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आपके ज्ञानवर्धन हेतु प्रस्तुत है रामचरितमानस (Ramcharitmanas), जिसे कि तुलसी रामायण (Ramayana) के नाम से भी जाना जाता है, की कहानियाँ (Ramcharitmanas Stories or Ramayana Stories)

भरद्वाज-याज्ञवल्क्य संवाद (Stories from Ramcharitmanas)

ऋषि भरद्वाज का आश्रम प्रयाग में गंगा के किनारे स्थित है। प्रतिवर्ष जब माघ के महीने में सूर्य मकर राशि पर आते हैं तो तीर्थराज प्रयाग के दर्शन करने तथा त्रिवेणी-स्नान करने लोग आते हैं। उस समय ऋषि-मुनियों का समाझ भी भरद्वाज मुनि के आश्रम में जुटता है। माघ के महीने भर गंगा-स्नान करने के पश्चात् सभी ऋषि-मुनि अपने आश्रमों को वापस लौट जाते हैं।

एक बार मकर-स्नान करने के बाद जब सभी ऋषि-मुनि वापस लौटने लगे तो भरद्वाज ने परम ज्ञानी याज्ञवल्क्य को अपने आश्रम में ही रोक लिया। भरद्वाज मुनि ने ऋषि याज्ञवल्क्य से कहा, “हे नाथ! आप वेद का तत्व जानने वाले हैं और मैं परम अज्ञानी हूँ। मेरे मन में एक बड़ा सन्देह है। हे प्रभु! कल्याणस्वरूप, ज्ञान और गुणों के खान, अविनाशी भगवान शंकर निरन्तर श्री राम का नाम जपते हैं। कृपया मुझे बताइये कि वे राम कौन हैं? एक राम तो अवधनरेश महाराज दशरथ जी के कुमार हैं, उनका चरित्र सारा संसार जानता है। उन्होंने स्त्री के विरह में अपार दुःख उठाया और क्रोध आने पर युद्ध में रावण को मार डाला। हे प्रभो! क्या ये वही राम हैं जिन्हें शिव जी जपते रहते हैं?”

याज्ञवल्क्य जी ने भरद्वाज से कहा, “मैं जानता हूँ कि तुम मन, वचन और कर्म से श्री राम जी के भक्त हो और चतुराई के साथ मुझसे श्री राम जी की कथा सुनना चाहते हो। तो, हे तात! तुम आदरपूर्वक मन लगाकर सुनो; मैं श्री राम जी की सुन्दर कथा कहता हूँ। एक बार ऐसा ही सन्देह पार्वती जी ने भी किया था तब महादेव जी ने विस्तारपूर्वक उसका उत्तर दिया था। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वही उमा और शिव जी का संवाद तुमसे कहता हूँ।

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