकट के बिना मुझे पता कैसे चलेगा कि मैं जा कहाँ रहा हूँ?”

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Is the History we read true?

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हमारा इतिहास (History) क्या हमारा ही इतिहास है?

आपको लगता है कि नहीं पता नहीं, पर मुझे तो यही लगता है कि आज जो हमारा इतिहास (History) पढ़ाया जाता है वह वास्तव में हमारा इतिहास है ही नहीं। वह तो उन क्रूर, कुटिल, अत्याचारी और हत्यारे लोगों का इतिहास है जिन्होंने अत्याचार और मक्कारी के बल पर भारत पर जबरन कब्जा कर लिया था। और दुख की बात तो यह है कि, आज पढ़ाए जाने वाले इतिहास में उन्हीं लोगों को ही महान बताया जाता है।

मुगल काल का इतिहास मुगलों के द्वारा और अंग्रेजों के समय का इतिहास अंग्रेजों के द्वारा लिखा गया है। अब जाहिर है कि मुगल मुगलों की और अंग्रेज ईसाइयों की श्रेष्ठता ही बयान करने की कोशिश करेगा और उसी हिसाब से वास्तविक घटनाओं को तोड़-मरोड़ कर ही इतिहास लिखेगा। मुगलों और अंग्रेजों, दोनो ही के इतिहासकारों को अच्छी तरह से मालूम था कि अत्यन्त प्राचीन काल से समस्त विश्व को ज्ञान, विज्ञान और गणित की शिक्षा प्रदान करने वाले भारत का अपना एक अनूठा इतिहास रहा है। किन्तु यदि वे भारत के उस सच्चे इतिहास को लिखते तो स्वयं को श्रेष्ठ कैसे सिद्ध कर पाते? स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए उन्होंने भारत के प्राचीन राजवंशों तथा उनकी वंशावलियों को अविश्वसनीय बता दिया, अनेक भारतीय साम्राज्यों के लिखित इतिहास को गायब कर दिया और हमारे प्राचीन ग्रन्थों मे उल्लेखित इतिहास को कल्पित कथाओं का रूप दे दिया।

दुर्भाग्य की बात तो यह है कि स्वतन्त्र होने के बाद भारत की सत्ता जिन लोगों के हाथ में आई वे शक्ल-सूरत से भारतीय दिखने वाले लोग भी मन से अंग्रेज ही थे, अंग्रेजियत उनके नस-नस में खून बनकर दौड़ रही थी। भारतीय दृष्टिकोण से भारत का सही इतिहास लिखा जाना भला उन्हें कैसे गवारा होता? पुराने इतिहास को तो उन्होंने सुधारा ही नहीं, उल्टे स्वतन्त्रता प्राप्ति के के पूर्व तथा पश्चात् के इतिहास को भी तोड़-मरोड़ कर कुछ तथाकथित विशिष्ट व्यक्तियों का इतिहास बना कर रख दिया। सारी उपलब्धियों का श्रेय उन तथाकथित विशिष्ट व्यक्तियों को दे दिया गया।

यदि आज भी हम अपने वास्तविक इतिहास को जान लें, अपनी प्राचीन संस्कृति और सभ्यता को महत्व दें, और निहित स्वार्थ को छोड़ कर विशुद्ध राष्ट्रीय भावना के साथ अपना काम करें तो संसार की कोई भी ताकत भारत को विश्व में प्रथम स्थान पाने से रोक नहीं सकती।

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How to manage when you can’t withdraw cash from Bank – Cashless Payment methods

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विमुद्रीकरण (demonetization) के बाद बगैर नगदी के भुगतान करना (cashless payment) एक बहुत बड़ी आवश्यकता बन गई है, नगरीय क्षेत्रों के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी। देश के प्रत्येक नागरिक के लिए, चाहे वह किसान हों, अध्यापक हो, सैनिक हो, अधिकारी हो, कर्मचारी हो, चाहे कुछ भी हो बगैर नगदी के भुगतान करने (cashless payment) के तरीकों को जानना जरूरी हो गया है। वर्तमान में नकदी (cash) की कमी को देखते हुए भारत सरकार भी बैंकिंग के डिजिटल विधि को युद्धस्तर पर बढ़ावा दे रही है।

तो आइये जानें बगैर नगदी के भुगतान करना (cashless payment) के तरीकों के बारे में

डिजिटल वैलेट्स (Digital Wallets)

छोटी राशियों जैसे कि सब्जी, दूध, किराना आदि खरीदी आदि के भुगतान के लिए डिजिटल वैलेट्स (Digital Wallets) सबसे सुगम तरीका है। डिजिटल वैलेट्स (Digital Wallets) को आप अपनी जेब में रखा हुआ मनीपर्स या नगदी का बटुआ समझ सकते हैं। जैसे आप अपनी जेब में मनीपर्स रखते हैं वैसे ही आप डिजिटल वैलेट्स (Digital Wallets) को आप अपने मोबाइल फोन में रख सकते हैं। मोबाइल फोन में डिजिटल वैलेट्स (Digital Wallets) रखने के बाद आपको नगद रुपया रखने की विशेष आवश्यकता नहीं है। बस आपके बैंक खाते में यथेष्ट राशि होनी चाहिए। बैंक खाते से आप अपने खर्च के लायक राशि को अपने मोबाइल के डिजिटल वैलेट्स (Digital Wallets) में डाल सकते हैं और फिर उसके द्वारा किसी भी चीज के लिए बिना नकदी के भुगतान कर सकते हैं।

पेटीएम, फ्रीचार्ज आदि डिजिटल वैलेट्स (Digital Wallets) सेवा के बड़े प्रदाता हैं।

किन्तु डिजिटल वैलेट्स (Digital Wallets) द्वारा भुगतान करने के लिए आपके मोबाइल में इन्टरनेट चलने की सुविधा होनी चाहिए।

यूएसएसडी ट्रांसफर (USSD transfer)

जिनके मोबाइल फोन में इन्टरनेट की सुविधा नहीं है उन लोगों के लिए यूएसएसडी ट्रांसफर (USSD transfer) बिना नगदी के भुगतान हेतु एक बड़ी राहत है। बस आपके मोबाइल को जिस बैंक में आपका खाता है उस बैंक में रजिस्टर्ड होना चाहिए। आप अपने रजिस्टर्ड मोबाइल में USSD कोड़ नंबर डायल करके मनी ट्रांसफर सहित विभिन्न बैंकिंग विकल्प प्राप्त कर सकते हैं। इस सेवा का विकास ग्रामीण जनता, जिन्हें प्रायः इंटरनेट सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाती, को ध्यान किया गया है। यह सेवा 11 क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध है।

UPI

यह भी मोबाइल बैंकिंग का एक भाग है जिसमें सुरक्षा पर अधिक ध्यान दिया गया है। NEFT का प्रयोग करके कैश ट्रांसफर करने पर आपको नगदी प्राप्त करने वाले को अपना बैंक खाता नंबर बताना पड़ता है किन्तु इस विधि में आप केवल यूजरनेम का प्रयोग करके कैश ट्रांसफर कर सकते हैं।
इस विधि को अधिक मोबाइल बैंकिंग की लेकिन सुरक्षा पर विशेष जोर देने के साथ एक हिस्सा है।

इंटरनेट बैंकिंग या मोबाइल बैंकिंग का प्रयोग करके आप इस सुविधा का लाभ ले सकते हैं।

नेट बैंकिंग (Net Banking)

नेट बैंकिंग अपने घर या कार्यालय में ही बैठकर अपने बैंक खाते का संचालन करने का एक बढ़िया तरीका है। घर बैठे ही आप अपने नेट बैंकिंग के लिए इन्टरनेट के माध्यम से सक्रिय करके अपना यूजरनेम और पासवर्ड बना सकते हैं। एक बार नेट बैंकिंग के सक्रिय हो जाने पर आप कभी भी, कहीं से भी अपने बैंक खाते का संचालन कर सकते हैं। मोबाइल रिचार्ज करना, रेलवे या एयर टिकट खरीदना, आनलाइन शॉपिंग करना, किसी को पैसे भेजना आदि अनेक कार्य आप नेट बैंकिंग की सहायता से अपने घर या कार्यालय से ही स्वयं कर सकते हैं।

मोबाइल बैंकिंग (Mobile Banking)

मोबाइल बैंकिंग ने तो आपके स्मार्टफोन को ही बैंकिंग पोर्टल में बदल कर रख दिया है। बस अपने स्मार्टफोन में अपने बैंक का मोबाइल बैंकिंग एप डाउन कर लीजिए और बैंक द्वारा दिये जाने वाली सारी सुविधाओं का लाभ ले लीजिए।

कैशलेस भुगतान के लिए क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड तो हैं ही। इनके बारे में तो आप जानते हैं ही, अब और क्या बताना?

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Narada cursed Vishnu – Stories from Ramcharitmanas 11

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आपके ज्ञानवर्धन हेतु प्रस्तुत है रामचरितमानस (Ramcharitmanas), जिसे कि तुलसी रामायण (Ramayana) के नाम से भी जाना जाता है, की कहानियाँ (Ramcharitmanas Stories or Ramayana Stories)

रामचरितमानस की कहानियाँ – नारद का विष्णु को शाप (Stories from Ramcharitmanas)
मोह के कारण नारद मुनि की बुद्ध भ्रष्ट हो गई थी, इससे वे विष्णु जी द्वारा राजकुमारी को ले जाते देख बहुत ही विकल हो गये। मानो गाँठ से छूटकर मणि गिर गई हो। मुनि की यह हालत देखकर शिव जी के गणों ने मुसकुरा कर कहा – जाकर दर्पण में अपना मुँह तो देखिये। ऐसा कहकर वे दोनों मुनि के शाप के डर से भयभीत होकर भागे। मुनि ने जल में झाँककर अपना मुँह देखा। अपना रूप देखकर उनका क्रोध बहुत बढ़ गया। उन्होंने शिव जी के उन गणों को शाप देते हुए कहा – तुम दोनों कपटी और पापी जाकर राक्षस हो जाओ। तुमने हमारी हँसी की, उसका फल चखो। अब फिर किसी मुनि की हँसी करना।

मुनि ने फिर जल में देखा, तो उन्हें अपना असली रूप प्राप्त हो गया; तब भी उन्हें सन्तोष नहिं हुआ। उनके ओंठ फड़क रहे थे और मन में क्रोध भरा था। तुरंत ही भगवान कमलापति के पास चले। मन में सोचते जाते थे कि जाकर या तो शाप दूँगा या प्राण दे दूँगा। उन्होंने जगत में मेरी हँसी करायी। दैत्यों के शत्रु भगवान हरि उन्हें बीच रास्त में ही मिल गये। साथ में लक्ष्मी जी और वही राजकुमारी थीं।

देवताओं के स्वामी भगवान ने मीठी वाणी में कहा – हे मुनि! व्याकुल की तरह कहाँ चले? ये शब्द सुनते ही नारद को बड़ा क्रोध आया, माया के वशीभूत होने के कारण मन में चेत नहीं रहा। मुनि ने कहा – तुम दूसरों की सम्पदा नहीं देख सकते, तुम्हारे ईर्ष्या और कपट बहुत हैं। समुद्र मथते समय तुमने शिव जी को बावला बना दिया और देवताओं को प्रेरित करके उन्हें विषपान कराया। असुरों को मदिरा और शिव जी को विष देकर तुमने स्वयं लक्ष्मी और सुन्दर कौस्तुभ मणि ले ली। तुम बड़े धोखेबाज और मतलबी हो। सदा कपट का व्यवहार करते हो। तुम परम स्वतन्त्र हो, सिर पर तो कोई है ही नहीं। इससे जब जो मन को भाता है, स्वच्छन्ता से वही करते हो। भले को बुरा और बुरे को भला कर देते हो। हृदय में हर्ष-विषाद कुछ भी नहीं लाते। सबको ठग-ठग कर परच गये हो और अत्यन्त निडर हो गये हो। अब तक तुमको किसी ने ठीक नहीं किया था। अब तुमने मुझ जैसे जबरदस्त से छेड़खानी की है, अतः अपने किये का फल अवश्य पाओगे। जिस मनुष्य शरीर को धारण कर तुमने मुझे ठगा है, तुम भी वही शरीर धारण करो, यह मेरा शाप है। तुमने हमारा रूप बन्दर सा बना दिया था, इससे बन्दर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। मैं जिस स्त्री को चाहता था, उससे मेरा वियोग कराकर तुमने मेरा बड़ा अहित किया है, इसलिए तुम भी स्त्री के वियोग में दुःखी होओगे।

मुनि के शाप को स्वीकार कर, हृदय में हर्षित होते हुए प्रभु ने नारद जी से बहुत विनती की और कृपानिधान भगवान ने अपनी माया की प्रबलता खींच ली। माया के हटते ही न तो वहाँ लक्ष्मी थीं और न वह राजकुमारी ही। तब मुने ने अत्यन्त भयभीत होकर श्री हरि के चरण पकड़ लिये और कहा – हे शरणागत के दुःखों को हरनेवाले! मेरी रक्षा कीजिए। हे कृपालु! मेरा शाप मिथ्या हो जाये।

तब दीनों पर दया करने वाले भगवान ने कहा – यह सब मेरी ही इच्छा से हुआ है।

मुनि ने कहा – मैंने आपको अनेक खोटे वचन कहे हैं। मेरे पाप कैसे मिटेंगे?

भगवान ने कहा – जाकर शंकर जी के शतनाम का जप करो, इससे हृदय में तुरंत शान्ति होगी। शिव जी के समान मुझे कोई प्रिय नहीं है, इस विश्वास को भूलकर भी न छोड़ना। हे मुनि! पुरारि (शिव जी) जिस पर कृपा नहीं करते वह मेरी भक्ति नहीं कर पाता।

बहुत प्रकार से मुनि को समझा-बुझा कर प्रभु अन्तर्धान हो गये और नारद जी श्री रामचन्द्र जी के गुणों का गान करते हुए सत्यलोक को चले।

शिव जी के गणों ने जब मुनि को मोहरहित और मन में बहुत प्रसन्न होकर मार्ग में जाते हुए देखा तब वे अत्यन्त भयभीत होकर नारद जी के पास आये और उनके चरण पकड़ कर दीन वचन बोले – हे मुनिराज! हम ब्राह्मण नहीं हैं, शिव जी के गण हैं। हमने बड़ा अपराध किया, जिसका फल हमने पा लिया। हे कृपालु! अब शाप दूर करने की कृपा कीजिये।

दीनों पर दया करने वाले नारद जी ने कहा – तुम दोनों जाकर राक्षस होओ, तुम्हें महान ऐश्वर्य, तेज और बल की प्राप्ति हो। तुम अपनी भुजाओं के बल से जब सारे विश्व को जीत लोगे, तब भगवान विष्णु मनुष्य का शरीर धारण तुमसे युद्ध करेंगे। युद्ध में भगवान विष्णु के हाथों से तुम्हारी मृत्यु होने पर तुम शापमुक्त हो जाओगे।

कालान्तर में वे दोनों शिव जी के गण रावण और कुम्भकर्ण हुए।

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Story of Vishwamohini – Stories from Ramcharitmanas 10

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आपके ज्ञानवर्धन हेतु प्रस्तुत है रामचरितमानस (Ramcharitmanas), जिसे कि तुलसी रामायण (Ramayana) के नाम से भी जाना जाता है, की कहानियाँ (Ramcharitmanas Stories or Ramayana Stories)

रामचरितमानस की कहानियाँ – विश्वमोहिनी (Stories from Ramcharitmanas)

श्री हरि ने, यह सोचकर कि मैं अवश्य ही वह उपाय करूँगा जिससे नारद मुनि का कल्याण और मेरा खेल हो, अपनी माया को प्रेरित किया तथा जिस रास्ते से नारद जी जा रहे थे उस रास्ते में सौ योजन का एक सुन्दर नगर रचा। उस नगर में शीलनिधि नाम का राजा रहता था, जिसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेना के समूह थे। उसका वैभव और विलास सौ इन्द्रों के समान था। वह रूप, तेज, बल और नीति का घर था। उसके विश्वमोहिनी (Vishwamohini) नाम की एक ऐसी रूपवती कन्या थी, जिसके रूप को देखकर लक्ष्मी जी भी मोहित हो जाएँ। वह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती थी, इसलिये वहाँ अगणित राजा आये हुए थे।

कौतुकवश नारद मुनि उस नगर में गये और नगरवासियों से उन्होंने सब हाल पूछा। सब समाचार सुनकर वे राजा के महल में आए। राजा ने पूजा करके मुनि को यथोचित आसन दिया। फिर राजा ने राजकुमारी को नारद जी को दिखलाया और पूछा कि हे नाथ! आप विचार करके इसके सब गुण-दोष कहिए।

उसके रूप को देखकर मुनि वैराग्य भूल गये। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने-आप को भी भूल गये और हृदय में हर्षित हुए, पर प्रकट रूप में उन लक्षणों को नहीं कहा। लक्षणों को देखकर वे मन में कहने लगे कि जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जायेगा और रणभूमि में कोई उसे जीत न सकेगा। यह शीलनिधि की कन्या जिसको वरेगी, सब चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे। सब लक्षणों को विचारकर मुनि ने अपने हृदय में रख लिया और राजा से कुछ अपनी ओर से बनाकर कह दिया।

फिर नारद जी ने वहाँ से प्रस्थान किया पर उनके मन में यह चिन्ता थी कि मैं सोच-विचार कर अब वही उपाय करूँ जिससे यह कन्या मुझे ही वरे। इसके लिए तो मुझे सुन्दर रूप चाहिये, जिसे देखकर राजकुमारी मुझ पर रीझ जाये और जयमाल मेरे गले में डाल दे। श्री हरि मेरे हितचिन्तक हैं अतः मैं उन्हीं से उनका सुन्दर रूप माँग लेता हूँ। ऐसा सोचकर नारद जी ने भगवान विष्णु का स्मरण किया और भगवान विष्णु उनके समक्ष प्रकट हो गये।

नारद जी ने बहुत आर्त होकर सब कथा कह सुनाई और प्रार्थना की कि हे प्रभो! आप अपना रूप मुझे दीजिये ताकि मैं उस कन्या को प्राप्त कर सकूँ। हे नाथ! जिस तरह मेरा हित हो, आप वही कीजिये। प्रभु ने कहा कि हे नारद जी! जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे। हे योगी मुनि! रोग से व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता। इसी प्रकार मैंने भी तुम्हारा हित करने की ठान ली है। ऐसा कहकर भगवान अन्तर्धान हो गए।

माया के वशीभूत नारद प्रभु की स्पष्ट वाणी को भी समझ न सके और स्वयंवर स्थल की ओर चल पड़े।

रामचरितमानस की कहानियाँ – विश्वमोहिनी का स्वयंवर (Stories from Ramcharitmanas)
विश्वमोहिनी के स्वयंवर में राजा लोग खूब सज-धज कर अपने आसन पर बैठे थे। नारद मुनि मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे कि मेरा रूप बड़ा सुन्दर है, मुझे छोड़ कन्या भूलकर भी दूसरे को न वरेगी। कृपानिधान भगवान ने मुनि के कल्याण के लिए उन्हें ऐसा कुरूप बना दिया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता, पर यह चरित कोई नहीं जान सका। सबने उन्हें नारद ही जानकर प्रणाम किया।

वहाँ शिव जी के दो गण भी थे। वे सब भेद जानते थे और ब्राह्मण का वेश बनाकर सारी लीला देखते फिरते थे। वे भी बड़े मौजी थे। वे शिव जी के दोनों गण भी नारद जी के पास जाकर बैठ गए। वे नारद जी को सुना-सुना कर व्यंग वचन कहते थे – भगवान ने इन्हें ऐसा सुन्दर रूप दिया है कि राजकुमारी रीझ जाएगी और “हरि” (वानर) जानकर इन्हीं को ही वरेंगी। यद्यपि मुनि उनकी अटपटी बातें सुन रहे थे, पर बुद्धि भ्रम से सनी होने के कारण वे बातें उनकी समझ में नहीं आती थीं और वे उन बातों को अपनी प्रशंसा समझ रहे थे।

राजकुमारी हाथ में वरमाला लिए सभा में पहुँची। राजकन्या को नारद जी का मुँह बन्दर जैसा दिखाई पड़ा इसलिए उसने नारद जी की ओर भूलवश भी नहीं ताका। नारद जी बार-बार उचकते और छटपटाते थे। उनकी दशा देखकर शिव जी के गण मुसकुराते थे। भगवान विष्णु भी राजा का शरीर धारण कर वहाँ उपस्थित थे। राजकुमारी ने हर्षित होकर भगवान विष्णु के गले में जयमाला डाल दी। लक्ष्मीनिवास भगवान दुलहिन को ले गए।

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