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पौराणिक कथाओं (Mythological Stories in Hindi) के अन्तर्गत प्रस्तुत है शान्तनु और सत्यवती की कथा (Story of Shantanu and Satyavati – Mythological Stories in Hindi)

महाभारत (Mahabharat) महाकाव्य में शान्तनु (Shantanu) और सत्यवती (Satyavati) की कथा आती है जो इस प्रकार है –

एक दिन महाराज शान्तनु (Shantanu) यमुना के किनारे पर घूम रहे थे तो उन्हें नदी में नाव चलाती हुई एक सुन्दर कन्या दिखी। उसके अंग-अंग से सुगन्ध निकल कर वातावरण में चारों ओर फैल रहा था।

शान्तनु ने उससे पूछा, “सुन्दरी! तुम किसकी कन्या हो? कृपा करके मुझे अपना परिचय दो।”

कन्या ने जवाब दिया, “महाराज! मैं निषाद-कन्या हूँ और मेरा नाम सत्यवती (Satyavati) है।”

महाराज उसकी सुन्दरता, मधुरता शरीर से निकल कर फैलने वाली सुगन्ध मोहित हो गये। वे तत्काल उसके पिता के पास पहुँचे और सत्यवती के साथ अपने विवाह का प्रस्ताव किया।

उनके इस प्रस्ताव पर निषाद ने कहा, “राजन्! मुझे अपनी पुत्री का आपके साथ विवाह करने में कोई ऐतराज नहीं है किन्तु आपको मेरी कन्या के गर्भ से उत्पन्न पुत्र को ही अपने राज्य का उत्तराधिकारी बनाना होगा।” निषाद के इन वचनों को सुन कर महाराज शान्तनु चुपचाप हस्तिनापुर लौट आये क्योंकि वे गंगापुत्र देवव्रत का अधिकार नहीं छीन सकते थे।

सत्यवती के वियोग में महाराज शान्तनु व्याकुल रहने लगे। उनका शरीर कमजोर होने लगा। महाराज की यह दशा देखकर देवव्रत को बड़ी फिक्र हुई। जब उन्हें मन्त्रियों ने उसके पिता की इस प्रकार की दशा होने का कारण बताया तो वे उसी पल समस्त मन्त्रियों के साथ निषाद के घर जा पहुँचे और उन्होंने निषाद से कहा, “हे निषाद! आप सहर्ष अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह मेरे पिता शान्तनु के साथ कर दें। मैं आपको वचन देता हूँ कि आपकी पुत्री के गर्भ से जो बालक जन्म लेगा वही राज्य का उत्तराधिकारी होगा। भविष्य में मेरी कोई सन्तान आपकी पुत्री के सन्तान का अधिकार छीन न पाये इस कारण से मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं आजन्म अविवाहित रहूँगा।”

उनकी इस प्रतिज्ञा को सुन कर निषाद ने हाथ जोड़ कर कहा, “हे देवव्रत! आपकी यह प्रतिज्ञा अभूतपूर्व है।” इतना कह कर निषाद ने तत्काल अपनी पुत्री सत्यवती को देवव्रत तथा उनके मन्त्रियों के साथ हस्तिनापुर भेज दिया।

देवव्रत ने अपनी माता सत्यवती को लाकर अपने पिता शान्तनु को सौंप दिया। पिता ने प्रसन्न होकर पुत्र से कहा, “पुत्र! तूने पितृभक्ति के वशीभूत होकर ऐसी प्रतिज्ञा की है जैसी कि न आज तक किसी ने किया है और न भविष्य में करेगा। मैं तुझे वरदान देता हूँ कि तेरी मृत्यु तेरी इच्छा से ही होगी। तेरी इस प्रकार की प्रतिज्ञा करने के कारण तू भीष्म कहलायेगा और तेरी प्रतिज्ञा भीष्म प्रतिज्ञा के नाम से सदैव प्रख्यात रहेगी।”

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