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पौराणिक कथाओं (Mythological Stories in Hindi) के अन्तर्गत प्रस्तुत है ययाति, देवयानी और शर्मिष्ठा की कथा (Story of Yayati, Devayani and Sharmishtha – Mythological Stories in Hindi)

राजा ययाति (Yayati) का देवयानी (Devayani) और शर्मिष्ठा (Sharmishtha) से विवाह की कथा इस प्रकार है –

देवयानी (Devayani) दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री थी और शर्मिष्ठा (Sharmishtha) दैत्यराज वृषपर्वा की। शर्मिष्ठा (Sharmishtha) रूप-यौवन में अत्यन्त सुन्दर थी पर देवयानी (Devayani) का रूप-लावण्य भी कम सुन्दर न था। एक बार देवयानी और शर्मिष्ठा सरोवर में स्नान कर रही थीं। स्नान के बाद गलती से शर्मिष्ठा ने देवयानी के वस्त्रों को पहन लिया इस पर देवयानी ने, जो कि ब्राह्मण कन्या होने के कारण स्वयं को श्रेष्ठ समझती थी, शर्मिष्ठा को खरी-खोटी सुनाते हुए कहा कि दुष्टा तूने मेरे वस्त्र अपवित्र कर दिये। रास्ते में, अपने अपमान का बदला लेने के लिए, शर्मिष्ठा ने देवयानी को एक सूख कुएँ में ढकेल दिया और वहाँ से चली गई।

कुछ देर बाद जब राजा ययाति (Yayati) उसी रास्ते से निकले तो देवयानी की चीखें सुनकर उसे कुएँ से बाहर निकाला और शुक्राचार्य के घर पहुँचाया। सारी बातें जानने पर शुक्राचार्य क्रोधित हो गये और दैत्यराज वृषपर्वा को बुला कर कहा कि यदि शर्मिष्ठा को जीवन भर के लिए देवयानी की दासी न बनाया गया तो वे नगर छोड़ कर चल देंगे। इस प्रकार शर्मिष्ठा देवयानी की दास बना दी गई।

देवयानी की इच्छानुसार शुक्राचार्य ने उसका विवाह ययाति के साथ कर दिया। दासी बनकर शर्मिष्ठा भी देवयानी के साथ ययाति के घर चली गई। देवयानी से ययाति के यदु और तर्वसु नामक दो पुत्र हुए। एक बार शर्मिष्ठा ने भी ययाति से पुत्र प्राप्ति की याचना की और शर्मिष्ठा से ययाति के दह्यु, अनु और पुरु नामक तीन पुत्र हुए।

शर्मिष्ठा के साथ ययाति के सम्बन्ध से रुष्ट देवयानी ने सारी बातें अपने पिता शुक्राचार्य से कहीं। शुक्राचार्य ने ययाति को तत्काल वृद्ध हो जाने का शाप दे दिया और ययाति तुरन्त बूढ़े हो गये। ययाति ने शुक्राचार्य से क्षमा माँगते हुए कहा कि उनके बूढ़े हो जाने के कारण देवयानी भी भोग का सुख नहीं प्राप्त कर पायेगी इसलिए शुक्राचार्य उन्हें फिर से जवान बना दें। इस पर शुक्राचार्य ने कहा कि यदि कोई अपनी युवावस्था तुम्हें देने को तैयार हो जायेगा तो तुम फिर से जवान हो जाओगे।

ययाति ने अपने पुत्रों से अपना यौवन देने के लिए कहा, अन्य सभी पुत्रों ने इंकार कर दिया किन्तु सबसे छोटा पुत्र पुरु इसके लिए तैयार हो गया। इस प्रकार ययाति युवा हो गये और पुरु उनके स्थान पर बूढ़ा हो गया। हजारों वर्ष तक यौवन का सुख भोगने के बाद ययाति ने पुरु को उसकी युवावस्था वापस कर दिया।

ययाति के बड़े पुत्र यदु से यदुवंश और छोटे पुत्र पुरु से पुरुवंश की स्थापना हुई।

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