कृपया ध्यान रखें - सदस्य बनने के बाद आपको प्राप्त होने वाले ई-मेल में हिंदी ई-पुस्तिका "स्पोकन इंग्लिश मार्गदर्शिका" मुफ्त डाउनलोड लिंक भी होगा। आपके इनबाक्स में यदि हमारा ई-मेल न दिखे तो उसे कृपया जंक फोल्डर में खोजें! देव आनंद, जो कि उनके सहकर्मी और अच्छे मित्र थे, ने उनसे वादा किया कि जब कभी भी उन्हें फिल्म बनाने का अवसर मिलेगा तो गुरु दत्त को ही वे उस फिल्म के निर्देशन का कार्यभार अवश्य ही देंगे। कुछ ही समय बाद देव आनंद ने अपना स्वयं का बैनर नवकेतन आरंभ किया और अपने वादे के अनुसार गुरु दत्त को निर्देशक बनने का आमंत्रण दिया। सन् 1951 में फिल्म बाजी के प्रदर्शन के बाद से गुरु दत्त एक ख्यातिनाम निर्देशक के रूप में जाने जाने लगे। फिल्म बाजी के गीत की रिकॉर्डिंग के समय गुरु दत्त की मुलाकात गीता राय से हुई और वे दोनों प्रेमपाश में बंध गये। 26 मई 1953 को गुरु दत्त ने गीता राय से विवाह कर लिया।
देव आनंद की मुख्य भूमिका वाली फिल्म जाल (1952) गुरु दत्त के द्वारा निर्देशित एक और फिल्म रही। परंतु फिल्म जाल को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई। फिल्म जाल के बाद उनके द्वारा निर्देशित फिल्म बाज (1953) भी असफल रही। फिल्म बाज में गुरु दत्त ने स्वयं मुख्य भूमिका निभाई थी। वो तो फिल्म आरपार (1954) थी जिसने गुरु दत्त को स्थापित और मान्यताप्राप्त निर्देशकों की पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया। फिल्म आरपार के बाद उन के कार्य को फिल्म मिस्टर एंड मिसेज 55, (1955) तथा प्यासा (1957) में फिर से एक बार जोरदार सराहना मिली। कागज के फूल (1959) हिंदी सिने जगत की पहली सिनेमा स्कोप फिल्म है जो कि गुरु दत्त के द्वारा निर्देशित आखरी फिल्म भी है। यद्यपि कागज के फूल गुरु दत्त की सबसे अधिक महत्वाकांक्षी फिल्म थी पर उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली और उसके बाद से उन्होंने फिल्मों के निर्देशन का कार्य बंद कर दिया। फिल्म निर्माण और स्वनिर्मित तथा दूसरों के द्वारा निर्मित फिल्मों में अभिनय का काम उन्होंने जारी रखा। उनकी फिल्म साहिब बीबी और गुलाम (1962) को राष्ट्रपति ने रजत पदक प्रदान किया। साहिब बीबी और गुलाम वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फिल्म भी रही।
गुरु दत्त की प्रमुख फिल्में
गुरु दत्त की वे फिल्में जिन्हें वे पूरी न कर पाये
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