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गोदान (Godan) मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) रचित कालजयी उपन्यास (Hindi Novel) है।

गोदान – 91 (Godan – Hindi Novel by Premchand)

Godan by Premchand

संध्या समय जब होरी ने सिलिया को डरते-डरते रुपए दिए, तो वह जैसे अपनी तपस्या का वरदान पा गई। दु:ख का भार तो वह अकेली उठा सकती थी। सुख का भार तो अकेले नहीं उठता। किसे यह खुशखबरी सुनाए? धनिया से वह अपने दिल की बातें नहीं कह सकती। गाँव में और कोई प्राणी नहीं, जिससे उसकी घनिष्ठता हो। उसके पेट में चूहे दौड़ रहे थे। सोना ही उसकी सहेली थी। सिलिया उससे मिलने के लिए आतुर हो गई। रात-भर कैसे सब्र करे? मन में एक आँधी-सी उठ रही थी। अब वह अनाथ नहीं है। मातादीन ने उसकी बाँह फिर पकड़ ली। जीवन-पथ में उसके सामने अब अंधेरी, विकराल मुख वाली खाई नहीं है, लहलहाता हुआ हरा-भरा मैदान है, जिसमें झरने गा रहे हैं और हिरन कुलेलें कर रहे हैं। उसका रूठा हुआ स्नेह आज उन्मत्त हो गया है। मातादीन को उसने मन में कितना पानी पी-पी कर कोसा था। अब वह उनसे क्षमादान माँगेगी। उससे सचमुच बड़ी भूल हुई कि उसने उनको सारे गाँव के सामने अपमानित किया। वह तो चमारिन है जाति की हेठी, उसका क्या बिगड़ा। आज दस-बीस लगा कर बिरादरी को रोटी दे दे, फिर बिरादरी में ले ली जायगी। उस बेचारे का तो सदा के लिए धरम नास हो गया। वह मरजाद अब उन्हें फिर नहीं मिल सकता। वह क्रोध में कितनी अंधी हो गई थी कि सबसे उनके प्रेम का ढिंढोरा पीटती फिरी। उनका तो धरम भिरष्ट हो गया था, उन्हें तो क्रोध था ही, उसके सिर पर क्यों भूत सवार हो गया? वह अपने ही घर चली जाती, तो कौन बुराई हो जाती? घर में उसे कोई बाँध तो न लेता। देस मातादीन की पूजा इसीलिए तो करता है कि वह नेम-धरम से रहते हैं। वही धरम नष्ट हो गया, तो वह क्यों न उसके खून के प्यासे हो जाते?

जरा देर पहले तक उसकी नजर में सारा दोष मातादीन का था और अब सारा दोष अपना था। सहृदयता ने सहृदयता पैदा की। उसने बच्चे को छाती से लगा कर खूब प्यार किया। अब उसे देख कर लज्जा और ग्लानि नहीं होती। वह अब केवल उसकी दया का पात्र नहीं। वह अब उसके संपूर्ण मातृस्नेह और गर्व का अधिकारी है।

कातिक की रूपहली चाँदनी प्रकृति पर मधुर संगीत की भाँति छाई थी। सिलिया घर से निकली। वह सोना के पास जा कर यह सुख-संवाद सुनाएगी। अब उससे नहीं रहा जाता। अभी तो साँझ हुई है। डोंगी मिल जायगी। वह कदम बढ़ाती हुई चली। नदी पर आ कर देखा, तो डोंगी उस पार थी। और माँझी का कहीं पता नहीं। चाँद घुल कर जैसे नदी में बहा जा रहा था। वह एक क्षण खड़ी सोचती रही। फिर नदी में घुस पड़ी। नदी में कुछ ऐसा ज्यादा पानी तो क्या होगा! उस उल्लास के सागर के सामने वह नदी क्या चीज थी? पानी पहले तो घुटनों तक था, फिर कमर तक आया और फिर अंत में गर्दन तक पहुँच गया। सिलिया डरी, कहीं डूब न जाए। कहीं कोई गढ़ा न पड़ जाय, पर उसने जान पर खेल कर पाँव आगे बढ़ाया। अब वह मझधार में है। मौत उसके सामने नाच रही है, मगर वह घबड़ाई नहीं है। उसे तैरना आता है। लड़कपन में इसी नदी में वह कितनी बार तैर चुकी है। खड़े-खड़े नदी को पार भी कर चुकी है। फिर भी उसका कलेजा धक-धक कर रहा है, मगर पानी कम होने लगा। अब कोई भय नहीं। उसने जल्दी-जल्दी नदी पार की और किनारे पहुँच कर अपने कपड़े का पानी निचोड़ा और शीत से काँपती आगे बढ़ी। चारों तरफ सन्नाटा था। गीदड़ों की आवाज भी न सुनाई पड़ती थी, और सोना से मिलने की मधुर कल्पना उसे उड़ाए लिए जाती थी।

मगर उस गाँव में पहुँच कर उसे सोना के घर जाते संकोच होने लगा। मथुरा क्या कहेगा? उसके घरवाले क्या कहेंगे? सोना भी बिगड़ेगी कि इतनी रात गए तू क्यों आई। देहातों में दिन-भर के थके-माँदे किसान सरेशाम ही से सो जाते हैं। सारे गाँव में सोता पड़ गया था। मथुरा के घर के द्वार बंद थे। सिलिया किवाड़ न खुलवा सकी। लोग उसे इस भेष में देख कर क्या कहेंगे? वहीं द्वार पर अलाव में अभी आग चमक रही थी। सिलिया अपने कपड़े सेंकने लगी। सहसा किवाड़ खुला और मथुरा ने बाहर निकल कर पुकारा, “अरे! कौन बैठा है अलाव के पास?”

सिलिया ने जल्दी से अंचल सिर पर खींच लिया और समीप आ कर बोली, “मैं हूँ, सिलिया।”

“सिलिया! इतनी रात गए कैसे आई? वहाँ तो सब कुसल है?”

“हाँ, सब कुसल है। जी घबड़ा रहा था। सोचा, चलूँ, सबसे भेंट करती आऊँ। दिन को तो छुट्टी ही नहीं मिलती।”

“तो क्या नदी थहा कर आई है?”

“और कैसे आती! पानी कम था।”

मथुरा उसे अंदर ले गया। बरोठे में अँधेरा था। उसने सिलिया का हाथ पकड़ कर अपने ओर खींचा। सिलिया ने झटके से हाथ छुड़ा लिया। और रोब से बोली, “देखो मथुरा, छेड़ोगे तो मैं सोना से कह दूँगी। तुम मेरे छोटे बहनोई हो, यह समझ लो। मालूम होता है, सोना से मन नहीं पटता।”

मथुरा ने उसकी कमर में हाथ डाल कर कहा, “तुम बहुत निठुर हो सिल्लो? इस बखत कौन देखता है?”

“क्या मैं सोना से सुंदर हूँ? अपने भाग नहीं बखानते कि ऐसी इंदर की परी पा गए। अब भौंरा बनने का मन चला है। उससे कह दूँ तो तुम्हारा मुँह न देखे।”

मथुरा लंपट नहीं था, सोना से उसे प्रेम भी था। इस वक्त अँधेरा और एकांत और सिलिया का यौवन देख कर उसका मन चंचल हो उठा था। यह तंबीह पा कर होश में आ गया। सिलिया को छोड़ता हुए बोला, “तुम्हारे पैरों में पड़ता हूँ सिल्लो, उससे न कहना। अभी जो सजा चाहो, दे लो।”

सिल्लो को उस पर दया आ गई। धीरे से उसके मुँह पर चपत जमा कर बोली, “इसकी सजा यही है कि फिर मुझसे ऐसी सरारत न करना, न और किसी से करना, नहीं सोना तुम्हारे हाथ से निकल जायगी।”

“मैं कसम खाता हूँ सिल्लो, अब कभी ऐसा न होगा।”

उसकी आवाज में याचना थी। सिल्लो का मन आंदोलित होने लगा। उसकी दया सरस होने लगी।

“और जो करो?”

“तो तुम जो चाहना करना।”

सिल्लो का मुँह उसके मुँह के पास आ गया था, और दोनों की साँस और आवाज और देह में कंपन हो रहा था। सहसा सोना ने पुकारा, “किससे बातें करते हो वहाँ?”

सिल्लो पीछे हट गई। मथुरा आगे बढ़ कर आँगन में आ गया और बोला, “सिल्लो तुम्हारे गाँव से आई है।”

सिल्लो भी पीछे-पीछे आ कर आँगन में खड़ी हो गई। उसने देखा, सोना यहाँ कितने आराम से रहती है। ओसारी में खाट है। उस पर सुजनी का नर्म बिस्तर बिछा हुआ है, बिलकुल वैसा ही, जैसा मातादीन की चारपाई पर बिछा रहता था। तकिया भी है, लिहाफ भी है। खाट के नीचे लोटे में पानी रखा हुआ है। आँगन में ज्योत्स्ना ने आइना-सा बिछा रखा है। एक कोने में तुलसी का चबूतरा है, दूसरी ओर जुआर के ठेठों के कई बोझ दीवार से लगा कर रखे हैं। बीच में पुआलों के गट्ठे हैं। समीप ही ओखल है, जिसके पास कुटा हुआ धान पड़ा हुआ है। खपरैल पर लौकी की बेल चढ़ी हुई है और कई लौकियाँ ऊपर चमक रही हैं। दूसरी ओर की ओसारी में एक गाय बँधी हुई है। इस खंड में मथुरा और सोना सोते हैं। और लोग दूसरे खंड में होंगे। सिलिया ने सोचा, सोना का जीवन कितना सुखी है।

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