हिंदी वेबसाइट

हिंदीभाषियों
के लिये
एक समर्पित वेबसाइट

novii codec download

Shop with Amezon.com

click here novii codec download

NARAD:Hindi Blog Aggregator

Google

हिंदी वेबसाइट में आपका स्वागत है!

महर्षि वाल्मीकि

आदिकवि वाल्मीकि - हिंदी वेबसाइट (Hindi Website)

महर्षि बनने के पहले वाल्मीकि रत्नाकर के नाम से जाने जाते थे। वे एक दस्यु थे। दस्युकर्म के मध्य एक बार उन्होंने देखा कि एक बहेलिये ने कामरत क्रौंच (सारस) पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया और मादा पक्षी विलाप करने लगी। उसके इस विलाप को सुन कर रत्नाकर की करुणा जाग उठी और द्रवित अवस्था में उनके मुख से स्वतः ही यह श्लोक फूट पड़ाः

मां निषाद प्रतिष्ठां त्वं गमः शाश्वती शमा,
यत्क्रौंच मिथुनादेकं वधीः काममोहितम्।।

(अरे बहेलिये, तू ने काममोहित मैथुनरत क्रौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी।)

इस घटना के पश्चात दस्युकर्म से उन्हें विरक्ति हो गई ज्ञान की प्राप्ति में अनुरक्त हो गये। ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने प्रसिद्ध महाकाव्य "रामायण" (जिसे कि "वाल्मीकि रामायण" के नाम से भी जाना जाता है) की रचना की और "आदिकवि वाल्मीकि" के नाम से अमर हो गये।

अपने महाकाव्य "रामायण" में अनेक घटनाओं के घटने के समय सूर्य, चंद्र तथा अन्य नक्षत्र की स्थितियों का वर्णन किया है। इससे ज्ञात होता है कि वे ज्योतिष विद्या एवं खगोल विद्या के भी प्रकाण्ड पण्डित थे।

अपने वनवास काल के मध्य "राम" वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में भी गये थेः

देखत बन सर सैल सुहाए|
बालमीक आश्रम प्रभु आए||


तथा जब "राम" ने अपनी पत्नी सीता का परित्याग कर दिया तब वाल्मीकि ने ही सीता को प्रश्रय दिया था।

उपरोक्त उद्धरणों से सिद्ध है कि वाल्मीकि "राम" के समकालीन थे तथा उनके जीवन में घटित प्रत्येक घटनाओं का पूर्णरूपेण ज्ञान वाल्मीकि ऋषि को था। उन्हें "राम" का चरित्र को इतना महान समझा कि उनके चरित्र को आधार मान कर अपने महाकाव्य "रामायण" की रचना की।

click here

click here

click here

click here

click here

click here

click here

click here

click here

click here

click here

click here

click here

click here

Digital Hindi Books
My Hubpage
My Lense
Forex Auto Pilot Video