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एफिलियेट प्रोग्राम
इंटरनेट के किसी व्यापारी के उत्पाद या सेवाओं को बढ़ावा देकर आमदनी प्राप्त करने को एफिलियेट (या एसोसियेट) प्रोग्राम कहते हैं। ऐसा भी समझा जा सकता है कि एफिलियेट बन कर आप किसी इंटरनेट व्यापारी के डिस्ट्रीब्यूटर बन गये। किन्तु एफिलियेट और डिस्ट्रीब्यूटर में बहुत फर्क है। डिस्ट्रीब्यूटर को गोदाम बनाने, सुरक्षा निधि जमा करने, मुख्य व्यापारी द्वारा भेजे गये माल के रख-रखाव आदि में बहुत बड़ी पूंजी फँसाना पड़ता है किन्तु इंटरनेट में आपको इस प्रकार का कोई झंझट मोल नहीं लेना पड़ता। इंटरनेट में तो केवल आपको संभावी ग्राहक को व्यापारी के वेबसाइट में भेजना होता है। फिर यदि संभावी ग्राहक सामान खरीद कर वास्तविक ग्राहक बन जाता है तो आपका कमीशन पक्का हो गया।
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एफिलियेट प्रोग्राम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कोई दूसरा व्यक्ति उत्पादन करता है, उसे बेचने के लिये वेबसाइट बनाता है, आपको विज्ञापन सामग्री स्वयं प्रदान करता है, ग्राहक से लेन-देन भी स्वयं करता है और असंतुष्ट ग्राहक को समझाना या उसका पैसा वापस करना आदि भी उसी का सरदर्द होता है। आपका ग्राहक से किसी प्रकार से भी सीधा सम्बंध नहीं होता, यहाँ तक कि ग्राहक आपको जानता तक नहीं। इसके बाद भी आपको आपका कमीशन मिलते रहता है।

एफिलियेट प्रोग्राम का आरम्भ सबसे पहले अमेजान डाट काम (amazon.com) ने
एसोसियेट प्रोग्राम के नाम से सन् 1996 में किया था। उसकी सफलता से प्रभावित होकर बाद में कमीशन जंक्शन (commission junction), क्लिक बैंक (Click Bank), 5 पिलार (5 Pillar), जेन फिट (Gen Fit), मारकेटिंग टिप्स (Marketing Tips), माई मारकेटिंग सेंटर (My Marketing Center) आदि अनेक वेबसाइटों ने भी अपना एफिलियेट कार्यक्रम शुरू कर दिया। आज तो इंटरनेट के प्रायः सभी व्यापारी का अपना एफिलियेट कार्यक्रम हो गया है।
एक बार किसी इंटरनेट व्यापारी के एफिलियेट बन जाने के बाद आपको उसके उत्पाद तथा वेबसाइट का प्रचार-प्रसार ही करना होता है। प्रचार-प्रसार कैसे करना है उसका प्रभावी तरीका भी वे स्वंय आपको सुझाते हैं तथा उसके लिये वे समस्त सामग्री भी वे ही आपको मुफ्त में प्रदान करते हैं।
किन्तु आपको हमेशा ये बात ध्यान में रखना होगा कि केवल एफिलियेट बन जाने से आमदनी होना शुरू नहीं हो जाता, इसके लिये कठिन परिश्रम करना पड़ता है। बिना परिश्रम किये किसी प्रकार की आमदनी हो ही नहीं सकती।
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