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आपके ज्ञानवर्धन हेतु प्रस्तुत है रामचरितमानस (Ramcharitmanas), जिसे कि तुलसी रामायण (Ramayana) के नाम से भी जाना जाता है, की कहानियाँ (Ramcharitmanas Stories or Ramayana Stories)

रामचरितमानस की कहानियाँ – नारद का विष्णु को शाप (Stories from Ramcharitmanas)
मोह के कारण नारद मुनि की बुद्ध भ्रष्ट हो गई थी, इससे वे विष्णु जी द्वारा राजकुमारी को ले जाते देख बहुत ही विकल हो गये। मानो गाँठ से छूटकर मणि गिर गई हो। मुनि की यह हालत देखकर शिव जी के गणों ने मुसकुरा कर कहा – जाकर दर्पण में अपना मुँह तो देखिये। ऐसा कहकर वे दोनों मुनि के शाप के डर से भयभीत होकर भागे। मुनि ने जल में झाँककर अपना मुँह देखा। अपना रूप देखकर उनका क्रोध बहुत बढ़ गया। उन्होंने शिव जी के उन गणों को शाप देते हुए कहा – तुम दोनों कपटी और पापी जाकर राक्षस हो जाओ। तुमने हमारी हँसी की, उसका फल चखो। अब फिर किसी मुनि की हँसी करना।

मुनि ने फिर जल में देखा, तो उन्हें अपना असली रूप प्राप्त हो गया; तब भी उन्हें सन्तोष नहिं हुआ। उनके ओंठ फड़क रहे थे और मन में क्रोध भरा था। तुरंत ही भगवान कमलापति के पास चले। मन में सोचते जाते थे कि जाकर या तो शाप दूँगा या प्राण दे दूँगा। उन्होंने जगत में मेरी हँसी करायी। दैत्यों के शत्रु भगवान हरि उन्हें बीच रास्त में ही मिल गये। साथ में लक्ष्मी जी और वही राजकुमारी थीं।

देवताओं के स्वामी भगवान ने मीठी वाणी में कहा – हे मुनि! व्याकुल की तरह कहाँ चले? ये शब्द सुनते ही नारद को बड़ा क्रोध आया, माया के वशीभूत होने के कारण मन में चेत नहीं रहा। मुनि ने कहा – तुम दूसरों की सम्पदा नहीं देख सकते, तुम्हारे ईर्ष्या और कपट बहुत हैं। समुद्र मथते समय तुमने शिव जी को बावला बना दिया और देवताओं को प्रेरित करके उन्हें विषपान कराया। असुरों को मदिरा और शिव जी को विष देकर तुमने स्वयं लक्ष्मी और सुन्दर कौस्तुभ मणि ले ली। तुम बड़े धोखेबाज और मतलबी हो। सदा कपट का व्यवहार करते हो। तुम परम स्वतन्त्र हो, सिर पर तो कोई है ही नहीं। इससे जब जो मन को भाता है, स्वच्छन्ता से वही करते हो। भले को बुरा और बुरे को भला कर देते हो। हृदय में हर्ष-विषाद कुछ भी नहीं लाते। सबको ठग-ठग कर परच गये हो और अत्यन्त निडर हो गये हो। अब तक तुमको किसी ने ठीक नहीं किया था। अब तुमने मुझ जैसे जबरदस्त से छेड़खानी की है, अतः अपने किये का फल अवश्य पाओगे। जिस मनुष्य शरीर को धारण कर तुमने मुझे ठगा है, तुम भी वही शरीर धारण करो, यह मेरा शाप है। तुमने हमारा रूप बन्दर सा बना दिया था, इससे बन्दर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। मैं जिस स्त्री को चाहता था, उससे मेरा वियोग कराकर तुमने मेरा बड़ा अहित किया है, इसलिए तुम भी स्त्री के वियोग में दुःखी होओगे।

मुनि के शाप को स्वीकार कर, हृदय में हर्षित होते हुए प्रभु ने नारद जी से बहुत विनती की और कृपानिधान भगवान ने अपनी माया की प्रबलता खींच ली। माया के हटते ही न तो वहाँ लक्ष्मी थीं और न वह राजकुमारी ही। तब मुने ने अत्यन्त भयभीत होकर श्री हरि के चरण पकड़ लिये और कहा – हे शरणागत के दुःखों को हरनेवाले! मेरी रक्षा कीजिए। हे कृपालु! मेरा शाप मिथ्या हो जाये।

तब दीनों पर दया करने वाले भगवान ने कहा – यह सब मेरी ही इच्छा से हुआ है।

मुनि ने कहा – मैंने आपको अनेक खोटे वचन कहे हैं। मेरे पाप कैसे मिटेंगे?

भगवान ने कहा – जाकर शंकर जी के शतनाम का जप करो, इससे हृदय में तुरंत शान्ति होगी। शिव जी के समान मुझे कोई प्रिय नहीं है, इस विश्वास को भूलकर भी न छोड़ना। हे मुनि! पुरारि (शिव जी) जिस पर कृपा नहीं करते वह मेरी भक्ति नहीं कर पाता।

बहुत प्रकार से मुनि को समझा-बुझा कर प्रभु अन्तर्धान हो गये और नारद जी श्री रामचन्द्र जी के गुणों का गान करते हुए सत्यलोक को चले।

शिव जी के गणों ने जब मुनि को मोहरहित और मन में बहुत प्रसन्न होकर मार्ग में जाते हुए देखा तब वे अत्यन्त भयभीत होकर नारद जी के पास आये और उनके चरण पकड़ कर दीन वचन बोले – हे मुनिराज! हम ब्राह्मण नहीं हैं, शिव जी के गण हैं। हमने बड़ा अपराध किया, जिसका फल हमने पा लिया। हे कृपालु! अब शाप दूर करने की कृपा कीजिये।

दीनों पर दया करने वाले नारद जी ने कहा – तुम दोनों जाकर राक्षस होओ, तुम्हें महान ऐश्वर्य, तेज और बल की प्राप्ति हो। तुम अपनी भुजाओं के बल से जब सारे विश्व को जीत लोगे, तब भगवान विष्णु मनुष्य का शरीर धारण तुमसे युद्ध करेंगे। युद्ध में भगवान विष्णु के हाथों से तुम्हारी मृत्यु होने पर तुम शापमुक्त हो जाओगे।

कालान्तर में वे दोनों शिव जी के गण रावण और कुम्भकर्ण हुए।

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