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काव्य (Hindi Poetry) के तीन अंग होते हैं – रस (Ras), छंद (Chhand) और अलंकार (Alankar)

यहाँ पर हम जानकारी दे रहे हैं रस (Ras) के विषय में।

रस हिन्दी का एक शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘आनन्द’। वैसे तो बहुत से ऐसे कार्य हैं जिनसे हमें आनन्द का अनुभव होता है, किन्तु काव्य (कविता) के पठन, श्रवण या अभिनय के दर्शन से जिस आनन्द की प्राप्ति होती है वह अत्यन्त अद्भुत तथा अलौकिक होता है। काव्य पठन अथवा श्रवण या अभिनय के दर्शन जिस अलौकिक आनन्द की प्राप्ति होती है उसे ही रस कहा जाता है।

रस को काव्य की आत्मा माना गया है।

रस के प्रकार तथा स्थाई भाव

श्रृंगार रस – रति/प्रेम
हास्य रस – हास
करुण रस – शोक
वीर रस – उत्साह
रौद्र रस – क्रोध
भयानक रस – भय
वीभत्स रस – घृणा
अद्भुत रस – आश्चर्य
शांत रस – वैराग्य
वात्सल्य रस – वात्सल्य
भक्ति रस – अनुराग

श्रृंगार रस (Hindi Poetry – Shringar Ras)

प्रेम की दो अवस्थाएँ मानी गई हैं – पहला संयोग और दूसरा वियोग। अतः श्रृंगार रस (Shringar Ras) के भी दो प्रकार हैं – पहला संयोग श्रृंगार और दूसरा वियोग श्रृंगार।

संयोग श्रृंगार

नायक और नायिका का एक दूसरे से मिलन संयोग श्रृंगार को जन्म देता है। संयोग श्रृंगार में नायक तथा नायिका के प्रेमपूर्ण विविध क्रियाकलापों, जैसे कि मिलन, दर्शन, वार्तालाप आदि, का वर्णन होता है।

स्थायीभाव – रति

आलम्बन विभाव- नायक और नायिका – दोनों एक दूसरे के आलम्बन होते हैं।
उद्दीपन विभाव – रूप, सौन्दर्य, श्रृंगार, चेष्टाएँ, चांदनी रात, एकान्त स्थान, रमणीय वातावरण आदि।

अनुभाव – एक दूसरे को देखना, प्रेमालाप, कटाक्ष, आलिंगन, स्वेद, अश्रु, रोमांच, कम्प आदि।

उदाहरण –

बतरस लालच लाल की मुसली धरी लुकाई।
सौंह करै भौहनि हँसै दैन कहइ नट जाइ॥

वियोग श्रृंगार

नायक नायिका का परस्पर वियोग वियोग श्रृंगार को जन्म देता है। इसमें अन्य भाव संयोग श्रृंगार की भाँति ही होते हैं।

उदाहरण –

हे खग मृग हे मधुकर श्रेणी। तुम देखी सीता मृगनैनी॥

हास्य रस (Hindi Poetry – Hasya Ras)

विकृत वेशभूषावाली चेष्टा या विकृत असामान्य कथन से उत्पन्न विनोद से जो आनन्द प्राप्त होता है वह हास्य रस (Hasya Ras) कहलाता है।

स्थायीभाव – हास्य

आलम्बन विभाव – विकृत वेशभूषा, आकार अथवा परिस्थिति।

उद्दीपन विभाव – अनोखी आकृति, आचरण आदि।

संचारी भाव – हर्ष, चपलता, आलस्य, निद्रा आदि

उदाहरण –

ठगधन मगधन लूटधन और रतनधन खान।
जो घर आवे घूस धन सब धन धूरि समान॥

करुण रस (Hindi Poetry – Karun Ras)

बन्धु, स्वजन मित्र आदि का वियोग या विनाश, द्रव्यनाश, अनिष्ट आदि करुण रस (Karun Ras) रस को जन्म देते हैं।

स्थायीभाव – शोक (दुःख)

आलम्बन विभाव – विनष्ट बन्धु, स्वजन मित्र आदि

उद्दीपन विभाव – प्रियजनों का दाहकर्म, उनके कार्यों तथा वस्त्रादि का स्मरण आदि।

संचारी भाव – मोह, निर्वेद, व्याधि, ग्लानि, भ्रम, जड़ता आदि।

उदाहरण –

हा धर्मवीर! आर्य भीम हरे हरे।
हा प्रिय नकुल सहदेव भ्राता उत्तरे हा उत्तरे।
हा देविकृष्णे! हा सुभद्रे! यह अधम अर्जुन चला।
धिक् है क्षमा करना मुझे मुझसे हुआ रिप का भला॥

रौद्र रस (Hindi Poetry – Roudra Ras)

निन्दा, हानि, विरोध आदि के द्वारा प्रतिशोध की भावना उत्पन्न होने से रौद्र रस की उत्पत्ति होती है।

स्थायीभाव – क्रोध

आलम्बन विभाव – शत्रु

उद्दीपन विभाव – शत्रु की अशिष्ट चेष्टाएँ

अनुभाव – नेत्रों का लाल होना, दाँत पीसना, नथुनों का फड़कना, भौहों का टेढ़ा होना, गर्जन-तर्जन, शस्त्रादि उठा लेना

संचारी भाव – आवेश, उग्रता, अमर्ष, चपलता, स्मृति, मोह, मद आदि

उदाहरण –

बोरौ सवै रघुवंश कुठार की धार में बारन बाजि सरत्थहि।
बान की वायु उड़ाइ कै लच्छन लक्ष्य करौ अरि हा समरत्थहिं।
रामहिं बाम समेत पठै बन कोप के भार में भूजौ भरत्थहिं।
जो धनु हाथ धरै रघुनाथ तो आजु अनाथ करौ दसरत्थहि॥

वीर रस (Hindi Poetry – Veer Ras)

अत्यन्त कठिन कार्य करने के उत्साह से रस की उत्पत्ति होती है। वीर रस के चार प्रकार हैं – युद्धवीर, दानवीर, दयावीर और धर्रमवीर।

युद्धवीर

स्थायीभाव – उत्साह

आलम्बन विभाव – अत्याचार, शत्रु

अनुभाव – शत्रु के कार्य

संचारी भाव – आवेग, गर्व, असूया, हर्ष, उत्सुकता, वितर्क, धैर्य आदि।

उदाहरण –

मैं सत्य कहता हूँ सखे! सुकुमार मत जानो मुझे।
यमराज से भी युद्ध में प्रस्तुत सदा मानो मुझे।
है और की तो बात क्या, गर्व मैं करता नहीं।
मामा तथा निज तात से भी समर में डरता नहीं॥

दानवीर

स्थायीभाव – उत्साह

आलम्बन विभाव – दीन व्यक्ति, भिक्षुक आदि

उद्दीपन विभाव – दानपात्र की प्रशंसा

अनुभाव – याचक का सम्मान

संचारी भाव – आवेग, गर्व, हर्ष आदि

उदाहरण –

भामिनि देहुँ सब लोक तज्यौ हठ मोरे यहै मन भाई।
लोक चतुर्दश की सुख सम्पति लागत विप्र बिना दुःखदाई।
जाइ बसौं उनके गृह में करिहौं द्विज दम्पति की सेवकाई।
तौ मनमाहि रुचै न रुचै सो रुचै हमैं तो वह ठौर सदाई॥

दयावीर

स्थायीभाव – उत्साह

आलम्बन विभाव – दीन, आर्त्त, दुःखी आदि

उद्दीपन विभाव – दीनता, कष्ट आदि

अनुभाव – सान्त्वना, मधुर वचन आदि

संचारी भाव – पुलक, उत्कण्ठा, चपलता आदि

उदाहरण –

लेकिन अब मेरी धरती पर जुल्म न होंगे,
और किसी अबला पर अत्याचार न होगा।
अब नीलाम न होगी निर्धनता हाटों में,
कोई आँख दीनता से बीमार न होगी॥

धर्मवीर

स्थायीभाव – उत्साह

आलम्बन विभाव – धर्मनिष्ठा

उद्दीपन विभाव – धर्म के प्रति श्रद्धा, धर्मग्रंथ का पठन, उपदेशादि

अनुभाव – धर्मानुकूल आचरण, धर्मरक्षा आदि

संचारी भाव – क्षमा, हर्ष आदि

उदाहरण –

फिरे द्रौपदी बिना वसह, परवाह नहीं है।
धन-वैभव-सुत राजपाट की चाह नहीं है।
पहले पाण्डव और युधिष्ठिर मिट जायेंगे।
तदन्तर ही दीप धर्म के बुझ पायेंगे।

भयानक रस (Hindi Poetry – Bhayanak Ras)

भयंकर जीव-जन्तुओं के दर्शन, वर्णन से भयानक रस की उत्पत्ति होती है।

स्थायीभाव – भय

आलम्बन विभाव – निर्जन स्थान, हिंसक जन्तु, अंधकार, वन, चोर-डाकू आदि

उद्दीपन विभाव – हिंसक जीवों की ध्वनि और चेष्टाएँ, भयंकर दृश्य, निर्जन स्थान आदि

अनुभाव – रोना, चिल्लाना, मूर्च्छा, कम्प, स्वेद, रोमांच, पलायन आदि

संचारी भाव – भ्रम, ग्लानि, शंका, त्रास, दैन्य, मरण आदि

उदाहरण –

एक ओर अजगरहिं लखि, एक ओर मृगराइ।
बिकल बटोही बीच ही, पर्यौ मूर्च्छा खाइ॥

वीभत्स रस (Hindi Poetry – Veebhats Ras)

घृणित वस्तुओं के द्वारा ग्लानि से वीभत्स रस (Veebhats Ras) की उत्पत्ति होती है।

स्थायीभाव – घृणा (जुजुप्सा)

आलम्बन विभाव – रक्त, मांस, पीब, फूहड़पन आदि घृणित वस्तुएँ

उद्दीपन विभाव – घृणित वस्तु, दुर्गन्ध आदि

अनुभाव – थूकना, मुँह बिगाड़ना, रोमांच आदि

संचारी भाव – मूर्च्छा, आवेग, असूया, मोह, व्याधि मरण आदि

उदाहरण –

सिर पर बैठ्यो काग, आँख दोउ खात निकारत।
खींचत जीभहिं स्यार, अतिहि आनन्द उर धारत।
गिद्ध जाँघ कहँ खोदि-खोदि कै मांस उचारत।
श्वान अंगुरिन काटि-काटि कै खात निकारत।
बहु चील नोचि लै जात तुच, मोद मढ़यो सबको हियो।
मनु ब्रह्भोज जिजमान कोउ, आज भिखारिन कहँ दियो॥

अद्भुत रस (Hindi Poetry – Adbhut Ras)

आश्चर्यजनक वस्तुओं को देखकर या उनका वर्णन पढ़-सुन कर विस्मय के भाव उत्पन्न होने से अद्भुत रस (Adbhut Ras) की उत्पत्ति होती है।

स्थायीभाव – विस्मय (आश्चर्य)

आलम्बन विभाव – रक्त, मांस, पीब, फूहड़पन आदि घृणित वस्तुएँ

उद्दीपन विभाव – अलौकिक या लोकोत्तर वर्णन सुनना या देखना आदि

अनुभाव – स्वर भंग, स्वेद, रोमांच, उत्फुल्लता, आश्चर्यचकित होन आदि

संचारी भाव – हर्ष, आवेग, जड़ता, भ्रान्ति, चिन्ता, तर्क आदि

उदाहरण –

लीन्हों उखारि पहार विशाल, चल्यौ तेहि काल विलम्ब न लायौ।
मारुत-नन्दन मारुत को, मन को खगराज को वेग लजायौ।
तीखो तुरा तुलसी कहतो पै हिए उपमा को समाऊ न आयौ।
मानो प्रतक्ष परव्वत को नभ लीक लसी कपि यों धुकि धायौ॥

शान्त रस (Hindi Poetry – Shant Ras)

संसार की असारता के कारण उत्पन्न हुए वैराग्य से शान्त रस (Shant Ras) की उत्पत्ति होती है।

स्थायीभाव – निर्वेद (वैराग्य)

आलम्बन विभाव – ईश्वर चिन्तन, विश्व कल्याण आदि

उद्दीपन विभाव – सत्संग, शास्त्र श्रवण, तीर्थाटन आदि

अनुभाव – पश्चाताप, सांसारिक दुःखों से कातर होन, पुलक आदि

संचारी भाव – ग्लानि, उद्वेग, जड़ता, दैन्य, वैराग्य आदि

उदाहरण –

अब लौं नसानी, अब न नसैहौं।
रामकृपा भवनिसा सिरानी जागे पुनि न डसैहौं॥
पायो नाम चारु चिन्तामनि उर कर तें न खसैहौं।
स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी चित कंचनहिं कसैहौं॥

वात्सल्य रस (Hindi Poetry – Vatsalya Ras)

बड़ों का छोटों के प्रति स्नेह से वात्सल्य रस (Vatsalya Ras) की उत्पत्ति होती है।

स्थायीभाव – वात्सल्य (स्नेह)

आलम्बन विभाव – पुत्र-पुत्री, शिशु, कनिष्ठ जन आदि

उद्दीपन विभाव – शिशु की तोतली बोली, रूप, क्रीड़ाएँ आदि

अनुभाव – प्यार-दुलार, चुम्बन, छाती से लगाना आदि

संचारी भाव – गर्व, हर्ष, शंका, आवेग आदि

उदाहरण –

मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी।
किती बार मोहि दूध पियत भै, यह अजहूँ है छोटी।
तू जो कहति बल की बेनी ह्वै हैं लाँबी-मोटी।
काढ़त गुहत न्हवावत ओछत नागिन सी भ्वैं लोटी।
पचि पचि दूध पियावत मोको देत न माखन रोटी।
‘सूर’ श्याम चिरजीवौ दोउ हरि हलधर की जोटी॥

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