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काव्य (Hindi Poetry) का दूसरा अंग है – छन्द (Chhand)

यहाँ पर हम जानकारी दे रहे हैं छन्द (Chhand) के विषय में।

वर्ण, मात्रा, गति, यति, लय और चरणान्त सम्बन्धी नियमों से युक्त रचना को छन्द (Chhand) कहते हैं।

वर्ण – वर्ण (अक्षर) दो प्रकार के होते हैं – दीर्घ अथवा गुरु और ह्रस्व अथवा लघु। गुरु को “ऽ” तथा लघु को “।” चिह्नों से प्रदर्शित किया जाता है।

मात्रा – अ, इ, उ, ऋ की मात्रा को एक और आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं तथा अः की मात्रा को दो मात्रा मानी जाती है। जैसे “राम” में प्रथम वर्ण “रा” गुरु अर्थात दो मात्रा वाली है और द्वितीय वर्ण “म” लघु अर्थात एक मात्रा वाली है अतः “राम” शब्द में कुल तीन मात्राएँ हुईं। संयुक्ताक्षर में प्रथम वर्ण की दो मात्राएँ मानी जाती हैं जैसे “मुक्त” में प्रथम अक्षर के लघु होते हुए भी उसे गुरु माना जावेगा।

लय – चरणों का के अन्तिम व्यञ्जन और मात्रा की समानता को लय या तुक कहा जाता है जैसे – “मांगी नाव न केवट आना। कहहिं तुम्हार मरमु मैं जाना॥” में “आना” और “जाना”।

गति – छन्दों की मात्राओं अथवा वर्णों में जो प्रवाह होता है उसे गति कहते हैं।

यति – छंदों को गाते समय बीच में जो हल्का सा रुकाव होता है उसे यति कहा जाता है।

गण – तीन मात्राओं के समूह को गण कहा जाता है। गण आठ प्रकार के होते हैं –

गण का नाम लक्षण चिह्न उदाहरण
यगण प्रथम वर्ण लघु, शेष गुरु ।ऽऽ दिखावा
मगण तीनों वर्ण गरु ऽऽऽ पाषाणी
तगण प्रथम दो गुरु अंतिम लघु ऽऽ। तालाब
रगण प्रथम और अन्तिम गुरु बीच का लघु ऽ।ऽ साधना
जगण प्रथम और अन्तिम लघु बीच का गुरु ।ऽ। पहाड़
भगण प्रथम गुरु शेष लघु ऽ।। भारत
नगण तीनों वर्ण लघु ।।। सरल
सगण प्रथम दो लघु अन्तिम गुरु ।।ऽ महिमा

गणो के नामों और लक्षणों को याद रखने के लिए सूत्र है – यमाताराजभानसलगा

छन्दों के भेद (Hindi Poetry – Kinds of Chhand)

मात्रा और वर्ण के आधार पर छन्द दो प्रकार के होते हैं – मात्रिक छंद और वर्णिक छन्द

मात्रिक छंद – मात्राओं की संख्या को ध्यान में रखकर रचे गये छंद मात्रिक छन्द कहलाते हैं।

वर्णिक छंद – वर्णों की संख्या को ध्यान में रखकर रचे गये छंद वर्णिक छन्द कहलाते हैं।

उपरोक्त दोनों ही प्रकार के छंद तीन प्रकार के होते हैं – सम, अर्द्ध सम और विषम

सम – जिन छन्दों के चारों चरणों की मात्राएँ या वर्ण एक से होते हैं वे सम कहलाते हैं जैसे चौपाई, इन्द्रबज्रा आदि।

अर्द्ध सम – जिन छन्दों में पहले और तीसरे तथा दूसरे और चौथे चरणों में मात्राएँ या वर्ण समान होते हैं वे अर्द्ध सम कहलाते हैं जैसे दोहा, सोरठा आदि।

विषम – जिन छन्दों में चार से अधिक चरण हों और वे एक समान न हों वे विषम छन्द कहलाते हैं जैसे कुण्डलिया, छप्पय आदि।

चौपाई  (Hindi Poetry – Choupai)

चौपाई एक मात्रिक छन्द है। यह एक सम छन्द है तथा इसके प्रत्येक चरण में सोलह मात्राएँ होती हैं।

उदाहरण –

सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥
गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥

दोहा (Hindi Poetry – Doha)

दोहा (Doha) एक मात्रिक छन्द है। यह एक अर्द्ध सम छन्द है तथा इसके पहले तथा तीसरे चरणों में तेरह-तेरह मात्राएँ एवं दूसरे तथा चौथे चरणों में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती हैं। पहले तथा तीसरे चरणों के अन्त में यति एवं दूसरे तथा चौथे चरणों के अन्त में गुरु लघु होना अनिवार्य होता है।

उदाहरण –

रहिमन निज मन की व्यथा, मन में राखो गोय।
सुन इठलैहैं लोग सब, बाँट न लैहैं कोय॥

सोरठा (Hindi Poetry – Sortha)

सोरठा (Sortha) एक मात्रिक छन्द है। यह एक अर्द्ध सम छन्द है। यह दोहे से ठीक उल्टा होता है क्योंकि इसके पहले तथा तीसरे चरणों में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ एवं दूसरे तथा चौथे चरणों में तेरह-तेरह मात्राएँ होती हैं। पहले तथा तीसरे चरणों के अन्त में तुकान्त तथा गुरु लघु होना अनिवार्य होता है।

उदाहरण –

सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेटे अटपटे।
विहँसे करुनाऐन, चितै जानकी लखन तन॥

रोला (Hindi Poetry – Rola)

रोला (Rola) चौबीस मात्राओं वाला छन्द है। ग्यारह और तेरह मात्राओं पर यति होती है।

उदाहरण –

शशि बिन सूनी रैन, ज्ञान बिन हिरदय सूनो।
घर सूनो बिन पुत्र, पत्र बिन तरुवर सूनो।
गज सूनो इक दन्त, और वन पुहुप विहूनो।
द्विज सूनो बिन वेद, ललित बिन सायर सूनो॥

कुण्डलिया (Hindi Poetry – Kundalia)

कुण्डलिया (Kundalia) छः चरणों का छन्द होता है जो एक दोहा और दो रोला को मिलाकर बनता है। दोहे का चौथा चरण पहले रोले का पहला चरण होता है। जिस शब्द से कुण्डलिया (Kundalia) शुरू होता है, उसी शब्द से ही समाप्त भी होता है।

उदाहरण –

गुनके गाहक सहस नर बिन गुन लहै न कोय।
जैसे कागा-कोकिला शब्द सुनै सब कोय।
शब्द सुनै सब कोय कोकिला सबै सुहावन।
दोऊ को इक रंग काग सब गनै अपावन॥
कह गिरधर कविराय सुनो हो ठाकुर मन के।
बिन गुन लहै न कोय सहस नर गाहक गुनके॥

हरिगीतिका (Hindi Poetry – Harigeetika)

हरिगीतिका (Harigeetika) अट्ठाइस मात्राओं का छन्द होता है। सोलह और बारह मात्राओं पर यति होती है तथा अन्त में लघु गुरु होता है।

उदाहरण –

इस भाँति जब शोकार्त जननी को विलोका राम ने।
कहते हुए यों वर वचन दी सान्त्वना भगवान ने।
जो सुवन निज माता पिता की उचित सेवा कर सका।
निज त्याग श्रद्धा भाव से मानस न जिसका भर सका॥

बरवै (Hindi Poetry – Barwai)

बरवै (Barwai) के प्रथम और तृतीय चरण में बारह-बारह मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में सात-सात मात्राएँ होती हैं।

उदाहरण –

चम्पक हरवा अंग मिलि, अधिक सुहाय।
जानि परै सिय हियरे, जब कुम्हलाय॥

गीतिका (Hindi Poetry – Geetika)

गीतिका (Geetika) छब्बीस मात्राओं का मात्रिक छन्द होता है। चौदह और बारह मात्राओं पर यति तथा अन्त में लघु गुरु होता है।

उदाहरण –

धर्म के मग में अधर्मी से कभी डरना नहीं।
चेतकर चलना कुमारग में कदम धरना नहीं।
शुद्ध भावों में भयानक भावना भरना नहीं।
ज्ञानवर्धक लेख लिखने में कमी करना नहीं॥

तोमर (Hindi Poetry – Tomr)

तोमर (Tomr) छन्द प्रत्येक चरण में बारह मात्राएँ होती हैं तथा अन्त में गुरु लघु होता है।

उदाहरण –

तब चले बान कराल। फुँकरत जनु बहु ब्याल॥
कोपेउ समर श्रीराम। चले विशिख निसित निकाम॥

रूपमाला (Rupmala)

रूपमाला (Rupmala) चौबीस मात्राओं का छन्द होता है, चौदह और दस पर यति होती है तथा अन्त में गुरु लघु होता है।

उदाहरण –

भूल जाते हैं जिसे हम, स्वप्न सा हर बार।
है वही बनता हमारे, स्वर्ग का आधार॥
यदि न होता कामना का, कोष अपने पास।
शून्य ही होता हृदय यों, है यथा आकाश॥

उल्लाला (Hindi Poetry – Ullala)

उल्लाला (Ullala) अट्ठाइस मात्राओं का छन्द होता है, पन्द्रह और तेरह पर यति होती है।

उदाहरण –

हे शरण दायिनी देवि तू, करती सबका त्राण है।
हे मातृभूमि सन्तान हम, तू जननी तू प्राण है॥

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