Facebooktwittergoogle_plusredditpinterestlinkedinmail

हिन्दी में सामान्य ज्ञान (General Knowledge in Hindi) के अन्तर्गत् प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध संस्कृत नाटकों (Sanskrit Dramas) के विषय में जानकारी।

संस्कृत साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता है उसकी विलक्षण काव्य रचनाएँ। नाटकों की रचना दृष्य काव्य के अन्तर्गत् आती हैं। संस्कृत साहित्य नाटकों की अलग-अलग शैलियों का अनूठा मिश्रण तथा संयोजन है जिसने हमें एक अद्वितीय साहित्यिक खजाना उपलब्ध कराया है। कालिदास, भास, शूद्रक, विशाखदत्त, हर्ष, भारवि, भवभूति, बाणभट्ट, अश्वघोष आदि संस्कृत के सुप्रसिद्ध नाटककार हैं।

यहाँ पर हम बता रहे हैं आपको सुप्रसिद्ध संस्कृत नाटकों (Sanskrit Dramas) के बारे में।

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

अभिज्ञानशाकुन्तलम् कालिदास रचित संस्कृत का महानतम नाटक है। अभिज्ञानशाकुन्तलम् को विश्व साहित्य के उत्कृष्टतम रचनाओं में से एक कहा जा सकता है।

हस्तिनापुर के राजा दुष्यन्त और कण्व ऋषि पालित विश्वामित्र और मेनका की पुत्री शकुन्तला के प्रेम, वियोग और पुनर्मिलन इस नाटक की कथावस्तु है।

आखेट के लिए वन में गये दुष्यन्त की भेंट कण्व ऋषि के आश्रम शकुन्तला से होती है और दोनों एक-दूसरे के प्रेम-पाश में बँधकर गन्धर्व विवाह कर लेते हैं। कुछ दिनों के बाद दुष्यन्त शकुन्तला को यादगार के तौर पर अपनी अँगूठी देकर हस्तिनापुर लौट जाते हैं।

कण्व ऋृषि के आश्रम में दुर्वासा ऋषि प्रवेश करते हैं किन्तु दुष्यन्त के ध्यान में लीन होने के कारण शकुन्तला को उनके आगमन का आभास नहीं होता। ऋषि दुर्वासा क्रोधित होकर शाप दे देते हैं कि जिसके ध्यान में लीन होकर तुमने मेरा अपमान किया है वह तुम्हें भूल जायेगा। शकुन्तला की सखी के प्रार्थना करने पर दुर्वासा कहते कि अँगूठी दिखाने पर शाप का प्रभाव नहीं रहेगा।

सोमतीर्थ की यात्रा से लौटने पर उन्हें शकुन्तला एवं दुष्यन्त के गांधर्व-विवाह तथा शकुन्तला के गर्भवती होने का समाचार मिलता है। विवाहित कन्या को अपने पास न रखने के उद्देश्य से ऋषि दो शिष्यों एव गौतमी के साथ शकुन्तला को राजा के पास भिजवा देते हैं।

मार्ग में नदी पार करते समय शकुन्तला की अँगूठी नदी में गिर जाती है। शकुन्तला के राजा दुष्यन्त के पास पहुँचने पर दुर्वासा के शापवश दुष्यन्त उसे नहीं पहचानते।

दुखी शकुन्तला को उसकी माता मेनका उठा ले जाती है।

शकुन्तला की गिरी हुई अँगूठी एक धीवर को एक मछली के पेट में मिलती है और वह उस अँगूठी को राजा के पास ले जाता है। उस अँगूठी को देखते ही राजा को शकुन्तला के विवाह की सारी बातें स्मरण हो आती हैं। दुष्यन्त शकुन्तला की खोज करवाता है किन्तु वह कहीं नहीं मिलती।

कुछ समय पश्चात् स्वर्ग में देवासुर संग्राम आरम्भ हो जाता है जिसमें देवराज इन्द्र की सहायता करने के लिए राजा दुष्यन्त भी पहुँच जाते हैं।

देवता दैत्यों को पराजित कर देते हैं। युद्ध समाप्त हो जाने पर दुष्यन्त वापस हस्तिनापुर प्रस्थान करते हैं। मार्ग में मारीच ऋषि के आश्रम में दुष्यन्त का शकुन्तला और उनके पुत्र भरत से मिलन होता है। मारीच ऋषि आशीर्वाद सहित शकुन्तला को दुष्यन्त के सुपुर्द कर देते हैं।

Facebooktwittergoogle_plusredditpinterestlinkedinmail