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आपके ज्ञानवर्धन हेतु प्रस्तुत है रामचरितमानस (Ramcharitmanas), जिसे कि तुलसी रामायण (Ramayana) के नाम से भी जाना जाता है, की कहानियाँ (Ramcharitmanas Stories or Ramayana Stories)

रामचरितमानस की कहानियाँ – विश्वमोहिनी (Stories from Ramcharitmanas)

श्री हरि ने, यह सोचकर कि मैं अवश्य ही वह उपाय करूँगा जिससे नारद मुनि का कल्याण और मेरा खेल हो, अपनी माया को प्रेरित किया तथा जिस रास्ते से नारद जी जा रहे थे उस रास्ते में सौ योजन का एक सुन्दर नगर रचा। उस नगर में शीलनिधि नाम का राजा रहता था, जिसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेना के समूह थे। उसका वैभव और विलास सौ इन्द्रों के समान था। वह रूप, तेज, बल और नीति का घर था। उसके विश्वमोहिनी (Vishwamohini) नाम की एक ऐसी रूपवती कन्या थी, जिसके रूप को देखकर लक्ष्मी जी भी मोहित हो जाएँ। वह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती थी, इसलिये वहाँ अगणित राजा आये हुए थे।

कौतुकवश नारद मुनि उस नगर में गये और नगरवासियों से उन्होंने सब हाल पूछा। सब समाचार सुनकर वे राजा के महल में आए। राजा ने पूजा करके मुनि को यथोचित आसन दिया। फिर राजा ने राजकुमारी को नारद जी को दिखलाया और पूछा कि हे नाथ! आप विचार करके इसके सब गुण-दोष कहिए।

उसके रूप को देखकर मुनि वैराग्य भूल गये। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने-आप को भी भूल गये और हृदय में हर्षित हुए, पर प्रकट रूप में उन लक्षणों को नहीं कहा। लक्षणों को देखकर वे मन में कहने लगे कि जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जायेगा और रणभूमि में कोई उसे जीत न सकेगा। यह शीलनिधि की कन्या जिसको वरेगी, सब चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे। सब लक्षणों को विचारकर मुनि ने अपने हृदय में रख लिया और राजा से कुछ अपनी ओर से बनाकर कह दिया।

फिर नारद जी ने वहाँ से प्रस्थान किया पर उनके मन में यह चिन्ता थी कि मैं सोच-विचार कर अब वही उपाय करूँ जिससे यह कन्या मुझे ही वरे। इसके लिए तो मुझे सुन्दर रूप चाहिये, जिसे देखकर राजकुमारी मुझ पर रीझ जाये और जयमाल मेरे गले में डाल दे। श्री हरि मेरे हितचिन्तक हैं अतः मैं उन्हीं से उनका सुन्दर रूप माँग लेता हूँ। ऐसा सोचकर नारद जी ने भगवान विष्णु का स्मरण किया और भगवान विष्णु उनके समक्ष प्रकट हो गये।

नारद जी ने बहुत आर्त होकर सब कथा कह सुनाई और प्रार्थना की कि हे प्रभो! आप अपना रूप मुझे दीजिये ताकि मैं उस कन्या को प्राप्त कर सकूँ। हे नाथ! जिस तरह मेरा हित हो, आप वही कीजिये। प्रभु ने कहा कि हे नारद जी! जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे। हे योगी मुनि! रोग से व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता। इसी प्रकार मैंने भी तुम्हारा हित करने की ठान ली है। ऐसा कहकर भगवान अन्तर्धान हो गए।

माया के वशीभूत नारद प्रभु की स्पष्ट वाणी को भी समझ न सके और स्वयंवर स्थल की ओर चल पड़े।

रामचरितमानस की कहानियाँ – विश्वमोहिनी का स्वयंवर (Stories from Ramcharitmanas)
विश्वमोहिनी के स्वयंवर में राजा लोग खूब सज-धज कर अपने आसन पर बैठे थे। नारद मुनि मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे कि मेरा रूप बड़ा सुन्दर है, मुझे छोड़ कन्या भूलकर भी दूसरे को न वरेगी। कृपानिधान भगवान ने मुनि के कल्याण के लिए उन्हें ऐसा कुरूप बना दिया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता, पर यह चरित कोई नहीं जान सका। सबने उन्हें नारद ही जानकर प्रणाम किया।

वहाँ शिव जी के दो गण भी थे। वे सब भेद जानते थे और ब्राह्मण का वेश बनाकर सारी लीला देखते फिरते थे। वे भी बड़े मौजी थे। वे शिव जी के दोनों गण भी नारद जी के पास जाकर बैठ गए। वे नारद जी को सुना-सुना कर व्यंग वचन कहते थे – भगवान ने इन्हें ऐसा सुन्दर रूप दिया है कि राजकुमारी रीझ जाएगी और “हरि” (वानर) जानकर इन्हीं को ही वरेंगी। यद्यपि मुनि उनकी अटपटी बातें सुन रहे थे, पर बुद्धि भ्रम से सनी होने के कारण वे बातें उनकी समझ में नहीं आती थीं और वे उन बातों को अपनी प्रशंसा समझ रहे थे।

राजकुमारी हाथ में वरमाला लिए सभा में पहुँची। राजकन्या को नारद जी का मुँह बन्दर जैसा दिखाई पड़ा इसलिए उसने नारद जी की ओर भूलवश भी नहीं ताका। नारद जी बार-बार उचकते और छटपटाते थे। उनकी दशा देखकर शिव जी के गण मुसकुराते थे। भगवान विष्णु भी राजा का शरीर धारण कर वहाँ उपस्थित थे। राजकुमारी ने हर्षित होकर भगवान विष्णु के गले में जयमाला डाल दी। लक्ष्मीनिवास भगवान दुलहिन को ले गए।

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