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गोस्वामी तुलसीदास - प्रचलित कथायें एवं विशिष्टाएँ

जै श्री राम - हिंदी वेबसाइट (Hindi Website)

ऐसा माना जाता है कि तुलसीदास जी वाल्मीकि के अवतार हैं। हिंदू मान्याताओं के अनुसार आत्मा अमर है। वाल्मीकि ने "रामायण" की रचना की थी और उसका पाठ करके लंबे अंतराल तक हिंदू एक सूत्र में बंधते रहे। मैं समझता हूँ कि कालान्तर में संस्कृत भाषा का ह्रास हो जाने के कारण "रामायण" का प्रभाव क्षीण होने लगा होगा तब वाल्मीकि को "रामायण" के लिये तुलसीदास के रूप में अवतार लेना पड़ा होगा।

ऐसा माना जाता है कि तुलसीदास जी वाल्मीकि के अवतार हैं। हिंदू मान्याताओं के अनुसार आत्मा अमर है। वाल्मीकि ने "रामायण" की रचना की थी और उसका पाठ करके लंबे अंतराल तक हिंदू एक सूत्र में बंधते रहे। मैं समझता हूँ कि कालान्तर में संस्कृत भाषा का ह्रास हो जाने के कारण "रामायण" का प्रभाव क्षीण होने लगा होगा तब वाल्मीकि को "रामायण" के लिये तुलसीदास के रूप में अवतार लेना पड़ा होगा।

पत्नी की फटकार ने रामबोला (तुलसीदास) के ज्ञान चक्षु खोल दिये थे और वे प्रयाग जा पहुँचे थे। ज्ञान प्राप्ति के लिये वे सतत् प्रयास करते रहे। चौदह वर्षों तक निरंतर तीर्थाटन किया। चारों धामों (बदरीनाथ, रामेश्वर, जगन्नाथ पुरी और द्वारिका) की पैदल यात्रा की। और अंततः ज्ञान प्राप्ति के अपने लक्ष्य को पा कर ही रहे।

ज्ञान प्राप्ति के पश्चात उन्होंने अनेक काव्यों की रचना की जिनमें से रामचरितमानस, कवितावली, दोहावली, गीतावली, विनय पत्रिका, कवित्त रामायाण, बरवै रामायाण, रामलला नहछू, रामाज्ञा, कृष्ण गीतावली, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, रामसतसई, रामनाम मणि, रामशलाका, हनुमान चालीसा, हनुमान बाहुक, संकट मोचन, वैराग्य संदीपनी, कोष मञ्जूषा आदि अत्यंत प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय हैं।

तुलसीदास - हिंदी वेबसाइट (Hindi Website)

तुलसीदास जी को हनुमान जी के दर्शन प्राप्त थे। हनुमान जी से ही प्रेरणा प्राप्त करके तुलसीदास जी ने "रामचरितमानस" की। तुलसीदास जी को हनुमान जी के दर्शन कैसे मिले यह भी एक रोचक कथा है। कहा जाता है कि प्रतिदिन प्रातःकाल जब शौच के लिये गंगापार जाते थे तो वापसी के समय लोटे में बचे हुये पानी को एक पेड़ के जड़ में डाल दिया करते थे। उस पेड़ में एक प्रेत का निवास था। रोज पानी मिलने की वजह से उसे संतुष्टि मिली वह तुलसीदास जी पर प्रसन्न हो गया और उनके सामने प्रकट होकर उसने वर मांगने के लिया कहा। तुलसीदास जी ने भगवान श्रीरामचंद्र के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त की। इस पर प्रेत ने कहा कि मैं भगवान श्रीरामचंद्र के दर्शन तो नहीं करवा सकता पर इतना अवश्य बता सकता हूँ कि फलाने मंदिर में नित्य सायंकाल में भगवान श्रीरामचंद्र की कथा होती है और वहाँ कथा सुनने के लिये हनुमान जी कोढ़ी के वेश में आते हैं। कथा सुनने के लिये सबसे पहले वे ही आते हैं और सबके चले जाने के बाद अंत में ही वे जाते हैं। वे ही आपको भगवान श्रीरामचंद्र के दर्शन करा सकते हैं अतः वहाँ जाकर उन्हीं से प्रार्थना कीजिये। तुलसीदास जी ने वहाँ जाकर अवसर पाते ही हनुमान जी के पैर पकड़ लिये और उन्हें प्रसन्न कर लिया। हनुमान जी ने कहा कि चित्रकूट चले जाओ वहीं तुम्हे भगवान श्रीरामचंद्र के दर्शन होंगे। तुलसीदास जी चित्रकूट पहुँच गये। वहाँ के जंगल गुजरते हुये उन्होंने दो राजकुमारों को, जिनमें से एक श्यामवर्ण के थे और दूसरे गौरवर्ण के, एक हिरण का पीछा करते हुये देखा। राजकुमारों के आँखों से ओझल हो जाने पर हनुमान जी ने प्रकट होकर बताया कि वे दोनों राजकुमार ही राम और लक्ष्मण थे। तुलसीदास जी को बहुत पछतावा हुआ कि वे उन्हें पहचान नहीं पाये। हनुमान जी ने कहा कि पछतावो मत एल बार फिर तुम्हे भगवान श्रीरामचंद्र के दर्शन होंगे तब मैं इशारे से तुम्हे बता दूंगा। संवत् 1607 के मौनी अमावश्या के दिन तुलसीदास जी चित्रकूट के घाट पर चंदन घिस रहे थे। तभी बालक के रूप में भगवान श्रीरामचंद्र वहाँ पर आये और तुलसीदास जी से मांगकर उन्हीं को चंदन लगाने लगे इसी समय हनुमान जी एक ब्राह्मण के रूप में आकर इस प्रकार गाने लगेः

चित्रकूट के घाट पर, भइ संतन की भीर।
तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर॥


इस पर तुलसीदास जी ने श्री रामचंद्र जी को पहचान लिया और उनके चरण पकड़ लिये।

नित्य भगवान श्रीरामचंद्र की भक्ति में लीन रहने से सहज ही उनकी अलौकिक शक्तियाँ जागृत हो गई थीं और उनके मुख से निकले शब्द सच सिद्ध हो जाते थे। एक महिला जो कि तुरंत ही विधवा हुई थी ने तुलसीदास जी को प्रणाम किया। अनजाने में ही उनके मुख से आशीर्वाद के रूप में 'सौभाग्यवती भव' शब्द निकल गये तो महिला का पति जीवित हो उठा। यह बात बादशाह तक पहुँच गई। बादशाह ने तुलसीदास को बुलवाकर करामात दिखाने के लिये कहा। तुलसीदास जी ने जवाब दिया कि मैं "रामनाम" के सिवाय और कोई करामात नहीँ जानता। इस पर बादशाह ने उन्हें कैद कर लेने का हुक्म दे दिया। कैद में तुलसीदास जी ने हनुमान जी की स्तुति करना आरंभ कर दिया। चमत्कारिक रूप से अनगिनत बंदर आ गये और किले में उत्पात मचाने लगे। बादशाह ने तुलसीदास जी से क्षमायाचना करके उन्हें कैद से आजाद कर दिया तो सारे बंदर वापस चले गये।

निःसंदेह तुलसीदास जी अलौकिक व्यक्तित्व के स्वामी थे। "रामचरिमानस" की रचना करके समस्त हिंदुओं पर एक बहुत बड़ा उपकार किया है। "रामचरितमानस" ग्रंथ संसार के लिये एक अमूल्य उपहार है। अंत में एक बात और। तुलसीदास जी का जन्म श्रावण शुक्ल सप्तमी को हुआ था और 126 वर्ष पश्चात पवित्र गंगा नदी के असी घाट पर श्रावण शुक्ल सप्तमी को ही उनकी मृत्यु हुई। इस पर किसी कवि ने कहा हैः

संवत् सोलह सौ असी, असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर।।


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