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Hindi Movies

हिन्दी फिल्में (Hindi Movies) अपने आरम्भ से आज तक भारतीय जनता को लुभाती रही हैं।

यहाँ प्रस्तुत है सन् 1950-980 के लोकप्रिय फिल्म (Popular Hindi Movies) के बारे में जानकारी।

भारत में फिल्मों के निर्माण आरम्भ होने के बाद भारतीय सिनेमा विकास के रास्ते पर निरंतर आगे बढ़ता ही गया और उसने मुड़कर कभी पीछे नहीं देखा। किंतु सन् 1950 से उसका स्वर्णिम काल प्रारंभ हुआ। रोचक कथानकों और सुमधुर गीत संगीत के मेल होने के कारण अद्वितीय फिल्में बनने लगीं।

राज कपूर (Raj Kapur), महबूब खान (Mehboob Khan), गुरु दत्त (Guru Dutt), व्ही. शांताराम (V. Shantaram) और बिमल राय (Bimal Roy) जैसे महान निर्माताओं ने बूट पालिश (Boot Polish), श्री 420 (Shree 420), जागते रहो (Jagate Raho), आन (Aan), मदर इंडिया (Mother India), प्यासा (Pyasa), कागज के फूल (Kagaj ke Phool), दो आँखें बारह हाथ (Do Aankhe Barah Haath), नवरंग (Navarang), दो बीघा जमीन (Do Bigha Jameen) और मधुमती (Madhumati) जैसी सुंदर, सशक्त एवं अविस्मरणीय चलचित्रों का निर्माण किया जो कि आज भी लोकप्रिय हैं। सन् 1955 में सत्यजित राय, जो कि विश्व के जाने माने निर्देशकों में से एक हैं, द्वारा निर्देशित फिल्म पाथेर पांचाली ने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की।

भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम काल में विभिन्न निर्माण संस्थाओं के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्मों का विवरण इस प्रकार हैः

महबूब खान (Mehboob Khan) के ‘महबूब प्रोडक्शन्स’ के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं हुमायु (1945), अनमोल घड़ी (1946), अनोखी अदा (1948), अंदाज (1949), झाँसी की रानी (1952), आन (1952), अमर (1954), आवाज (1956), मदर इंडिया (1957), सन आफ इंडिया (1962)।

बिमल राय (Bimal Roy) के ‘बिमल राय प्रोडक्शन्स’ के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं दो बीघा जमीन (1953), नौकरी (1954), देवदास (1955), अमानत (1955), परिवार (1956), मधुमती (1958), सुजाता (1959), उसने कहा था (1960), परख (1960), काबुलीवाला (1961), प्रेम पत्र (1962), बंदिनी (1963), बेनज़ीर (1964), दो दूनी चार (1968)।

राज कपूर (Raj Kapur) के ‘आर.के. फिल्म्स’ के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं आग (1948), बरसात (1949), आवारा (1951), बूट पालिश (1954), श्री 420 (1955), जिस देश में गंगा बहती है (1961), संगम (1964), मेरा नाम जोकर (1970), धरम करम (1975), सत्यं शिवं सुंदरम् (1978)।

राज कपूर (Raj Kapur) अपने समय के सबसे कम उम्र वाले निर्देशक थे। संगीत की उन्हें खूब समझ थी इसीलिये उनकी फिल्मों के गाने आज तक लोकप्रिय हैं, खास कर बरसात का गाना ‘हवा में उड़ता जाये…..’, आवारा का गाना ‘घर आया मेरा परदेशी…..’, बूट पॉलिश का गाना ‘नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है…..’, श्री 420 का गाना ‘मेरा जूता है जापानी…..’ एवं ‘प्यार हुआ इकरार हुआ…..’, जिस देश में गंगा बहती है का गाना ‘ओ बसंती पवन पागल…..’, संगम का गाना ‘ओ मेरे सनम ओ मेरे सनम…..’ आदि।

देव आनंद (Dev Anand) के ‘नवकेतन इंटरनेशनल’ के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं अफसर (1950), टैक्सी ड्राइव्हर (1954), हाउस नं.44 (1955), फंटूश (1956), नौ दो ग्यारह (1957), काला पानी (1958), काला बाजार (1960), हम दोनों (1961), तेरे घर के सामने (1963), गाइड (1965), ज्वेल थीफ (1967), प्रेम पुजारी (1970), हरे राम हरे कृष्ण (1971), शरीफ़ बदमाश (1973), छुपा रुस्तम (1973), इश्क इश्क इश्क (1974), जानेमन (1976), लूटमार (1980)।

देव आनंद (Dev Anand) सदाबहार हीरो रहे। ग्रैगरी पैक के अंदाज में अभिनय किया करते थे और खूब लोकप्रिय हुये। उनके दोनों भाई चेतन आनंद और विजय आनंद भी गजब के प्रतिभा के धनी थे। फिल्म गाइड के निर्देशन के लिये विजय आनंद को सभी लोगों से बहुत प्रशंसा मिली थी।

गुरु दत्त (Guru Dutt) के ‘गुरुदत्त फिल्म्स’ के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं बाज़ी (1951), प्यासा (1958), कागज के फूल (1959), साहेब बीबी और गुलाम (1962)।

वैसे तो गुरु दत्त (Guru Dutt) की बनाई सभी फिल्में लाजवाब थीं पर फिल्म प्यासा की तारीफ सबसे अधिक की गई थी। आपको शायद पता हो कि उनके द्वारा बनाई गई फिल्म कागज के फूल हिंदी की पहली सिनेमास्कोप फिल्म है।

जेमिनी प्रोडक्शन्स के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं चंद्रलेखा (1948), निशान (1949), संसार (1951), मिस्टर संपत (1952), बहुत दिन हुये (1954), इंसानियत (1955), राज तिलक (1958), पैगाम (1959), घराना (1961), औरत (1967), तीन बहूरानियाँ (1968), शतरंज (1969)।

ए.व्ही.एम. प्रोडक्शन्स के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं बहार (1951), लड़की (1953), चोरी चोरी (1956), भाई भाई (1956), भाभी (1957), मिस मेरी (1957), बरखा (1959), बिंदिया (1960), छाया (1961), मैं चुप रहूँगी (1962), मुनीम जी (1962), पूजा के फूल (1964), लाडला, मेहरबान, दो कलियाँ (1968)।

जेमिनी प्रोडक्शन्स तथा ए.व्ही.एम. प्रोडक्शन्स दक्षिण भारत की फिल्म निर्माण संस्थाएँ थीं पर सामाजिक कथाओं पर आधारित लोकप्रिय हिंदी फिल्मे भी बनाया करती थीं।

बी.आर. चोपड़ा (B.R. Chopra) के ‘बी.आर. फिल्म्स’ के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं एक ही रास्ता (1956), नया दौर (1957), साधना (1958), धूल का फूल (1959), कानून (1961), धर्मपुत्र (1962), गर्ल्स हॉस्टल (1962), गुमराह (1963), वक्त (1965), हमराज़ (1967), इत्तिफाक (1969), हम एक हैं (1970), आदमी और इंसान (1970), जवाब (1970), छाटी सी बात (1976), इंसाफ का तराजू (1980)।

बी.आर. चोपड़ा (B.R. Chopra) जाने माने निर्माता निर्देशक रहे हैं। उनकी बनाई टी.व्ही. सीरयल महाभारत की आज भी प्रशंसा होती है।

एस. मुखर्जी के ‘फिल्मालय प्रोडक्शन्स’ के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं दिल दे के देखो (1959), हम हिंदुस्तानी (1960), लव्ह इन शिमला (1960), प्यार का सागर (1961), एक मुसाफिर एक हसीना (1962), आओ प्यार करें (1964), तू ही मेरी जिंदगी (1965)।

सुबोध मुखर्जी के ‘सुबोध मुखर्जी प्रोडक्शन्स’ के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं जंगली (1961), एप्रिल फूल (1964), शागिर्द (1967), अभिनेत्री (1970), शर्मीली (1971), मि. रोम्यो (1974)।

ताराचंद बड़जात्या के ‘राजश्री प्रोडक्शन्स’ के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं आरती (1962), दोस्ती (1964), महापुरुष (1965), तकदीर (1967), जीवन मृत्यु (1970), उपहार (1971), मेरे भैया (1972), पिया का घर (1972), सौदागर (1973), हनीमून (1973), तूफान (1975), गीत गाता चल (1975), तपस्या (1976), चितचोर (1976), पहेली (1977), दुल्हन वही जो पिया मन भाये (1977), अलीबाबा मरजीना (1977), एजेंट विनोद (1977), अँखियों के झरोखे से (1978), सुनयना (1979), शिक्षा (1979), सावन को आने दो (1979), साँच को आँच नहीं (1979), नैया (1979), गोपाल कृष्ण (1979), राधा और सीता (1979), तराना (1979), मनोकामना (1980), मान अभिमान (1980), एक बार कहो (1980), हमकदम (1980)।

रामानंद सागर के ‘सागर आर्ट’ के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं जिंदगी (1964), आरजू (1965), आँखें (1968), गीत (1970), ललकार (1972), चरस (1976)।

रामानंद सागर के बनाये टी.व्ही. सीरियल रामायण के प्रसारण के समय ट्रेनों को भी स्टेशन में रोक दिया जाता था जिससे कि यात्री उसे देख सकें। प्रसारण समाप्त हो जाने के बाद ही ट्रेनें आगे बढ़ती थी।

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