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उर्दू शायरी (Shayari) की कोई मिसाल नहीं है। यह ‘गागर में सागर’ है।

तो पेश है क़तील शिफाई की गज़ल (Ghazal) “मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा” (Main to mar kar bhi meri jaan tujhe chahunga)

ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा

तू मिला है तो ये एहसास हुआ है मुझको
ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिए थोड़ी है
इक ज़रा सा गम-ए-दौरां का भी हक है जिस पर
मैंने वो साँस भी तेरे लिए रख छोड़ी है
तुझ पे हो जाऊँगा कुर्बान तुझे चाहूँगा

अपने जज्बात में नग़मात रचाने के लिए
मैं ने धड़कन की तरह दिल में बसाया है तुझे
मैं तसव्वुर भी जुदाई का भला कैसे करूँ
मैंने किस्मत की लकीरों से चुराया है तुझे
प्यार का बन के निगेहबान तुझे चाहूँगा

तेरी हर चाप से जलते हैं ख्यालों में चिराग
जब भी तू आये जगाता हुआ जादू आये
तुझको छू लूँ तो फिर ऐ जान-ए-तमन्ना मुझको
देर तक अपने बदन से तेरी खुशबू आये
तू बहारों का है उन्वान तुझे चाहूँगा

ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं
मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा

क़तील शिफाई (Qatil Shifai)

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