Facebooktwittergoogle_plusredditpinterestlinkedinmail

शायरी (Shayari) का अपना अलग ही मजा है। श़ेर (Sher) गागर में सागर भर देने की विधा है।

प्रस्तुत है मेरे पसन्द की शायरी (Shayari) –

हमको किसके ग़म ने मारा, ये कहानी फिर सही
किसने तोड़ा दिल हमारा, ये कहानी फिर सही

दिल के लुटने का सबब पूछो ना सबके सामने
नाम आयेगा तुम्हारा, ये कहानी फिर सही

नफ़रतों के तीर खाकर दोस्तों के शहर में
हमने किस किस को पुकारा, ये कहानी फिर सही

क्या बतायें प्यार की बाजी वफ़ा की राह में
कौन जीता कौन हारा, ये कहानी फिर सही

– मंसूर अनवर

किस्मत के नाम को तो सब जानते हैं लेकिन,
किस्मत में क्या लिखा है अल्लाह जानता है.

– अख्तर शिरानी

जो भी बिछड़े हैं कब मिले हैं ‘फ़राज़’,
फिर भी तू इन्तज़ार कर शायद.

– अहमद फ़राज़

उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन,
दो आरज़ू में कट गए दो इन्तज़ार में.

– बहादुर शाह ज़फर

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए.

– बशीर बद्र

ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा,
काफ़िला साथ और सफ़र तन्हा.

– गुलज़ार

ज़िन्दगी तुझ से उम्मीद-ए-वफ़ा क्या रक्खूँ,
जब मुझे छोड़ गए दोस्त पुराने मेरे.

– मुज़फ्फर वारसी

ज़िन्दगी जब्र-ए-मुसलसल की तरह कटी है,
जाने किस ज़ुल्म की पाई है सज़ा याद नहीं.

– सागर सिद्दीकी

जब्र-ए-मुसलसल = निरन्तर संघर्ष

मौत इक गीत रात गाती थी,
ज़िन्दगी झूम-झूम जाती थी.

– फिराक़ गोरखपुरी

क्यूँ हमें मौत के पैग़ाम दिए जाते हैं
ये सज़ा कम है कि जिए जाते हैं

– शमीम जयपुरी

मैं कभी न मुसकुराता जो मुझे ये इल्म होता
कि हज़ारों ग़म मिलेंगे मुझे इक खुशी से पहले।

ये अजीब इम्तिहाँ है कि तुम्हीं को भूलना है
मिले कब थे इस तरह हम तुम्हें बेदिली से पहले।

है ये मेरी बदनसीबी तेरा क्या कुसूर इसमें
तेरे ग़म ने मार डाला मुझे ज़िन्दग़ी से पहले।

हमें कोई ग़म नहीं था ग़म-ए-आशिक़ी से पहले
न थी दुश्मनी किसी से तेरी दोस्ती से पहले।

Facebooktwittergoogle_plusredditpinterestlinkedinmail